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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

दिखाने के लिए दण्डकारण्य मे देवयुगल ने आकाशगामी घोड़ो
सहित रत्नजटित रथ और प्रतिमा रामभद्र को दी।
वहाँ रघुपुरुङ्गव श्री रामचन्द्र ने सात मास और नव दिन तक
विदेहदुहिता—सीता के उपनीत कुसुमो से भक्तिपूर्वक पूजा की।
राम के प्रबल कर्मों को अलङ्घनीय और दुख से छूटने वाले
ज्ञातकर उस पूज्य प्रतिमा को देवता उसी स्थान पर वापम ले
गये। अब फिर शकेन्द्र प्रकृष्ट भक्तिपूर्वक दिव्य भोगो से पूजा
करने लगा, इस प्रकार ग्यारह लाख वर्ष पूरे हो गए।
उस समय जब यदुवंश मे बलदेव-कृष्ण और नेमिनाथ तरुणा-
वस्था को प्राप्त हुए और केशव को राज्य मिला और जरासंध से
युद्ध मे अपनी सेना को उपसर्ग होने पर कृष्ण ने भगवान नेमिनाथ
से उस उपसर्ग के शीघ्र विनाश होने का उपाय पूछा।
प्रभु ने आदेश दिया—“पुरुषोत्तम ! मेरे सिद्ध होने के तेयासी
हजार सात सौ पचास वर्ष बाद विविध अधिष्ठायको द्वारा नत-
चरण श्री पार्श्व अर्हन्त होगे, जिनकी पूजा—स्नात्र जल सींचने
पर लोक मे अशिव की शांति होगी।” “स्वामी ! वर्त्तमान मे उन
जिनेश्वर की प्रतिमा कही भी विद्यमान है ?” इस प्रकार चक्रधर
श्रीकृष्ण के पूछने पर स्वामी ने कहा—“वह इन्द्रपूजित है”। तब
नेमि जिन और जनार्दन के मनोगत भाव को ज्ञात कर मातलि
सारथी सहित एक रथ मे वह प्रतिमा शकेन्द्र ने दी।
मुरारि ने प्रमुदित हो प्रतिमा को न्हवण कराके बहुत से
घनसार रस, चन्दन रस और उत्तम सुगन्धित पुष्पो से पूजा की।
पीछे सेना पर स्वामी के न्हवण जल को सिंचित किया जिससे
योगी के चित्त-विलय की भाँति सारे उपसर्गो का विलय हो गया।
बहुत दुखदायी प्रतिवासुदेव के निधन प्राप्त होने पर यादव सेना मे
जयजयकार हो गया। उसी विजय के स्थान पर जिनेश्वर नेमि-

श्री स्तम्भन पार्श्वनाथ-कल्प २५
नाथ के आदेश से सखपुर नामक अभिनव नगर निर्माण कराके
श्री पार्श्वप्रभु का बिम्ब स्थापित किया । इस प्रतिमा को लेकर
कृष्ण के अपने नगर मे आने पर राजाओ ने वासुदेवत्वाभिषेक
उत्सव किया । कृष्ण नरेश्वर ने मणि-कंचन रत्नो से रचित
प्रासाद मे सस्थापित प्रतिमा की सात सौ वर्ष तक पूजा की ।
द्वारिका के दाह और यादव जाति के प्रलय होने पर भी
स्वामी के प्रभाव से देवालय मे अग्नि नही लगी । समुद्र ने अपनी
लोल लहरो के द्वारा नगरी के साथ रुचिर मनोहर मन्दिर सहित
स्वामी (की प्रतिमा) को जल के अन्दर ले लिया ।
नागकुमारियो के साथ क्रीडा के हेतु आये हुए तक्षक नागेन्द्र
ने प्रभु की पापनाशक प्रतिमा को देखा और उसने प्रमुदित चित्त
से बहुत प्रकार की नृत्य-कला से महामहोत्सवपूर्वक अस्सी हजार
वर्ष पर्यन्त पूजा की । दिग्पालश्रेष्ठ वरुण ने समुद्र की सफाई
करते हुए तक्षक द्वारा पूजी जाती हुई त्रिभुवनपति पार्श्वनाथ
की प्रतिमा को देखा और सोचा—अरे ये तो वही स्वामी
हैं जो देवेन्द्र द्वारा पहले पूजित थे, अब मुझे भी स्वामी के चरणो
की सेवा करना योग्य है । ऐसा विचार कर वह जिनेश्वर की
अनवरत पूजा, प्रार्थना, सेवा करने लगा । उस समय प्रभु वहाँ
चार हजार वर्ष पर्यन्त वही स्थित रहे ।
जब श्री वर्द्धमानस्वामी भरत क्षेत्र मे जलद तिलक-पुष्करा-
वर्त्त मेघ की भाँति अविरल धारा से भव्य शस्यो को सिंचन कर
रहे थे तब अपनी कान्ति से देवलोक की कान्ति को कलुषित करने
वाली कान्तिनगरी मे धनेश्वर नामक सार्थवाह सुखपूर्वक निवास
करता था । एक बार वह महाडभ्य (सेठ) यान मे समुद्र-यात्रा के
लिए निकला और सायात्रिक आदि के साथ सिंहल द्वीप पहुँचा ।
और माला बेचकर वहाँ से शीघ्रतापूर्वक लौटते हुए सहसा जल-
राशि के अन्दर प्रवहण स्तम्भित हो गया । जब वह दुखी होकर

२६ विविध तीर्थ-कल्प
चिन्ता करने लगा तो गासनदेवी पद्मावती ने प्रकट होकर कहा—
वत्स । डरो मत । वात सुनो । दिग्पाल वरुण विनिर्मित महिमा
वाले, पृथ्वी मे मोह का मान मर्दन करने वाले श्री पार्श्वनाथ
भगवान यहाँ पानी के नीचे रहे हुए हैं। हे भद्र । तुम उन्हे अपने
स्थान पर ले जाओ ।
धनेश्वर ने कहा—देवी । समुद्र जल के मूल से जिनेश्वर को
निकाल कर ग्रहण करने की मेरे मे गक्ति कहाँ है ? तब गासन
देवी ने कहा—मेरे पीछे-पीछे लगकर प्रविष्ट हो जाओ और कच्चे
सूत के तार से वाँधकर प्रभु को निकालो और जहाज मे चढाकर
हे श्रावक । अपने नगर ले जाओ ।
देवी के निर्देगानुसार यह सब करके वह महासत्वगाली सेठ
त्रैलोक्यपति प्रभु को ग्रहण कर हर्ष प्रकर्ष से पुलकितगात्र हो
गया । और क्षणमात्र मे स्वस्थान आये और पट-कुटी वनवा कर
लोक सम्मुख स्वागतार्थ आवे तब तक के लिए वहाँ रहे । गन्धर्वों
के गीत-वाजित्र और सधवा स्त्रियो के धवल मङ्गलपूर्वक दान
देते हुए स्वामी को बहिर्दिगि प्रदेग-स्थल मे प्रवेग कराया ।
सेठ ने कान्तिनगरी मे रजत की भाँति निर्मल, स्वच्छ प्रासाद
कराया और उसमे प्रभु को विराजमान करके भक्तिपूर्वक प्रतिदिन
पूजन करने लगा । धनेश्वर के काल-प्राप्त होनेपर प्रवर नागरिकों
द्वारा प्रभु की पूजा होते हजार वर्ष बीत गए । तब देवाधिदेव
की परिकर रहित प्रतिमा को आकाग मार्ग से रस-स्तंभन निमित्त
कान्तिनगरी से कालत्रय कला कलित श्री पादलिप्तसूरि गणधर
के उपदेग से योगीन्द्र नागार्जुन अपने स्थान पर लाया । योगिनी-
गत कार्य सिद्ध होनेपर वह स्वामी को अटवी मे छोड गया और
रस स्तम्भित होने के कारण स्तम्भनक नामक तीर्थ हो गया ।
उद्भिन्न वगजाल के अन्दर स्थित, जो दुग्धस्नपित अंग वाले

प्रभु के आकण्ठ क्षिति निमग्न रहने से लोगो ने उनका नाम
यक्ष प्रसिद्ध कर दिया। उस अवस्था मे पाँच सौ वर्ष तक
जिनेश्वर भगवान् की पूजा होगी। फिर धरणेन्द्र के सानिध्य से
श्रुतसागर के पारगामी श्री अभयदेवसूरि जी सघ सहित हस्थित
रोग को दूर करके देदीप्यमान माहात्म्य वाला तीर्थ प्रकट करेंगे।
कान्तीपुरी से भगवान् पुन समुद्र मे जावेंगे। बहुत प्रकार
से नगर मे भारी महिमा से देदीप्यमान होगे।
यदि कोई सहस्र मुख वाला होकर लाल जिह्वा धारण कर ले
तो भी त्रिकाल मे कौन प्रतिमा स्थानो को साधन करने में
समर्थ है ?
पावापुरी, चम्पापुरी, अष्टापद, गिरनार, समेतगिखर, विमला-
चल, कागी, नागिक, मिथिला, राजगृह प्रमुख तीर्थों में यात्रा,
पूजन, दान से जीवो को जो फल होता है वह यहाँ पार्श्वनाथ प्रभु
की प्रतिमा के दर्शनमात्र से प्राप्त करता है।
पार्श्वनाथ भगवान को वन्दन करने की विचार-वृद्धि से मास-
खमण का फल और प्रतिमा को दृष्टिगोचर करने से छम्मा

विविध तीर्थ-कल्प २८
उत्तम मुकुट, कुण्डल, केयूरादि करवाता है वह त्रिभुवनमुकुट
होकर शीघ्र ही शिव-सुख प्राप्त करता है।
जिसने त्रिभुवन चूडामणि, लोगो के नयनो के लिए अञ्जन-
शलाका जैसी इस प्रतिमा को नही देखा उसका मनुष्य जन्म ही
निरर्थक है। श्री सघदास मुनि द्वारा प्रतिमा का लघु कल्प निर्मित
है। मैंने तो बडे कल्प से सम्बन्ध मात्र समुद्धृत किया है।
जो इस कल्प को पढता, सुनता व चिन्तन करता है वह
कल्पवासियो का नाथ (इन्द्र) होकर सातवे भव मे सिद्धि प्राप्त
करता है। और जो पुस्तक लिख कर इस कल्प की गृह चैत्य मे
पूजा करता है वह चिरबोधि नरक और तिर्यञ्चगति मे नियमा
से नही जाता।
दैनिक पढने से सिंह, समुद्र, अग्नि, हाथी, चोर, साँप, ग्रह,
वैरी का निवारण होकर प्रेत, वैताल, शाकिनी आदिका भय नष्ट
होता है।
कल्प वृक्ष की भाँति यह कल्प हृदय स्थान मे धारण करने
वाले भव्यो की पुण्य-शोभा विलसित और वाञ्छित प्रदान करे।
जहाँ तक नरक्षेत्र मे मेरु रूपी प्रदीप पृथ्वी तल पर समुद्र जल
रूपी तेल से उद्योतित विद्यमान है यह कल्प वहाँ तक जयवन्त
रहे।
यह पार्श्वनाथ का सक्षिप्त कल्प समाप्त हुआ।

श्री स्तम्भनक-कल्प २९
श्री स्तंभनक-कल्प
दृढ व्याधि से शरीर अशक्त हो जाने पर अनशन ग्रहण करने
के लिए ( श्री अभयदेव सूरि जी महाराज ने ) सघ को बुलाया,
रात्रि मे देवी ने सूत की नौ कोकडी सुलझाने के लिए कहा।
हाथो से अशक्ति प्रकाशित करने पर ( देवी ने ) नवाङ्ग विवरण
कथा से चमत्कृत कर स्तभन पार्श्वनाथ वन्दन करने की आरोग्य-
विधि उपदिष्ट की । सभाणा से चलकर धवलकपुर आने के वाद
पादविहारी होकर स्तम्भनपुर के सेढी नदी के तट पर स्थित
खोखरे पलाश वन मे पहुंचे। गो-दुग्ध झरने से स्थान को पहिचान
कर जयतिहुअण स्तोत्रार्द्ध से पार्श्वनाथ स्वामी को प्रत्यक्ष किया
और स्तवन पूर्ण कर प्रभावशाली वृत्त द्वय को गुप्त कर दिया।
सघ द्वारा निर्मापित जिनालय मे श्री पार्श्वनाथ भगवान की
प्रतिमा को स्थापित किया वे गतरोग हुए नवाङ्गो वृत्तिकारक
श्री अभयदेव सूरि जी महाराज विजयवन्त हो ।
जन्म से भी चार हजार वर्ष पूर्व देवालय में पूजित हुए और
भगवान की वासव, वासुदेव और वरुण ने समुद्र मे पूजा की।
कान्तिनगरी के सेठ धनेश्वर ने पूजा की, और नागार्जुन ने भी
अर्चन किया वे स्तंभनपुर के श्री पार्श्वनाथ जिनेश्वर आपकी
रक्षा करे।
श्री स्तभनक कल्प समाप्त हुआ ग्र० १०० (पाठान्तर १११) हैं।

७. अहिच्छत्त्रानगरी-कल्प
तीन भुवन मे भानु के नाम से प्रकट श्री पार्श्वनाथ जिनेश्वर
को नमस्कार करके अहिच्छत्त्रा नगरी का कल्प किंचित् यथाश्रुत
कहूँगा ।
इसी जवूद्वीप के भारतवर्ष मे मध्य खण्ड स्थित कुरुजांगल
जनपद मे सखावती नामक ऋद्धि-समृद्धि नगरी थी । वहाँ भगवान
पार्श्वनाथ स्वामी छद्मस्थ विहार मे विचरते हुए कायोत्सर्ग स्थित
रहे । पूर्व निबद्ध वैर के कारण कमठासुर ने अविच्छिन्न धारा-
प्रवाह से वर्षता हुआ मेघ विकुर्वण किया, जिससे सारे भूमण्डल मे
जल-जलाकार होकर भगवन्त के आकण्ठ जल आ गया ।
पञ्चाग्निसाधक कमठ तापस द्वारा जलाए काठ मे दग्ध
साँप को निकाले गए प्रभु के उपकार को स्मरण कर नागराज
धरणेन्द्र ने अवधि-ज्ञान से देखा और अपनी अग्रमहिषियो के साथ
आकर मणिरत्नमय सहस्रफणालंकृत छत्र प्रभु के ऊपर करके
कुण्डलीकृत नागराज ने उन्हे ग्रहण कर उस उपसर्ग को निवारण
किया । तभी से उस नगरी

अहिच्छत्रा नगरी-कल्प ३१

वाली सिद्ध रसकूपिका भी यहाँ दृष्टिगोचर होती है। जहाँ म्लेच्छ
राजा द्वारा अग्निदाह आदि अनेक उद्घाटनोपक्रम निष्फल हो
गए।
उस नगर के भीतर और बाहर सवां लाख कुएँ और वापिकाएँ
हैं। मधुरोदक की यात्रा के लिए आये हुए लोगो और पार्श्वनाथ
चैत्य मे स्नात्र करते हुए लोगो को आज भी कमठ प्रखर तूफान
और काली मेघ घटा और गर्जन व बिजली आदि दिखाता है।
मूल चैत्य के निकट सिद्ध क्षेत्र मे श्री पार्श्वनाथ स्वामी का धरणेन्द्र-
पद्मावती सेवित चैत्य है। प्राकार के समीप श्री नेमिनाथ भगवान
की प्रतिमा सहित सिद्ध-वृद्ध कलित आम्रलुम्बधारिणी सिंहवाहिनी
अम्बिका देवी विद्यमान है। चन्द्र किरणो की भाँति निर्मल जल से
परिपूर्ण उत्तरा नामक वापी है जहाँ स्नान करके और वहाँ की
मिट्टी का लेपन करने से कुष्ठियो का कुष्ठ रोग शान्त हो जाता
है। धन्वन्तरि कूप की विचित्र वर्ण वाली मिट्टी से गुरु आम्नाय से
सोना बनता है। ब्रह्म कुण्ड के तट पर ऊगी हुई मण्डूक ब्राह्मी के
पत्तो का चूर्ण एक वर्ण वाली गाय के दूध के साथ पीने से प्रज्ञा-
मेधा सम्पन्न, निरोग और किन्नर की भाँति स्वर होता है। वहाँ
उपवन के समस्त वृक्षो मे औषधियाँ उपलब्ध होती हैं जो उन-उन
कार्यों को सिद्ध करती है जैसे जयन्ती, नागदमणी, सहदेवी,
अपराजिता, लक्ष्मणा, त्रिवर्णी, नकुली, सकुली, सर्पाक्षी, सुवर्ण-
शिला, मोहनी, सामली, रविभक्ता, निर्विषी, मोरशिखा, गल्या,
विशल्या प्रभृति महौषधियाँ यहाँ विद्यमान हैं। यहाँ हरिहर,
हिरण्यगर्भ, चण्डिकाभवन, ब्रह्मकुण्ड आदि लौकिक तीर्थ हैं। तथा
यह नगरी महातपस्वी सुगृहीतनामधेय कृष्णर्षि की जन्मभूमि है।
तत्पद पंकज पराग कण निपात से पवित्रीकृत एक वस्त्र वाले
पार्श्वनाथ भगवान को स्मरण करने से आधि व्याधि, सर्पविष,
सिंह, हाथी, रण, चोर, जल, अग्नि, राज्य, दुष्ट ग्रह, मारि, भूत,

३२ विविध तीर्थ-कल्प
प्रेत, शाकिनी प्रमुख क्षुद्रोपद्रव विशेष कर भव्य जीवो को पराभव
नही करते । सकल अतिशयो की निधान रूप यह नगरी है ।
यह अहिच्छत्रा नगरी का कल्प पद्मावती धरणेन्द्र और कमठ
के प्रिय श्री जिन प्रभुसूरि ने सक्षेप से वर्णन किया है ।
॥ अहिच्छत्रा-कल्प समाप्त हुआ ग्रथाग्र० ३६ ॥
🙫
८. अर्बुदगिरि-कल्प
श्री आदिनाथ और नेमिनाथ अर्हन्तो को नमस्कार करके
अर्बुद महागिरि का कल्प लेशमात्र कहता हूँ । पहले श्रीमाता
देवी की उत्पत्ति यथाश्रुत कहूँगा, जिसके अधिष्ठान से यह पर्वत
पृथ्वी मे प्रख्यात हुआ है ।
श्री रत्नमाल नगर मे रत्नशेखर राजा हुआ, नि सन्तान होने
से दुखी हो उसने शाकुनिक लोगो को बाहर भेजा । उन्होने शिर
पर काष्ठ-भार लिए कष्टपूर्वक चलने में दुर्गत स्त्री को देख
कर राजा को बतलाया कि इसका पुत्र आपके पद पर राजा
होगा । राजा के आदेश से उन लोगो ने उस सगर्भा को मारने
के लिए गर्त मे डाल दिया । वह कार्यचिन्ता के बहाने उससे
बाहर निकली और उस भयार्त्ता ने पुत्र प्रसव कर झाडी मे रख
दिया । इस घटना से अज्ञात उन लोगो ने गर्त मे लाकर उसे
मार डाला ।

अर्बुदगिरि-कल्प ३३

पुण्ड से आकृष्ट होकर एक मृगी उस बालक को दोनो समय
स्तन पान करा देती। अन्यदा महालक्ष्मी ने टङ्कशाला मे मृगी
के चारो पैरो वाली नयी मुद्रा-नाणा की वृद्धि कर दी। यह सुन
कर जिगु रुप मे उत्पन्न होने की वार्त्ता फैल गई। कोई नया
राजा हुआ, सुन कर राजा ने सुभटो को भेजा, उन्होने उसका
वध करने के लिए आकर नगर के गोपुर मे उसे देखा और बाल-
हत्या से बचने के लिए गायो के झुण्ड के आने के मार्ग मे रख
दिया। उसके उसी प्रकार रहते भाग्यवश एक उक्षा—धान बटोर
ने वाली स्त्री के रूप मे शक्ति विशेष—आगे हो गई, उससे प्रेरित
हो पशुओ के बीच से उस शिशु को उठा कर रख लिया। यह
सुन कर मंत्री के समझाने से राजा ने उसे लेकर अपना औरस
पुत्र मान लिया।
क्रमशः वह श्रीपुञ्ज नामक राजा हुआ और उसकी पुत्री
श्रीमाता रूप सम्पन्न वानर जैसे मुख वाली हुई। वह जाति-
स्मृति प्राप्त वैराग्यवान्-निर्विषयी हुई। उसने अपने पिता से अपना
पूर्व भव निवेदन किया कि मै पहले वानरी थी और अर्बुदगिरि
की वृक्ष शाखा पर किसी ने मेरा शिरोच्छेद कर दिया। मेरा
रुण्ड वृक्ष के नीचे कुण्ड मे जा गिरा। उस अमित तीर्थ के प्रभाव
से मै नर देह धारिणी हुई। मेरा मस्तक आज जी उसी तरह है
अत मैं वानरमुखी हुई हूँ। श्रीपुञ्ज ने उसे अपने पुरुषो के साथ
भेज कर कुण्ड मे उसका मुख डुबाया, जिससे वह नरमुखी हो
गई और आबू पर तपश्चर्या करने लगी।
एक वार आकाशगामी योगी उसे देख कर रूपमुग्ध हो
गया। उसने आकाश से उतर कर प्रेमालाप पूर्वक कहा—शुभे!
तुम मुझे किस प्रकार वरण करोगी? उसने कहा—रात्रि का
प्रथम प्रहर जब तक कुर्कुट बोले उससे पहिले किसी विद्या से यदि
इस पर्वत-ह्रद पर मनोहर बारह सीढियाँ बना दो तो मैं तुम्हे
वरण करुँगी!

३

३४ विविध तीर्थ-कल्प
योगी ने अपनी विद्या से दो प्रहर मे वैसा कर दिया।
श्रीमाता ने अपनी शक्ति से बनावटी कुर्कुट शब्द किया और
उसके निषेध करने पर भी वह उसका छल जानता हुआ
विवाह के लिए ठहर गया। योगी ने नदी के किनारे विवाह
सामग्री सहित उसे बैठाया। श्रीमाता ने कहा—त्रिशूल छोड़ कर
विवाह करने के लिए मेरे पास बैठो ! वह वैसा ही करके बैठा तो
श्रीमाता ने कुत्ते लगा कर उसकी आंखो को विकृत कर दिया और
उसी की शूल से उसका हृदय वेध कर वध कर डाला। इस प्रकार
आजन्म अखण्ड शील पालन करके श्रीमाता स्वर्ग को प्राप्त हुई।
राजा श्री पुञ्ज ने उस शिखर पर उसका प्रासाद बनवाया।
छह महीनो के बाद अर्बुद नामक सांप पहाड़ के नीचे चलता
है जिसके पहाड कम्पन होता है इसी से सभी प्रासाद विना शिखर
के हैं। लौकिक मे भी कहते हैं कि—
पहले यह हिमाचल का पुत्र नन्दिवर्द्धनगिरि था, कालान्तर मे
अर्बुदनाग का अधिष्ठान होने से "अर्बुद" नाम हो गया। इस
पर धनवानो के बारह गाँव बसते हैं। गोग्गलिक तापस और
राष्ट्रीय लोग मे हजारो हैं। न तो ऐसा वृक्ष है न वल्ली, न पुष्प,
न कन्द और न फल है एवं न ऐसी खान है जो यहाँ न देखी
जाती हो। यहाँ प्रदीप्तिमान् महौषधियाँ हैं जो रात्रि मे ज्वाज्ज्व-
ल्यमान रहती हैं। सुगन्धित और रसाढ्य दोनो प्रकार के वन हैं।
स्वच्छद छलकती हुई स्वच्छ लहरो वाली मन्दाकिनी नदी
है जिसके तट पर फूलो के वृक्ष हैं और पिपासुओ को तृप्त—
आनन्दित करने वाली सुशोभित है। इस गिरिराज के हजारो
उत्तुंग शिखर प्रकाशित है जहाँ सूर्य का रथ-सारथी भी क्षण
मात्र स्खलित हो जाता है। चण्डाली-वज्र-तैलेभ कन्दादि कन्दो
की जातियाँ उन-उन कार्यों को सिद्ध करने वाली पद-पद पर
देखी जाती हैं। यहाँ के आश्चर्यजनक कुण्ड, धातु-खाने तथा

अर्बुदगिरि-कल्प ३५

अमृत जल वाले झरणो के कारण यह समृद्ध प्रदेश है। कोयल के
उच्च स्वर से कूकने पर शीघ्र कोकूयित कुण्ड से खल-खल गब्द
करता हुआ जल का प्रवाह प्रादुर्भूत होता है।
श्रीमाता, अचलेश्वर, वशिष्ठाश्रम आदि लौकिक तीर्थ और
मन्दाकिनो आदि भी है। इस महागिरिराज के नेता परमार
नरेश्वर हैं जिनकी राजधानी चन्द्रावती नगरी लक्ष्मी की निधान
है। विमलबुद्धिकलित विमल दण्डनायक ने यहाँ ऋषभदेव
भगवान की पित्तलमय प्रतिमावाला चैत्य बनवाया। उसने चम्पक
वृक्ष के सान्निध्य मे पुत्र सम्पदा एवं तीर्थोद्धार की वाञ्छा से
भगवती अम्बा की आराधना करके श्रीमाता के मन्दिर के पास
पुष्प-मालादि से रुचिर और गोमय गोमुख देखकर वहाँ शुल्क
देकर जमीन ग्रहण की। गुर्जरेश्वर पर क्रुद्ध राणा श्री धाधूक
को भक्ति से प्रसन्न कर चित्रकूट से लाकर उसके वचनो से विक्रम
स० १०८८ मे प्रचुर द्रव्य व्यय द्वारा उसने "विमल वसति"
नामक उत्तम प्रासाद बनवाया। यहाँ बहुत प्रकार से पूजित
अम्बिका देवी यात्रागत सघ के गहन विघ्नो का नाश करती है।
युगादिदेव के चैत्य के सामने यहाँ एक रात्रि मे शिल्पी ने पाषाण-
मय घोडा घढ कर तैयार किया।
विक्रम संवत् १२८८ मे सचिवो मे चन्द्र के समान तेजपाल ने
लूणिगवसही नामक नेमिनाथमन्दिर का निर्माण कराया। श्री
स्तम्भतीर्थ मे निष्पन्न कसौटी का नेत्रामृताञ्जन बिम्ब तेजपाल
मन्त्री ने वहाँ स्थापित किया। उसने श्री सोम दिग्पाल के निर्देग
से अपने पूर्णजो की मूर्तियाँ हस्तिगाला मे विराजमान की।
अहो ! सूत्रधार शिरोमणि शोभन देव् ने इस चैत्य गिल्प की
रचना से अपना नाम सार्थक कर दिया। इस अर्बुद के अनुज
मैनाक पर्वत की समुद्र ने वज्र से रक्षा की और इसने भवदण्ड से
मन्त्रीश्वरो की रक्षा की।

३६ विविध तीर्थ-कल्प
दैवात् म्लेच्छो द्वारा दोनो तीर्थो के भग्न कर देने पर भी
इसका उद्धार शक सवत् १२४३ (वि० स० १३७८) मे करवाया ।
प्रथम तीर्थ का उद्धार महण सिंह के पुत्र लल्ल ने और दूसरे का
चण्ड सिंह के पुत्र पीथड ने करवाया । चालुक्य कुल चन्द्रमा
कुमारपाल भूपाल ने इसके ऊँचे शिखर पर श्री वीर चैत्य का
निर्माण कराया ।
उन-उन औषधियो से पूर्ण और उन-उन कौतुहलो से भरे हुए
अनेक तीर्थो से पवित्रित इस अर्बुदगिरि के दर्शन धन्य जन ही
करते हैं ।
श्री जिन प्रभसूरि ने श्रोत्रसुधाकल्प यह श्रीमद् अर्बुद कल्प
बनाया है, चतुर जन इसका परिचय प्राप्त करे ।
श्री अर्बुद कल्प समाप्त हुआ । ग्रथा ग्र० ५२ अक्षर १२ हैं ।
९. मथुरापुरी-कल्प
जगत मे शरण्यभूत सातवे और तेईसवे जिनेश्वर को नमस्कार
करके भव्य जनो को मगल कारी मथुरा-कल्प कहूँगा ।
सुपार्श्वनाथ भगवान के तीर्थ मे वर्त्तमान धर्मरुचि और धर्म
घोष नामक दो मुनिवर्य सिंह के सदृश निस्सग थे ।
वे मुनिराज छट्ठ, अट्ठम, दशम, द्वादशम, पक्षोपवास और
मास, दो मास और चार मासक्षमण की तपश्चर्या करते हुए,
भव्यजीवो को प्रतिबोध करते हुए किसी समय मथुरा नगरी मे

मथुरापुरी-कल्प ३७

विचरे। उस समय मथुरा नगरी बारह योजन लम्बी और नौ
योजन विस्तीर्ण एव पार्श्व स्थित यमुना नदी के जल से प्रक्षालित
प्रकार विभूषित धवलगृह, देवकुल, वापी, कूप, पुष्करिणी,
जिनभवन और हाटो से सुशोभित थी। वहाँ विविध चारो विद्याओ
को पढने वाले ब्राह्मणो का समूह था।
वहाँ वे मुनिराज अनेक फल फूलो से लदे हुए भूतरमण नामक
उपवन मे अवग्रह लेकर उपवास करके वर्षकाल—चातुर्मास स्थित
रहे। उनके स्वाध्याय, तपश्चरण और प्रशमादि गुणो से आवर्जित-
आकृष्ट उपवन स्वामिनी कुबेरा देवी ने रात्रि मे प्रकट होकर
कहा—भगवन्! आपके गुणो से मै अत्यन्त प्रसन्न हूँ, कुछ वर
माँगिए। मुनिराजो ने उसे—हम निस्सग हैं, हमें कुछ नही चाहिए।
कहते हुए—धर्म सुनाकर अविरति श्राविका बनायो।
अन्यदा कार्त्तिक शुक्ल अष्टमी की रात्रि मे मुनिराजो ने कुवेरा
देवी से कहा—तुम शय्यातर हो, हे श्राविके! तुम दृढ सम्यक्त्व
वाली हो, अत जिन वन्दन, पूजन मे प्रवृत्त रहना। वर्त्तमान योग
से चातुर्मास करके पारणे के लिए हम अन्य गाँवो मे विचरण
करेंगे। देवी ने शोकपूर्वक कहा—भगवन्! आप सर्वदा इसी
उपवन मे क्यो नही रहते। साधुओ ने कहा—
"श्रमणो, पक्षियो, भ्रमरो, गोकुल, चतुष्पदो, पासा सारी और
मेघ का निवास अनियत होता है।"
उसने प्रार्थना की—यदि ऐसा है तो धर्म कार्य कहिए, जिसे
मैं सम्पादन करूँ, क्योकि देवदर्शन अमोघ होता है। साधुओ ने
कहा—यदि ऐसा ही आग्रह है तो हमे सघ के साथ मेरुपर्वत ले
जाकर चैत्यो की वन्दना कराओ। देवी ने कहा—मैं आप दोनो
को देव-वन्दन करा दूगी। मथुरा सघ चलने से अन्तराल मे कोई
मिथ्यादृष्टि देव विघ्न करेगे। साधुओ ने कहा—हमने आगम वल

[Header] ३८ विविध तीर्थ-कल्प

से मेरु देखा है, यदि संघ को ले जाने की तुम्हारी गक्ति न हो तो
केवल हम दोनो तो वहाँ जाने से रहे।
देवी ने उदास होकर कहा—यदि ऐसा है तो मैं यही प्रतिमाओ
से शोभित मेरु पर्वत का आकार बना दूंगी। जहाँ आप संघ सहित
देववन्दन करें। साधुओ ने स्वीकार किया। देवी ने कंचन घटित,
रत्न मण्डित, अनेक सुर परिवृत, तोरण-ध्वज-मालालंकृत शिखर
व छत्रत्रय शाली स्तूप रात्रि में निर्माण किया। वह स्तूप मेखला-
त्रय मण्डित था, एक-एक मेखला में चारो दिशाओ मे पंच वर्ण
रत्नमय बिम्ब थे। उस स्तूप पर मूल प्रतिमा श्री सुपार्श्वनाथ
स्वामी की प्रतिष्ठापित थी।
प्रातः काल लोगो को मालूम हुआ तो उस स्तूप को देखकर
वे परस्पर कलह करने लगे। कोई कहता ये वासुकि लक्षण युक्त
स्वयम्भूदेव हैं, कोई उसे शेष शय्या स्थित नारायण एवं ब्रह्मा,
धरणेन्द्र, सूर्य चन्द्रादि बतलाया, बौद्ध कहते ये स्तूप नही पर
“बुद्धडउ” है। तब मध्यस्थ पुरुपो ने कहा—कलह मत करो, ये
जिस देव ने निर्मित किया है, वही सगय दूर करेंगे। अपने-अपने
देवो को पट पर चित्र-आलेखित कर अपनी गोष्ठी सहित रहे।
जिनका देव होगा उसी का एक पट रहेगा, दूसरे देवो के पट नष्ट
हो जायेंगे। संघ ने भी सुपार्श्वनाथ भगवान का पट लिखा।
सभी लोग अपने-अपने देवो के पट गोष्ठी सहित पूजा करके नवमी
की रात्रि मे सर्व दर्शनी लोग गाते हुए स्थित रहे। आधी रात के
समय तृण-धूलि और पत्थर युक्त उद्दण्ड तूफान चलने लगा जिससे
सभी पट टूट कर उड़ गए। प्रलय गर्जारव से लोग दगो-दिग
पलायन कर गए। एक सुपार्श्वनाथ भगवान का पट स्थित रहा।
लोक विस्मित हुए और “ये अरिहन्त देव हैं”—कहने लगे। उस
पट को सारे नगर में घुमाया, पट-यात्रा प्रवर्तित हुई।

मथुरापुरी-कल्प ३९
उसके बाद न्हवण प्रारम्भ हुआ। प्रथम न्हवण के लिए
श्रावक लोग कलह करने लगे। प्रतिष्ठित लोगो ने यह व्यवस्था
की—जिसके नाम का गोलक (चिट्ठी) कुमारी कन्या के हाथ में
प्रथम आवेगा वह चाहे दरिद्र हो धनाढ्य प्रथम न्हवण करावेगा।
दशमी की रात्रि मे यह व्यवस्था हुई। ग्यारस के दिन दूध, दही,
घृत, कुंकुम, चन्दनादि से हजार कलशो से श्रावकों ने न्हवण
कराया। देवताओ ने प्रच्छन्न स्थित रहकर न्हवण कराया,
आज भी वे उसी प्रकार यात्रार्थ आते हैं।
क्रमश सभी के द्वारा न्हवण कराने पर पुष्प, धूप, वस्त्र,
महाध्वज, आभरणादि चढ़ाए गए। साधुओ को वस्त्र, घृत,
गुडादि दिया। बारहवी रात्रि मे माला चढाई गयी। इस प्रकार
वे मुनिराज देववन्दन कर सकल सघ को आनन्दित कर पारणा
करके अन्यत्र चातुर्मास के लिए तीर्थ प्रकट कर क्रमशः कर्मों का
नाश कर सिद्धि प्राप्त हुए, वहाँ सिद्ध क्षेत्रतीर्थ हुआ।
मुनिराजो के वियोग से दुखित देवी ने नित्य देव-पूजा-रत अर्द्ध-
पल्योपम का आयु पूर्ण कर च्यवकर मनुष्यत्व पाया और उत्तम
पद प्राप्त किया। उसके स्थान पर जो-जो उत्पन्न होती है वह
'कुवेरा' नाम से प्रसिद्ध होती हैं। उसके द्वारा परिरक्षित स्तूप
चिरकाल—पार्श्वनाथ स्वामी के उत्पन्न होने तक खुला रहा।
इसके बीच मथुरा के राजा ने लोभ के वशीभूत होकर आदमी को
बुला कर कहा कि इस स्तूप का स्वर्ण और रत्न निकाल कर मेरे
भण्डार मे रखो। लोग लोहे के कुदालो से स्तूप पर आघात करने
लगे पर उनके घाव उस पर न लग कर स्वय घातको पर लगने
लगे। तब प्रतीतिहीन राजा ने स्वयं कुहाड़े की चोट दी, कुहाडा
ने उछलकर राजा के मस्तक को छिन्न कर डाला। तब कोपाय-
मान देवी ने प्रकट होकर लोगो के कहा—अरे पापियो ! यह
क्या काम प्रारंभ किया है, राजा की तरह तुम लोगो को भी मरना

४० विविध तीर्थ-कल्प

है ? भयभीत लोगो ने हाथ मे धूप लेकर देवी से क्षमा याचना
की । देवी ने कहा—जो जिनालय पूजेगा उसके उपद्रव दूर
करूंगी। जो जिन प्रतिमा या सिद्धालय की पूजा करेगा उसी का
घर स्थिर रहेगा अन्यथा गिर जायगा ।
यही से मंगल चैत्यो की प्ररूपणा हुई, ऐसा छेद ग्रंथ वृहत्कल्प
मे मथुरा के भवनो का निदर्शन किया है ।
यहाँ प्रतिवर्ष जिन पटह की नगरमे यात्रा-भ्रमण कराना व
कुहाड छट्टी मनाना एव यहाँ जो भी राजा हो उसे जिनप्रतिमा
प्रतिष्ठित कराके भोजन करना, अन्यथा वह जीवित नही रहेगा ।
देवी की इस आज्ञा को लोगो ने पालन करना प्रारंभ कर दिया ।
एक बार पार्श्वनाथ स्वामी केवली अवस्था मे विचरते हुए
मथुरा नगरी पधारे । समवशरण मे धर्मोपदेश देते हुए दूषम
काल के भविष्य को उन्होने प्रकाशित किया । भगवान के अन्यत्र
पधार जाने पर देवी कुबेरा ने लोगो को पुकार कर कहा—"प्रभु ने
दूषम काल निकट बतलाया है । लोग व राजा लोभ ग्रस्त होगे, मैं
भी प्रमादी हूँ और चिरायु नही अत. इस खुले स्तूप की सर्वकाल
रक्षा नही करने सकूँगी । सघादेश से मै इसे ईंटो से ढँक दूँगी,
तुम लोग शैलमय पार्श्वनाथ स्वामी की बाहर से पूजा करना ।
मेरे स्थान मे दूसरी जो भी देवी होगी, वह अभ्यन्तर की पूजा
करेगी । सघ के मानने पर देवी ने वैसा ही कर दिया ।
भगवान महावीर के निर्वाण को तेरह सौ से अधिक वर्ष
बीतने पर बप्पभट्टिसूरि उत्पन्न हुए, उन्होने इस तीर्थ का उद्धार
किया, पार्श्वनाथ भगवान को पूजवाया । शास्वत पूजा करने के
लिए कानन, कूप और कोट करवाया । चौरासी • दिलाइ ।
• सघ ने ईंटें खिसकती•हुई ज्ञात कर उखडे जाते स्तूप को
पत्थरो से मढने के विचार से खोलना प्रारंभ किया तो देवी ने
स्वप्न मे स्तूप को खोलना मना किया । तब देवी के वचनो से

स्तूप को बिना खोले सुघटित पत्थर जड़ कर जीर्णोद्धार किया
गया। आज भी देवो द्वारा यह महास्तूप रक्षित है, देउल मे हजारो
प्रतिमाएँ है, आवासानिक प्रदेग मे मनोहर गन्धकुटी मे चिल्लणिका
अम्बा और अनेक क्षेत्रपालादि सयुक्त यह जिनभवन विराज-
मान है।
इस नगरी मे भावी तीर्थंकर श्री कृष्ण वासुदेव का जन्म
हुआ। यहाँ आर्य मगू तथा हुडिक यक्ष—जो चोर का जीव यक्ष
हुआ था—का देव कुल है।
यहाँ पाँच स्थल हैं, यथा—१ अर्क स्थल, २ वीर स्थल,
३. पद्म स्थल, ४ कुश स्थल, ५ महा स्थान। एव बारह वन इस
प्रकार हैं—१. लोहजघ वन, २ मधुवन, ३. विल्व वन, ४ ताल
वन, ५ कुमुदवन, ६ वृन्दावन, ७ भण्डीर वन, ८ खदिर वन,
९ कामिक वन, १० कोल वन, ११ बहुलावन, १२ महावन।
यहाँ पाँच लौकिक तीर्थ हैं, यथा—१ विश्रान्तिक तीर्थ,
२ असिकुण्ड तीर्थ, ३ वैकुण्ठ तीर्थ, ४ कालिंजर तीर्थ, ५ चक्र
तीर्थ।
शत्रुञ्जय मे ऋषभदेव, गिरनार पर नेमिनाथ, भरौंच मे
मुनि सुव्रत, मोढेरा मे महावीर और मथुरामे सुपार्श्व—पार्श्व को
दो घडी के भीतर वन्दन कर सोराष्ट्र के ढुठण मे विहार कर के
जो ग्वालियर मे आहार करते थे उन आमराय सेवित चरण-
कमल श्री वप्पभट्टि सूरि जी महाराज ने वि० स० ८२६ मे मथुरा
मे श्री महावीर भगवान का विम्ब स्थापित किया।
यहाँ श्री वीर वर्द्धमान स्वामी के जीव विश्वभूति ने अप-
रिमित वल प्राप्ति का नियाणा किया था। यहाँ यमुना वंकयमुन
राजा के द्वारा निहित दण्ड अणगार के केवल ज्ञान उत्पन्न होने
पर महिमा करने के लिए इन्द्र आया था।

४२ विविध तीर्थ-कल्प

यहाँ जितशत्रु राजा के पुत्र कालवेणिक मुनि ने अर्ण रोगार्त्त
स्वदेह मे पुद्गलगिरि पर निष्प्रभ उपसर्ग सहन किया था।
यहाँ शंख राजर्षि के तप प्रभाव को देख सोमदेव द्विज गजपुर
नगर मे दीक्षा लेकर स्वर्ग जाकर काशी मे हरिकेश वल ऋषि
देव पूज्य हुआ।
यहाँ उत्पन्न राजकन्या निवृत्ति राघविध द्वारा सुरेन्द्र दत्त को
स्वयंवरा हुई।
यहाँ कुवेरदत्ता ने माता कुवेर सेना और भाई कुवेरदत्त को
अवधि ज्ञान द्वारा अठारह नातो के सम्बन्ध बता कर प्रतिवोध
दिया।
यहाँ श्रुतसागर पारगामी आर्य्य मगु ने ऋद्धिगारव, रस
गारव, शाता गारव से यतत्व प्राप्त कर साधु को अप्रमादी करने
के लिए जिह्वा प्रसारित कर प्रतिवोध दिया।
यहाँ सबल कबल नामके वछडे सेठ जिनदास के ससर्ग से
प्रतिवोध पाकर नागकुमार देव हुए और भगवान महावीर के
नौकारूढ होने पर उपसर्ग निवारण किया।
यहाँ अन्निका पुत्र ने पुष्पचूल को प्रवर्जित कर ससार समुद्र
से पार किया।
यहाँ गवाक्ष स्थित मिथ्यादृष्टि इन्द्रदत्त पुरोहित को—नीचे
मार्ग मे चलते हुए साधु के मस्तक पर पाँव करने पर—श्रावक ने
गुरुभक्तिवश पंगु कर दिया था।
यहाँ भूतगृह स्थित निगोद स्वरूप व स्व आयु पूछ कर सन्तुष्ट
चित्त शक्रेन्द्र ने आर्य्यरक्षित सूरि को वन्दन किया। उपाश्रय के
द्वार को अन्य दिशा मे कर डाला।
यहाँ वस्त्र पुष्यमित्र, घृत पुष्यमित्र और दुर्वलिक पुष्यमित्र
लब्धि-सम्पन्न विचरे। यहाँ बारह वर्ष व्यापी दु सह दुष्काल

मधुरापुरी-कल्प ४३
व्यतीत होने पर सकल सघ को एकत्र कर स्कदिलाचार्य ने
आगमानुयोग-वाचना प्रवृत्त की ।
यहाँ देव-निर्मित स्तूप के समक्ष पक्षक्षमणपूर्वक देवता को
आराधना कर जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण ने दीमक भक्षित त्रुटित
पाठ भग्न महानिशीथ सूत्र ग्रंथ को परिपूर्ण किया ।
यहाँ साधुओ के तपश्चरण से सन्तुष्ट शासन देवी ने तद्दर्शनिक
परिगृहीत तीर्थ को सघ के वचनानुसार जैनो को दिलाया । पीछे
देवी ने लोगो की लोभवृत्ति ज्ञातकर स्वर्णमय स्तूप को प्रच्छन्न
करके ईंटो का बना दिया । श्री वप्पभट्टिसूरि के वचनो से आम
राजा ने उसे प्रस्तर शिल्प से मण्डित कराया ।
यहाँ शख राजा और कलावती ने पाँचवे जन्म देवसिंह-कनक-
सुन्दरी नाम के श्रमणोपासको ने राज्यलक्ष्मी का उपभोग किया ।
इस प्रकार अनेक प्रकार के सविधान वाला इस नगरी का
उत्पत्ति-इतिहास है । यहाँ नरवाहना कुबेरा, सिंहवाहिनी
अम्बिका व श्वानवाहन क्षेत्रपाल तीर्थ की रक्षा करते है ।
इस प्रकार श्री जिनप्रभ सूरि ने इस मथुरा-कल्प का कुछ
वर्णन किया । इह लोक-परलोक के सुखार्थी भव्यजन इसे पढे ।
मथुरा तीर्थ की यात्रा से जो पुण्य-ऋद्धि फल प्राप्त होता है
वही इस कल्प को तल्लीनतापूर्वक सुनने से होता है ।
श्री मथुरा-कल्प समाप्त हुआ । इसकी श्लोक सख्या ११३
और २९ अक्षर हैं ।