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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० १३] पञ्चम स्कन्ध ५१७

अ० १३] पञ्चम स्कन्ध ५१७

समये ते विभिद्यन्ते परैस्तु परिवञ्चिताः।<br>स्वच्छिद्रं शत्रुपक्षीयान्निर्दिशन्ति गृहस्थिताः॥ ६०<br><br>कार्यभेदकरा नित्यं कोशगुप्तासिवत्सदा।<br>संग्रामेऽथ समुत्पन्ने भीषयन्ति प्रभुं सदा॥ ६१कार्य सिद्ध करते हैं। वे समय आनेपर परपक्षके लोगोंसे प्रलोभन पाकर अपने स्वामीका भेद खोल देते हैं और घरमें बैठे-बैठे अपनी कमजोरी शत्रुपक्षके लोगोंको बता देते हैं। ऐसे मन्त्री म्यानमें छिपी तलवारकी भाँति अपने स्वामीके कार्यमें बाधा डालते हैं और संग्रामकी स्थिति उत्पन्न होनेपर सदा उन्हें डराते रहते हैं॥ ५९-६१॥
विश्वासस्तु न कर्तव्यस्तेषां राजन् कदाचन।<br>विश्वासे कार्यहानिः स्यान्मन्त्रहानिः सदैव हि॥ ६२<br><br>खलाः किं किं न कुर्वन्ति विश्वस्ता लोभतत्पराः।<br>तामसाः पापनिरता बुद्धिहीनाः शठास्तथा॥ ६३हे राजन्! उन मन्त्रियोंका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि उनका विश्वास करनेपर काम बिगड़ जाता है और गुप्त भेद भी खुल जाता है। लोभी, तमोगुणी, पापी, बुद्धिहीन, शठ तथा खल मन्त्रियोंका विश्वास कर लेनेपर वे क्या-क्या अनर्थ नहीं कर डालते?॥ ६२-६३॥
तस्मात्कार्यं करिष्यामि गत्वाहं रणमस्तके।<br>चिन्ता त्वया न कर्तव्या सर्वथा नृपसत्तम॥ ६४<br><br>गृहीत्वा तां दुराचारामागमिष्यामि सत्वरः।<br>पश्य मेऽद्य बलं धैर्यं प्रभुकार्यं स्वशक्तितः॥ ६५अतएव हे नृपश्रेष्ठ! मैं स्वयं युद्धभूमिमें जाकर आपका कार्य सम्पन्न करूँगा। आप किसी भी तरहकी चिन्ता न करें। मैं उस दुराचारिणी स्त्रीको पकड़कर आपके पास शीघ्र ले आऊँगा। आप मेरा बल तथा धैर्य देखें। मैं अपनी पूरी शक्तिसे अपने स्वामीका कार्य सिद्ध करूँगा॥ ६४-६५॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीपराजयकरणाय दुर्धरप्रबोधवचनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


अथ त्रयोदशोऽध्यायः

बाष्कल और दुर्मुखका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध

व्यास उवाच
इत्युक्त्वा तौ महाबाहू दैत्यौ बाष्कलदुर्मुखौ।<br>जग्मतुर्मददिग्धाङ्गौ सर्वशस्त्रास्त्रकोविदौ॥ १व्यासजी बोले—हे राजन्! ऐसा कहकर अभिमानसे चूर अंगोंवाले तथा सभी शस्त्रास्त्रोंके विशारद वे दोनों महाबाहु दैत्य बाष्कल तथा दुर्मुख समरांगणकी ओर चल पड़े॥ १॥
तौ गत्वा समरे देवीमूचतुर्वचनं तदा।<br>दानवौ च मदोन्मत्तौ मेघगम्भीरया गिरा॥ २इसके बाद वे दोनों मदोन्मत्त दानव समरभूमिमें पहुँचकर मेघ-गर्जनके समान गम्भीर वाणीमें देवीसे कहने लगे॥ २॥
देवि देवा जिता येन महिषेण महात्मना।<br>वरय त्वं वरारोहे सर्वदैत्याधिपं नृपम्॥ ३हे देवि! हे सुन्दरि! जिन महान् महिषासुरने सभी देवताओंपर विजय प्राप्त कर ली है; सभी दैत्योंके अधिष्ठाता उन नरेश महिषासुरका आप वरण कर लें॥ ३॥

५९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स कृत्वा मानुषं रूपं सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>भूषितं भूषणैर्दिव्यैस्त्वामेष्यति रहः किल॥ ४वे सभी लक्षणोंसे सम्पन्न मनुष्य-रूप धारण करके तथा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत होकर एकान्तमें आपसे मिलनेके लिये आयेंगे॥ ४॥
त्रैलोक्यविभवं कामं त्वमेष्यसि शुचिस्मिते।<br>महिषे परं भावं कुरु कान्ते मनोगतम्॥ ५हे सुन्दर मुस्कानवाली देवि! [उन्हें पतिके रूपमें स्वीकार कर लेनेपर] आपको तीनों लोकोंका वैभव निश्चय ही प्राप्त हो जायगा। अतः हे कान्ते! उन महिषासुरके प्रति आप अपने मनमें परम प्रेमभाव रखिये॥ ५॥
कृत्वा पतिं महावीरं संसारसुखमद्भुतम्।<br>त्वं प्राप्स्यसि पिकालापे योषितां खलु वाञ्छितम्॥ ६हे कोकिलभाषिणि! महान् पराक्रमी महिषासुरको अपना पति बनाकर आप स्त्रियोंके लिये अभीष्ट अद्भुत सांसारिक सुख प्राप्त करेंगी॥ ६॥
देव्युवाचदेवी बोलीं—
जाल्म त्वं किं विजानासि नारीयं काममोहिता।<br>मन्दबुद्धिर्बलात्यर्थं भजेयं महिषं शठम्॥ ७अरे दुष्ट! क्या तुम यह समझ रहे हो कि यह कोई काममोहित, बुद्धिहीन तथा बलरहित नारी है? मैं उस मूर्ख महिषासुरकी सेवा कैसे कर सकती हूँ?॥ ७॥
कुलशीलगुणैस्तुल्यं तं भजन्ति कुलस्त्रियः।<br>अधिकं रूपचातुर्यबुद्धिशीलक्षमादिभिः॥ ८कुलीन स्त्रियाँ कुल, चरित्र तथा गुणमें समानता रखनेवाले एवं रूप, चतुरता, बुद्धि, व्यवहार, क्षमा आदिसे विशेषरूपसे सम्पन्न पुरुषको ही स्वीकार करती हैं॥ ८॥
का नु कामातुरा नारी भजेच्च पशुरूपिणम्।<br>पशूनामधमं नूनं महिषं देवरूपिणी॥ ९ऐसी कौन देवरूपिणी नारी होगी, जो कामातुर होकर पशुरूपधारी तथा पशुओंमें भी अधम महिषको अपना पति बनाना चाहेगी?॥ ९॥
गच्छतं महिषं तूर्णं भूपं बाष्कलदुर्मुखौ।<br>वदतं मद्वचो दैत्यं गजंतुल्यं विषाणिनम्॥ १०<br><br>पातालं गच्छ वाभ्येत्य संग्रामं कुरु वा मया।<br>रणे जाते सहस्त्राक्षो निर्भयः स्यादिति ध्रुवम्॥ ११<br><br>हत्वाहं त्वां गमिष्यामि नान्यथा गमनं मम।<br>इत्थं ज्ञात्वा सुदुर्बुद्धे यथेच्छसि तथा कुरु॥ १२<br><br>मामनिर्जित्य भूभागे न स्थानं ते कदाचन।<br>भविष्यति चतुष्पाद दिवि वा गिरिकन्दरे॥ १३हे बाष्कल और दुर्मुख! तुम लोग तत्काल अपने राजा महिषासुरके पास जाओ और हाथीके समान विशाल शरीरवाले तथा शृङ्गधारी उस दानवसे मेरा सन्देश कह दो—‘तुम पाताललोक चले जाओ अथवा यहाँ आकर मेरे साथ युद्ध करो। संग्राम होनेपर ही इन्द्र निर्भय हो सकते हैं—यह निश्चित है। मैं तुम्हारा वध करके ही जाऊँगी, बिना तुम्हें मारे मैं नहीं जा सकती। हे महामूर्ख! यह समझकर अब तुम जो चाहते हो वैसा करो। हे चतुष्पाद! बिना मुझको पराजित किये पृथ्वीके किसी भी भागमें, अन्तरिक्ष या पर्वतकी गुफामें कहीं भी अब तुम्हें शरण नहीं मिलेगी’॥ १०—१३॥
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इत्युक्तौ तौ तया दैत्यौ कोपाकुलितलोचनौ।<br>धनुर्बाणधरौ वीरौ युद्धकामौ बभूवतुः॥ १४देवीके ऐसा कहनेपर क्रोधसे तमतमाये नेत्रोंवाले वे दोनों दैत्य धनुष-बाण लेकर युद्ध करनेके लिये तैयार हो गये॥ १४॥