देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५१
अ० ११] चतुर्थ स्कन्ध ४५१
| सेवाथ समये कार्या शत्रूणां शुभकाम्यया ।<br>स्वशक्त्युपचये काले हन्तव्यास्ते मनीषिभिः ॥ ११ | बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि अपने कल्याणकी इच्छासे समयपर शत्रुओंकी भी सेवा करे और अपनी शक्तिका संचय हो जानेपर उन्हें मार डाले ॥ ११ ॥ |
| तदद्य विनयं कृत्वा सामपूर्वं छलेन वै।<br>तिष्ठध्वं स्वनिकेतेषु मदागमनकाङ्क्षया ॥ १२ | अतः देवताओंकी विनती करके छलपूर्वक सामनीतिका प्रयोग करते हुए मेरे लौटनेकी प्रतीक्षाके साथ अपने-अपने घरोंमें रहो ॥ १२ ॥ |
| प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि दानवाः ।<br>युध्यामहे पुनर्दैवान्मन्त्रमास्थाय वै बलम् ॥ १३ | हे दानवो! महादेवजीसे मन्त्र प्राप्त करके मैं आऊँगा और तब उसी मन्त्रबलका आश्रय लेकर हमलोग देवताओंसे युद्ध करेंगे ॥ १३ ॥ |
| इत्युक्त्वाथ भृगुस्तेभ्यो जगाम कृतनिश्चयः ।<br>महादेवं महाराज मन्त्रार्थं मुनिसत्तमः ॥ १४ | हे महाराज! उन दानवोंसे ऐसा कहकर दृढ़ संकल्पवाले मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्य मन्त्रप्राप्तिके लिये शिवजीके पास चले गये ॥ १४ ॥ |
| दानवाः प्रेषयामासुः प्रह्लादं सुरसन्निधौ ।<br>सत्यवादिनमव्यग्रं सुराणां प्रत्ययप्रदम् ॥ १५ | तदनन्तर दैत्योंने सत्यवादी, धैर्यवान् तथा देवताओंके विश्वासपात्र प्रह्लादको देवताओंके पास भेजा ॥ १५ ॥ |
| प्रह्लादस्तु सुरान्प्राह प्रश्रयावनतो नृपः ।<br>असुरैः सहितस्तत्र वचनं नम्रतायुतम् ॥ १६<br><br>न्यस्तशस्त्रा वयं सर्वे निःसन्नाहास्तथैव च ।<br>देवास्तपश्चरिष्यामः संवृता वल्कलैर्युताः ॥ १७ | असुरोंके साथ वहाँ जाकर राजा प्रह्लाद विनय-सम्पन्न होकर देवताओंसे नम्रतायुक्त वचन बोले। हे देवताओ! हम सभी लोगोंने शस्त्र रख दिये हैं और कवचका त्याग कर दिया है। अब हम वल्कल धारण करके तपस्या करेंगे ॥ १६-१७ ॥ |
| प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा सत्याभिव्याहृतं तु तत् ।<br>ततो देवा न्यवर्तन्त विज्वरा मुदिताश्च ते ॥ १८ | प्रह्लादका वचन सुनकर देवताओंने उसे सत्य मान लिया और इसके बाद वे निश्चिन्त होकर प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे लौट गये ॥ १८ ॥ |
| न्यस्तशस्त्रेषु दैत्येषु विनिवृत्तास्तदा सुराः ।<br>विश्रब्धाः स्वगृहान्गत्वा क्रीडासक्ताः सुसंस्थिताः ॥ १९ | तब दैत्योंके शस्त्र त्याग देनेपर देवता युद्धसे विरत हो गये और चिन्तारहित होकर अपने-अपने घर जाकर स्वस्थचित्त हो क्रीड़ाविलासमें संलग्न हो गये ॥ १९ ॥ |
| दैत्या दम्भं समालम्ब्य तापसास्तपिसंयुताः ।<br>कश्यपस्याश्रमे वासं चक्रुः काव्यागमेच्छया ॥ २० | उस समय दैत्यगण पाखण्डका सहारा लेकर तपस्वीके रूपमें तपस्यारत होकर शुक्राचार्यके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए कश्यपमुनिके आश्रममें रहने लगे ॥ २० ॥ |
| काव्यो गत्वाथ कैलासं महादेवं प्रणम्य च।<br>उवाच विभुना पृष्टः किं ते कार्यमिति प्रभुः ॥ २१<br><br>मन्त्रानिच्छाम्यहं देव ये न सन्ति बृहस्पतौ ।<br>पराजयाय देवानामसुरणां जयाय च ॥ २२ | उधर, मुनि शुक्राचार्यने कैलासपर्वतपर पहुँचकर शंकरजीको प्रणाम किया। भगवान् शिवके पूछनेपर कि 'आपका क्या कार्य है?'—उन्होंने कहा—हे देव! मैं देवताओंकी पराजय और असुरोंकी विजयके लिये उन मन्त्रोंको चाहता हूँ, जो बृहस्पतिके भी पास न हों ॥ २१-२२ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 C
| ४५२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
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| व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सर्वज्ञः शङ्करः शिवः।<br>चिन्तयामास मनसा किं कर्तव्यमतः परम्॥ २३<br><br>सुरेषु द्रोहबुद्ध्यासौ मन्त्रार्थमिह साम्प्रतम्।<br>प्राप्तः काव्यो गुरुस्तेषां दैत्यानां विजयाय च॥ २४<br><br>रक्षणीया मया देवा इति सञ्चिन्त्य शङ्करः।<br>दुष्करं व्रतमत्युग्रं तमुवाच महेश्वरः॥ २५<br><br>पूर्णं वर्षसहस्रं तु कणधूममवाक्शिराः।<br>यदि पास्यसि भद्रं ते ततो मन्त्रानवाप्स्यसि॥ २६ | व्यासजी बोले—उनका वचन सुनकर सर्वज्ञ और कल्याणकारी भगवान् शिव मनमें सोचने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? ये दैत्यगुरु शुक्राचार्य देवताओंके प्रति द्रोह-बुद्धिसे युक्त होकर उन दैत्योंकी विजयके लिये मन्त्रहेतु इस समय यहाँ आये हैं, अतः मुझे देवताओंकी रक्षा करनी चाहिये—ऐसा सोचकर शिवजीने उन्हें यह अत्यन्त कठोर और दुष्कर व्रत करनेको कहा—पूरे एक हजार वर्षोंतक यदि आप सिर नीचे करके कणधूम (भूसीके धुएँ)-का पान करेंगे, तभी आपका कल्याण होगा और आप मन्त्र प्राप्त कर सकेंगे॥ २३—२६॥ |
| इत्युक्तोऽसौ प्रणम्येशं बाढमित्यब्रवीद्वचः।<br>व्रतं चराम्यहं देव त्वयाज्ञप्तः सुरेश्वर॥ २७ | शिवजीके ऐसा कहनेपर उन्होंने महेश्वरको प्रणाम करके यह वचन कहा—'बहुत अच्छा', हे देव! हे सुरेश्वर! आपने मुझे जो आदेश दिया है, मैं उस व्रतका पालन करूँगा॥ २७॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा शङ्करं काव्यश्चकार व्रतमुत्तमम्।<br>धूमपानरतः शान्तो मन्त्रार्थं कृतनिश्चयः॥ २८ | व्यासजी बोले—शिवजीसे ऐसा कहकर मन्त्रप्राप्तिके लिये दृढ़संकल्प शुक्राचार्यजी शान्त होकर धुएँका सेवन करते हुए कठोर व्रत करने लगे॥ २८॥ |
| ततो देवाः परिज्ञाय काव्यं व्रतरतं तदा।<br>दैत्यान्दम्भरतांश्चैव बभूवुर्मन्त्रतत्पराः॥ २९ | तब उस समय शुक्राचार्यको व्रतमें संलग्न तथा दैत्योंको [तपस्वी बनकर] पाखण्डमें निरत देखकर देवता लोग आपसमें मन्त्रणा करने लगे॥ २९॥ |
| विचार्य मनसा सर्वे संग्रामायोद्यता नृप।<br>ययुर्धृतायुधास्तत्र यत्र ते दानवोत्तमाः॥ ३० | हे राजन्! भलीभाँति विचार करके सभी देवता संग्रामके लिये उद्यत हो गये और शस्त्रास्त्र धारणकर वहाँ पहुँच गये, जहाँ वे बड़े-बड़े दानव विद्यमान थे॥ ३०॥ |
| तानागतानसमीक्ष्याथ सायुधान्दंशितांस्तथा।<br>आसंस्ते भयसंविग्ना दैत्या देवान्समन्ततः॥ ३१ | तदनन्तर दैत्यगण उन आये हुए देवताओंको आयुधोंसे सज्जित और कवच धारण किये तथा अपनेको उनसे सब ओरसे घिरा देखकर भयसे व्याकुल हो उठे॥ ३१॥ |
| उत्पेतुः सहसा ते वै सन्नद्धान्भयकर्शिताः।<br>अब्रुवन्वचनं तथ्यं ते देवान्बलदर्पितान्॥ ३२ | वे भयातुर दानव तुरंत उठकर खड़े हो गये और युद्धके लिये उद्यत बलाभिमानी देवताओंसे सारगर्भित वचन कहने लगे—हमने शस्त्र रख दिये हैं, हम भयभीत हैं और हमारे आचार्य इस समय व्रतमें संलग्न हैं। हे देवताओ! पहले अभयदान देकर भी आप लोग हमें मारनेकी इच्छासे आ गये। हे |
| न्यस्तशस्त्रे भयवति आचार्ये व्रतमास्थिते।<br>दत्त्वाभयं पुरा देवाः सम्प्राप्ता नो जिघांसया॥ ३३ | |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 D