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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 442 में से

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पृष्ठ 125

४२ विविध तीर्थ-कल्प

यहाँ जितशत्रु राजा के पुत्र कालवेणिक मुनि ने अर्ण रोगार्त्त
स्वदेह मे पुद्गलगिरि पर निष्प्रभ उपसर्ग सहन किया था।
यहाँ शंख राजर्षि के तप प्रभाव को देख सोमदेव द्विज गजपुर
नगर मे दीक्षा लेकर स्वर्ग जाकर काशी मे हरिकेश वल ऋषि
देव पूज्य हुआ।
यहाँ उत्पन्न राजकन्या निवृत्ति राघविध द्वारा सुरेन्द्र दत्त को
स्वयंवरा हुई।
यहाँ कुवेरदत्ता ने माता कुवेर सेना और भाई कुवेरदत्त को
अवधि ज्ञान द्वारा अठारह नातो के सम्बन्ध बता कर प्रतिवोध
दिया।
यहाँ श्रुतसागर पारगामी आर्य्य मगु ने ऋद्धिगारव, रस
गारव, शाता गारव से यतत्व प्राप्त कर साधु को अप्रमादी करने
के लिए जिह्वा प्रसारित कर प्रतिवोध दिया।
यहाँ सबल कबल नामके वछडे सेठ जिनदास के ससर्ग से
प्रतिवोध पाकर नागकुमार देव हुए और भगवान महावीर के
नौकारूढ होने पर उपसर्ग निवारण किया।
यहाँ अन्निका पुत्र ने पुष्पचूल को प्रवर्जित कर ससार समुद्र
से पार किया।
यहाँ गवाक्ष स्थित मिथ्यादृष्टि इन्द्रदत्त पुरोहित को—नीचे
मार्ग मे चलते हुए साधु के मस्तक पर पाँव करने पर—श्रावक ने
गुरुभक्तिवश पंगु कर दिया था।
यहाँ भूतगृह स्थित निगोद स्वरूप व स्व आयु पूछ कर सन्तुष्ट
चित्त शक्रेन्द्र ने आर्य्यरक्षित सूरि को वन्दन किया। उपाश्रय के
द्वार को अन्य दिशा मे कर डाला।
यहाँ वस्त्र पुष्यमित्र, घृत पुष्यमित्र और दुर्वलिक पुष्यमित्र
लब्धि-सम्पन्न विचरे। यहाँ बारह वर्ष व्यापी दु सह दुष्काल