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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० १२] षष्ठ स्कन्ध ७८३

अ० १२] षष्ठ स्कन्ध ७८३

भवितव्यं त्वया तात तदा सत्यवचोऽन्वितम्।<br>अन्यथा त्वयि मुञ्चामि कोपं शापसमन्वितम्॥ ५६घर आऊँगा। हे तात! उस समय आपको अपनी बातको सत्य सिद्ध करना होगा, अन्यथा मैं क्रुद्ध होकर आपको शाप दे दूँगा॥ ५४—५६॥
राजोवाच<br>समावर्तनकर्मान्ते सर्वथा यादसांपते।<br>कृत्वा पुत्रपशुं यज्ञे यजिष्ये विधिपूर्वकम्॥ ५७**राजा बोले—**हे जलाधिनाथ! मैं समावर्तनसंस्कार हो जानेपर पुत्रको यज्ञ-पशु बनाकर विधिपूर्वक यज्ञ करूँगा॥ ५७॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञो वरुणः प्रीतमानसः।<br>तथेत्युक्त्वा ययौ तूर्णं नृपस्तु सुस्थितोऽभवत्॥ ५८**व्यासजी बोले—**राजाका यह वचन सुनकर वरुणदेव प्रसन्न होकर 'ठीक है'—ऐसा कहकर तुरंत चले गये और राजा भी स्वस्थचित्त हो गये॥ ५८॥
रोहिताख्य इति ख्यातः सुतस्तस्य विवृद्धिमान्।<br>सञ्जातश्चतुरः सर्वविद्यानां च विशारदः॥ ५९इधर राजाका रोहित नामका वह पुत्र बड़ा हो गया; वह बुद्धिमान् और समस्त विद्याओंमें पारंगत हो गया॥ ५९॥
यज्ञस्य कारणं तेन ज्ञातं सर्वं सविस्तरम्।<br>भयभीतस्ततः सोऽपि मत्वा मरणमात्मनः॥ ६०उसे यज्ञका सब कारण विस्तारपूर्वक ज्ञात हो गया। तब वह अपनी मृत्यु जानकर अत्यन्त भयभीत हो गया॥ ६०॥
कृत्वा पलायनं वीरो गतोऽसौ गिरिगह्वरे।<br>अगम्ये नृपतिस्थाने स्थितस्तत्र भयातुरः॥ ६१[एक दिन] वह बालक राजमहलसे भागकर एक अगम्य पर्वतकी गुफामें चला गया और भयग्रस्त होकर वहाँ रहने लगा॥ ६१॥
प्राप्ते कालेऽथ वरुणो यज्ञार्थी नृपतेर्गृहम्।<br>गत्वा तमाह भूपालं कुरु यज्ञं विशांपते॥ ६२समय आनेपर वरुणदेव यज्ञकी अभिलाषासे राजमहलमें पहुँचकर उन राजासे बोले—हे राजन्! यज्ञ कीजिये॥ ६२॥
प्रम्लानवदनो राजा तमाह व्यथितेन्द्रियः।<br>किं करोमि गतः क्वापि सुतो मे सुरसत्तम॥ ६३यह सुनकर उदास मुखवाले राजाने व्यथित होकर उनसे कहा—हे सुरश्रेष्ठ! मैं क्या करूँ? मेरा पुत्र कहीं चला गया है॥ ६३॥
श्रुत्वा तद्वचनं राज्ञः कुपितो यादसांपतिः।<br>शशाप तं नृपं कोपादसत्यवादिनं भृशम्॥ ६४राजाकी यह बात सुनकर जलचरोंके अधिपति वरुणदेवने क्रुद्ध होकर असत्यवादी राजाको शाप दे दिया—कपटविशारद हे राजन्! तुमने प्रतिज्ञा करके मुझे धोखा दिया है, अतः तुम्हारे शरीरमें जलोदर नामक रोग हो जाय॥ ६४-६५॥
जलोदराभिधो व्याधिर्देहे भवतु ते नृप।<br>यतः प्रतारितश्चाहं कृत्वा कपटपण्डित॥ ६५
इति शप्त्वा ययौ धाम स्वकं पाशधरस्तदा।<br>राजा चिन्तातुरस्तस्थौ भवने व्याधिपीडितः॥ ६६ऐसा शाप देकर पाशधारी वरुणदेव अपने लोकको चले गये और रोगसे पीड़ित होकर राजा अपने महलमें चिन्तित रहने लगे॥ ६६॥
यदातिव्याधितो राजा रोगेण शापजेन ह।<br>तदा शुश्राव पुत्रोऽपि पितरं व्याधिपीडितम्॥ ६७जब शापजन्य रोगसे राजा बहुत व्यथित हो गये तब उनके पुत्रने भी पिताके रोग-पीड़ित होनेकी बात सुनी॥ ६७॥
पान्थिकः प्राह पुत्रं हि पिता ते भृशदुःखितः।<br>जलोदरविकारेण शापजेन नृपात्मज॥ ६८किसी पथिकने उससे कहा—हे राजपुत्र! शापके कारण जलोदर रोगसे ग्रस्त तुम्हारे पिता बहुत अधिक दुःखी हैं॥ ६८॥
७८४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३

| विनष्टं जीवितं तेऽद्य वृथा जातस्य दुर्मते।<br>यत्त्यक्त्वा पितरं दुःस्थं प्राप्तोऽसि गिरिगह्वरम्॥ ६९ | हे दुर्बुद्धि! तुम्हारा जीवन नष्ट हो गया, तुम्हारा जन्म लेना व्यर्थ है; क्योंकि तुम अपने पिताको दुःखी अवस्थामें छोड़कर पर्वतकी गुफामें छिपे हो॥ ६९॥ |
| किमनेन शरीरेण प्राप्तं ते जन्मनः फलम्।<br>देहदं दुःखितं कृत्वा स्थितोऽस्यत्र सुताधम॥ ७० | हे कुपुत्र! तुम्हारे इस शरीरसे तुम्हारे जन्म लेनेका क्या लाभ है, जो तुम अपने पिताको दुःखी करके यहाँ रह रहे हो?॥ ७०॥ |
| प्राणास्त्याज्याः पितुः कार्ये सत्पुत्रेणेति निश्चयः।<br>त्वदर्थे दुःखितो राजा क्रन्दति व्याधिपीडितः॥ ७१ | राजा हरिश्चन्द्र तुम्हारे लिये दुःखी और व्याधिसे पीड़ित होकर विलाप कर रहे हैं। पिताके लिये सत्पुत्रको प्राणोंतकका त्याग कर देना चाहिये—यह सिद्धान्त है॥ ७१॥ |
| व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य वचस्तथ्यं पान्थिकाद्धर्मसंयुक्तम्।<br>यदा चक्रे मनो गन्तुं द्रष्टुं तातं व्यथातुरम्॥ ७२<br><br>तदा विप्रवपुर्भूत्वा वासवस्तमुपागमत्।<br>रहः प्राह हितं वाक्यं दयावानिव भारत॥ ७३<br><br>मूर्खोऽसि राजपुत्र त्वं गमनाय मतिं वृथा।<br>करोषि पितरं त्वद्य न जानासि व्यथायुतम्॥ ७४ | व्यासजी बोले—तब पथिककी धर्मसंगत बात सुनकर जैसे ही रोहितने पीडाग्रस्त अपने पिताको देखनेके लिये जानेका विचार किया, वैसे ही ब्राह्मणका रूप धारण करके इन्द्र वहाँ आ गये। हे भारत! उन्होंने दयालुकी भाँति एकान्तमें हितकी यह बात कही—हे राजकुमार! तुम मूर्ख हो, जो वहाँ जानेका व्यर्थ विचार कर रहे हो। तुम नहीं जानते कि तुम्हारे पिता तुम्हारे लिये क्यों दुःखी हैं?॥ ७२–७४॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हरिश्चन्द्रस्य जलोदरव्याधिपीडावर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


अथ त्रयोदशोऽध्यायः

राजा हरिश्चन्द्रका शुनःशेपको यज्ञीय पशु बनाकर यज्ञ करना, विश्वामित्रसे प्राप्त वरुणमन्त्रके जपसे शुनःशेपका मुक्त होना, परस्पर शापसे विश्वामित्र और वसिष्ठका बक तथा आडी होना

| इन्द्र उवाच<br>साहसं कृतवान् राजा पूर्वं यत्कथितो मखः।<br>वरुणाय प्रतिज्ञातः पुत्रं कृत्वा पशुं प्रियम्॥ १ | इन्द्र बोले—पूर्वकालमें राजाने वरुणदेवसे यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं अपने प्रिय पुत्रको यज्ञीय पशु बनाकर यज्ञ करूँगा—यह उन्होंने बड़ा साहस किया था॥ १॥ |
| गते त्वयि पिता पुत्रं बद्ध्वा यूपेऽघृणः पुनः।<br>पशुं कृत्वा महाबुद्धे वधिष्यति व्यथातुरः॥ २ | हे महामते! तुम्हारे वहाँ जानेपर रोगसे दुःखी तुम्हारे निर्दयी पिता तुम्हें यज्ञीय पशु बनाकर यूपमें बाँधकर मार डालेंगे॥ २॥ |
| इत्थं निषिद्धस्तत्पुत्रः शक्रोणामिततेजसा।<br>स्थितस्तत्रैव मायेशीमायया मोहितो भृशम्॥ ३ | अमित तेजस्वी इन्द्रके द्वारा इस प्रकार रोक दिये जानेपर मायेश्वरीकी मायासे अत्यन्त मोहित होकर वह राजपुत्र वहीं रुक गया॥ ३॥ |
| यदा पुनः पुनः श्रुत्वा पितरं रोगपीडितम्।<br>गमनाय मतिं चक्रे तदेन्द्रः प्रत्यषेधयत्॥ ४ | इस प्रकार जब-जब वह पिताको रोगसे पीड़ित सुनकर जानेका विचार करता था, तब-तब इन्द्र उसे रोक देते थे॥ ४॥ |

| अ० १३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८५ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हरिश्चन्द्रोऽतिदुःखार्तः पप्रच्छ गुरुमन्तिके।<br>स्थितं वसिष्ठमेकान्ते सर्वज्ञं हिततत्परम्॥ ५एक दिन राजा हरिश्चन्द्रने अत्यन्त दुःखी होकर एकान्तमें बैठे हुए सर्वज्ञ और कल्याणकारी गुरु वसिष्ठके पास जाकर पूछा—॥ ५॥
राजोवाच<br>भगवन् किं करोम्यद्य कातरोऽस्मि व्यथाकुलः।<br>त्राहि मां दुःखमनसं महाव्याधिभयातुरम्॥ ६**राजा बोले—**हे भगवन्! मैं क्या करूँ? मैं अत्यन्त भयभीत और कष्टसे पीड़ित हूँ। इस महाव्याधिसे पीड़ित मुझ दुःखितचित्तकी रक्षा कीजिये॥ ६॥
वसिष्ठ उवाच<br>शृणु राजन्नुपायोऽस्ति रोगनाशं प्रति स्तुतः।<br>त्रयोदशविधाः पुत्राः कथिता धर्मसंग्रहे॥ ७**वसिष्ठजी बोले—**हे राजन्! सुनिये, रोगनाशका एक प्रशस्त उपाय है। धर्मशास्त्रमें तेरह प्रकारके पुत्र कहे गये हैं॥ ७॥
तस्मात्क्रीतं सुतं कृत्वा यजस्व मखमुत्तमम्।<br>द्रव्यं दत्त्वा यथेष्टमानयस्व द्विजोत्तमम्॥ ८इसलिये किसी ब्राह्मणके उत्तम बालकको उसका मनोभिलषित धन देकर क्रय करके उसे ले आइये और उत्तम यज्ञको सम्पन्न कीजिये॥ ८॥
एवं कृते मखे भूप रोगनाशो भविष्यति।<br>वरुणोऽपि प्रसन्नात्मा भविष्यति यथासुखम्॥ ९हे राजन्! इस प्रकार यज्ञ करनेसे आपका रोग नष्ट हो जायगा और वरुणदेव भी हर्षित होकर प्रसन्नचित्त हो जायँगे॥ ९॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा प्रोवाच मन्त्रिणम्।<br>अन्वेषय महाबुद्धे विषयेष्वतियत्नतः॥ १०**व्यासजी बोले—**उनकी ऐसी बात सुनकर राजाने मन्त्रीसे कहा—हे महामते! सभी स्थानोंमें प्रयत्नपूर्वक पता लगाइये॥ १०॥
कदाचित्कोऽपि लोभार्थी ददाति स्वसुतं पिता।<br>समानय धनं दत्त्वा यावत्प्रार्थयतेऽप्यसौ॥ ११यदि कोई लोभी पिता अपने पुत्रको देता है तो वह जितना धन माँगे, उतना देकर उसे ले आइये॥ ११॥
सर्वथैव समानेयो यज्ञार्थे द्विजबालकः।<br>न कार्या कृपणा बुद्धिस्त्वया मत्कार्यहेतवे॥ १२सब प्रकारसे प्रयास करके यज्ञके लिये ब्राह्मणबालक लाना ही चाहिये। मेरे कार्यमें तुम्हें किसी भी प्रकारका बुद्धिशैथिल्य नहीं करना चाहिये॥ १२॥
प्रार्थनीयस्त्वया पुत्रः कस्यचिद् द्विजवादिनः।<br>द्रव्येण देहि यज्ञार्थं कर्तव्योऽसौ पशुः किल॥ १३तुम्हें प्रत्येक ब्राह्मणसे प्रार्थना करनी चाहिये कि धन लेकर राजाको पुत्र दे दीजिये, उसे यज्ञके लिये यज्ञीय पशु बनाना है॥ १३॥
इति सञ्चोदितस्तेन सचिवः कार्यहेतवे।<br>अन्वेषयामास पुरे ग्रामे ग्रामे गृहे गृहे॥ १४उन राजासे यह आदेश प्राप्तकर मन्त्रीने यज्ञकार्यके लिये राज्यके प्रत्येक गाँव तथा घरमें पता लगाया॥ १४॥
एवमन्वेषतस्तस्य विषये कश्चिदातुरः।<br>निर्धनस्त्रिसुतश्चासीदजीगर्तैति नामतः॥ १५इस प्रकार राज्यमें पता लगाते हुए उसे अजीगर्त नामक एक दुःखी और निर्धन ब्राह्मण मिला, जिसके तीन पुत्र थे॥ १५॥
तस्य पुत्रं शुनःशेपं मध्यमं मन्त्रिसत्तमः।<br>आनयामास दत्त्वार्थं प्रार्थितं यद्धनं तदा॥ १६उस ब्राह्मणने जितना धन माँगा, उतना देकर वह मन्त्रिश्रेष्ठ उसके मझले पुत्र शुनःशेपको ले आया॥ १६॥
समानीय शुनःशेपं सचिवः कार्यतत्परः।<br>राज्ञे निवेदयामास पशुयोग्यं द्विजात्मजम्॥ १७कार्यकुशल मन्त्रीने पशुयोग्य ब्राह्मणपुत्र शुनःशेपको लाकर राजाको समर्पित कर दिया॥ १७॥

| ७८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राजातिमुदितस्तेन विप्रानानीय सर्वतः।<br>कारयामास सम्भारान्यज्ञार्थं वेदवित्तमान्॥ १८इससे अत्यन्त प्रसन्न होकर राजाने वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलाकर यज्ञके लिये सामग्री एकत्र करवायी॥ १८॥
प्रारब्धे तु मखे तत्र विश्वामित्रो महामुनिः।<br>बद्धं दृष्ट्वा शुनःशेपं निषिषेध नृपं तदा॥ १९यज्ञके प्रारम्भ होनेपर महामुनि विश्वामित्रने वहाँ शुनः-शेपको बँधा देखकर राजाको मना करते हुए कहा—॥ १९॥
राजन्मा साहसं कार्षीर्मुञ्चैनं द्विजबालकम्।<br>प्रार्थयाम्यहमायुष्मन् सुखं तेऽद्य भविष्यति॥ २०हे राजन्! ऐसा साहस न कीजिये, इस ब्राह्मणबालकको छोड़ दीजिये। हे आयुष्मन्! मैं प्रार्थना करता हूँ, इससे आपको सुखकी प्राप्ति होगी॥ २०॥
क्रन्दत्ययं शुनःशेपः करुणा मां दुनोत्यपि।<br>दयावान्भव राजेन्द्र कुरु मे वचनं नृप॥ २१यह शुनःशेप क्रन्दन कर रहा है, अतः करुणा मुझे बहुत व्यथित कर रही है। हे राजेन्द्र! मेरी बात मानिये; हे नृप! दयावान् बनिये॥ २१॥
परदेहस्य रक्षायै स्वदेहं ये दयापराः।<br>ददति क्षत्रियाः पूर्वं स्वर्गकामाः शुचिव्रताः॥ २२<br><br>त्वं स्वदेहस्य रक्षार्थं हंसि द्विजसुतं बलात्।<br>पापं मा कुरु राजेन्द्र दयावान्भव बालके॥ २३पूर्वकालमें स्वर्गके इच्छुक, पवित्रव्रती तथा दयापरायण जो क्षत्रियगण थे, वे दूसरोंके शरीरकी रक्षाके लिये अपने प्राण दे देते थे और आप अपने शरीरकी रक्षाके लिये बलपूर्वक ब्राह्मणपुत्रका वध कर रहे हैं। हे राजेन्द्र! पाप मत कीजिये और इस बालकपर दयावान् होइए॥ २२-२३॥
सर्वेषां सदृशी प्रीतिर्देहे वेत्सि स्वयं नृप।<br>मुञ्चैनं बालकं तस्मात्प्रमाणं यदि मे वचः॥ २४हे राजन्! अपने देहके प्रति सभीको एक-जैसी प्रीति होती है—यह बात आप स्वयं जानते हैं। यदि आप मेरी बातको प्रमाण मानते हैं तो इस बालकको छोड़ दीजिये॥ २४॥
व्यास उवाच<br>अनादृत्य च तद्वाक्यं राजा दुःखातुरो भृशम्।<br>न मुमोच मुनिस्तस्मै चुकोपातीव तापसः॥ २५व्यासजी बोले— दुःखसे अत्यन्त पीड़ित राजाने मुनिकी बातका अनादर करके उस बालकको नहीं छोड़ा; इससे वे तपस्वी मुनि उनके ऊपर अत्यन्त क्रुद्ध हो गये॥ २५॥
उपदेशं ददौ तस्मै शुनःशेपाय कौशिकः।<br>मन्त्रं पाशधरस्याथ दयावान्वेदवित्तमः॥ २६<br><br>शुनःशेपोऽपि तं मन्त्रमसकृद्वधकर्शितः।<br>प्लुतस्वरेण चुक्रोश संस्मरन्वरुणं भृशम्॥ २७वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उन दयालु विश्वामित्रने शुनःशेपको पाशधारी वरुणदेवके मन्त्रका उपदेश दिया। अपने वधके भयसे व्याकुल शुनःशेप भी वरुणदेवका स्मरण करते हुए उच्च स्वरसे बार-बार मन्त्रका जप करने लगा॥ २६-२७॥
स्तुवन्तं मुनिपुत्रं तं ज्ञात्वा वै यादसां पतिः।<br>तत्रागत्य शुनःशेपं मुमोच करुणार्णवः॥ २८<br><br>रोगहीनं नृपं कृत्वा वरुणः स्वगृहं ययौ।<br>विश्वामित्रस्तु तं पुत्रं कृतवान्मोचितं मृतेः॥ २९जलचरोंके अधिपति करुणासिन्धु वरुणदेवने वहाँ आकर स्तुति करते हुए उस ब्राह्मणपुत्र शुनः-शेपको छुड़ा दिया और राजाको रोगमुक्त करके वे वरुणदेव अपने लोकको चले गये। विश्वामित्रने उस बालकको मृत्युसे मुक्ति प्रदान कर दी॥ २८-२९॥
अ० १३ ]षष्ठ स्कन्ध७८७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न कृतं वचनं राज्ञा कौशिकस्य महात्मनः।<br>रोषं दधार मनसा राजोपरि स गाधिजः॥ ३०राजाने महात्मा विश्वामित्रकी बात नहीं मानी, अतः वे गाधिपुत्र विश्वामित्र मन-ही-मन राजाके ऊपर बहुत क्रुद्ध हुए॥ ३०॥
एकस्मिन्समये राजा हयारूढो वनं गतः।<br>सूकरं हन्तुकामस्तु मध्याह्ने कौशिकीतटे॥ ३१एक समय राजा घोड़ेपर सवार होकर वनमें गये। वे सूअरको मारनेकी इच्छासे ठीक दोपहरके समय कौशिकी नदीके तटपर पहुँचे॥ ३१॥
वृद्धब्राह्मणवेषेण विश्वामित्रेण वञ्चितः।<br>सर्वस्वं प्रार्थितं तस्य गृहीतं राज्यमद्भुतम्॥ ३२वहाँ विश्वामित्रने वृद्ध ब्राह्मणका वेश धारण करके छलपूर्वक उनका सर्वस्व माँग लिया और उनके महान् राज्यपर अपना अधिकार कर लिया॥ ३२॥
पीडितोऽसौ हरिश्चन्द्रो यजमानो यतो भृशम्।<br>वसिष्ठः कौशिकं प्राह वने प्राप्तं यदृच्छया॥ ३३<br>क्षत्रियाधम दुर्बुद्धे वृथा ब्राह्मणवेषभृत्।<br>बकधर्म वृथा किं त्वं गर्वं वहसि दाम्भिक॥ ३४जिससे [वसिष्ठके] यजमान राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त कष्ट पाने लगे। एक बार संयोगवश वनमें आये हुए विश्वामित्रसे वसिष्ठने कहा— हे क्षत्रियाधम! हे दुर्बुद्धे! तुमने व्यर्थ ही ब्राह्मणका वेश बना रखा है, बगुलेके समान वृत्तिवाले हे दाम्भिक! तुम व्यर्थमें गर्व क्यों करते हो?॥ ३३-३४॥
कस्मात्त्वया नृपश्रेष्ठो यजमानो ममाप्यसौ।<br>अपराधं विना जाल्म गमितो दुःखमद्भुतम्॥ ३५हे जाल्म! तुमने मेरे यजमान नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्रको बिना अपराधके महान् कष्टमें क्यों डाल दिया?॥ ३५॥
बकध्यानपरो यस्मात्तस्मात्त्वं वै बको भव।<br>इति शप्तो वसिष्ठेन कौशिकः प्राह तं पुनः॥ ३६तुम बगुलेके समान ध्यानपरायण हो। अतः तुम 'बक' (बगुला) हो जाओ। वसिष्ठके द्वारा इस प्रकार शापप्राप्त विश्वामित्रने उनसे कहा—
त्वमप्याडिर्भवायुष्मन् बकोऽहं यावदेव हि।हे आयुष्मन्! जबतक मैं बक रहूँगा, तबतक तुम भी आडी पक्षी बनकर रहोगे॥ ३६ ½॥
व्यास उवाच<br>एवं परस्परं दत्त्वा शापं तौ क्रोधपीडितौ॥ ३७<br>अण्डजौ तरसा जातौ सरस्याडीबकौ मुनी।<br>एकस्मिन्पादपे नीडं कृत्वासौ बकरूपभाक्॥ ३८<br>विश्वामित्रः स्थितस्तत्र दिव्ये सरसि मानसे।<br>अन्यस्मिन्पादपे कृत्वा वसिष्ठो नीडमुत्तमम्॥ ३९<br>आडीरूपधरस्तस्थावन्योन्यं द्वेषतत्परौ।<br>दिने दिने तौ संग्रामं चक्रतुः क्रोधसंयुतौ॥ ४०<br>दुःखदं सर्वलोकानां क्रन्दमानावुभौ भृशम्।<br>चञ्चुपक्षप्रहारैस्तु नखाघातैः परस्परम्॥ ४१<br>जघ्नतू रुधिरक्लिन्नौ पुष्पिताविव किंशुकौ।<br>एवं बहूनि वर्षाणि पक्षिरूपधरौ मुनी॥ ४२<br>स्थितौ तत्र महाराज शापपाशेन यन्त्रितौ।व्यासजी बोले— इस प्रकार क्रोधसे व्याकुल उन दोनोंने एक-दूसरेको शाप दे दिया और एक सरोवरके समीप वे दोनों मुनि 'आडी' और 'बक' के रूपमें अण्डोंसे उत्पन्न हुए। दिव्य मानसरोवरके तटपर एक वृक्षपर घोंसला बनाकर बकरूपधारी विश्वामित्र और एक दूसरे वृक्षपर उत्तम घोंसला बनाकर आडीरूपधारी वसिष्ठ परस्पर द्वेषपरायण होकर रहने लगे। वे दोनों कोपाविष्ट होकर प्रतिदिन घोर क्रन्दन करते हुए सभी लोगोंके लिये दुःखदायी युद्ध करते थे। वे दोनों चोंच और पंखोंके प्रहार तथा नखोंके आघातसे परस्पर चोट पहुँचाते थे। रक्तसे लथपथ वे दोनों खिले हुए किंशुकके फूल-जैसे प्रतीत होते थे। हे महाराज! इस प्रकार पक्षीरूपधारी दोनों मुनि शापरूपी पाशमें जकड़े हुए वहाँ बहुत वर्षोंतक पड़े रहे॥ ३७-४२ ½॥
राजोवाच<br>कथं मुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ शापाद्वसिष्ठकौशिकौ॥ ४३<br>तन्ममाचक्ष्व विप्रर्षे परं कौतूहलं हि मे।राजा बोले— हे विप्रर्षे! वे दोनों मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ और विश्वामित्र शापसे किस प्रकार मुक्त हुए, यह मुझे बताइये, मुझे बड़ा कौतूहल है॥ ४३ ½॥
७८८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
युध्यमानावुभौ दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः॥ ४४<br>तत्राजगामानिमिषैर्वृतः सर्वैर्दयापरैः।<br>तावाश्वास्य जगत्कर्ता युद्धतो विनिवार्य च॥ ४५लोकपितामह ब्रह्माजी उन दोनोंको युद्ध करते देखकर समस्त दयापरायण देवताओंके साथ वहाँ आये। सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने उन दोनोंको समझाकर युद्धसे विरत करके परस्पर दिये गये शापसे भी मुक्त कर दिया॥ ४४-४५ १/२॥
शापं संमोचयामास तयोः क्षिप्तं परस्परम्।<br>ततो जग्मुः सुराः सर्वे स्वानि धिष्ण्यानि पद्मभूः॥ ४६<br>सत्यलोकं जगामाशु हंसारूढः प्रतापवान्।<br>विश्वामित्रोऽप्यगात्तूर्णं वसिष्ठः स्वाश्रमं गतः॥ ४७<br>मिथः स्नेहं ततः कृत्वा प्रजापत्युपदेशतः।<br>मैत्रावरुणिनाप्येवं कृतं युद्धमकारणम्॥ ४८इसके बाद सभी देवगण अपने-अपने लोकोंको चले गये, कमलयोनि प्रतापी ब्रह्माजी शीघ्र हंसपर आरूढ़ होकर सत्यलोकको चले गये और प्रजापतिके उपदेशसे परस्पर स्नेह करके विश्वामित्र तथा वसिष्ठजी भी अपने-अपने आश्रमोंको शीघ्र चले गये। हे राजन्! इस प्रकार मैत्रावरुणि वसिष्ठने भी अकारण ही विश्वामित्रके साथ परस्पर दुःखप्रद युद्ध किया था॥ ४६-४८ १/२॥
कौशिकेन समं भूप दुःखदं च परस्परम्।<br>को नाम मानवो लोके देवो वा दानवोऽपि वा॥ ४९<br>अहङ्कारजयं कृत्वा सर्वदा सुखभाग्भवेत्।<br>तस्माद्राजंश्चित्तशुद्धिर्महतामपि दुर्लभा॥ ५०<br>यत्नेन साधनीया सा तद्विहीनं निरर्थकम्।<br>तीर्थं दानं तपः सत्यं यत्किञ्चिद्धर्मसाधनम्॥ ५१इस संसारमें मनुष्य, देवता या दैत्य—कौन ऐसा है, जो अहंकारपर विजय प्राप्तकर सदा सुखी रह सके। अतः हे राजन्! चित्तकी शुद्धि महापुरुषोंके लिये भी दुर्लभ है। उसे प्रयत्नपूर्वक शुद्ध करना चाहिये; उसके बिना तीर्थयात्रा, दान, तपस्या, सत्य आदि जो कुछ भी धर्मसाधन है; वह सब निरर्थक है॥ ४९-५१॥
( श्रद्धात्र त्रिविधा प्रोक्ता सात्त्विकी राजसी तथा।<br>तामसी सर्वदेहेषु देहिनां धर्मकर्मसु॥<br>सात्त्विकी दुर्लभा लोके यथोक्तफलदा सदा।<br>तदर्धफलदा प्रोक्ता राजसी विधिसंयुता॥<br>तामसी त्वफला राजन्न तु कीर्तिकरी पुनः।<br>कामक्रोधाभिभूतानां जनानां नृपसत्तम॥ )(सबके देहोंमें तथा प्राणियोंके धर्मकर्मोंमें सात्त्विकी, राजसी और तामसी—यह तीन प्रकारकी श्रद्धा कही गयी है। इनमें यथोक्त फल देनेवाली सात्त्विकी श्रद्धा जगत्में सदा दुर्लभ होती है। विधिविधानसे युक्त राजसी श्रद्धा उसका आधा फल देनेवाली कही गयी है। हे राजन्! काम-क्रोधके वशीभूत पुरुषोंकी श्रद्धा तामसी होती है। हे नृपश्रेष्ठ! वह फलविहीन होती है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं होती।)
वासनारहितं कृत्वा तच्चित्तं श्रवणादिना।<br>तीर्थादिषु वसेन्नित्यं देवीपूजनतत्परः॥ ५२<br>देवीनामानि वचसा गृह्णंस्तस्या गुणान्स्तुवन्।<br>ध्यायंस्तस्याः पदाम्भोजं कलिदोषभयार्दितः॥ ५३कलियुगके दोषोंसे भयभीत व्यक्तिको कथा-श्रवण आदिके द्वारा चित्तको वासनारहित करके देवीकी पूजामें तत्पर रहते हुए, वाणीसे देवीके नामोंको ग्रहण करते हुए, उनके गुणोंका कीर्तन करते हुए तथा उनके चरण-कमलका ध्यान करते हुए तीर्थ आदिमें नित्य वास करना चाहिये॥ ५२-५३॥
एवं तु कुर्वतस्तस्य न कदाचित्कलेर्भयम्।<br>अनायासेन संसारान्मुच्यते पातकी जनः॥ ५४ऐसा करनेसे उसे कभी कलियुगका भय नहीं होगा, इससे पापी प्राणी भी अनायास ही संसारसे मुक्त हो जाता है॥ ५४॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे आडीबकयुद्धवर्णनसहितं देवीमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥

अ० १४ ]षष्ठ स्कन्ध७८९

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

राजा निमि और वसिष्ठका एक-दूसरेको शाप देना, वसिष्ठका मित्रावरुणके पुत्रके रूपमें जन्म लेना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>मैत्रावरुणिरित्युक्तं नाम तस्य मुनेः कथम्।<br>वसिष्ठस्य महाभाग ब्रह्मणस्तनुजस्य ह॥ १<br>किमसो कर्मतो नाम प्राप्तवान् गुणतस्तथा।<br>ब्रूहि मे वदतां श्रेष्ठ कारणं तस्य नामजम्॥ २जनमेजय बोले—हे महाभाग! ब्रह्माके पुत्र मुनि वसिष्ठका 'मैत्रावरुणि'—यह नाम कैसे पड़ा? हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! किस कर्म अथवा गुणके कारण उन्होंने यह नाम प्राप्त किया। उनके नाम पड़नेका कारण मुझे बताइये॥ १-२॥
व्यास उवाच<br>निबोध नृपतिश्रेष्ठ वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः।<br>निमिशापात्तनुं त्यक्त्वा पुनर्जातो महाद्युतिः॥ ३<br>मित्रावरुणयोर्यस्मात्तस्मात्तन्नाम विश्रुतम्।<br>मैत्रावरुणिरित्यस्मिँल्लोके सर्वत्र पार्थिव॥ ४व्यासजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! सुनिये, वसिष्ठजी ब्रह्माके पुत्र हैं, उन महातेजस्वीने निमिके शापसे वह शरीर त्यागकर पुनः जन्म लिया॥ ३॥<br>हे राजन्! उनका जन्म मित्र और वरुणके यहाँ हुआ था, इसीलिये इस संसारमें सर्वत्र उनका 'मैत्रावरुणि'—यह नाम विख्यात हुआ॥ ४॥
राजोवाच<br>कस्माच्छप्तः स धर्मात्मा राज्ञा ब्रह्मात्मजो मुनिः।<br>चित्रमेतन्मुनिं लग्नो राज्ञः शापोऽतिदारुणः॥ ५<br>अनागसं मुनिं राजा किमसो शप्तवान्मुने।<br>कारणं वद धर्मज्ञ तस्य शापस्य मूलतः॥ ६राजा बोले—राजा निमिने ब्रह्माजीके पुत्र धर्मात्मा वसिष्ठको शाप क्यों दिया? राजाका वह दारुण शाप मुनिको लग गया—यह तो आश्चर्य है!॥ ५॥<br>हे मुने! निरपराध मुनिको राजाने क्यों शाप दे दिया; हे धर्मज्ञ! उस शापका कारण यथार्थरूपमें बताइये?॥ ६॥
व्यास उवाच<br>कारणं तु मया प्रोक्तं तव पूर्वं विनिश्चितम्।<br>संसारोऽयं त्रिभिर्व्याप्तो राजन्मायागुणैः किल॥ ७<br>धर्मं करोतु भूपालश्चरन्तु तापसास्तपः।<br>सर्वेषां तु गुणैर्विद्धं प्रोज्ज्वलं तद्भवेदिह॥ ८<br>कामक्रोधाभिभूताश्च राजानो मुनयस्तथा।<br>लोभाहङ्कारसंयुक्ताश्चरन्ति दुश्चरं तपः॥ ९<br>यजन्ति क्षत्रिया राजन् रजोगुणसमावृताः।<br>ब्राह्मणास्तु तथा राजन् न कोऽपि सत्त्वसंयुतः॥ १०<br>ऋषिणासौ निमिः शप्तस्तेन शप्तो मुनिः पुनः।<br>दुःखाह्दुःखतरं प्राप्तावुभावपि विधेर्बलात्॥ ११<br>द्रव्यशुद्धिः क्रियाशुद्धिर्मनसः शुद्धिरुज्ज्वला।<br>दुर्लभा प्राणिनां भूप संसारे त्रिगुणात्मके॥ १२व्यासजी बोले—इसका सम्यक् रूपसे निर्णीत कारण तो मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ। हे राजन्! यह संसार मायाके तीनों गुणोंसे व्याप्त है॥ ७॥<br>राजा धर्म करें और तपस्वी तप करें—यह स्वाभाविक कर्म है, परंतु सभी प्राणियोंका मन गुणोंसे आबद्ध रहनेके कारण विशुद्ध नहीं रह पाता॥ ८॥<br>राजालोग काम और क्रोधसे अभिभूत रहते हैं और उसी प्रकार तपस्वीगण भी लोभ और अहंकारयुक्त होकर कठोर तपस्या करते हैं॥ ९॥<br>हे राजन्! क्षत्रियगण रजोगुणसे युक्त होकर यज्ञ करते थे, वैसे ही ब्राह्मण भी थे। हे राजन्! कोई भी सत्त्वगुणसे युक्त नहीं था॥ १०॥<br>ऋषिने राजाको शाप दिया और तब राजाने भी मुनिको शाप दे दिया। इस प्रकार दैववशात् दोनोंको बहुत दुःख प्राप्त हुआ॥ ११॥<br>हे राजन्! इस त्रिगुणात्मक जगत्में प्राणियोंके लिये द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और उज्ज्वल मनःशुद्धि दुर्लभ है॥ १२॥

| ७९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पराशक्तिप्रभावोऽयं नोल्लङ्घ्यः केनचित्क्वचित्।<br>यस्यानुग्रहमिच्छेत्सा मोचयत्येव तं क्षणात्॥ १३यह पराशक्तिका ही प्रभाव है और कोई कभी इसका अतिक्रमण नहीं कर सकता। जिसपर वे भगवती कृपा करना चाहती हैं, उसे तत्काल मुक्त कर देती हैं॥ १३॥
महान्तोऽपि न मुच्यन्ते हरिब्रह्महरादयः।<br>पामरा अपि मुच्यन्ते यथा सत्यव्रतादयः॥ १४ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि महान् देवता भी मुक्त नहीं हो पाते, किंतु सत्यव्रत आदि जैसे अधम भी मुक्त हो जाते हैं॥ १४॥
तस्यास्तु हृदयं कोऽपि न वेत्ति भुवनत्रये।<br>तथापि भक्तवश्येयं भवत्येव सुनिश्चितम्॥ १५यद्यपि तीनों लोकोंमें भगवतीके रहस्यको कोई नहीं जानता है, फिर भी वे भक्तके वशमें हो जाती हैं—ऐसा निश्चित है॥ १५॥
तस्मात्तद्भक्तिरास्थेया दोषनिर्मूलनाय च।<br>रागदम्भादियुक्ता चेत्सा भक्तिर्नाशिनी भवेत्॥ १६अतः दोषोंके निर्मूलनके लिये उनकी भक्ति करनी चाहिये। यदि वह भक्ति राग, दम्भ आदिसे युक्त हो तो वह नाश करनेवाली होती है॥ १६॥
इक्ष्वाकुकुलसम्भूतो निमिर्नाम नराधिपः।<br>रूपवान् गुणसम्पन्नो धर्मज्ञो लोकरञ्जकः॥ १७<br><br>सत्यवादी दानपरो याजको ज्ञानवाञ्छुचिः।<br>द्वादशस्तनयो धीमान्प्रजापालनतत्परः॥ १८इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न निमि नामके एक राजा थे। वे रूपवान्, गुणवान्, धर्मज्ञ, प्रजावत्सल सत्यवादी, दानशील, यज्ञ-कर्ता, ज्ञानी और पुण्यात्मा थे। वे बुद्धिमान् और प्रजापालक राजा निमि इक्ष्वाकुके बारहवें पुत्र थे॥ १७-१८॥
पुरं निवेशयामास गौतमाश्रमसन्निधौ।<br>जयन्तपुरसंज्ञं तु ब्राह्मणानां हिताय सः॥ १९उन्होंने ब्राह्मणोंके हितके लिये गौतममुनिके आश्रमके समीप जयन्तपुर नामका एक नगर बसाया॥ १९॥
बुद्धिस्तस्य समुत्पन्ना यजेयमिति राजसी।<br>यज्ञेन बहुकालेन दक्षिणासंयुतेन च॥ २०उनके मनमें एक बार यह राजसी बुद्धि उत्पन्न हुई कि बहुत समयतक चलनेवाले और विपुल दक्षिणावाले यज्ञके द्वारा आराधना करूँ॥ २०॥
इक्ष्वाकुं पितरं पृष्ट्वा यज्ञकार्याय पार्थिवः।<br>कारयामास सम्भारं यथोद्दिष्टं महात्मभिः॥ २१तब राजाने यज्ञकार्यके लिये अपने पिता इक्ष्वाकुसे आज्ञा लेकर महात्माओंके कथनानुसार समस्त यज्ञीय सामग्री एकत्र करायी॥ २१॥
भृगुमङ्गिरसं चैव वामदेवं च गौतमम्।<br>वसिष्ठं च पुलस्त्यं च ऋचीकं पुलहं क्रतुम्॥ २२<br><br>मुनीनामन्त्रयामास सर्वज्ञांर्वेदपारगान्।<br>यज्ञविद्याप्रवीणांश्च तापसान्वेदवित्तमान्॥ २३इसके बाद राजाने भृगु, अंगिरा, वामदेव, गौतम, वसिष्ठ, पुलस्त्य, ऋचीक, पुलह और क्रतु—इन सर्वज्ञ, वेदमें पारंगत, यज्ञविद्याओंमें कुशल एवं वेदज्ञ मुनियों और तपस्वियोंको आमन्त्रित किया॥ २२-२३॥
राजा सम्भृतसम्भारः सम्पूज्य गुरुमात्मनः।<br>वसिष्ठं प्राह धर्मज्ञो विनयेन समन्वितः॥ २४समस्त सामग्री एकत्र कर धर्मज्ञ राजाने अपने गुरु वसिष्ठकी पूजा करके विनयसे युक्त होकर उनसे कहा—॥ २४॥
यजेयं मुनिशार्दूल याजयस्व कृपानिधे।<br>गुरुस्त्वं सर्ववेत्तासि कार्यं मे कुरु साम्प्रतम्॥ २५हे मुनिश्रेष्ठ! मैं यज्ञ करना चाहता हूँ। अतः यज्ञ करानेकी कृपा करें। हे कृपानिधे! आप सर्वज्ञ हैं और मेरे गुरु हैं; इस समय आप मेरा कार्य सम्पन्न कीजिये॥ २५॥
यज्ञोपकरणं सर्वं समानीतं सुसंस्कृतम्।<br>पञ्चवर्षसहस्रं तु दीक्षां कर्तुं मतिश्च मे॥ २६मैंने समस्त यज्ञीय सामग्री मँँगवा ली है और उसका संस्कार भी करा लिया है। मेरा विचार है कि मैं पाँच हजार वर्षके लिये यज्ञ-दीक्षा ग्रहण कर लूँ॥ २६॥