विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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चिन्ता करने लगा तो गासनदेवी पद्मावती ने प्रकट होकर कहा—
वत्स । डरो मत । वात सुनो । दिग्पाल वरुण विनिर्मित महिमा
वाले, पृथ्वी मे मोह का मान मर्दन करने वाले श्री पार्श्वनाथ
भगवान यहाँ पानी के नीचे रहे हुए हैं। हे भद्र । तुम उन्हे अपने
स्थान पर ले जाओ ।
धनेश्वर ने कहा—देवी । समुद्र जल के मूल से जिनेश्वर को
निकाल कर ग्रहण करने की मेरे मे गक्ति कहाँ है ? तब गासन
देवी ने कहा—मेरे पीछे-पीछे लगकर प्रविष्ट हो जाओ और कच्चे
सूत के तार से वाँधकर प्रभु को निकालो और जहाज मे चढाकर
हे श्रावक । अपने नगर ले जाओ ।
देवी के निर्देगानुसार यह सब करके वह महासत्वगाली सेठ
त्रैलोक्यपति प्रभु को ग्रहण कर हर्ष प्रकर्ष से पुलकितगात्र हो
गया । और क्षणमात्र मे स्वस्थान आये और पट-कुटी वनवा कर
लोक सम्मुख स्वागतार्थ आवे तब तक के लिए वहाँ रहे । गन्धर्वों
के गीत-वाजित्र और सधवा स्त्रियो के धवल मङ्गलपूर्वक दान
देते हुए स्वामी को बहिर्दिगि प्रदेग-स्थल मे प्रवेग कराया ।
सेठ ने कान्तिनगरी मे रजत की भाँति निर्मल, स्वच्छ प्रासाद
कराया और उसमे प्रभु को विराजमान करके भक्तिपूर्वक प्रतिदिन
पूजन करने लगा । धनेश्वर के काल-प्राप्त होनेपर प्रवर नागरिकों
द्वारा प्रभु की पूजा होते हजार वर्ष बीत गए । तब देवाधिदेव
की परिकर रहित प्रतिमा को आकाग मार्ग से रस-स्तंभन निमित्त
कान्तिनगरी से कालत्रय कला कलित श्री पादलिप्तसूरि गणधर
के उपदेग से योगीन्द्र नागार्जुन अपने स्थान पर लाया । योगिनी-
गत कार्य सिद्ध होनेपर वह स्वामी को अटवी मे छोड गया और
रस स्तम्भित होने के कारण स्तम्भनक नामक तीर्थ हो गया ।
उद्भिन्न वगजाल के अन्दर स्थित, जो दुग्धस्नपित अंग वाले