देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १३ ] चतुर्थ स्कन्ध ४६५
अ० १३ ] चतुर्थ स्कन्ध ४६५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तथेति तमुवाचाथ जयन्ती धर्मवित्तमा।<br>यथेष्टं गच्छ धर्मज्ञ न ते धर्मं विलोपये॥ ५२ | परम धर्मपरायणा जयन्तीने उनसे कहा—हे धर्मज्ञ! बहुत ठीक है, आप स्वेच्छापूर्वक जाइये। मैं आपका धर्म लुप्त नहीं होने दूँगी॥ ५२॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं काव्यो जगाम त्वरितस्ततः।<br>अपश्यद्दानवानां च पार्श्वे वाचस्पतिं तदा॥ ५३<br><br>छद्मरूपधरं सौम्यं बोधयन्तं छलेन तान्।<br>जैनं धर्मं कृतं स्वेन यज्ञनिन्दापरं तथा॥ ५४<br><br>भो देवरिपवः सत्यं ब्रवीमि भवतां हितम्।<br>अहिंसा परमो धर्मोऽहन्तव्या ह्याततायिनः॥ ५५<br><br>द्विजैर्भोगरतैर्वेदे दर्शितं हिंसनं पशोः।<br>जिह्वास्वादपरैः काममहिंसैव परा मता॥ ५६ | उसका यह वचन सुनकर शुक्राचार्य वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि दैत्योंके पास विराजमान होकर बृहस्पति छद्मरूप धारण करके शान्तचित्त हो छलसे उन्हें अपने द्वारा रचित जिन-धर्म तथा यज्ञनिन्दापरक वचनोंकी शिक्षा इस प्रकार दे रहे हैं—‘हे देवताओंके शत्रुगण! मैं सत्य तथा आपलोगोंके हितकी बात बता रहा हूँ कि अहिंसा सर्वोपरि धर्म है। आततायियोंको भी नहीं मारना चाहिये। भोगपरायण तथा अपनी जिह्वाके स्वादके लिये सदा तत्पर रहनेवाले द्विजोंने वेदमें पशुहिंसाका उल्लेख कर दिया है, किंतु सच्चाई यह है कि अहिंसाको ही सर्वोत्कृष्ट माना गया है’॥ ५३-५६॥ |
| एवंविधानि वाक्यानि वेदशास्त्रपराणि च।<br>ब्रुवाणं गुरुमाकर्ण्य विस्मितोऽसौ भृगोः सुतः॥ ५७<br><br>चिन्तयामास मनसा मम द्वेष्यो गुरुः किल।<br>वञ्चिताः किल धूर्तेन याज्या मे नात्र संशयः॥ ५८ | इस प्रकारकी वेद-शास्त्रविरोधी बातें कहते हुए देवगुरु बृहस्पतिको देखकर वे भृगुपुत्र शुक्राचार्य आश्चर्यचकित हो गये। वे मन-ही-मन सोचने लगे कि यह देवगुरु तो मेरा शत्रु है। इस धूर्तने मेरे यजमानोंको अवश्य ठग लिया है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ५७-५८॥ |
| धिग्लोभं पापबीजं वै नरकद्वारमूर्जितम्।<br>गुरुरप्यनृतं ब्रूते प्रेरितो येन पाप्मना॥ ५९ | नरकके द्वारस्वरूप तथा पापके बीजरूप उस उग्र लोभको धिक्कार है, जिस लोभरूप पापसे प्रेरित होकर देवगुरु बृहस्पति भी झूठ बोल रहे हैं॥ ५९॥ |
| प्रमाणं वचनं यस्य सोऽपि पाखण्डधारकः।<br>गुरुः सुराणां सर्वेषां धर्मशास्त्रप्रवर्तकः॥ ६० | जिनका वचन प्रमाण माना जाता है और जो समस्त देवताओंके गुरु तथा धर्मशास्त्रोंके प्रवर्तक हैं, वे भी पाखण्डके पोषक हो गये हैं॥ ६०॥ |
| किं किं न लभते लोभान्मलिनीकृतमानसः।<br>अन्योऽपि गुरुरप्येवं जातः पाखण्डपण्डितः॥ ६१<br><br>शैलूषचेष्टितं सर्वं परिगृह्य द्विजोत्तमः।<br>वञ्चयत्यतिसम्मूढान्दैत्यान्याज्यान्ममाप्यसौ॥ ६२ | लोभसे विकृत मनवाला प्राणी क्या-क्या नहीं कर डालता। दूसरोंकी क्या बात, जबकि साक्षात् देवगुरु ही इस प्रकारके पाखण्डके पण्डित हो गये हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी ये धूर्तोंकी सारी भाव-भंगिमाएँ बनाकर मेरे इन घोर अज्ञानी दैत्य यजमानोंको ठग रहे हैं॥ ६१-६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे शुक्लरूपेण गुरुणा दैत्यवञ्चनावर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
| ४६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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अथ चतुर्दशोऽध्यायः
शुक्राचार्यद्वारा दैत्योंको बृहस्पतिका पाखण्डपूर्ण कृत्य बताना, बृहस्पतिकी मायासे मोहित दैत्योंका उन्हें फटकारना, क्रुद्ध शुक्राचार्यका दैत्योंको शाप देना, बृहस्पतिका अन्तर्धान हो जाना, प्रह्लादका शुक्राचार्यजीसे क्षमा माँगना और शुक्राचार्यका उन्हें प्रारब्धकी बलवत्ता समझाना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| इति सञ्चिन्त्य मनसा तानुवाच हसन्निव।<br>वञ्चिता मत्स्वरूपेण दैत्याः किं गुरुणा किल॥ १<br><br>अहं काव्यो गुरुश्चायं देवकार्यप्रसाधकः।<br>अनेन वञ्चिता यूयं मद्याज्या नात्र संशयः॥ २<br><br>मा श्रद्दध्वं वचोऽस्यार्या दाम्भिकोऽयं मदाकृतिः।<br>अनुगच्छत मां याज्यास्त्यजतैनं बृहस्पतिम्॥ ३ | मनमें ऐसा सोचकर उन दैत्योंसे शुक्राचार्यने हँसते हुए कहा—हे दैत्यगण! मेरा स्वरूप बनाये हुए इस देवगुरु बृहस्पतिने तुमलोगोंको ठग लिया क्या? शुक्राचार्य मैं हूँ और ये तो देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाले देवगुरु बृहस्पति हैं। हे मेरे यजमानो! इन्होंने तुम सबको अवश्य ठग लिया; इसमें सन्देह नहीं है। हे आर्यो! इनकी बातोंपर विश्वास मत करो। ये पाखण्डी हैं तथा मेरा स्वरूप बनाये हुए हैं। हे यजमानो! तुमलोग मेरा अनुसरण करो और इन बृहस्पतिका त्याग कर दो॥ १—३॥ |
| इत्याकर्ण्य वचस्तस्य दृष्ट्वा तौ सदृशौ पुनः।<br>विस्मयं परमं जग्मुः काव्योऽयमिति निश्चिताः॥ ४ | उनका यह वचन सुनकर और फिर उन दोनोंको समान रूपवाला देखकर सभी दैत्य महान् आश्चर्यमें पड़ गये। पुनः उन्होंने विचार किया कि हो सकता है ये ही शुक्राचार्य हों॥ ४॥ |
| स तान्वीक्ष्य सुसम्भ्रान्तान्गुरुर्वाक्यमुवाच ह।<br>गुरुर्वो वञ्चयत्येव मद्रूपोऽयं बृहस्पतिः॥ ५<br><br>प्राप्तो वञ्चयितुं युष्मान्देवकार्यार्थसिद्धये।<br>मा विश्वासं वचस्तस्य कुरुध्वं दैत्यसत्तमाः॥ ६<br><br>प्राप्ता विद्या मया शम्भोर्युष्मानध्यापयामि ताम्।<br>देवेभ्यो विजयं नूनं करिष्यामि न संशयः॥ ७ | इस प्रकार उन दैत्योंको अत्यन्त विस्मित देखकर [शुक्राचार्यरूपधारी] गुरु बृहस्पतिने यह बात कही—मेरा स्वरूप बनाये हुए ये देवगुरु बृहस्पति तुम सबको धोखा दे रहे हैं। ये देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके निमित्त तुमलोगोंको ठगनेके लिये आये हुए हैं। हे श्रेष्ठ दैत्यगण! तुमलोग इनकी बातपर विश्वास मत करो। मैंने शंकरजीसे विद्या प्राप्त कर ली है और उसे तुम सबको पढ़ा रहा हूँ। इस प्रकार मैं तुम्हें देवताओंपर विजय दिला दूँगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५—७॥ |
| इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं काव्यरूपधरस्य ते।<br>विश्वासं परमं जग्मुः काव्योऽयमिति निश्चयात्॥ ८<br><br>काव्येन बहुधा तत्र बोधिताः किल दानवाः।<br>बुबुधुर्न गुरोर्मायामोहिताः कालपर्ययात्॥ ९ | शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले देवगुरु बृहस्पतिका यह वाक्य सुनकर उन दैत्योंको पूर्ण विश्वास हो गया कि ये ही निश्चितरूपसे [हमारे गुरु] शुक्राचार्य हैं। उस समय शुक्राचार्यने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया फिर भी समयके फेरसे गुरु बृहस्पतिकी मायासे मोहित होनेके कारण वे दैत्य समझ नहीं सके॥ ८-९॥ |
| अ० १४ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४६७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं ते निश्चयं कृत्वा ततो भार्गवमब्रुवन् ।<br>अयं गुरुर्नो धर्मात्मा बुद्धिदश्च हिते रतः ॥ १०<br><br>दशवर्षाणि सततमयं नः शास्ति भार्गवः ।<br>गच्छ त्वं कुहको भासि नास्माकं गुरुरप्युत ॥ ११ | ऐसा निश्चय करनेके उपरान्त उन्होंने शुक्राचार्यसे कहा—ये ही हमारे गुरु हैं। ये धर्मात्मा हमें बुद्धि प्रदान करनेवाले हैं और हमारा हित करनेमें तत्पर हैं। इन शुक्राचार्यजीने हमें निरन्तर दस वर्षतक शिक्षा दी है। तुम चले जाओ, तुम धूर्त जान पड़ते हो; तुम हमारे गुरु बिलकुल नहीं हो सकते ॥ १०-११ ॥ |
| इत्युक्त्वा भार्गवं मूढा निर्भर्त्स्य च पुनः पुनः ।<br>जगृहुस्तं गुरुं प्रीत्या प्रणिपत्याभिवाद्य च ॥ १२ | ऐसा कहकर उन मूर्ख दैत्योंने शुक्राचार्यको बार-बार फटकारा और बृहस्पतिको प्रेमपूर्वक प्रणाम तथा अभिवादन करके उन्हें ही अपना गुरु स्वीकार कर लिया ॥ १२ ॥ |
| काव्यस्तु तन्मयान्दृष्ट्वा चुकोपाथ शशाप च ।<br>दैत्यान्विबोधितान्मत्वा गुरुणा चातिवञ्चितान् ॥ १३<br><br>यस्मान्मया बोधिता वै गृह्णीयुर्न च मे वचः ।<br>तस्मात्प्रनष्टसंज्ञा वै पराभवमवाप्स्यथ ॥ १४<br><br>मदवज्ञाफलं कामं स्वल्पे काले ह्यवाप्स्यथ ।<br>तदास्य कपटं सर्वं परिज्ञातं भविष्यति ॥ १५ | देवगुरु बृहस्पतिने इन दैत्योंको पूर्णरूपसे सिखा-पढ़ा दिया है तथा इन्हें खूब ठगा है—ऐसा मानकर और इन्हें गुरु बृहस्पतिमें तन्मय देखकर शुक्राचार्य बहुत कुपित हुए और उन्होंने शाप दे दिया कि मेरे बार-बार समझानेपर भी तुमलोगोंने मेरी बात नहीं मानी, इसलिये नष्ट बुद्धिवाले तुम सब पराभवको प्राप्त होओगे। तुमलोग थोड़े ही समयमें मेरे तिरस्कारका फल पाओगे। तब इनका सारा कपट तुम सबको मालूम पड़ जायगा ॥ १३–१५ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वासौ जगामाशु भार्गवः क्रोधसंयुतः ।<br>बृहस्पतिर्मुदं प्राप्य तस्थौ तत्र समाहितः ॥ १६ | व्यासजी बोले— ऐसा कहकर क्रोधमें भरे शुक्राचार्य तत्काल चल दिये और [शुक्राचार्यरूपधारी] बृहस्पति प्रसन्न होकर निश्चिन्तभावसे वहाँ रहने लगे ॥ १६ ॥ |
| ततः शप्तानगुरुर्ज्ञात्वा दैत्यांस्तान्भार्गवेण हि ।<br>जगाम तरसा त्यक्त्वा स्वरूपं स्वं विधाय च ॥ १७<br><br>गत्वोवाच तदा शक्रं कृतं कार्यं मया ध्रुवम् ।<br>शप्ताः शुक्रेण ते दैत्या मया त्यक्ताः पुनः किल ॥ १८<br><br>निराधाराः कृता नूनं यतध्वं सुरसत्तमाः ।<br>संग्रामार्थं महाभाग शापदग्धा मया कृताः ॥ १९ | तदनन्तर शुक्राचार्यके द्वारा उन दैत्योंको शापित हुआ जानकर गुरु बृहस्पति तत्काल उन्हें छोड़कर अपना रूप धारणकर वहाँसे चल पड़े। उन्होंने जाकर इन्द्रसे कहा—मैंने [आपका] सम्पूर्ण कार्य भलीभाँति बना दिया है। शुक्राचार्यने उन दैत्योंको शाप दे दिया और बादमें मैंने भी उनका त्याग कर दिया। अब मैंने उन्हें पूर्णरूपसे असहाय बना दिया है। अतः हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग युद्धके लिये अब उद्योग करें। हे महाभाग! मैंने उन दैत्योंको शापसे दग्ध कर दिया है ॥ १७–१९ ॥ |
| इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं मघवा मुदमाप्तवान् ।<br>जहृषुश्च सुराः सर्वे प्रतिपूज्य बृहस्पतिम् ॥ २० | गुरु बृहस्पतिका यह वचन सुनकर इन्द्र बहुत आनन्दित हुए और सभी देवता भी हर्षित हो उठे। तत्पश्चात् गुरु बृहस्पतिकी पूजा करके वे युद्धके लिये |
| ४६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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| संग्रामाय मतिं चक्रुः संविचार्य मिथः पुनः।<br>निर्ययुर्मिलिताः सर्वे दानवाभिमुखाः सुराः॥ २१ | मन्त्रणा करने लगे। आपसमें भलीभाँति सोच-विचार करके सभी देवता एक साथ मिलकर दानवोंसे लड़नेके लिये वहाँसे निकल पड़े॥ २०-२१॥ |
| सुरान्समुद्यताञ्ज्ञात्वा कृतोद्योगान्महाबलान्।<br>अन्तर्हितं गुरुं चैव बभूवुश्चिन्तयान्विताः॥ २२ | उधर महाबली देवताओंको युद्धकी तैयारी करके आक्रमणके लिये उद्यत तथा शुक्राचार्यरूपधारी गुरु बृहस्पतिको अन्तर्हित जान करके दैत्यगण बहुत चिन्तित हुए॥ २२॥ |
| परस्परमथोचुस्ते मोहितास्तस्य मायया।<br>सम्प्रसाद्यो महात्मा च यातोऽसौ रुष्टमानसः॥ २३ | अब उन देवगुरुकी मायासे मोहित वे दैत्य आपसमें कहने लगे कि वे गुरु शुक्राचार्य कुपितमन होकर यहाँसे चले गये, अतः हमें उन महात्माको भलीभाँति मनाना चाहिये॥ २३॥ |
| वञ्चयित्वा गतः पापो गुरुः कपटपण्डितः।<br>भ्रातृस्त्रीलम्भनः प्रायो मलिनोऽन्तर्बहिः शुचिः॥ २४ | वह पापी और कपटकार्यमें अत्यन्त प्रवीण देवगुरु हमें ठगकर चला गया। अपने भाईकी पत्नीके साथ अनाचार करनेवाला वह भीतरसे कलुषित है तथा ऊपरसे पवित्र प्रतीत होता है॥ २४॥ |
| किं कुर्मः क्व च गच्छामः कथं काव्यं प्रकोपितम्।<br>कुर्वीमहि सहायार्थं प्रसन्नं हृष्टमानसम्॥ २५ | अब हम क्या करें और कहाँ जायें? अत्यन्त कुपित गुरु शुक्राचार्यको अपनी सहायताके लिये हम किस तरह हर्षित तथा प्रसन्नचित्त करें॥ २५॥ |
| इति सञ्चिन्त्य ते सर्वे मिलिता भयकम्पिताः।<br>प्रह्लादं पुरतः कृत्वा जग्मुस्ते भार्गवं पुनः॥ २६ | ऐसा विचार करके वे सब एकजुट हुए। प्रह्लादको आगे करके भयसे काँपते हुए वे दैत्य पुनः भृगुपुत्र शुक्राचार्यके पास गये। |
| प्रणेमुश्चरणौ तस्य मुनेर्मौनभृतस्तदा।<br>भार्गवस्तानुवाचाथ रोषसंरक्तलोचनः॥ २७ | [वहाँ पहुँचकर] उन्होंने मौन धारण किये हुए उन मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया। तब क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले शुक्राचार्य उनसे कहने लगे॥ २६-२७॥ |
| मया प्रबोधिता यूयं मोहिता गुरुमायया।<br>न गृहीतं वचो योग्यं तदा याज्या हितं शुचि॥ २८ | हे यजमानो! मैंने तुमलोगोंको बहुत समझाया, किंतु देवगुरुकी मायासे व्यामुग्ध रहनेके कारण तुम-लोगोंने मेरा उचित, हितकर और निष्कपट वचन नहीं माना॥ २८॥ |
| तदावगणितश्चाहं भवद्भिस्तद्दृशं गतैः।<br>प्राप्तं नूनं मदोन्मत्तैर्ममावमानजं फलम्॥ २९ | उस समय उनके वशवर्ती हुए तुम सबने मेरी अवहेलना की। मदसे उन्मत्त रहनेवाले तुम सबको मेरे अपमान करनेका फल अवश्य मिल गया॥ २९॥ |
| तत्र गच्छत सद्भ्रष्टा यत्रासौ कपटाकृतिः।<br>वञ्चकः सुरकार्यार्थी नाहं तद्विद्धि वञ्चकः॥ ३० | तुमलोगोंका सर्वस्व छिन गया। अब तुमलोग वहींपर चले जाओ; जहाँ वह कपटी, छली और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाला बृहस्पति विद्यमान है; मैं उसकी तरह वंचक नहीं हूँ॥ ३०॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं ब्रुवन्तं शुक्रं तु वाक्यसन्दिग्धया गिरा।<br>प्रह्लादस्तं तदोवाच गृहीत्वा चरणौ ततः॥ ३१ | व्यासजी बोले— इस प्रकार संदेहयुक्त वाणीमें बोलते हुए शुक्राचार्यके दोनों पैर पकड़कर प्रह्लाद उनसे कहने लगे—॥ ३१॥ |