देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १०] द्वितीय स्कन्ध २२५
अ० १०] द्वितीय स्कन्ध २२५
| चिन्ताविष्टस्तदा नागो विप्रशापभयाकुलः।<br>चिन्तयामास योगेन प्रविशेयं गृहं कथम्॥ २९<br><br>वञ्चयामि कथं चैनं राजानं पापकारिणम्।<br>विप्रशापादतं मूढं विप्रपीडाकरं शठम्॥ ३० | [यह जानकर] ब्राह्मणके शापसे भयभीत सर्पराज तक्षकको बड़ी चिन्ता हुई। वह सोचने लगा कि अब मैं किस उपायसे इस राजभवनमें प्रवेश करूँ? और इस पापी, मूढ, विप्रको पीड़ित करनेवाले तथा मुनिके शापसे आहत इस दुष्ट राजाको मैं कैसे छलूँ?॥ २९-३०॥ |
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| पाण्डवानां कुले जातः कोऽपि नैतादृशो भवेत्।<br>तापसस्य गले येन मृतः सर्पो निवेशितः॥ ३१ | पाण्डववंशमें ऐसा कोई नहीं हुआ, जिसने इस प्रकार किसी तपस्वी ब्राह्मणके गलेमें मृत सर्प डाल दिया हो॥ ३१॥ |
| कृत्वा विगर्हितं कर्म जानन्कालगतिं नृपः।<br>रक्षकान्भवने कृत्वा प्रासादमभिगम्य च॥ ३२<br><br>मृत्युं वञ्चयते राजा वर्ततेऽद्य निराकुलः।<br>तं कथं धक्ष्यिष्यामि विप्रवाक्येन चोदितः॥ ३३ | ऐसा निन्दित कर्म करके कालचक्रको जानते हुए भी यह राजा भवनमें रक्षकोंकी नियुक्ति करके राज-भवनमें छिपकर मृत्युकी वंचना कर रहा है और निश्चिन्त होकर पड़ा है। विप्रके शापानुसार मैं उस राजाको कैसे डसूँ?॥ ३२-३३॥ |
| न जानाति च मन्दात्मा मरणं ह्यनिवर्तनम्।<br>तेनासौ रक्षकान्स्थाप्य सौधारूढोऽद्य मोदते॥ ३४ | यह मन्दबुद्धि इतना भी नहीं जानता कि मृत्यु तो अनिवार्य है? इसी कारण यह रक्षकोंकी नियुक्ति करके स्वयं भवनपर चढ़कर आनन्द ले रहा है॥ ३४॥ |
| यदि वै विहितो मृत्युर्दैवेनामिततेजसा।<br>स कथं परिवर्तेत कृतैर्यत्नैस्तु कोटिभिः॥ ३५ | यदि अमित तेजवाले दैवने मृत्यु निश्चित कर दी है तो करोड़ों प्रकारके प्रयत्नोंसे भी उसे कैसे टाला जा सकता है?॥ ३५॥ |
| पाण्डवस्य च दायादो जानन्मृत्युं गतं नृपः।<br>जीवने मतिमास्थाय स्थितः स्थाने निराकुलः॥ ३६ | पाण्डववंशका उत्तराधिकारी यह राजा परीक्षित् अपनेको मृत्युके मुखमें गया हुआ जानते हुए भी जीवित रहनेकी अभिलाषा रखकर सुरक्षित स्थानमें निश्चिन्त होकर पड़ा हुआ है॥ ३६॥ |
| दानपुण्यादिकं राजा कर्तुमर्हति सर्वथा।<br>धर्मेण हन्यते व्याधिर्येनायुः शाश्वतं भवेत्॥ ३७ | यह यदि चाहता तो अनेक प्रकारके दान-पुण्य-द्वारा अपनी आयु बढ़ा सकता था; क्योंकि धर्माचरणसे व्याधि नष्ट होती है और उससे आयु स्थिर होती है॥ ३७॥ |
| नोचेन्मृत्युविधिं कृत्वा स्नानदानादिकाः क्रियाः।<br>मरणं स्वर्गलोकाय नरकायान्धथा भवेत्॥ ३८ | यदि ऐसा सम्भव नहीं था तो मृत्युके समय सम्पन्न की जानेवाली स्नान, दान आदि क्रियाएँ करके मृत्युके अनन्तर स्वर्गयात्रा कर सकता था, अन्यथा इसे नरक जाना होगा॥ ३८॥ |
| द्विजपीडाकृतं पापं पृथग्वास्य च भूपतेः।<br>विप्रशापस्तथा घोर आसन्ने मरणे किल॥ ३९ | मुनिको पीड़ा पहुँचानेका पाप इस राजाको था ही और ब्राह्मणका घोर शाप अलगसे है। अतः अब इसकी मृत्यु सन्निकट है॥ ३९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 A
| २२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| न कोऽपि ब्राह्मणः पार्श्वे य एनं प्रतिबोधयेत्।<br>वेधसा विहितो मृत्युरनिवार्यस्तु सर्वथा॥ ४० | इस समय ऐसा कोई ब्राह्मण भी इसके पास नहीं है, जो इसे यह बता सके कि विधाताके द्वारा निर्धारित मृत्यु सर्वथा अनिवार्य है॥ ४०॥ |
| इति सञ्चिन्त्य सर्पोऽसौ स्वानागानिकटे स्थितान्।<br>कृत्वा तापसवेषांस्तानग्राहिणोत्सुभुजङ्गमान्॥ ४१<br><br>फलमूलादिकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः।<br>स्वयं च कीटरूपेण फलमध्ये ससार ह॥ ४२ | ऐसा विचारकर तक्षकनागने अपने निकटवर्ती श्रेष्ठ नागोंको तपस्वी ब्राह्मणोंका वेष धारण कराकर राजाके पास भेजा। वे राजाको देनेके लिये फल-मूल आदि लेकर तैयार हो गये और तक्षकनाग भी एक छोटे-से कीटके रूपमें फलके बीचमें छिप गया॥ ४१-४२॥ |
| निर्गतास्ते तदा नागाः फलान्यादाय सत्वराः।<br>ते राजभवनं प्राप्य स्थिताः प्रासादसन्निधौ॥ ४३ | तब वे नाग फल आदि लेकर शीघ्र ही निकल पड़े और राजभवनमें पहुँचकर महलके पास खड़े हो गये॥ ४३॥ |
| रक्षकास्तापसान्दृष्ट्वा पप्रच्छुस्तच्चिकीर्षितम्।<br>ऊचुस्ते भूपतिं द्रष्टुं प्राप्ताः स्मोऽद्य तपोवनात्॥ ४४ | इस प्रकार तपस्वियोंको खड़े देखकर रक्षकोंने उनसे पूछा कि आपलोगोंकी क्या इच्छा है? तब उन्होंने कहा—हमलोग महाराजको देखनेके लिये तपोवनसे आये हैं॥ ४४॥ |
| अभिमन्युसुतं वीरं कुलार्कं चारुदर्शनम्।<br>परिवर्धयितुं प्राप्ता मन्त्रैराथर्वणैस्तथा॥ ४५ | पाण्डवकुलके सूर्य, शुभदर्शन तथा पराक्रमी अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित्को अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे आशीर्वाद देनेहेतु हमलोग यहाँ आये हैं॥ ४५॥ |
| निवेदयध्वं राजानं दर्शनार्थगतान्मुनीन्।<br>कृत्वाभिषेकान्यास्यामो दत्त्वा मिष्टफलानि च॥ ४६ | आप जाकर महाराजसे कहें कि कुछ मुनिजन उनसे मिलने आये हैं और वे महाराजका मन्त्राभिषेक करके उन्हें मधुर फल देकर लौट जायेंगे॥ ४६॥ |
| भारतानां कुले क्वापि न दृष्टा द्वाररक्षकाः।<br>न श्रुतं तापसानां तु राज्ञोऽसन्दर्शनं किल॥ ४७<br><br>आरोहामो वयं तत्र यत्र राजा परीक्षितः।<br>आशीर्भिर्वर्धयित्वैनं दत्ताज्ञाः प्रव्रजामहे॥ ४८ | भरतवंशी राजाओंके कुलमें कभी भी द्वाररक्षक नहीं देखे गये। ऐसा भी कहीं सुना नहीं गया कि तपस्वियोंको राजाका दर्शन न मिले। जहाँ महाराज परीक्षित् विराजमान हैं, वहाँ हमलोग जायँगे और उन्हें अपने आशीर्वादसे दीर्घायुष्य बनाकर आज्ञा लेकर लौट जायँगे॥ ४७-४८॥ |
| सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तेषां तापसानां तु रक्षकाः।<br>प्रत्युचुस्तान् द्विजान्मत्वा निदेशं भूपतेर्यथा॥ ४९<br><br>नाद्य वो दर्शनं विप्रा राज्ञः स्यादिति नो मतिः।<br>श्वः सर्वतापसैरत्र त्वागन्तव्यं नृपालये॥ ५० | सूतजी बोले—उन तपस्वियोंका वचन सुनकर रक्षकोंने उन्हें ब्राह्मण समझकर महाराजका आदेश सुनाते हुए कहा—हे विप्रो! हमारे विचारमें आज आपलोगोंको राजाका दर्शन नहीं हो सकेगा। अतः आप समस्त तपस्वीजन राजभवनमें कल पधारें॥ ४९-५०॥ |
| अनारोहस्तु प्रासादो विप्राणां मुनिसत्तमाः।<br>विप्रशापभयाद्राज्ञा विहितोऽस्ति न संशयः॥ ५१ | हे मुनिश्रेष्ठो! विप्रशापसे भयभीत होकर राजाने अपने महलमें ब्राह्मणोंका प्रवेश वर्जित कर रखा है; इसमें संशय नहीं है॥ ५१॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 B
| अ० १० ] | द्वितीय स्कन्ध | २२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तदोचुस्तानथो विप्राः फलमूलजलानि च।<br>विप्राशिषश्च राज्ञेऽथ ग्राहयन्तु सुरक्षकाः॥ ५२ | तब ब्राह्मणोंने उनसे कहा—हमलोगोंकी ओरसे ये फल-मूल तथा जल आप रक्षकगण राजाको दे दें और हमलोगोंका आशीर्वाद पहुँचा दें॥ ५२॥ |
| ते गत्वा नृपतिं प्रोचुस्तापसानागताञ्जनाः।<br>राजोवाचानयध्वं वै फलमूलादिकं च यत्॥ ५३<br>पृच्छध्वं तापसान्कार्यं प्रातरागमनं पुनः।<br>प्रणामं कथयध्वं मे नाद्य सन्दर्शनं मम॥ ५४ | उन्होंने राजाके पास जाकर तपस्वियोंके आगमनकी बात बता दी। इसपर राजाने आज्ञा दी कि वे लोग फल-मूल आदि जो कुछ दे रहे हैं, उन्हें यहाँ लाओ और उन तपस्वियोंके आनेका कारण पूछ लो और उन्हें पुनः कल प्रातः आनेको कह दो। साथ ही मेरी ओरसे उन्हें प्रणाम कहकर यह भी कह देना कि आज मेरा मिलना सम्भव नहीं है॥ ५३-५४॥ |
| ते गत्वाथ समादाय फलमूलादिकं च यत्।<br>राज्ञे समर्पयामासुर्बहुमानपुरःसरम्॥ ५५ | उन द्वारपालोंने तपस्वियोंके पास जाकर उनके दिये हुए फल-मूल आदि लाकर आदरपूर्वक राजाको अर्पित कर दिये॥ ५५॥ |
| गतेषु तेषु नागेषु विप्रवेषावृतेषु च।<br>फलान्यादाय राजासौ सचिवानिदमब्रवीत्॥ ५६<br>सुहृदो भक्षयन्त्वद्य फलान्येतानि सर्वशः।<br>अद्याहं चैकमेतद्वै फलं विप्रार्पितं महत्॥ ५७ | उन विप्रवेषमें आये नागोंके चले जानेपर महाराजने फलोंको लेकर मन्त्रियोंसे कहा—हे सचिवो! आपलोग भी इन फलोंका सम्यक् सेवन कीजिये। मैं तो तपस्वियोंद्वारा अर्पित यही एक बड़ा फल खाऊँगा॥ ५६-५७॥ |
| इत्युक्त्वा तत्फलं दत्त्वा सुहृद्भ्यश्चोत्तरासुतः।<br>करे कृत्वा फलं पक्वं ददार नृपतिः स्वयम्॥ ५८ | ऐसा कहकर उत्तरासुत राजा परीक्षित्ने सब फल अपने सुहृद् सचिवोंमें बाँट दिये और एक सुन्दर पका फल हाथमें लेकर उसे स्वयं विदीर्ण किया॥ ५८॥ |
| विदारितं फलं राज्ञा तत्र कृमिरभूदणुः।<br>स कृष्णनयनस्ताम्रो दृष्टो भूपतिना स्वयम्॥ ५९<br>तं दृष्ट्वा नृपतिः प्राह सचिवान्विस्मितानथ।<br>अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम्॥ ६०<br>अङ्गीकरोमि तं शापं कृमिको मां दशत्वयम्।<br>एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां संन्यवेशयत्॥ ६१<br>अस्तं याते दिनानाथे धृतः कण्ठेऽथ कीटकः।<br>तक्षकस्तु तदा जातः कालरूपी भयानकः॥ ६२ | जिस फलको राजाने चीरा, उसमें ताम्र वर्णवाला तथा काले नेत्रवाला एक छोटा-सा कीट राजाको दिखायी दिया। उसे देखकर राजाने अपने आश्चर्यचकित मन्त्रियोंसे कहा—सूर्य अस्त हो रहे हैं, अतः अब मुझे विषका भय नहीं है। मैं ब्राह्मणके उस शापको अंगीकार करता हूँ कि यह कीट मुझे काट ले। ऐसा कहकर महाराज परीक्षित्ने उसे अपने गलेपर रख लिया। सूर्यके अस्त होते ही गलेपर स्थित वह कीट साक्षात् कालस्वरूप भयानक तक्षकके रूपमें परिणत हो गया॥ ५९–६२॥ |
| राजा संवेष्टितस्तेन दष्टश्चापि महीपतिः।<br>मन्त्रिणो विस्मयं प्राप्ता रुरुदुर्भृशदुःखिताः॥ ६३ | उस नागने तत्काल राजाको लपेट लिया तथा उन्हें डँस लिया। यह देखते ही सभी मन्त्री आश्चर्यमें पड़ गये और अत्यधिक दुःखित होकर विलाप करने लगे॥ ६३॥ |
| घोररूपमहिं वीक्ष्य दुद्रुवुस्ते भयार्दिताः।<br>चुक्रुशू रक्षकाः सर्वे हाहाकारो महानभूत्॥ ६४ | भयंकर रूपवाले उस सर्पको देखकर सभी सचिवगण भयभीत होकर वहाँसे भागने लगे और सभी रक्षकगण चिल्लाने लगे। इस प्रकार वहाँ महान् हाहाकार मच गया॥ ६४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 C