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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५३

अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सत्यं वः क्व गतं देवा धर्मश्च श्रुतिनोदितः ।<br>न्यस्तशस्त्रा न हन्तव्या भीताश्च शरणं गताः ॥ ३४देवगण! आप लोगोंका सत्य और श्रुतिसम्मत वह धर्म कहाँ चला गया कि ‘जो शस्त्र रख चुके हों, भयभीत हों और शरणागत हो गये हों, उन्हें नहीं मारना चाहिये’॥ ३२–३४॥
देवा ऊचुः<br>भवद्भिः प्रेषितः काव्यो मन्त्रार्थं कुहकेन च ।<br>तपो ज्ञातं हि युष्माकं तेन युध्याम एव हि ॥ ३५देवता बोले—आप लोगोंने छलसे शुक्राचार्यको मन्त्र प्राप्त करनेके लिये भेजा है। हम आपलोगोंके तपको जान गये हैं, इसीलिये हमलोग युद्ध करनेके लिये उद्यत हुए हैं॥ ३५॥
सज्जा भवन्तु युद्धाय संरब्धाः शस्त्रपाणयः ।<br>शत्रुश्छिद्रेण हन्तव्य एष धर्मः सनातनः ॥ ३६अब क्षुब्ध हुए आपलोग भी हाथोंमें शस्त्र धारणकर युद्धके लिये तैयार हो जाइये। यह सनातन सिद्धान्त है कि जब शत्रु दुर्बल हो, तभी उसे मार डालना चाहिये॥ ३६॥
व्यास उवाच<br>

४५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११


संस्कृतहिन्दी
इत्युक्त्वा प्रेरिता निद्रा तानागत्य पपात च।<br>सेन्द्रा निद्रावशं याता देवा मूकवदास्थिताः॥ ४४ऐसा कहकर उन्होंने निद्राको प्रेरित किया। उस निद्राने देवताओंके पास आकर उनपर अपना प्रभाव डाल दिया, जिससे इन्द्रसहित सभी देवता निद्राके वशीभूत हो गये और गूँगेकी भाँति पड़े रहे॥ ४४॥
इन्द्रं निद्राजितं दृष्ट्वा दीनं विष्णुिरभाषत।<br>मां त्वं प्रविश भद्रं ते नये त्वां च सुरोत्तम॥ ४५इन्द्रको निद्राके द्वारा नियन्त्रित तथा दीन देखकर भगवान् विष्णुने कहा—हे देवश्रेष्ठ! तुम मुझमें प्रविष्ट हो जाओ, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हें अन्यत्र पहुँचाता हूँ॥ ४५॥
एवमुक्तस्ततो विष्णुं प्रविवेश पुरन्दरः।<br>निर्भयो गतनिद्रश्च बभूव हरिरक्षितः॥ ४६विष्णुके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र उनमें प्रवेश कर गये और उन श्रीहरिसे रक्षित होकर वे निर्भय तथा निद्रारहित हो गये॥ ४६॥
रक्षितं हरिणा दृष्ट्वा शक्रं तत्र गतव्यथम्।<br>काव्यमाता ततः क्रुद्धा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ४७<br><br>मघवंस्त्वां भक्षयामि सविष्णुं वै तपोबलात्।<br>पश्यतां सर्वदेवानामीदृशं मे तपोबलम्॥ ४८तब भगवान् विष्णुके द्वारा रक्षित इन्द्रको व्यथाशून्य देखकर शुक्राचार्यकी माता कुपित हो उठीं और यह वचन बोलीं—हे इन्द्र! सभी देवताओंके देखते-देखते मैं अपने तपोबलसे विष्णुसहित तुम्हें खा जाऊँगी; ऐसा मेरा तपोबल है॥ ४७-४८॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्तौ तु तया देवौ विष्ण्विन्द्रौ योगविद्यया।<br>अभिभूतौ महात्मानौ स्तब्धौ तौ सम्बभूवतुः॥ ४९व्यासजी बोले—ऐसा कहकर उन्होंने अपनी योगविद्याके द्वारा इन्द्र तथा विष्णुको आक्रान्त कर दिया और वे दोनों महात्मा स्तब्ध हो गये॥ ४९॥
विस्मितास्तु तदा देवा दृष्ट्वा तावतिबाधितौ।<br>चक्रुः किलकिलाशब्दं ततस्ते दीनमानसाः॥ ५०उन दोनोंको बहुत बड़े संकटमें पड़ा देखकर देवताओंको महान् आश्चर्य हुआ और वे दुःखित्त हो जोर-जोरसे चीखने-चिल्लाने लगे॥ ५०॥
क्रोशमानान्सुरान्दृष्ट्वा विष्णुं प्राह शचीपतिः।<br>विशेषेणाभिभूतोऽस्मि त्वत्तोऽहं मधुसूदन॥ ५१<br><br>जह्येनां तरसा विष्णो यावन्नौ न दहेत्प्रभो।<br>तपसा दर्पितां दुष्टां मा विचारय माधव॥ ५२देवताओंको चीखते-चिल्लाते देखकर इन्द्रने विष्णुसे कहा—हे मधुसूदन! मैं [इस समय] आपकी अपेक्षा अधिक आक्रान्त हूँ। अतः हे विष्णो! हे प्रभो! यह हमें जबतक भस्म न कर दे, आप तपस्याके अभिमानमें चूर इस दुष्टाको शीघ्रतापूर्वक मार डालिये। हे माधव! अब आप सोच-विचार न करें॥ ५१-५२॥
इत्युक्तो भगवान्विष्णुः शक्रण प्रथितेन च।<br>चक्रं सस्मार तरसा घृणां त्यक्त्वाथ माधवः॥ ५३<br><br>स्मृतमात्रं तु सम्प्राप्तं चक्रं विष्णुवशानुगम्।<br>दधार च करे क्रुद्धो वधार्थं शक्रनोदितः॥ ५४कीर्तिमान् इन्द्रके ऐसा कहनेपर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने दया छोड़कर तत्काल सुदर्शन चक्रका स्मरण किया। विष्णुके वशमें रहनेवाला वह चक्र उनके स्मरण करते ही आ पहुँचा और इन्द्रसे प्रेरित होकर उन्होंने कुपित हो उसके वधके लिये चक्रको अपने हाथमें ले लिया॥ ५३-५४॥