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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अथ दशमोऽध्यायः

| अ० १० ] | षष्ठ स्कन्ध | ७७१ |
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अथ दशमोऽध्यायः

कर्मकी गहन गतिका वर्णन तथा इस सम्बन्धमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका उदाहरण

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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>कथितं चरितं ब्रह्मञ्छक्रस्याद्भुतकर्मणः।<br>स्थानभ्रंशस्तथा दुःखप्राप्तिरुक्ता विशेषतः॥ १<br>यत्र देवाधिदेव्याश्च महिमातीव वर्णितः।<br>सन्देहोऽत्र ममाप्यस्ति यच्छक्रोऽपि महातपाः॥ २जनमेजय बोले—हे ब्रह्मन्! आपने अद्भुत कर्म करनेवाले इन्द्रका आख्यान कहा, जिसमें उनके पदच्युत होने और दुःख प्राप्त करनेका विशेषरूपसे वर्णन किया गया है तथा जिसमें देवताओंकी भी अधीश्वरी देवी भगवतीकी महिमा विस्तारसे वर्णित हुई है॥ १ १/२ ॥
देवाधिपत्यमासाद्य दुःसहं दुःखमन्वभूत्।<br>मखानां तु शतं कृत्वा प्राप्तं स्थानमनुत्तमम्॥ ३<br>देवेशत्वं च सम्प्राप्य भ्रष्टः स्थानादसौ कथम्।<br>एतत्सर्वं समाचक्ष्व कारणं करुणानिधे॥ ४मुझे महान् सन्देह है कि महान् तपस्वी इन्द्रको देवाधिपतिका पद प्राप्त होनेपर भी दारुण दुःख प्राप्त हुआ। सौ यज्ञ करके उन्होंने अतिश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया; और देवताओंके स्वामीका पद प्राप्त करके भी वे अपने स्थानसे कैसे च्युत हो गये?॥ २-३ १/२ ॥
सर्वज्ञोऽसि मुनिश्रेष्ठ पुराणानां प्रवर्तकः।<br>नावाच्यं महतां किञ्चिच्छिष्ये च श्रद्धयान्विते॥ ५<br>तस्मात्कुरु महाभाग मत्सन्देहापनोदनम्।हे दयानिधे! इस सबका कारण सम्यक् रूपसे बताइये। हे मुनिश्रेष्ठ! आप सब कुछ जाननेवाले और पुराणोंके प्रवर्तक हैं, महापुरुषोंके लिये अपने श्रद्धालु शिष्यसे कुछ भी अकथ्य नहीं होता, इसलिये हे महाभाग! मेरे सन्देहका निवारण कीजिये॥ ४-५ १/२ ॥
सूत उवाच<br>इति पृष्टः स राज्ञा वै तदा सत्यवतीसुतः॥ ६<br>तमाहातिप्रसन्नात्मा यथानुक्रममुत्तरम्।सूतजी बोले—तब राजाके ऐसा पूछनेपर सत्यवतीपुत्र वेदव्यासजी प्रसन्नतापूर्वक उनके प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर देने लगे॥ ६ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>निबोध नृपतिश्रेष्ठ कारणं परमाद्भुतम्॥ ७<br>कर्मणस्तु त्रिधा प्रोक्ता गतिस्तत्त्वविदां वरैः।<br>सञ्चितं वर्तमानं च प्रारब्धमिति भेदतः॥ ८<br>अनेकजन्मस्सञ्जातं प्राक्तनं सञ्चितं स्मृतम्।<br>सात्त्विकं राजसं कर्म तामसं त्रिविधं पुनः॥ ९व्यासजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! इसका अत्यन्त अद्भुत कारण सुनो। श्रेष्ठ तत्त्वज्ञानियोंने संचित, वर्तमान और प्रारब्धके भेदसे कर्मकी तीन गतियाँ बतलायी हैं। अनेक जन्मोंका संचित प्राक्तन कर्म संचित-कर्म कहा गया है; फिर वे कर्म भी सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकारके होते हैं॥ ७—९॥
शुभं वाप्यशुभं भूप सञ्चितं बहुकालिकम्।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं सुकृतं दुष्कृतं तथा॥ १०<br>जन्मजन्मनि जीवानां सञ्चितानां च कर्मणाम्।<br>निःशेषस्तु क्षयो नाभूत्कल्पकोटिशतैरपि॥ ११हे राजन्! बहुत समयके संचित शुभ या अशुभ कर्म पुण्य या पापके रूपमें अवश्य ही भोगने पड़ते हैं। जीवोंके प्रत्येक जन्मके संचित कर्म बिना भोग किये करोड़ों कल्पोंमें भी नहीं नष्ट होते॥ १०-११॥
क्रियमाणं च यत्कर्म वर्तमानं तदुच्यते।<br>देहं प्राप्य शुभं वापि ह्यशुभं वा समाचरेत्॥ १२<br>सञ्चितानां पुनर्मध्यात्समाहृत्य कियान्किल।<br>देहारम्भे च समये कालः प्रेरयतीव तत्॥ १३जो कर्म किया जा रहा है, उसे वर्तमान कहा जाता है, जीव देह प्राप्तकर शुभ या अशुभ कार्यमें प्रवृत्त होता है। संचित कर्मोंके कारण देह प्राप्त होनेपर काल जीवको पुनः कर्मके लिये प्रेरित करता है॥ १२-१३॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 C

| ७७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| प्रारब्धं कर्म विज्ञेयं भोगात्तस्य क्षयः स्मृतः।<br>प्राणिभिः खलु भोक्तव्यं प्रारब्धं नात्र संशयः ॥ १४<br><br>पुरा कृतानि राजेन्द्र ह्यशुभानि शुभानि च।<br>अवश्यमेव कर्माणि भोक्तव्यानीति निश्चयः ॥ १५<br><br>देवैर्मनुष्यैरसुरैर्यक्षगन्धर्वकिन्नरैः ।<br>कर्मैव हि महाराज देहारम्भस्य कारणम् ॥ १६ | प्रारब्ध कर्म उसे जानना चाहिये, जिसका भोगसे क्षय हो जाता है। प्राणियोंको यहाँ प्रारब्ध कर्म अवश्य भोगना पड़ता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे राजेन्द्र! देवता, मनुष्य, असुर, यक्ष, गन्धर्व और किन्नर—इन सभीको पूर्वकालमें किये गये शुभ-अशुभ कर्मोंका फल भोगना पड़ता है—यह निश्चित है। हे महाराज! सबके देह-धारणका कारण उनका कर्म ही होता है। कर्मके समाप्त हो जानेपर प्राणियोंका जन्म लेना भी समाप्त हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं है॥ १४–१६ १/२ ॥ |
| कर्मक्षये जन्मनाशः प्राणिनां नात्र संशयः।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र इन्द्राद्याश्च सुरास्तथा ॥ १७<br><br>दानवा यक्षगन्धर्वाः सर्वे कर्मवशाः किल।<br>अन्यथा देहसम्बन्धः कथं भवति भूपते ॥ १८<br><br>कारणं यस्तु भोगस्य देहिनः सुखदुःखयोः।<br>तस्मादनेकजन्मोत्थसञ्चितानां च कर्मणाम् ॥ १९<br><br>मध्ये वेगः समायाति कस्यचित्कालपाकतः।<br>तत्प्रारब्धवशात्पुण्यं करोति च यथा तथा ॥ २० | हे राजन्! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र आदि देवता, दानव, यक्ष और गन्धर्व—ये सभी कर्मके वशीभूत हैं, अन्यथा जीवके सुख-दुःखमें भोगका जो कारणरूप देहसम्बन्ध है वह कैसे होता? इसीलिये किसी कालविपाकके योगसे यथासमय अनेक जन्मोंमें किये हुए संचित कर्मोंका प्रभाव प्रकट हो जाता है। उसी प्रारब्धकर्मके वशमें होकर ही मनुष्य पुण्य या पाप करता है, उसी प्रकार देवता आदि भी करते हैं॥ १७–२० १/२ ॥ |
| पापं करोति मनुजस्तथा देवादयोऽपि च।<br>तथा नारायणो राजन्नरश्च धर्मजावुभौ ॥ २१<br><br>जातौ कृष्णार्जुनौ काममंशौ नारायणस्य तौ।<br>पुराणपीठिकेयं वै मुनिभिः परिकीर्तिता ॥ २२ | हे राजन्! भगवान् विष्णुके अंशसे धर्मपुत्र नर और नारायण ही कृष्ण और अर्जुनके रूपमें प्रकट हुए। मुनियोंके द्वारा इस पौराणिक आख्यानका विवेचन किया गया है॥ २१–२२ ॥ |
| देवांशः स तु विज्ञेयो यो भवेद्विभवाधिकः।<br>नानृषिः कुरुते काव्यं नारुद्रो रुद्रमर्चते ॥ २३<br><br>नादेवांशो ददात्यन्नं नाविष्णुः पृथिवीपतिः।<br>इन्द्रादग्नेर्यमाद्विष्णोर्धनदादिति भूपते ॥ २४<br><br>प्रभुत्वं च प्रभावं च कोपं चैव पराक्रमम्।<br>आदाय क्रियते नूनं शरीरमिति निश्चयः ॥ २५ | जो अधिक वैभवशाली होता है उसे देवांश जानना चाहिये। जो ऋषि नहीं है वह काव्यकी रचना नहीं कर सकता; जो रुद्र नहीं है वह रुद्रकी अर्चना नहीं कर सकता। जिसमें देवांश नहीं है वह अन्नदान नहीं कर सकता और जिसमें विष्णुका अंश नहीं है वह राजा नहीं हो सकता। हे राजन्! विष्णु, इन्द्र, अग्नि, यम और कुबेरसे प्रभुत्व, प्रभाव, कोप और पराक्रम प्राप्त करके ही निश्चितरूपसे यह शरीर बनता है॥ २३–२५ ॥ |
| यः कश्चिद्बलवाँल्लोके भाग्यवानथ भोगवान्।<br>विद्यावान्दानवान्वापि स देवांशः प्रपठ्यते ॥ २६ | इस संसारमें जो कोई बलवान्, भाग्यवान्, भोगवान्, विद्यावान् या दानशील है, उसे देवांश कहा जाता है॥ २६ ॥ |
| तथैवैते मयाख्याताः पाण्डवाः पृथिवीपते।<br>देवांशो वासुदेवोऽपि नारायणसमद्युतिः ॥ २७ | हे राजन्! उसी प्रकार मैंने पाण्डवोंको भी देवांश बताया था। वासुदेव श्रीकृष्ण तो नारायणके अंश और उन्हींके समान कान्तियुक्त थे॥ २७ ॥ |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 D

अ० १० ]षष्ठ स्कन्ध७७३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शरीरं प्राणिनां नूनं भाजनं सुखदुःखयोः।<br>शरीरी प्राप्नुयात्कामं सुखं दुःखमनन्तरम्॥ २८प्राणियोंका शरीर सुख-दुःखका भाजन होता है; शरीरधारी सुख-दुःख प्राप्त करता रहता है॥ २८॥
देही नास्ति वशः कोऽपि दैवाधीनः सदैव हि।<br>जननं मरणं दुःखं सुखं प्राप्नोति चावशः॥ २९कोई भी प्राणी स्वतन्त्र नहीं है, बल्कि सदैव दैवके अधीन रहता है। वह विवश होकर जन्म, मरण, सुख तथा दुःख प्राप्त करता है॥ २९॥
पाण्डवास्ते वने जाताः प्राप्तास्तु स्वगृहं पुनः।<br>स्वबाहुबलतः पश्चाद्राजसूयं क्रतूत्तमम्॥ ३०<br>वनवासं पुनः प्राप्ता बहुदुःखकरं परम्।<br>अर्जुनेन तपस्तप्तं दुष्करं ह्यजितेन्द्रियैः॥ ३१<br>सन्तुष्टैस्तु सुरैर्दत्तं वरदानं पुनः शुभम्।<br>नरदेहकृतं पुण्यं क्व गतं वनवासजम्॥ ३२<br>नरदेहे तपस्तप्तं चोग्रं बदरिकाश्रमे।<br>नार्जुनस्य शरीरे तत्फलदं सम्बभूव ह॥ ३३दैववश ही पाण्डव वन गये और पुनः उन्होंने अपना राज्य प्राप्त किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने बाहुबलसे राजसूय नामक उत्तम यज्ञ किया और बादमें अत्यन्त दुःखदायक वनवास उन्हें पुनः प्राप्त हुआ। वहाँ अर्जुनने अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये दुष्कर तपस्या की। तब [उस तपस्यासे] सन्तुष्ट होकर देवताओंने उन्हें कल्याणकारी वरदान दिया। उस वनवास और नरावतारमें किया गया पुण्य कहाँ गया ? नरावतारमें उन्होंने बदरिकाश्रममें उग्र तपस्या की थी, परंतु अर्जुनके रूपमें उन्हें उस तपस्याका फल नहीं मिला!॥ ३०—३३॥
प्राणिनां देहसम्बन्धे गहना कर्मणो गतिः।<br>दुर्ज्ञेया सर्वथा दैवर्मानवानां तु का कथा॥ ३४प्राणियोंके देह-सम्बन्धी कर्मोंकी गति अत्यन्त गहन है; यह देवताओंके लिये भी दुर्ज्ञेय है तो मनुष्योंकी क्या बात !॥ ३४॥
वासुदेवोऽपि सञ्जातः कारागारेऽतिसङ्कटे।<br>नीतोऽसौ वसुदेवेन नन्दगोपस्य गोकुलम्॥ ३५<br>एकादशैव वर्षाणि संस्थितस्तत्र भारत।<br>पुनः स मथुरां गत्वा जघानोग्रसुतं बलात्॥ ३६<br>मोचयामास पितरौ बन्धनाद् भृशदुःखितौ।<br>उग्रसेनं च राजानञ्चकार मथुरापुरे॥ ३७<br>जगाम द्वारवत्यां स म्लेच्छराजभयात्पुनः।<br>सर्वं भाविवशात्कृष्णः कृतवान्पौरुषं महत्॥ ३८वासुदेव श्रीकृष्ण भी अत्यन्त संकटमय कारागारमें उत्पन्न हुए और वसुदेवके द्वारा गोकुलमें नन्दगोपके घर ले जाये गये। हे भारत! वे वहाँ ग्यारह वर्षतक रहे और पुनः मथुरा जाकर उन्होंने बलपूर्वक उग्रसेनके पुत्र कंसका वध किया। तदनन्तर अत्यन्त दुःखित माता-पिताको बन्धनसे मुक्त किया तथा उग्रसेनको मथुरापुरीका राजा नियुक्त किया। पुनः वे म्लेच्छराज कालयवनके भयसे द्वारका चले गये। श्रीकृष्णने यह सब महान् पराक्रम दैवके अधीन होकर ही किया॥ ३५—३८॥
कृत्वा कार्याण्यनेकानि द्वारवत्यां जनार्दनः।<br>देहं त्यक्त्वा प्रभासे तु सकुदुम्बो दिवं गतः॥ ३९<br>पुत्राः पौत्राश्च सुहृदो भ्रातरो जामयस्तथा।<br>प्रभासे यादवाः सर्वे विप्रशापात्क्षयं गताः॥ ४०<br>एवं ते कथिता राजन् कर्मणो गहना गतिः।<br>वासुदेवोऽपि व्याधस्य बाणेन निधनं गतः॥ ४१वे जनार्दन श्रीकृष्ण द्वारकामें अनेक कार्य करके और प्रभासक्षेत्रमें देहका परित्यागकर अपने कुटुम्बसहित स्वर्ग चले गये। विप्रशापके कारण समस्त यादवगण पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, भाइयों और बहनोंसहित प्रभासक्षेत्रमें नष्ट हो गये और वासुदेव श्रीकृष्ण भी व्याधके बाणसे निधनको प्राप्त हुए। हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे कर्मकी गहन गतिका वर्णन कर दिया॥ ३९—४१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
कर्मणां गहनगतिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

७७४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

अथैकादशोऽध्यायः

युगधर्म एवं तत्सम्बन्धी व्यवस्थाका वर्णन

जनमेजय उवाचजनमेजय बोले—
भारावतारणार्थाय कथितं जन्म कृष्णयोः।<br>संशयोऽयं द्विजश्रेष्ठ हृदये मम तिष्ठति॥ १<br><br>पृथिवी गोस्वरूपेण ब्रह्माणं शरणं गता।<br>द्वापरान्तेऽतिदीनार्ता गुरुभारप्रपीडिता॥ २हे द्विजश्रेष्ठ! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये बलराम और श्रीकृष्णके अवतारकी बात आपने कही, किंतु मेरे मनमें एक संशय है॥ १॥<br><br>द्वापरयुगके अन्तमें अत्यन्त दीन तथा आतुर होकर भारी बोझसे दबी हुई पृथ्वी गौका रूप धारण करके ब्रह्माजीकी शरणमें गयी॥ २॥
वेधसा प्रार्थितो विष्णुः कमलापतिरीश्वरः।<br>भूभारोत्तारणार्थाय साधूनां रक्षणाय च॥ ३<br><br>भगवन् भारते खण्डे देवैः सह जनार्दन।<br>अवतारं गृहाणाशु वसुदेवगृहे विभो॥ ४तब ब्रह्माजीने लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुसे प्रार्थना की—‘हे भगवन्! हे विभो! हे जनार्दन! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये और साधुजनोंकी रक्षाके लिये आप देवताओंके साथ भारतवर्षमें वसुदेवके घरमें शीघ्र ही अवतार लीजिये’॥ ३-४॥
एवं सम्प्रार्थितो धात्रा भगवान्देवकीसुतः।<br>बभूव सह रामेण भूभारोत्तारणाय वै॥ ५<br><br>कियानुत्तारितो भारो हत्वा दुष्टाननेकprimary:शः।<br>ज्ञात्वा सर्वान्दुराचारान्यापबुद्धिन्नृपानिह॥ ६ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये जानेपर भगवान् पृथ्वीका भार उतारनेके लिये बलरामके साथ देवकीके पुत्र हुए; तब उन्होंने अनेक दुष्टों तथा सभी दुराचारी और पापबुद्धि राजाओंको ज्ञात करके उन्हें मारकर पृथ्वीका कितना भार उतारा?॥ ५-६॥
हतो भीष्मो हतो द्रोणो विराटो द्रुपदस्तथा।<br>बाह्लीकः सोमदत्तश्च कर्णो वैकर्तनस्तथा॥ ७<br><br>यैर्लुण्ठितं धनं सर्वं हृताश्च हरियोषितः।<br>कथं न नाशिता दुष्टा ये स्थिताः पृथिवीतले॥ ८<br><br>आभीराश्च शका म्लेच्छा निषादाः कोटिशस्तथा।<br>भारावतरणं किं तत्कृतं कृष्णेन धीमता॥ ९<br><br>सन्देहोऽयं महाभाग न निवर्तति चित्ततः।<br>कलावस्मिन्प्रजाः सर्वाः पश्यतः पापनिश्चयाः॥ १०भीष्म मारे गये, द्रोणाचार्य मारे गये; इसी प्रकार विराट, द्रुपद, बाह्लीक, सोमदत्त और सूर्यपुत्र कर्ण मारे गये। परंतु जिन्होंने कृष्णकी पत्नियोंका हरण किया और उनका सारा धन लूट लिया, उन दुष्टोंको तथा जो करोड़ों आभीर, शक, म्लेच्छ और निषाद पृथ्वीतलपर स्थित थे—उन सबको उन्होंने नष्ट क्यों नहीं कर दिया? तब उन बुद्धिमान् श्रीकृष्णने पृथ्वीका कौन-सा भार उतार दिया! हे महाभाग! मेरे चित्तसे यह सन्देह नहीं हटता है; इस कलियुगमें तो समस्त प्रजा पापपरायण ही दिखायी देती है॥ ७—१०॥
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
राजन् यस्मिन्युगे यादृक्प्रजा भवति कालतः।<br>नान्यथा तद्भवेन्नूनं युगधर्मोऽत्र कारणम्॥ ११हे राजन्! जैसा युग होता है, कालप्रभावसे प्रजा भी वैसी ही होती है, इसके विपरीत नहीं होता; इसमें युगधर्म ही कारण है॥ ११॥
ये धर्मरसिका जीवास्ते वै सत्ययुगेऽभवन्।<br>धर्मार्थरसिका ये तु ते वै त्रेतायुगेऽभवन्॥ १२<br><br>धर्मार्थकामरसिका द्वापरे चाभवन्युगे।<br>अर्थकामपराः सर्वे कलावस्मिन्भवन्ति हि॥ १३जो धर्मानुरागी जीव हैं, वे सत्ययुगमें हुए; जो धर्म और अर्थसे प्रेम रखनेवाले प्राणी हैं, वे त्रेतायुगमें हुए; धर्म, अर्थ और कामके रसिक प्राणी द्वापरयुगमें हुए और अर्थ तथा काममें आसक्ति रखनेवाले सभी प्राणी इस कलियुगमें होते हैं॥ १२-१३॥

| अ० ११ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७७५ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
युगधर्मस्तु राजेन्द्र न याति व्यत्ययं पुनः।<br>कालः कर्तास्ति धर्मस्य ह्यधर्मस्य च वै पुनः॥ १४हे राजेन्द्र! युगधर्मका प्रभाव विपरीत नहीं होता है; काल ही धर्म और अधर्मका कर्ता है॥ १४॥
राजोवाच<br>ये तु सत्ययुगे जीवा भवन्ति धर्मतत्पराः।<br>कुत्र तेऽद्य महाभाग तिष्ठन्ति पुण्यभागिनः॥ १५<br>त्रेतायुगे द्वापरे वा ये दानव्रतकारकाः।<br>वर्तन्ते मुनयः श्रेष्ठाः कुत्र ब्रूहि पितामह॥ १६<br>कलावद्य दुराचारा येऽत्र सन्ति गतत्रपाः।<br>आद्ये युगे क्व यास्यन्ति पापिष्ठा देवनिन्दकाः॥ १७<br>एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तरेण महामते।<br>सर्वथा श्रोतुकामोऽस्मि यदेतद्धर्मनिर्णयम्॥ १८राजा बोले—हे महाभाग! सत्ययुगमें जो धर्मपरायण प्राणी हुए हैं, वे पुण्यशाली लोग इस समय कहाँ स्थित हैं? हे पितामह! त्रेतायुग या द्वापरमें जो दान तथा व्रत करनेवाले श्रेष्ठ मुनि हुए हैं, वे अब कहाँ विद्यमान हैं; मुझे बतायें। इस कलियुगमें जो दुराचारी, निर्लज्ज, देवनिन्दक और पापी लोग विद्यमान हैं, वे सत्ययुगमें कहाँ जायेंगे? हे महामते! यह सब विस्तारपूर्वक कहिये; मैं इस धर्मनिर्णयके विषयमें सब कुछ सुनना चाहता हूँ॥ १५—१८॥
व्यास उवाच<br>ये वै कृतयुगे राजन् सम्भवन्तीह मानवाः।<br>कृत्वा ते पुण्यकर्माणि देवलोकान्व्रजन्ति वै॥ १९व्यासजी बोले—हे राजन्! जो मनुष्य सत्ययुगमें उत्पन्न होते हैं, वे अपने पुण्यकार्योंके कारण देवलोकको चले जाते हैं॥ १९॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम।<br>स्वधर्मनिरता यान्ति लोकान्कर्मजितान्किल॥ २०हे नृपश्रेष्ठ! अपने-अपने वर्णाश्रमधर्मोंमें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने कर्मोंसे अर्जित लोकोंमें चले जाते हैं॥ २०॥
सत्यं दया तथा दानं स्वदारगमनं तथा।<br>अद्रोहः सर्वभूतेषु समता सर्वजन्तुषु॥ २१<br>एतत्साधारणं धर्मं कृत्वा सत्ययुगे पुनः।<br>स्वर्गं यान्तीतरे वर्णा धर्मतो रजकादयः॥ २२<br>तथा त्रेतायुगे राजन् द्वापरेऽथ युगे तथा।<br>कलावस्मिन्युगे पापा नरकं यान्ति मानवाः॥ २३<br>तावत्तिष्ठन्ति ते तत्र यावत्स्याद्युगपर्ययः।<br>पुनश्च मानुषे लोके भवन्ति भुवि मानवाः॥ २४सत्य, दया, दान, एकपत्नीव्रत, सभी प्राणियोंमें अद्रोहभाव तथा सभी जीवोंमें समभाव रखना—यह सत्ययुगका साधारण धर्म है। सत्ययुगमें इसका धर्मपूर्वक पालन करके रजक आदि इतर वर्णके लोग भी स्वर्ग चले जाते हैं। हे राजन्! त्रेता और द्वापरयुगमें यही स्थिति रहती है, किंतु इस कलियुगमें पापी मनुष्य नरक जाते हैं और वे वहाँ तबतक रहते हैं जबतक युगका परिवर्तन नहीं होता, उसके बाद मनुष्यके रूपमें पुनः पृथ्वीपर जन्म लेते हैं॥ २१—२४॥
यदा सत्ययुगस्यादिः कलेरन्तश्च पार्थिव।<br>तदा स्वर्गात्पुण्यकृतो जायन्ते किल मानवाः॥ २५हे राजन्! जब कलियुगका अन्त और सत्ययुगका आरम्भ होता है, तब पुण्यशाली लोग स्वर्गसे पुनः मनुष्यके रूपमें जन्म लेते हैं॥ २५॥
यदा कलियुगस्यादिर्द्वापरस्य क्षयस्तथा।<br>नरकात्पापिनः सर्वे भवन्ति भुवि मानवाः॥ २६जब द्वापरका अन्त और कलियुगका प्रारम्भ होता है, तब नरकके सभी पापी पृथ्वीपर मनुष्यके रूपमें उत्पन्न होते हैं॥ २६॥
एवं कालसमाचारो नान्यथाभूत्कदाचन।<br>तस्मात्कलिरसत्कर्ता तस्मिंस्तु तादृशी प्रजा॥ २७इस प्रकार युगके अनुरूप ही आचार होता है, उसके विपरीत कभी नहीं। कलियुग असत्-प्रधान होता है, इसलिये उसमें प्रजा भी वैसी ही होती है।
७७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कदाचिद्दैवयोगात् प्राणिनां व्यत्ययो भवेत्।<br>कलौ ये साधवः केचिद् द्वापरे सम्भवन्ति ते ॥ २८<br>तथा त्रेतायुगे केचित्केचित्सत्ययुगे तथा।<br>दुष्टाः सत्ययुगे ये तु ते भवन्ति कलावपि ॥ २९<br>कृतकर्मप्रभावेण प्राप्नुवन्त्यसुखानि च।<br>पुनश्च तादृशं कर्म कुर्वन्ति युगभावतः ॥ ३०दैवयोगसे कभी-कभी इन प्राणियोंके जन्म लेनेमें व्यतिक्रम भी हो जाता है। कलियुगमें कुछ जो साधुजन हैं, वे द्वापरके मनुष्य हैं। उसी प्रकार द्वापरके मनुष्य कभी-कभी त्रेतामें और त्रेताके मनुष्य सत्ययुगमें जन्म लेते हैं। जो सत्ययुगमें दुराचारी मनुष्य होते हैं, वे कलियुगके हैं। वे अपने किये हुए कर्मके प्रभावसे दुःख पाते हैं और पुनः युगप्रभावसे वे वैसा ही कर्म करते हैं॥ २७-३०॥
जनमेजय उवाच<br>युगधर्मान्महाभाग ब्रूहि सर्वानशेषतः।<br>यस्मिन्वै यादृशो धर्मो ज्ञातुमिच्छामि तं तथा ॥ ३१जनमेजय बोले— हे महाभाग! आप समस्त युगधर्मोंका पूर्णरूपसे वर्णन करें; जिस युगमें जैसा धर्म होता है, उसे मैं जानना चाहता हूँ॥ ३१॥
व्यास उवाच<br>निबोध नृपशार्दूल दृष्टान्तं ते ब्रवीम्यहम्।<br>साधूनामपि चेतांसि युगभावाद् भ्रमन्ति हि ॥ ३२व्यासजी बोले— हे नृपशार्दूल! ध्यानपूर्वक सुनिये, इस सम्बन्धमें मैं एक दृष्टान्त कहता हूँ। साधुजनोंके मन भी युगधर्मसे प्रभावित होते हैं॥ ३२॥
पितुर्यथा ते राजेन्द्र बुद्धिर्विप्रावहेलने।<br>कृता वै कलिना राजन् धर्मज्ञस्य महात्मनः ॥ ३३<br>अन्यथा क्षत्रियो राजा ययातिकुलसम्भवः।<br>तापसस्य गले सर्पं मृतं कस्मादयोजयत् ॥ ३४हे राजेन्द्र! आपके महात्मा और धर्मज्ञ पिताकी भी बुद्धि कलियुगने विप्रका अपमान करनेकी ओर प्रेरित कर दी थी; अन्यथा ययातिके कुलमें पैदा हुए क्षत्रिय राजा परीक्षित् एक तपस्वीके गलेमें मरा हुआ सर्प क्यों डालते?॥ ३३-३४॥
सर्वं युगबलं राजन्वेदितव्यं विजानता।<br>प्रयत्नेन हि कर्तव्यं धर्मकर्म विशेषतः ॥ ३५हे राजन्! विद्वान्को इसे युगका ही प्रभाव समझना चाहिये। इसलिये विशेषरूपसे धर्माचरण ही प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये॥ ३५॥
नूनं सत्ययुगे राजन् ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>पराशक्त्यर्चनरता देवीदर्शनलालसाः ॥ ३६<br>गायत्रीप्रणवासक्ता गायत्रीध्यानकारिणः।<br>गायत्रीजपसंसक्ता मायाबीजैकजापिनः ॥ ३७<br>ग्रामे ग्रामे पराम्बायाः प्रासादकरणोत्सुकाः।<br>स्वकर्मनिरताः सर्वे सत्यशौचदयान्विताः ॥ ३८<br>त्रय्युक्तकर्मनिरतास्तत्त्वज्ञानविशारदाः।<br>अभवन्क्षत्रियास्तत्र प्रजाभरणतत्पराः ॥ ३९<br>वैश्यास्तु कृषिवणिज्यगोसेवानिरतास्तथा।<br>शूद्राः सेवापरास्तत्र पुण्ये सत्ययुगे नृप ॥ ४०हे राजन्! सत्ययुगमें सभी ब्राह्मण वेदके ज्ञाता, पराशक्तिकी पूजामें तत्पर रहनेवाले, देवीदर्शनकी लालसासे युक्त, गायत्री और प्रणवमन्त्रमें अनुरक्त, गायत्रीका ध्यान करनेवाले, गायत्रीजपपरायण, एकमात्र मायाबीजमन्त्रका जप करनेवाले, प्रत्येक गाँवमें भगवती पराम्बाका मन्दिर बनानेके लिये उत्सुक रहनेवाले, अपने-अपने कर्मोंमें निरत रहनेवाले, सत्य-पवित्रता-दयासे समन्वित, वेदत्रयी कर्ममें संलग्न रहनेवाले और तत्त्वज्ञानमें पूर्ण निष्णात होते थे। क्षत्रिय प्रजाओंके भरण-पोषणमें संलग्न रहते थे। हे राजन्! उस पुण्यमय सत्ययुगमें वैश्यलोग कृषि, व्यापार और गो-पालन करते थे तथा शूद्र सेवापरायण रहते थे॥ ३६-४०॥
पराम्बापूजनासक्ताः सर्वे वर्णाः परे युगे।<br>तथा त्रेतायुगे किञ्चिन्न्यूना धर्मस्य संस्थितिः ॥ ४१उस सत्ययुगमें सभी वर्णोंके लोग भगवती पराम्बाके पूजनमें आसक्त रहते थे। उसके बाद त्रेतायुगमें धर्मकी स्थिति कुछ कम हो गयी। सत्ययुगमें
अ० ११ ]षष्ठ स्कन्ध७७७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
द्वापरे च विशेषेण न्यूना सत्ययुगस्थितिः।<br>पूर्वं ये राक्षसा राजन् ते कलौ ब्राह्मणाः स्मृताः॥ ४२जो धर्मकी स्थिति थी, वह द्वापरमें विशेषरूपसे कम हो गयी। हे राजन्! पूर्वयुगोंमें जो राक्षस समझे जाते थे, वे ही कलियुगमें ब्राह्मण माने जाते हैं॥ ४१-४२॥
पाखण्डनिरताः प्रायो भवन्ति जनवञ्चकाः।<br>असत्यवादिनः सर्वे वेदधर्मविवर्जिताः॥ ४३<br>दाम्भिका लोकचतुरा मानिनो वेदवर्जिताः।<br>शूद्रसेवापराः केचिन्नानाधर्मप्रवर्तकाः॥ ४४<br>वेदनिन्दाकराः क्रूरा धर्मभ्रष्टातिवादुकाः।<br>यथा यथा कलिर्वृद्धिं याति राजंस्तथा तथा॥ ४५<br>धर्मस्य सत्यमूलस्य क्षयः सर्वात्मना भवेत्।<br>तथैव क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च धर्मवर्जिताः॥ ४६<br>असत्यवादिनः पापास्तथा वर्णेतराः कलौ।<br>शूद्रधर्मरता विप्राः प्रतिग्रहपरायणाः॥ ४७वे प्रायः पाखण्डी, लोगोंको ठगनेवाले, झूठ बोलनेवाले तथा वेद और धर्मसे दूर रहनेवाले होते हैं। उनमेंसे कुछ तो दम्भी, लोकव्यवहारमें चालाक, अभिमानी, वेदप्रतिपादित मार्गसे हटकर चलनेवाले, शूद्रोंकी सेवा करनेवाले, विभिन्न धर्मोंका प्रवर्तन करनेवाले, वेदनिन्दक, क्रूर, धर्मभ्रष्ट और व्यर्थ वाद-विवादमें लगे रहनेवाले होते हैं। हे राजन्! जैसे-जैसे कलियुगकी वृद्धि होती है, वैसे-वैसे सत्यमूलक धर्मका सर्वथा क्षय होता जाता है और वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और इतर वर्णोंके लोग भी धर्महीन, मिथ्यावादी तथा पापी होते हैं। ब्राह्मण शूद्रधर्ममें संलग्न और प्रतिग्रहपरायण हो जाते हैं॥ ४३-४७॥
भविष्यन्ति कलौ राजन् युगे वृद्धिं गताः किल।<br>कामचाराः स्त्रियः कामलोभमोहसमन्विताः॥ ४८<br>पापा मिथ्याभिवादिन्यः सदा क्लेशरता नृप।<br>स्वभर्तृवञ्चका नित्यं धर्मभाषणपण्डिताः॥ ४९हे राजन्! कलियुगका प्रभाव और बढ़नेपर स्त्रियाँ स्वेच्छाचारिणी तथा काम, लोभ और मोहसे युक्त हो जायेंगी। हे राजन्! वे पापाचारिणी, झूठ बोलनेवाली, सदा कलह करनेवाली, अपने पतिको ठगनेवाली और नित्य धर्मका भाषण करनेमें निपुण होंगी। कलियुगमें इस प्रकारकी पापपरायण स्त्रियाँ होती हैं॥ ४८-४९ १/२॥
भवन्त्येवंविधा नार्यः पापिष्ठाश्च कलौ युगे।<br>आहारशुद्ध्या नृपते चित्तशुद्धिस्तु जायते॥ ५०<br>शुद्धे चित्ते प्रकाशः स्याद्धर्मस्य नृपसत्तम।<br>वृत्तसङ्करदोषेण जायते धर्मसङ्करः॥ ५१<br>धर्मस्य सङ्करे जाते नूनं स्याद्वर्णसङ्करः।<br>एवं कलियुगे भूप सर्वधर्मविवर्जिते॥ ५२<br>स्ववर्णधर्मवार्तैषा न कुत्राप्युपलभ्यते।<br>महान्तोऽपि च धर्मज्ञा अधर्मं कुर्वते नृप॥ ५३<br>कलिस्वभाव एवैष परिहार्यो न केनचित्।<br>तस्मादत्र मनुष्याणां स्वभावात्पापकारिणाम्॥ ५४<br>निष्कृतिर्न हि राजेन्द्र सामान्योपायतो भवेत्।हे राजन्! आहारकी शुद्धिसे ही अन्तःकरणकी शुद्धि होती है और हे नृपश्रेष्ठ! चित्त शुद्ध होनेपर ही धर्मका प्रकाश होता है। आचारसंकरता (दूसरे वर्णोंके अनुसार आचरण)-दोषसे धर्ममें व्यतिक्रम (विकार) उत्पन्न होता है और धर्ममें विकृति होनेपर वर्णसंकरता उत्पन्न होती है। हे राजन्! इस प्रकार सभी धर्मोंसे हीन कलियुगमें अपने-अपने वर्णाश्रम-धर्मकी चर्चा भी कहीं नहीं सुनायी देती। हे राजन्! धर्मज्ञ और श्रेष्ठजन भी अधर्म करने लग जाते हैं। यह कलियुगका स्वभाव ही है; किसीके भी द्वारा इसका प्रतीकार नहीं किया जा सकता। अतः हे राजेन्द्र! इस कालमें स्वभावसे ही पाप करनेवाले मनुष्योंकी निष्कृति सामान्य उपायसे नहीं हो सकती॥ ५०-५४ १/२॥