देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १२ ] चतुर्थ स्कन्ध ४५५
अ० १२ ] चतुर्थ स्कन्ध ४५५
| संस्कृत | हिन्दी |
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| गृहीत्वा तत्करे चक्रं शिरश्चिच्छेद रंहसा।<br>हतां दृष्ट्वा तु तां शक्रो मुदितश्चाभवत्तदा॥ ५५<br><br>देवाश्चातीव सन्तुष्टा हरिं जय जयेति च।<br>तुष्टुवुर्मुदिताः सर्वे सञ्जाता विगतज्वराः॥ ५६ | उस चक्रको हाथमें लेकर भगवान् विष्णुने बड़े वेगसे उसका सिर काट दिया। तब उसे मृत देखकर इन्द्र हर्षित हो उठे। सभी देवता भी अत्यन्त सन्तुष्ट होकर विष्णुकी जयकार करने लगे। वे प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने लगे और सन्तापरहित हो गये॥ ५५-५६॥ |
| इन्द्रविष्णू तु सञ्जातौ तत्क्षणाद्धृदयव्यथौ।<br>स्त्रीवधाच्छंकमानौ तु भृगोः शापं दुरत्ययम्॥ ५७ | स्त्रीवधसे [होनेवाले पाप] तथा भृगुमुनिके भीषण शापकी शंका करते हुए वे भगवान् विष्णु तथा इन्द्र उसी समयसे दुःखितचित्त रहने लगे॥ ५७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे<br>शुक्रमातृवधवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥
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अथ द्वादशोऽध्यायः
महात्मा भृगुद्वारा विष्णुको मानवयोनिमें जन्म लेनेका शाप देना, इन्द्रद्वारा अपनी पुत्री जयन्तीको शुक्राचार्यके लिये अर्पित करना, देवगुरु बृहस्पतिद्वारा शुक्राचार्यका रूप धारणकर दैत्योंका पुरोहित बनना
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>तं दृष्ट्वा तु वधं घोरं चुक्रोध भगवान्भृगुः।<br>वेपमानोऽतिदुःखार्तः प्रोवाच मधुसूदनम्॥ १ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उस भयानक वधको देखकर भगवान् भृगु अत्यन्त कुपित हुए और दुःखसे व्याकुल होकर काँपते हुए वे मधुसूदन विष्णुसे कहने लगे॥ १॥ |
| भृगुरुवाच<br>अकृत्यं ते कृतं विष्णो जानन्पापं महामते।<br>वधोऽयं विप्रजाताया मनसा कर्तुमक्षमः॥ २ | **भृगु बोले—**हे महाबुद्धिमान् विष्णो! जो नहीं करना चाहिये वह पाप आपने जान-बूझकर कर डाला। विप्र-स्त्रीके इस वधकी तो मनसे कल्पना करना भी अनुचित है॥ २॥ |
| आख्यातस्त्वं सत्त्वगुणः स्मृतो ब्रह्मा च राजसः।<br>तथासौ तामसः शम्भुर्विपरीतं कथं स्मृतम्॥ ३<br><br>तामसस्त्वं कथं जातः कृतं कर्मातिनिन्दितम्।<br>अवध्या स्त्री त्वया विष्णो हता कस्मान्निरागसा॥ ४ | आप तो सत्त्वगुणसे सम्पन्न कहे गये हैं, ब्रह्मा रजोगुणी और शिव तमोगुणी बताये गये हैं; तब आपने अपने गुणके विपरीत कार्य क्यों किया? आप तामसी कैसे हो गये, जिससे आपने यह घोर निन्दनीय कर्म कर डाला? हे विष्णो! आपने उस अवध्य तथा निरपराध स्त्रीको क्यों मार डाला?॥ ३-४॥ |
| शपामि त्वां दुराचारं किमन्यत्प्रकरोमि ते।<br>विधुरोऽहं कृतः पाप त्वयाहं शुक्रकारणात्॥ ५ | [उन्होंने क्रोधपूर्वक कहा कि] अब मैं तुझ दुराचारीको शाप दे रहा हूँ, इसके अतिरिक्त तुम्हारा क्या प्रतीकार करूँ? अरे पापी! तुमने इन्द्रके हितके लिये मुझे विधुर बना दिया। हे मधुसूदन! मैं इन्द्रको शाप नहीं दूँगा, बल्कि तुम्हें ही शाप दूँगा। |
| न शपेऽहं तथा शक्रं शपे त्वां मधुसूदन।<br>सदा छलपरोऽसि त्वं कीटयोनिर्दुराशयः॥ ६ | कृष्ण सर्पसदृश दुरभिप्रायवाले तुम सदा छल करनेमें ही तत्पर रहते हो॥ ५-६॥ |
| ४५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ये च त्वां सात्त्विकं प्राहुस्ते मूर्खा मुनयः किल।<br>तामसस्त्वं दुराचारः प्रत्यक्षं मे जनार्दन॥ ७<br><br>अवतारा मृत्युलोके सन्तु मच्छापसम्भवाः।<br>प्रायो गर्भभवं दुःखं भुंक्ष्व पापाज्जनार्दन॥ ८ | हे जनार्दन! जो मुनि तुम्हें सात्त्विक कहते हैं, वे निश्चय ही मूर्ख हैं। मैंने तो प्रत्यक्ष जान लिया कि तुम तमोगुणी तथा दुराचारी हो। अतः हे जनार्दन! मेरे शापसे मृत्युलोकमें तुम्हारे अनेक अवतार हों और [इस स्त्री-वधजन्य] पापके कारण बार-बार गर्भवाससे होनेवाले दुःखको भोगो॥ ७-८॥ |
| व्यास उवाच<br>ततस्तेनाथ शापेन नष्टे धर्मे पुनः पुनः।<br>लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह॥ ९ | व्यासजी बोले—उसी शापके कारण भगवान् विष्णु धर्मका ह्रास होनेपर संसारके कल्याणके लिये बार-बार मानवरूपोंमें प्रकट होते हैं॥ ९॥ |
| राजोवाच<br>भृगुभार्या हता तत्र चक्रेणामिततेजसा।<br>गार्हस्थ्यञ्च पुनस्तस्य कथं जातं महात्मनः॥ १० | राजा बोले—[हे व्यासजी!] जब अमित तेजस्वी चक्रके द्वारा भृगुपत्नीका वध हो गया, उसके बाद महात्मा भृगुका गार्हस्थ्य-जीवन कैसे व्यतीत हुआ?॥ १०॥ |
| व्यास उवाच<br>इति शप्त्वा हरिं रोषात्तदादाय शिरस्त्वरन्।<br>काये संयोज्य तरसा भृगुः प्रोवाच कार्यवित्॥ ११<br><br>अद्य त्वां विष्णुना देवि हतां सञ्जीवयाम्यहम्।<br>यदि कृत्स्नो मया धर्मो ज्ञायते चरितोऽपि वा॥ १२<br><br>तेन सत्येन जीवेत यदि सत्यं ब्रवीम्यहम्।<br>पश्यन्तु देवताः सर्वा मम तेजोबलं महत्॥ १३<br><br>अद्भिस्त्वां प्रोक्ष्य शीताभिर्जीवयामि तपोबलात्।<br>सत्यं शौचं तथा वेदा यदि मे तपसो बलम्॥ १४ | व्यासजी बोले—इस प्रकार रोषपूर्वक भगवान् विष्णुको शाप देकर कार्यकुशल महर्षि भृगु तत्काल उस [कटे] सिरको लेकर शीघ्रतापूर्वक [अपनी पत्नीके] धड़में जोड़ करके बोले—हे देवि! विष्णुके द्वारा तुम मारी जा चुकी हो, किंतु अब मैं तुम्हें फिरसे जीवित कर रहा हूँ। यदि मैं सम्पूर्ण धर्म जानता हूँ तथा उसका सम्यक् आचरण करता हूँ और सदा सत्य भाषण करता हूँ तो उसी सत्यके प्रभावसे तुम जीवित हो जाओ। सभी देवता मेरे महान् तेज-बलको देख लें। यदि मुझमें सत्य, पवित्रता, वेदाध्ययन तथा तपस्याका बल होगा तो मैं उन्हींके प्रभावसे शीतल जलसे तुम्हारा प्रोक्षण करके तुम्हें जीवित कर दूँगा॥ ११-१४॥ |
| व्यास उवाच<br>अद्भिः सम्प्रोक्षिता देवी सद्यः सञ्जीविता तदा।<br>उत्थिता परमप्रीता भृगोर्भार्या शुचिस्मिता॥ १५ | व्यासजी बोले—तब जलसे प्रोक्षित करते ही मधुर मुसकानवाली वे भृगुपत्नी शीघ्र ही जीवित हो गयीं और बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उठकर खड़ी हो गयीं॥ १५॥ |
| ततस्तां सर्वभूतानि दृष्ट्वा सुप्तोत्थितामिव।<br>साधु साध्विति तं तां तु तुष्टुवुः सर्वतो दिशम्॥ १६ | तब सोकर उठी हुईके समान उसे देखकर सब ओरसे लोग 'साधु-साधु'—ऐसा कहकर भृगुमुनि तथा उनकी भार्या दोनोंकी स्तुति करने लगे॥ १६॥ |
| एवं सञ्जीविता तेन भृगुणा वरवर्णिनी।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवाः सेन्द्रा विलोक्य तत्॥ १७ | इस प्रकार उन महर्षि भृगुने उस सुन्दरीको जीवित कर दिया। यह देखकर इन्द्रसहित सभी देवता अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे॥ १७॥ |
| अ० १२ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४५७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन्द्रः सुरानथोवाच मुनिना जीविता सती।<br>काव्यस्तप्त्वा तपो घोरं किं करिष्यति मन्त्रवित्॥ १८ | तत्पश्चात् इन्द्रने देवताओंसे कहा—भृगुमुनिने अपनी साध्वी भार्याको जीवित कर दिया। साथ ही मन्त्रज्ञानी शुक्राचार्य कठोर तपस्या करके [शिवसे मन्त्र प्राप्तकर] पता नहीं क्या कर डालेंगे!॥ १८॥ |
| व्यास उवाच<br>गता निद्रा सुरेन्द्रस्य देहेऽक्षेममभून्नृप।<br>स्मृत्वा काव्यस्य वृत्तान्तं मन्त्रार्थमतिदारुणम्॥ १९ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! मन्त्रप्राप्तिके लिये शुक्राचार्यके अत्यन्त कठोर तपका स्मरण करके इन्द्रकी नींद समाप्त हो गयी और उनके शरीरमें व्याकुलता होने लगी॥ १९॥ |
| विमृश्य मनसा शक्रो जयन्तीं स्वसुतां तदा।<br>उवाच कन्यां चार्वङ्गीं स्मितपूर्वमिदं वचः॥ २०<br><br>गच्छ पुत्रि मया दत्ता काव्याय त्वं तपस्विने।<br>समाराधय तन्वङ्गि मत्कृते तं वशं कुरु॥ २१<br><br>उपचारैर्मुनिं तैस्तैः समाराध्य मनःप्रियैः।<br>भयं मे तरसा गत्वा हर तत्र वराश्रमे॥ २२ | तब मनमें भली-भाँति विचार करके इन्द्रने सुन्दर स्वरूपवाली अपनी पुत्री जयन्तीसे मुसकराते हुए कहा—हे पुत्रि! मैंने तुम्हें तपस्वी शुक्राचार्यको सौंप दिया। अतः हे तन्वंगि! अब तुम जाओ और मेरे कल्याणके लिये उनकी सेवा करो और उन्हें वशमें कर लो। उस उत्तम आश्रममें शीघ्र जाकर उनके मनको प्रिय लगनेवाले विविध उपचारोंसे उन्हें प्रसन्न करके मेरा भय दूर करो॥ २०—२२॥ |
| सा पितुर्वचनं श्रुत्वा तत्रागच्छन्मनोरमा।<br>तमपश्यद्विशालाक्षी पिबन्तं धूममाश्रमे॥ २३ | विशाल नयनोंवाली वह सुन्दर कन्या पिताकी बात सुनकर [शुक्राचार्यके] आश्रममें गयी और वहाँपर उसने मुनिको [नीचेकी ओर सिर करके] धुएँका सेवन करते हुए देखा॥ २३॥ |
| तस्य देहं समालोक्य स्मृत्वा वाक्यं पितुस्तदा।<br>कदलीदलमादाय वीजयामास तं मुनिम्॥ २४ | तब उनके [तपोरत] शरीरको देखकर और पिताकी बात याद करके वह केलेका एक पत्ता लेकर मुनिको पंखा झलने लगी॥ २४॥ |
| निर्मलं शीतलं वारि समानीय सुवासितम्।<br>पानाय कल्पयामास भक्त्या परमया लघु॥ २५<br><br>छायां वस्त्रातपत्रेण भास्करे मध्यगे सति।<br>रचयामास तन्वङ्गी स्वयं धर्मे स्थिता सती॥ २६ | तबसे वह उनके पीनेके लिये अत्यन्त स्वच्छ, शीतल, सुगन्धित तथा रुचिकर जल ले आकर [उनके समक्ष] श्रद्धापूर्वक उपस्थित किया करती। सूर्यके मध्य आकाशमें होते ही वह सुन्दरी उनके ऊपर वस्त्रसे छतरी बनाकर छाया कर देती थी। वह साध्वी सदा पातिव्रत्य धर्मका पालन करती थी॥ २५—२६॥ |
| फलान्यानीय दिव्यानि पक्वानि मधुराणि च।<br>मुमोचाग्रे मुनेस्तस्य भक्षार्थं विहितानि च॥ २७<br><br>कुशाः प्रादेशमात्रा हि हरिताः शुकसन्निभाः।<br>दधाराग्रेऽथ पुष्पाणि नित्यकर्मसमृद्धये॥ २८<br><br>निद्रार्थं कल्पयामास संस्तरं पल्लवान्वितम्।<br>तस्मिन्मुनौ चादरस्था चकार व्यजनं शनैः॥ २९ | वह शास्त्रविहित दिव्य, पके तथा मीठे फल लाकर खानेके लिये उन मुनिके समक्ष रख देती थी। वह कन्या उनके नित्यकर्मके सम्पादनार्थ पुष्प और तोतेके वर्णके समान प्रादेशमात्र मापवाले हरे-हरे कुश उनके आगे प्रस्तुत कर देती थी। उनके शयनके लिये वह कोमल-कोमल पत्तोंका बिछौना तैयार करती थी और फिर उन मुनिके प्रति आदरभाव रखकर धीरे-धीरे पंखा झलने लगती थी॥ २७—२९॥ |
| ४५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हावभावादिकं किञ्चिद्विकारजननं च तत्।<br>न चकार जयन्ती सा शापभीता मुनेस्तदा॥ ३० | मुनिके शापसे भयभीत होकर वह जयन्ती उनके मनमें विकार उत्पन्न करनेवाला कोई हाव-भाव प्रदर्शित नहीं करती थी॥ ३०॥ |
| स्तुतिं चकार तन्वङ्गी गीर्भिस्तस्य महात्मनः।<br>सुभाषिण्यनुकूलाभिः प्रीतिकर्त्रीभिरप्युत॥ ३१<br>प्रबुद्धे जलमादाय दधाराचमनाय च।<br>मनोऽनुकूलं सततं कुर्वन्ती व्यचरत्तदा॥ ३२ | सुकुमार अंगोंवाली तथा मृदुभाषण करनेवाली वह कन्या उन महात्माके मनके अनुकूल तथा प्रीति उत्पन्न करनेवाले शब्दोंसे उनकी स्तुति करती थी। तत्पश्चात् उनके जाग जानेपर आचमनके लिये जल लाकर रख देती थी। इस प्रकार सदा उनके मनके अनुकूल कार्य करती हुई उनके साथ व्यवहार करती थी॥ ३१-३२॥ |
| इन्द्रोऽपि सेवकांस्तत्र प्रेषयामास चतुरः।<br>प्रवृत्तिं ज्ञातुकामो वै मुनेस्तस्य जितात्मनः॥ ३३ | चिन्तासे व्याकुल इन्द्र भी उन जितेन्द्रिय मुनिकी प्रवृत्ति जाननेकी इच्छासे अपने सेवक भेजते रहते थे॥ ३३॥ |
| एवं बहूनि वर्षाणि परिचर्यापरावभूत्।<br>निर्विकारा जितक्रोधा ब्रह्मचर्यपरा सती॥ ३४ | इस प्रकार वह साध्वी कन्या क्रोधपर विजय प्राप्त करके, निर्विकार होकर तथा ब्रह्मचर्यपरायण रहती हुई बहुत वर्षोंतक मुनिकी सेवामें संलग्न रही॥ ३४॥ |
| पूर्णे वर्षसहस्रे तु परितुष्टो महेश्वरः।<br>वरेण छन्दयामास काव्यं प्रीतमना हरः॥ ३५ | तदनन्तर हजार वर्ष पूर्ण होनेपर महेश्वर शिव प्रसन्न हो गये और प्रसन्नतापूर्वक वे शुक्राचार्यसे वर माँगनेके लिये कहने लगे॥ ३५॥ |
| ईश्वर उवाच<br>यच्च किञ्चिदपि ब्रह्मान्विद्यते भृगुनन्दन।<br>प्रतिपश्यसि यत्सर्वं यच्च वाच्यं न कस्यचित्॥ ३६<br>सर्वाभिभावकत्वेन भविष्यसि न संशयः।<br>अवध्यः सर्वभूतानां प्रजेशश्च द्विजोत्तमः॥ ३७ | ईश्वर बोले— हे ब्रह्मन्! हे भृगुनन्दन! जगत्में जो कुछ भी विद्यमान है, आप जो सब देख रहे हैं तथा जो किसीकी भी वाणीका विषय नहीं है—उन सबके स्वामित्वसे आप युक्त हो जायेंगे; इसमें कोई सन्देह नहीं है। आप सभी प्राणियोंसे अवध्य होंगे। आप प्रजाओंके स्वामी तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे॥ ३६-३७॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं दत्त्वा वराञ्छम्भुस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>काव्यस्तामथ संवीक्ष्य जयन्तीं वाक्यमब्रवीत्॥ ३८<br>कासि कस्यासि सुश्रोणि ब्रूहि किं ते चिकीर्षितम्।<br>किमर्थमिह सम्प्राप्ता कार्यं वद वरोरु मे॥ ३९<br>किं वाञ्छसि करोम्यद्य दुष्करं चेत्सुलोचने।<br>प्रीतोऽस्मि त्वत्कृतेनाद्य वरं वरय सुव्रते॥ ४० | व्यासजी बोले— इस प्रकार वर प्रदान करके शिवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् जयन्तीको देखकर शुक्राचार्यने उससे कहा—हे सुश्रोणि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो; मुझे अपनी अभिलाषा बताओ। हे सुन्दरि! तुम यहाँ किसलिये आयी हो, अपना कार्य बताओ। हे सुनयने! तुम क्या चाहती हो; यदि वह कार्य दुष्कर भी हो तो भी मैं उसे अभी कर दूँगा। हे सुव्रते! आज मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ, अतः वर माँग लो॥ ३८-४०॥ |
| अ० १२ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४५९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततः सा तु मुनिं प्राह जयन्ती मुदितानना।<br>चिकीर्षितं मे भगवंस्तपसा ज्ञातुमर्हसि॥ ४१ | तदनन्तर प्रसन्न मुखमण्डलवाली जयन्तीने मुनिसे कहा—हे भगवन्! आप तो अपनी तपस्यासे मेरा अभिलषित जान लेनेमें समर्थ हैं॥ ४१॥ |
| शुक्र उवाच<br>ज्ञातं मया तथापि त्वं ब्रूहि यन्मनसेप्सितम्।<br>करोमि सर्वथा भद्रं प्रीतोऽस्मि परिचर्यया॥ ४२ | **शुक्राचार्य बोले—**वह तो मैंने जान लिया, फिर भी जो तुम्हारा मनोभिलषित है, उसे तुम मुझे बताओ। मैं हर तरहसे तुम्हारा कल्याण करूँगा; क्योंकि मैं तुम्हारी सेवासे प्रसन्न हूँ॥ ४२॥ |
| जयन्त्युवाच<br>शक्रस्याहं सुता ब्रह्मन् पित्रा तुभ्यं समर्पिता।<br>जयन्ती नामतश्चाहं जयन्तावरजा मुने॥ ४३ | **जयन्ती बोली—**हे ब्रह्मन्! मैं इन्द्रकी पुत्री हूँ और पिताजीने मुझे आपको सौंप दिया है। हे मुने! मेरा नाम जयन्ती है और मैं जयन्तकी छोटी बहन हूँ॥ ४३॥ |
| सकामास्मि त्वयि विभो वाञ्छितं कुरु मेऽधुना।<br>रंस्ये त्वया महाभाग धर्मतः प्रीतिपूर्वकम्॥ ४४ | हे विभो! मैं आपपर आसक्त हूँ, अतः मेरी अभिलाषा पूर्ण कीजिये। हे महाभाग! मैं पातिव्रत-धर्मके अनुसार प्रेमपूर्वक आपके साथ विहार करूँगी॥ ४४॥ |
| शुक्र उवाच<br>मया सह त्वं सुश्रोणि दशवर्षाणि भामिनि।<br>सर्वैर्भूतैरदृश्या च रमस्वेह यदृच्छया॥ ४५ | **शुक्राचार्य बोले—**हे सुश्रोणि! हे भामिनि! तुम सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहती हुई दस वर्षोंतक इच्छानुसार मेरे साथ यहाँ विहार करो॥ ४५॥ |
| व्यास उवाच<br>एवमुक्त्वा गृहं गत्वा जयन्त्याः पाणिमुद्वहन्।<br>तया सहावसद्देव्या दशवर्षाणि भार्गवः॥ ४६ | **व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर शुक्राचार्यने घर जाकर जयन्तीके साथ विवाह किया। तत्पश्चात् मायासे आच्छादित होकर सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहते हुए वे ऐश्वर्यसम्पन्न मुनि शुक्राचार्य देवी जयन्तीके साथ दस वर्षोंतक वहाँ रहे॥ ४६ ½॥ |
| अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संवृतः प्रभुः।<br>दैत्यास्तमागतं श्रुत्वा कृतार्थं मन्त्रसंयुक्तम्॥ ४७<br><br>अभिजग्मुर्गृहे तस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः।<br>नापश्यन् रममाणं ते जयन्त्या सह संयुक्तम्॥ ४८ | गुरु शुक्राचार्यको अपने उद्देश्यमें सफल हो मन्त्रसे युक्त होकर आया हुआ सुनकर सभी दैत्य उनके दर्शनकी इच्छासे प्रसन्नतापूर्वक उनके घर गये, किंतु वे उन्हें देख न सके; क्योंकि उस समय वे जयन्तीके साथ विहार कर रहे थे॥ ४७-४८॥ |
| तदा विमनसः सर्वे जाता भग्नोद्यमाश्च ते।<br>चिन्तापरातिदीनाश्च वीक्षमाणाः पुनः पुनः॥ ४९<br><br>अदृष्ट्वा तं तु संवृतं प्रतिजग्मुर्यथागतम्।<br>स्वगृहान्दैत्यवर्यास्ते चिन्ताविष्टा भयातुराः॥ ५० | इससे उन सभी दैत्योंका मन उदास हो गया और उनके सभी उद्योग व्यर्थ हो गये। वे बहुत चिन्तित और दुःखी होकर उन्हें बार-बार खोजते रहे। अन्तमें [मायासे] आच्छादित उन मुनिको न देखकर वे चिन्तित तथा भयभीत दैत्य जैसे आये थे वैसे ही अपने घर लौट गये॥ ४९-५०॥ |
| रममाणं तथा ज्ञात्वा शक्रः प्रोवाच तं गुरुम्।<br>बृहस्पतिं महाभागं किं कर्तव्यमितः परम्॥ ५१ | तत्पश्चात् शुक्राचार्यको विहार करता हुआ जानकर इन्द्रने अपने गुरु महाभाग बृहस्पतिसे कहा—अब क्या किया जाय?॥ ५१॥ |
| ४६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| गच्छाद्य दानवान्ब्रह्मन्मायया त्वं प्रलोभय।<br>अस्माकं कुरु कार्यं त्वं बुद्ध्या सञ्चिन्त्य मानद॥ ५२ | हे ब्रह्मन्! आप दानवोंके पास जाइये और मायाके द्वारा उन्हें मोहमें डाल दीजिये। हे मानद! बुद्धिसे भलीभाँति विचार करके आप हमारा कार्य सिद्ध कर दीजिये॥ ५२॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं काव्यं रममाणं सुसंवृतम्।<br>ज्ञात्वा तद्रूपमास्थाय दैत्यान्प्रति ययौ गुरुः॥ ५३ | इन्द्रकी बात सुनकर देवगुरु बृहस्पति शुक्राचार्यको मायाच्छादित होनेके कारण [अदृश्य हो जयन्तीके साथ] क्रीडा करते जानकर उन्हींका रूप धारण करके दैत्योंके पास गये॥ ५३॥ |
| गत्वा तत्रातिभक्त्यासौ दानवान्समुपाह्वयत्।<br>आगतास्तेऽसुराः सर्वे ददृशुः काव्यमग्रतः॥ ५४ | वहाँ पहुँचकर उन्होंने बड़े आदरके साथ दानवोंको बुलवाया। तब सभी दानव आ गये और उन्होंने शुक्राचार्यको अपने सम्मुख देखा॥ ५४॥ |
| प्रणम्य संस्थिताः सर्वे काव्यं मत्वातिमोहिताः।<br>न विदुस्ते गुरोर्मायां काव्यरूपविभाविनीम्॥ ५५ | मायासे विमोहित सभी दैत्य [उन छद्मवेषधारी देवगुरु बृहस्पतिको ही] शुक्राचार्य समझकर उन्हें प्रणाम करके उनके समक्ष खड़े हो गये। वे शुक्राचार्यका कृत्रिम रूप प्रकट करनेवाली देवगुरु बृहस्पतिकी मायाको नहीं जान सके॥ ५५॥ |
| तानुवाच गुरुः काव्यरूपः प्रच्छन्नमायया।<br>स्वागतं मम याज्यानां प्राप्तोऽहं वो हिताय वै॥ ५६<br><br>अहं वो बोधयिष्यामि विद्यां प्राप्ताममायया।<br>तपसा तोषितः शम्भुर्युष्मत्कल्याणहेतवे॥ ५७ | तत्पश्चात् छद्म मायासे शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले गुरु बृहस्पतिने उनसे कहा—मेरे यजमानोंका स्वागत है। मैं आपलोगोंके हितके लिये अब आ गया हूँ। मैंने आप सबके कल्याणके लिये तपस्याके द्वारा भगवान् शिवको प्रसन्न कर लिया और अब मैं उनसे प्राप्त विद्याको निष्कपट भावसे आपलोगोंको बता दूँगा॥ ५६-५७॥ |
| तच्छ्रुत्वा प्रीतिमनसो जातास्ते दानवोत्तमाः।<br>कृतकार्यं गुरुं मत्वा जहृषुस्ते विमोहिताः॥ ५८<br><br>प्रणेमुस्ते मुदा युक्ता निरातङ्का गतव्यथाः।<br>देवेभ्यश्च भयं त्यक्त्वा तस्थुः सर्वे निरामयाः॥ ५९ | यह सुनकर वे श्रेष्ठ दानव प्रसन्नचित्त हो गये। गुरु शुक्राचार्यको अपने उद्देश्यमें सफल समझकर वे मोहग्रस्त दानव बहुत हर्षित हुए और उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें प्रणाम किया। वे भयमुक्त तथा सन्तापरहित हो गये। अब देवताओंका भय छोड़कर वे सभी दैत्य स्वस्थचित्त होकर रहने लगे॥ ५८-५९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे जयन्त्या शुक्रसहवासवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
शुक्राचार्यरूपधारी बृहस्पतिका दैत्योंको उपदेश देना
| राजोवाच<br>किं कृतं गुरुणा पश्चाद् भृगुरूपेण वर्तता।<br>छलेनैव हि दैत्यानां पौरोहित्येन धीमता॥ १ | राजा बोले—[हे व्यासजी!] तत्पश्चात् शुक्राचार्यका रूप धारण करनेवाले बुद्धिमान् गुरु बृहस्पतिने छलपूर्वक दैत्योंका पुरोहित बनकर क्या किया?॥ १॥ |
| अ० १३ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४६१ |
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| गुरुः सुराणामनिशं सर्वविद्यानिधिस्तथा।<br>सुतोऽङ्गिरस एवासौ स कथं छलकृन्मुनिः॥ २ | वे तो देवताओंके गुरु हैं, सदासे सभी विद्याओंके निधान हैं और महर्षि अंगिराके पुत्र हैं; तब उन मुनिने छल क्यों किया?॥ २॥ |
| धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु सत्यं धर्मस्य कारणम्।<br>कथितं मुनिभिर्येन परमात्मापि लभ्यते॥ ३ | मुनियोंने समस्त धर्मशास्त्रोंमें सत्यको ही धर्मका मूल बताया है, जिससे परमात्मातक प्राप्त किये जा सकते हैं॥ ३॥ |
| वाचस्पतिस्तथा मिथ्यावक्ता चेद्दानवान्प्रति।<br>कः सत्यवक्ता संसारे भविष्यति गृहाश्रमी॥ ४ | जब बृहस्पति भी दानवोंसे झूठ बोले, तब संसारमें कौन गृहस्थ सत्य बोलनेवाला हो सकेगा?॥ ४॥ |
| आहारादधिकं भोज्यं ब्रह्माण्डविभवेऽपि न।<br>तदर्थं मुनयो मिथ्या प्रवर्तन्ते कथं मुने॥ ५ | हे मुने! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका वैभव पासमें हो जानेपर भी [कोई व्यक्ति अपने] आहारसे अधिक नहीं खा सकता, तब उसीके निमित्त मुनिलोग भी मिथ्या-भाषणमें किसलिये प्रवृत्त हो जाते हैं?॥ ५॥ |
| शब्दप्रमाणमुच्छेदं शिष्टाभावे गतं न किम्।<br>छलकर्मप्रवृत्ते वाविगीतत्वं गुरौ कथम्॥ ६ | इस प्रकारके अशिष्ट आचरणसे देवगुरु बृहस्पतिके वचनोंकी प्रामाणिकता क्या नष्ट नहीं हो गयी और इस छलकर्ममें लिप्त होनेसे उन्हें निष्कलंक कैसे कहा जा सकता है?॥ ६॥ |
| देवाः सत्त्वसमुद्भूता राजसा मानवाः स्मृताः।<br>तिर्यञ्चस्तामसाः प्रोक्ता उत्पत्तौ मुनिभिः किल॥ ७ | मुनियोंने देवताओंको सत्त्वगुणसे, मनुष्योंको रजोगुणसे तथा पशु-पक्षियोंको तमोगुणसे उत्पन्न बतलाया है॥ ७॥ |
| अमराणां गुरुः साक्षान्मिथ्यावादी स्वयं यदि।<br>तदा कः सत्यवक्ता स्याद्राजसस्तामसः पुनः॥ ८ | यदि स्वयं देवगुरु बृहस्पति ही साक्षात् मिथ्या-भाषणमें प्रवृत्त हो गये, तब रजोगुण तथा तमोगुणसे युक्त कौन प्राणी सत्यवादी हो सकेगा?॥ ८॥ |
| क्व स्थितिस्तस्य धर्मस्य सन्देहोऽयं ममात्मनः।<br>का गतिः सर्वजन्तूनां मिथ्याभूते जगत्त्रये॥ ९ | इस प्रकार तीनों लोकोंके मिथ्यापरायण हो जानेपर धर्मकी स्थिति कहाँ होगी और सभी प्राणियोंकी क्या दशा होगी? यही मेरा संदेह है॥ ९॥ |
| हरिर्ब्रह्मा शचीकान्तस्तथान्ये सुरसत्तमाः।<br>सर्वे छलविधौ दक्षा मनुष्याणाञ्च का कथा॥ १० | भगवान् विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र तथा और भी दूसरे महान् देवतागण—सब छलकार्यमें निपुण हैं, तब मनुष्योंकी बात ही क्या?॥ १०॥ |
| कामक्रोधाभिसन्तप्ता लोभोपहतचेतसः।<br>छले दक्षाः सुराः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः॥ ११ | सभी देवता और तपोधन मुनिगण भी काम तथा क्रोधसे सन्तप्त और लोभसे व्याकुलचित्त होकर छल-प्रपंचमें तत्पर रहते हैं॥ ११॥ |
| वसिष्ठो वामदेवश्च विश्वामित्रो गुरुस्तथा।<br>एते पापरताः कात्र गतिर्धर्मस्य मानद॥ १२ | हे मानद! जब वसिष्ठ, वामदेव, विश्वामित्र और गुरु बृहस्पति—ये लोग भी पाप-कर्ममें संलग्न हो गये, तब धर्मकी क्या दशा होगी?॥ १२॥ |
| इन्द्रोऽग्निश्चन्द्रमा वेधाः परदाराभिलम्पटाः।<br>आर्यत्वं भुवनेष्वेषु स्थितं कुत्र मुने वद॥ १३ | इन्द्र, अग्नि, चन्द्रमा और ब्रह्मातक कामके वशीभूत हो गये, तब हे मुने! आप ही बतायें कि इन भुवनोंमें शिष्टता कहाँ रह गयी?॥ १३॥ |
| ४६२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| वचनं कस्य मन्तव्यमुपदेशधियानघ।<br>सर्वे लोभाभिभूतास्ते देवाश्च मुनयस्तदा ॥ १४ | हे पुण्यात्मन् ! जब वे सब देवता और मुनिलोग भी लोभके वशीभूत हैं, तब उपदेश ग्रहण करनेके विचारसे किसका वचन प्रमाण माना जाय ? ॥ १४ ॥ |
| व्यास उवाच<br>किं विष्णुः किं शिवो ब्रह्मा मघवा किं बृहस्पतिः।<br>देहवान् प्रभवत्येव विकारैः संयुतस्तदा ॥ १५ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] चाहे विष्णु, ब्रह्मा, शिव, इन्द्र और बृहस्पति ही क्यों न हों—देहधारी तो विकारोंसे युक्त रहता ही है ॥ १५ ॥ |
| रागी विष्णुः शिवो रागी ब्रह्मापि रागसंयुतः।<br>(रागवान्किमकृत्यं वै न करोति नराधिप)<br>रागवानपि चातुर्याद्विदेह इव लक्ष्यते ॥ १६<br><br>सम्प्राप्ते संकटे सोऽपि गुणैः सम्बाध्यते किल।<br>कारणाद्रहितं कार्यं कथं भवितुमर्हति ॥ १७<br><br>ब्रह्मादीनां च सर्वेषां गुणा एव हि कारणम्।<br>पञ्चविंशत्समुद्भूता देहास्तेषां न चान्यथा ॥ १८<br><br>काले मरणधर्म्मोऽस्ते सन्देहः कोऽत्र ते नृप। | ब्रह्मा, विष्णु और महेशतक आसक्तिसे ग्रस्त हैं। (हे राजन्! आसक्त प्राणी कौन-सा अनर्थ नहीं कर बैठता) आसक्तिसे युक्त प्राणी भी चतुराईके कारण विरक्तकी भाँति दिखायी पड़ता है, किंतु संकट उपस्थित होनेपर वह [सत्त्व, रज, तम] गुणोंसे आबद्ध हो जाता है। कोई भी कार्य बिना कारणके कैसे हो सकता है? ब्रह्मा आदि समस्त देवताओंके भी मूल कारण गुण ही हैं। उनके भी शरीर पचीस तत्त्वोंसे बने हैं, इसमें सन्देह नहीं है। हे राजन्! समय आ जानेपर वे भी मृत्युको प्राप्त होते हैं, इसमें आपको संशय कैसा? ॥ १६—१८ ½ ॥ |
| परोपदेशे विस्पष्टं शिष्टाः सर्वे भवन्ति च ॥ १९<br><br>विप्लुतिर्ह्यविशेषेण स्वकार्ये समुपस्थिते।<br>कामः क्रोधस्तथा लोभद्रोहोहङ्कारमत्सराः ॥ २०<br><br>देहवान्कः परित्यक्तुमीशो भवति तान्युनः।<br>संसारोऽयं महाराज सदैवैवंविधः स्मृतः ॥ २१<br><br>नान्यथा प्रभवत्येव शुभाशुभमयः किल। | यह पूर्णरूपसे स्पष्ट है कि दूसरोंको उपदेश देनेमें सभी लोग शिष्ट बन जाते हैं, किंतु अपना कार्य पड़नेपर उस उपदेशका पूर्णतः लोप हो जाता है। जो काम, क्रोध, लोभ, द्रोह, अहंकार और डाह आदि विकार हैं; उन्हें छोड़नेमें कौन-सा देहधारी प्राणी समर्थ हो सकता है? हे महाराज! यह संसार सदासे ही इसी प्रकार शुभाशुभसे युक्त कहा गया है, इसमें सन्देह नहीं है॥ १९—२१ ½ ॥ |
| कदाचिद्भगवान्विष्णुस्तपश्चरति दारुणम् ॥ २२<br><br>कदाचिद्विविधान्यज्ञान्वितनोति सुराधिपः।<br>कदाचित्तु रमारङ्गरञ्जितः परमेश्वरः ॥ २३<br><br>रमते किल वैकुण्ठे तद्वशस्तरुणो विभुः।<br>कदाचिद्दानवैः सार्धं युद्धं परमदारुणम् ॥ २४<br><br>करोति करुणासिन्धुस्तद्बाणापीडितो भृशम्।<br>कदाचिज्जयमाप्नोति दैवात्सोऽपि पराजयम् ॥ २५<br><br>सुखदुःखाभिभूतोऽसौ भवत्येव न संशयः।<br>शेषे शेते कदाचिद्वै योगनिद्रासमावृतः ॥ २६<br><br>काले जागर्ति विश्वात्मा स्वभावप्रतिबोधितः। | कभी भगवान् विष्णु घोर तपस्या करते हैं, कभी वे ही सुरेश्वर अनेक प्रकारके यज्ञ करते हैं, कभी वे परमेश्वर विष्णु लक्ष्मीके प्रेम-रसमें सिक्त होकर उनके वशीभूत हो वैकुण्ठमें विहार करते हैं। वे करुणासागर विष्णु कभी दानवोंके साथ अत्यन्त भीषण युद्ध करते हैं और उनके बाणोंसे आहत हो जाते हैं। [उस युद्धमें] वे कभी विजयी होते हैं और कभी दैववश पराजित भी हो जाते हैं। इस प्रकार वे भी सुख तथा दुःखसे प्रभावित होते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। वे विश्वात्मा कभी योगनिद्राके वशवर्ती होकर शेषशय्यापर शयन करते हैं और कभी सृष्टिकाल आनेपर योगमायासे प्रेरित होकर जाग भी जाते हैं॥ २२—२६ ½ ॥ |