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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 442 में से

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पृष्ठ 123

४० विविध तीर्थ-कल्प

है ? भयभीत लोगो ने हाथ मे धूप लेकर देवी से क्षमा याचना
की । देवी ने कहा—जो जिनालय पूजेगा उसके उपद्रव दूर
करूंगी। जो जिन प्रतिमा या सिद्धालय की पूजा करेगा उसी का
घर स्थिर रहेगा अन्यथा गिर जायगा ।
यही से मंगल चैत्यो की प्ररूपणा हुई, ऐसा छेद ग्रंथ वृहत्कल्प
मे मथुरा के भवनो का निदर्शन किया है ।
यहाँ प्रतिवर्ष जिन पटह की नगरमे यात्रा-भ्रमण कराना व
कुहाड छट्टी मनाना एव यहाँ जो भी राजा हो उसे जिनप्रतिमा
प्रतिष्ठित कराके भोजन करना, अन्यथा वह जीवित नही रहेगा ।
देवी की इस आज्ञा को लोगो ने पालन करना प्रारंभ कर दिया ।
एक बार पार्श्वनाथ स्वामी केवली अवस्था मे विचरते हुए
मथुरा नगरी पधारे । समवशरण मे धर्मोपदेश देते हुए दूषम
काल के भविष्य को उन्होने प्रकाशित किया । भगवान के अन्यत्र
पधार जाने पर देवी कुबेरा ने लोगो को पुकार कर कहा—"प्रभु ने
दूषम काल निकट बतलाया है । लोग व राजा लोभ ग्रस्त होगे, मैं
भी प्रमादी हूँ और चिरायु नही अत. इस खुले स्तूप की सर्वकाल
रक्षा नही करने सकूँगी । सघादेश से मै इसे ईंटो से ढँक दूँगी,
तुम लोग शैलमय पार्श्वनाथ स्वामी की बाहर से पूजा करना ।
मेरे स्थान मे दूसरी जो भी देवी होगी, वह अभ्यन्तर की पूजा
करेगी । सघ के मानने पर देवी ने वैसा ही कर दिया ।
भगवान महावीर के निर्वाण को तेरह सौ से अधिक वर्ष
बीतने पर बप्पभट्टिसूरि उत्पन्न हुए, उन्होने इस तीर्थ का उद्धार
किया, पार्श्वनाथ भगवान को पूजवाया । शास्वत पूजा करने के
लिए कानन, कूप और कोट करवाया । चौरासी • दिलाइ ।
• सघ ने ईंटें खिसकती•हुई ज्ञात कर उखडे जाते स्तूप को
पत्थरो से मढने के विचार से खोलना प्रारंभ किया तो देवी ने
स्वप्न मे स्तूप को खोलना मना किया । तब देवी के वचनो से