देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अथ दशमोऽध्यायः
| २२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| वातोऽपि न चरेत्तत्र प्रवेशे विनिवार्यते।<br>भक्ष्यभोज्यादिकं राजा तत्रस्थश्च चकार सः॥ ४६<br>स्नानसन्ध्यादिकं कर्म तत्रैव विनिवर्त्य च।<br>राजकार्याणि सर्वाणि तत्रस्थश्चाकरोन्नृपः॥ ४७<br>मन्त्रिभिः सह सम्मन्त्र्य गणयन्दिवसानपि।<br>कश्चिच्च कश्यपो नाम ब्राह्मणो मन्त्रिसत्तमः॥ ४८<br>शुश्राव च तथा शापं प्राप्तं राज्ञा महात्मना।<br>स धनार्थी द्विजश्रेष्ठः कश्यपः समचिन्तयत्॥ ४९<br>व्रजामि तत्र यत्रास्ते शप्तो राजा द्विजेन ह।<br>इति कृत्वा मतिं विप्रः स्वगृहान्निःसृतः पथि॥ ५०<br>कश्यपो मन्त्रविद्विद्वान्धनार्थी मुनिसत्तमः॥ ५१ | महलके भीतर वायुका भी संचरण नहीं हो पाता था; क्योंकि उसका प्रवेश सर्वथा वर्जित था। राजा वहीं स्थित रहकर भोजनादि करने लगे। वहींपर रहते हुए स्नान एवं सन्ध्यादि कार्योंसे निवृत्त होकर राजा मन्त्रियोंसे मन्त्रणा करते तथा शापके दिन गिनते हुए समस्त राजकार्योंको संचालित करते थे॥ ४६-४७ १/२॥<br>इसी बीच किसी कश्यप नामक मन्त्र-विशेषज्ञ ब्राह्मणने सुना कि राजा परीक्षित्को [सर्पद्वारा काटे जानेका] शाप प्राप्त हुआ है। उस धनाभिलाषी ब्राह्मणश्रेष्ठ कश्यपने विचार किया कि मुनिके द्वारा शापित राजा इस समय जहाँ रह रहे हैं, मैं वहीं पर जाऊँगा। ऐसा निश्चय करके मन्त्रज्ञ, विद्वान् तथा धनाभिलाषी वह कश्यप नामक मुनिश्रेष्ठ विप्र अपने घरसे निकलकर रास्तेपर चल पड़ा॥ ४८-५१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे परीक्षिद्राज्ञो गुप्तगृहे वासवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
महाराज परीक्षित्को डँसनेके लिये तक्षकका प्रस्थान, मार्गमें मन्त्रवेत्ता कश्यपसे भेंट, तक्षकका एक वटवृक्षको डँसकर भस्म कर देना और कश्यपका उसे पुनः हरा-भरा कर देना, तक्षकद्वारा धन देकर कश्यपको वापस कर देना, सर्पदंशसे राजा परीक्षित्की मृत्यु
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| तस्मिन्नेव दिने नाम्ना तक्षकस्तं नृपोत्तमम्।<br>शप्तं ज्ञात्वा गृहात्तूर्णं निःसृतः पुरुषोत्तमः॥ १<br>वृद्धब्राह्मणवेषेण तक्षकः पथि निर्गतः।<br>अपश्यत्कश्यपं मार्गे व्रजन्तं नृपतिं प्रति॥ २ | [हे मुनिवृन्द!] उसी दिन तक्षक नामक नाग नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को शापित जानकर एक उत्तम मनुष्यका रूप धारण करके अपने घरसे शीघ्र निकल पड़ा। वृद्ध ब्राह्मणके वेषमें रास्तेपर चलते हुए उस तक्षकने महाराज परीक्षित्के यहाँ जाते हुए कश्यपको देखा॥ १-२॥ |
| तमपृच्छत्पन्नगोऽसौ ब्राह्मणं मन्त्रवादिनम्।<br>क्व भवांस्त्वरितो याति किञ्च कार्यं चिकीर्षति॥ ३ | उस नागने उन मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणसे पूछा—आप इतनी शीघ्र गतिसे कहाँ चले जा रहे हैं और कौन-सा कार्य करनेकी आपकी इच्छा है?॥ ३॥ |
| कश्यप उवाच | कश्यपने कहा— |
| परीक्षितं नृपश्रेष्ठं तक्षकश्च प्रधक्ष्यति।<br>तत्राहं त्वरितो यामि नृपं कर्तुमपज्वरम्॥ ४ | महाराज परीक्षित्को तक्षकनाग डँसनेवाला है। अतः मैं उन्हें विषमुक्त करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक वहीं जा रहा हूँ॥ ४॥ |
| मन्त्रोऽस्ति मम विप्रेन्द्र विषनाशकरः किल।<br>जीवयिष्याम्यहं तं वै जीवितव्येऽधुना किल॥ ५ | हे विप्रेन्द्र! मेरे पास प्रबल विषनाशक मन्त्र है, अतएव यदि उनकी आयु शेष होगी तो मैं उन्हें जीवित कर दूँगा॥ ५॥ |
| अ० १० ] | द्वितीय स्कन्ध | २२३ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| तक्षक उवाच<br>अहं स पन्नगो ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम्।<br>निवर्त्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम्॥ ६ | तक्षकने कहा—हे ब्रह्मन्! मैं ही वह तक्षकनाग हूँ और मैं ही महाराज परीक्षित्को काटूँगा। मेरे काट लेनेपर आप चिकित्सा करनेमें समर्थ नहीं हो सकेंगे; अतएव आप लौट जाइये॥ ६॥ |
| कश्यप उवाच<br>अहं दष्टं त्वया सर्प नृपं शप्तं द्विजेन वै।<br>जीवयिष्याम्यसन्देहं कामं मन्त्रबलेन वै॥ ७ | कश्यपने कहा—हे सर्प! ब्राह्मणके द्वारा शापित किये गये राजाको आपके काटनेके उपरान्त मैं उन्हें अपने मन्त्रबलसे निःसन्देह जीवित कर दूँगा॥ ७॥ |
| तक्षक उवाच<br>यदि त्वं जीवितुं यासि मया दष्टं नृपोत्तमम्।<br>मन्त्रशक्तिबलं विप्र दर्शय त्वं ममानघ॥ ८<br>धक्ष्याम्येनं च न्यग्रोधं विषदंष्ट्राभिरद्य वै। | तक्षकने कहा—हे विप्र! हे अनघ! यदि आप मेरे काटे हुए नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को जीवित करनेके लिये जा रहे हैं तो आप अपनी मन्त्र-शक्तिका प्रभाव दिखाइये। मैं इसी समय इस वटवृक्षको अपने विषैले दाँतोंसे डँसता हूँ॥ ८ १/२ ॥ |
| कश्यप उवाच<br>जीवयिष्ये त्वया दष्टं दग्धं वा पन्नगोत्तम॥ ९ | कश्यपने कहा—हे सर्पश्रेष्ठ! आप इसे काट लें अथवा इसे जलाकर भस्म कर दें तो भी मैं इसे पुनः जीवित कर दूँगा॥ ९॥ |
| सूत उवाच<br>अदशत्पन्नगो वृक्षं भस्मसाच्च चकार तम्।<br>उवाच कश्यपं भूयो जीवयैनं द्विजोत्तम॥ १० | सूतजी बोले—नागराज तक्षकने उस वृक्षको डँस लिया और उसे जलाकर भस्म कर दिया। तब उसने कश्यपसे कहा—‘हे द्विजश्रेष्ठ! अब आप इसे पुनः जीवित कीजिये’॥ १०॥ |
| दृष्ट्वा भस्मीकृतं वृक्षं पन्नगेन विषाग्निना।<br>सर्वं भस्म समाहृत्य कश्यपो वाक्यमब्रवीत्॥ ११<br>पश्य मन्त्रबलं मेऽद्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तम।<br>जीवयाम्यद्य वृक्षं वै पश्यतस्ते महाविष॥ १२ | तक्षकनागकी विषाग्निसे भस्म हुए वृक्षके सम्पूर्ण भस्मको एकत्र करके कश्यपने यह बात कही—हे महाविषधर नागराज! अब आप मेरे मन्त्रका प्रभाव देखिये। मैं आपके देखते-देखते इस वटवृक्षको जीवन प्रदान करता हूँ॥ ११-१२॥ |
| इत्युक्त्वा जलमादाय कश्यपो मन्त्रवित्तमः।<br>सिषेच भस्मराशिं तं मन्त्रितेनैव वारिणा॥ १३<br>तद्वारिसेचनाज्जातो न्यग्रोधः पूर्ववच्छुभः।<br>विस्मयं तक्षकः प्राप्तो दृष्ट्वा तं जीवितं नगम्॥ १४ | ऐसा कहकर हाथमें जल लेकर मन्त्रविद् कश्यपने उस जलको अभिमन्त्रित किया और उसे भस्मराशिपर छिड़क दिया। जलके पड़ते ही वह वटवृक्ष पुनः पहलेकी भाँति सुन्दर हो गया। उस वृक्षको इस प्रकार जीवित देखकर तक्षकको बड़ा आश्चर्य हुआ॥ १३-१४॥ |
| तमाह कश्यपं नागः किमर्थं ते परिश्रमः।<br>सम्पादयामि तं कामं ब्रूहि वाडव वाञ्छितम्॥ १५ | उस नागराजने कश्यपसे कहा—हे विप्र! आप इतना परिश्रम किसलिये करेंगे? आपकी वह कामना मैं ही पूर्ण कर दूँगा। कहिये, आप क्या चाहते हैं?॥ १५॥ |
| कश्यप उवाच<br>वित्तार्थी नृपतिं मत्वा शप्तं पन्नग निःसृतः।<br>गृहादहं चोपकर्तुं विद्यया नृपसत्तमम्॥ १६ | कश्यपने कहा—हे पन्नग! मैं धनका अभिलाषी हूँ; नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को शापित जानकर अपनी मन्त्रविद्यासे उनका उपकार करनेके लिये मैं अपने घरसे निकला हुआ हूँ॥ १६॥ |
| २२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| तक्षक उवाच<br>वित्तं गृहाण विप्रेन्द्र यावदिच्छसि पार्थिवात्।<br>ददामि स्वगृहं याहि सकामोऽहं भवाम्यतः॥ १७ | तक्षकने कहा—हे विप्रवर ! राजासे जितना धन आप चाहते हैं, उतना धन मुझसे अभी ले लें और अपने घर लौट जायँ, जिससे मैं अपने कृत्यमें सफल हो सकूँ॥ १७॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कश्यपः परमार्थवित्।<br>चिन्तयामास मनसा किं करोमि पुनः पुनः॥ १८<br><br>धनं गृहीत्वा स्वगृहं प्रयामि यद्यहं पुनः।<br>भविष्यति न मे कीर्तिर्लोके लोभसमाश्रयात्॥ १९<br><br>जीवितेऽथ नृपश्रेष्ठे कीर्तिः स्यादचला मम।<br>धनप्राप्तिश्च बहुधा भवेत्पुण्यं च जीवनात्॥ २० | सूतजी बोले—तक्षककी यह बात सुनकर परमार्थवेत्ता कश्यपजी मनमें बार-बार सोचने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? यदि मैं धन लेकर अपने घर जाता हूँ तो धनलोलुप होनेके कारण संसारमें मेरी कीर्ति नहीं होगी। यदि राजा जीवित हो जाते हैं तो मेरी अचल कीर्ति होगी तथा धन-प्राप्तिके साथ-साथ पुण्य भी प्राप्त होगा॥ १८–२०॥ |
| रक्षणीयं यशः कामं धिग्ध्नं यशसा विना।<br>सर्वस्वं रघुणा पूर्वं दत्तं विप्राय कीर्तये॥ २१<br><br>हरिश्चन्द्रेण कर्णेन कीर्त्यर्थं बहुविस्तरम्।<br>उपेक्ष्यं कथं भूपं दह्यमानं विषाग्निना॥ २२ | यश ही रक्षणीय है और बिना यशके धनको धिक्कार है; क्योंकि प्राचीन कालमें महाराज रघुने कीर्तिके लिये अपना सब कुछ ब्राह्मणको दे दिया था। सत्यवादी हरिश्चन्द्र तथा दानी कर्णने भी केवल कीर्तिके लिये बहुत कुछ किया था। अतः विषकी अग्निसे जलते हुए राजा परीक्षित्की उपेक्षा मैं कैसे करूँ?॥ २१-२२॥ |
| जीवितेऽद्य मया राज्ञि सुखं सर्वजनस्य च।<br>अराजके प्रजानाशो भविता नात्र संशयः॥ २३ | यदि मैं महाराजको जिला दूँ तो सब लोगोंको अत्यन्त सुख मिलेगा और यदि राजा मर गये तो अराजकताके कारण सारी प्रजा नष्ट हो जायगी, इसमें सन्देह नहीं है॥ २३॥ |
| प्रजानाशस्य पापं मे भविष्यति मृते नृपे।<br>अपकीर्तिश्च लोकेषु धनलोभाद्भविष्यति॥ २४ | राजाके मृत हो जाने पर मुझे प्रजानाशका पाप लगेगा तथा संसारमें धन-लोभके कारण मेरी अपकीर्ति भी होगी॥ २४॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा ध्यानं कृत्वा स कश्यपः।<br>गतायुषं च नृपतिं ज्ञातवान्बुद्धिमत्तरः॥ २५ | मनमें ऐसा विचार करके परम बुद्धिमान् कश्यपने ध्यान करके जाना कि महाराज परीक्षित्की आयु अब समाप्त हो चुकी है॥ २५॥ |
| आसन्नमृत्युं राजानं ज्ञात्वा ध्यानेन कश्यपः।<br>गृहं ययौ स धर्मात्मा धनमादाय तक्षकात्॥ २६ | इस प्रकार ध्यान-दृष्टिसे धर्मात्मा कश्यप राजाकी मृत्यु निकट जानकर तक्षकसे धन लेकर अपने घर लौट गये॥ २६॥ |
| निवर्त्य कश्यपं सर्पः सप्तमे दिवसे नृपम्।<br>हन्तुकामो जगामाशु नगरं नागसाह्वयम्॥ २७ | कश्यपको लौटाकर वह नाग सातवें दिन राजाको डँसनेकी इच्छासे शीघ्र हस्तिनापुर चला गया॥ २७॥ |
| शुश्राव नगरस्यान्ते प्रासादस्थं परीक्षितम्।<br>मणिमन्त्रौषधैः कामं रक्ष्यमाणमतन्द्रितम्॥ २८ | नगरमें पहुँचते ही उसने सुना कि मणि, मन्त्र तथा औषधियोंसे भलीभाँति सावधानीपूर्वक सुरक्षित होकर राजा परीक्षित् अपने महलमें रह रहे हैं॥ २८॥ |