सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 114

अहिच्छत्रा नगरी-कल्प ३१

वाली सिद्ध रसकूपिका भी यहाँ दृष्टिगोचर होती है। जहाँ म्लेच्छ
राजा द्वारा अग्निदाह आदि अनेक उद्घाटनोपक्रम निष्फल हो
गए।
उस नगर के भीतर और बाहर सवां लाख कुएँ और वापिकाएँ
हैं। मधुरोदक की यात्रा के लिए आये हुए लोगो और पार्श्वनाथ
चैत्य मे स्नात्र करते हुए लोगो को आज भी कमठ प्रखर तूफान
और काली मेघ घटा और गर्जन व बिजली आदि दिखाता है।
मूल चैत्य के निकट सिद्ध क्षेत्र मे श्री पार्श्वनाथ स्वामी का धरणेन्द्र-
पद्मावती सेवित चैत्य है। प्राकार के समीप श्री नेमिनाथ भगवान
की प्रतिमा सहित सिद्ध-वृद्ध कलित आम्रलुम्बधारिणी सिंहवाहिनी
अम्बिका देवी विद्यमान है। चन्द्र किरणो की भाँति निर्मल जल से
परिपूर्ण उत्तरा नामक वापी है जहाँ स्नान करके और वहाँ की
मिट्टी का लेपन करने से कुष्ठियो का कुष्ठ रोग शान्त हो जाता
है। धन्वन्तरि कूप की विचित्र वर्ण वाली मिट्टी से गुरु आम्नाय से
सोना बनता है। ब्रह्म कुण्ड के तट पर ऊगी हुई मण्डूक ब्राह्मी के
पत्तो का चूर्ण एक वर्ण वाली गाय के दूध के साथ पीने से प्रज्ञा-
मेधा सम्पन्न, निरोग और किन्नर की भाँति स्वर होता है। वहाँ
उपवन के समस्त वृक्षो मे औषधियाँ उपलब्ध होती हैं जो उन-उन
कार्यों को सिद्ध करती है जैसे जयन्ती, नागदमणी, सहदेवी,
अपराजिता, लक्ष्मणा, त्रिवर्णी, नकुली, सकुली, सर्पाक्षी, सुवर्ण-
शिला, मोहनी, सामली, रविभक्ता, निर्विषी, मोरशिखा, गल्या,
विशल्या प्रभृति महौषधियाँ यहाँ विद्यमान हैं। यहाँ हरिहर,
हिरण्यगर्भ, चण्डिकाभवन, ब्रह्मकुण्ड आदि लौकिक तीर्थ हैं। तथा
यह नगरी महातपस्वी सुगृहीतनामधेय कृष्णर्षि की जन्मभूमि है।
तत्पद पंकज पराग कण निपात से पवित्रीकृत एक वस्त्र वाले
पार्श्वनाथ भगवान को स्मरण करने से आधि व्याधि, सर्पविष,
सिंह, हाथी, रण, चोर, जल, अग्नि, राज्य, दुष्ट ग्रह, मारि, भूत,

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार) · पृष्ठ 114, कुल 442 में से · SarvaKosh