विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
४ विविध तीर्थ-कल्प
मात्र से मनुष्यो के सिंह-अग्नि-समुद्र-साँप-भूपाल-विष-युद्ध-चोर-
वैरी-मारिजन्य भय नष्ट हो जाते हैं।
भरतेश्वर की बनवायी लेप्यमय आदिनाथ प्रतिमा का उत्संग
गय्यास्थ एव आत्मस्थ होकर ध्यान करने से सर्वभयो को जीतने
वाला होता है। उग्रतप व ब्रह्मचर्य से जो पुण्य की प्राप्ति होती है,
वही गत्रुञ्जय मे निवास करने से प्राप्ति होती है।
तीर्थों पर करोडो के व्यय से कामित आहार देने का पुण्यफल
यहाँ विमलाचल पर एक उपवास करने पर प्राप्त हो जाता है।
तीन लोक मे जो कुछ भी तीर्थ है—पुण्डरीक गिरि का अभिवदन-
दर्गन करने मात्र से उन सबके दर्गन हो जाते हैं।
सैकडो दानगालाओ मे भोजन होने पर भी यहाँ कभी अरिष्ट
पक्षी-कौए नही आते। यहाँ यात्रा पर जाते लोगोको भोजन देने पर
करोड गुणा पुण्य होता है और यात्रा करके लौटते हुए को भोजन
देने पर अनन्तगुणा पुण्य होता है।
विमलाचल को देखे विना भी सघ को प्रतिलाभ देने पर कोटि
गुणा पुण्य व देखने पर अनन्त गुणा पुण्य होता है।
इसी तीर्थ को वदन करने पर तीर्थंकरो के केवलज्ञान व
निर्वाण जहाँ हुए हैं, उन सभी तीर्थों की वदना हो जाती है।
जन्म-दीक्षा-ज्ञानोत्पत्ति-मोक्षगमन उत्सव दूसरे तीर्थों मे
पृथक्-पृथक् होते हैं किन्तु यहाँ सभी एक साथ होते है।
अयोध्या, मिथिला, चम्पा, श्रावस्ती, हस्तिनापुर, कौगाम्बी,
कागी, काकन्दी, कम्पिल, भद्दिलपुर, रत्नवाह—गौरीपुर, कुण्ड-
ग्राम, पावापुरी, चन्द्रानना, सिंहपुर, राजगृह, रैवतक, सम्मेत-
गिखर, वैभार, अष्टपदादि तीर्थों की यात्रा के फल से यहाँ की
यात्रा करने से सौ गुना फल होता है।
पूजा के पुण्य से सौ गुणा पुण्य, विम्बनिर्माण से एवं चैत्य
निर्माण से सहस्र गुणा व प्रतिपालन से अनन्त गुणा पुण्य होता है।
शत्रुञ्जय तीर्थ-कल्प ५
जो इस तीर्थ-शिखर पर प्रतिमा या मन्दिर बनवाता है वह
भारतवर्ष की ऋद्धि भोगकर स्वर्गश्री प्राप्त करता है।
नमस्कार-सहित तपश्चर्यादि करता हुआ मनुष्य पुण्डरीक
गिरि की स्मृति से उत्तरोत्तर तप फल प्राप्त करता है।
त्रिकरण शुद्धि पूर्वक इस तीर्थ को स्मरण करने वाला मनुष्य
छःमासी तप का फल प्राप्त करता है।
आज भी पुण्डरीक गिरि पर उत्तम अनशन करके शीलरहित
भी सुखपूर्वक स्वर्ग प्राप्त करता है।
यहाँ छत्र, चामर, कलश, ध्वज, स्थाल का दान करने वाला
विद्याधर एवं रथदान करने वाला चक्रवर्ती हो जाता है।
भावशुद्धिपूर्वक यहाँ दश पुष्पमालाओ को देने वाला भोजन
करता हुआ भी उपवास का फल प्राप्त करता है।
दुगुणा देने से छट्ठ तप, त्रिगुणा से अष्टम, चौगुना देने से
दशम, पाँच गुणा से द्वादश और क्रमशः बढते-बढते देने से फल
की भी उत्तरोत्तर वृद्धि कही गई है।
विमलाचल पर स्नान पूजा मात्र से जो पुण्य होता है, अन्य
तीर्थों मे वह स्वर्ण-भूषण और भूमिदान करने से भी नही होता।
यहाँ धूप-खेने से पक्षोपवास का फल और कर्पूर-पूजा से
मासक्षमण का फल प्राप्त करता है।
यहाँ निर्दोष भोजनादि से साधुओ को प्रतिलाभने से कात्तिक-
मासक्षमण का फल होता है। तीनो काल मंत्र पूर्वक स्नान करके
चैत्र व आश्विन मे "नमोऽर्हद्भ्य" पद का ध्यान करने से तीर्थंकर
पद अर्जन करता है।
पालीताना नगर में पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी के दो
जिनालय है और जिनके नीचे नेमिनाथ भगवान का महान्
आयतन है।
मन्त्रीश्वर वाग्भट ने तीन करोड तीन लाख स्वर्ण व्यय कर
६ विविध तीर्थ-कल्प
आदीश्वर भगवान के प्रासाद का उद्धार करवाया । यहाँ तीर्थ मे
प्रवेश करते ही पहले आदीश्वर भगवान की विशद प्रतिमा के
दर्शन करने पर आँखे तृप्त होती है ।
श्री विक्रमादित्य से एक सौ आठ वर्ष बीतने पर जावडशाह
ने प्रचुर द्रव्य व्यय करके प्रतिमा को विराजमान किया । और
उसने मम्माण पर्वत मे उत्पन्न चमकीली कान्ति वाले मम्माण
रत्न पाषाण के ज्योतिरस रत्न द्वारा प्रतिमा घटित—निर्माण
करवाई ।
मधुमती नगर निवासी सेठ जावड ने पहिले श्री वज्रस्वामी से
शत्रुञ्जय का माहात्म्य सुना था । वह गन्धोदक स्नान कराने की
रुचि से लेप्यमय बिम्ब का विचार कर चक्रेश्वरी देवी को स्मरण
करके मम्माण पर्वत की खान मे गया और वहाँ से पाषाण की
प्रतिमा बनवा कर रथ मे आरोपण कर शुभ दिन मे भार्या-सहित
विमल गिरि की ओर चला । दिन मे प्रतिमा सहित रथ जितना
रास्ता चलता था, उतना ही रात्रि मे वापस लौट आता था ।
यह आश्चर्य देखकर जावडसाह का चित्त खिन्न हो गया और
उसने कपर्दि-यक्ष का स्मरण किया । और उसके हेतु और विधि
को ज्ञात कर वह अपनी पत्नी के सहित रथ के मार्ग मे टेढा सो
गया । उसके साहस से प्रसन्न हुए देवता ने रथ को बिम्ब सहित
पहाड़ के शिखर पर चढा दिया । सात्त्विको के लिए कुछ भी
दु साध्य नही है ।
मूलनायक का उत्थापन करके उनके स्थान पर मम्वाणी
पाषाण की प्रतिमा स्थापन करने पर लेप्य बिम्ब के भयंकर शब्द
से पर्वत के टुकडे हुए और उनके द्वारा छोडी हुई बिजली श्रेष्ठी के
बिम्ब ने हाथ मे लेकर मर्दन कर दी । वह सीढियो में छेद करती
हुई पहाड़ के देश को भेद कर निकल गई ।
जावड सेठ चैत्य शिखर पर पत्नी सहित चढकर प्रमोद से
शत्रुञ्जय तीर्थ-कल्प ७
हर्ष रोमाञ्चित हो नाचने लगा । म्लेच्छ देश से १८ जहाज आये,
जिनका द्रव्य व्ययकर सेठ ने यह धर्म-प्रभावना की । इस प्रकार
जावडगाह ऋषभदेव, पुण्डरीक और कपर्दि यक्ष की मूर्त्तियाँ
विराजमान कर स्वर्ग का अतिथि वना । भगवान के दाहिनी ओर
पुण्डरीक स्वामी और वाँये तरफ जावड शाह द्वारा स्थापित दूसरा
विम्ब सुशोभित है ।
इक्ष्वाकु और यादव वंशी लोग यहाँ असंख्य कोटा-कोटि सिद्ध
हुए हैं जो 'कोटि-कोटि तिलक' नाम को सूचित करते हैं।
पाँचो पाण्डव, उनकी माता कुन्ती यहाँ से मुक्त हुए, यह इस
तोर्थ पर रही हुईटॉक पर लेप्यमय छहों मूर्त्तियाँ सिद्ध करती हैं ।
यहाँ श्रीसघ के अद्भुत भाग्य से रायण चैत्य वृक्ष चन्द्र-
किरणों से झरते अमृत के सदृश दुग्धवर्षा करता है । यहाँ व्याघ्री-
मयूर आदि तिर्यञ्च भी मुक्त भक्ति पूर्वक आदीश्वर भगवान के
चरणों को नमस्कार करने से स्वर्ग को प्राप्त हुए है । वाम पार्श्व मे
सत्यपुरीय महावीरावतार जिनालय और दक्षिण पार्श्व मे शकुनि
चैत्य के पृष्ठ भाग मे अष्टापद का मंदिर है। भव्य जन सरलता-
पूर्वक यात्रा कर पुण्य वृद्धि करे, इस हेतु से नन्दीश्वर, स्तंभनक
और गिरनार महातीर्थ के मन्दिर विराजमान हैं। अस्तिहस्त नमि
और विनमि से सेवित श्री नाभेय जिनेश्वर स्वर्गारोहण चैत्य में
शोभायमान हैं। दूसरे उत्तुग शिखर को श्रेयास, शान्तिनाथ,
नेमिनाथ, ऋषभदेव और महावीर आदि जिनेश्वर अलंकृत करते
है। पुण्यशाली जन यहाँ जिनालय में ससार का उच्छेद करने
वाली भगवती मरुदेवी को नमस्कार करके अपने आपको कृतकृत्य
मानते हैं ।
यहाँ कल्पवृक्ष सदृश कपर्दि नामक यक्षराज नमस्कार करने
वालो एव यात्रीसंघ के विविध विघ्नो का नाग करते है ।
यहाँ पर भगवान नेमिनाथ के आदेग से श्रीकृष्ण ने आठ
पाटलिपुत्र, नालंदा, चम्पा, मिथिला एवं मगध तीर्थ कल्प
८ विविध तीर्थ-कल्प
दिन उपवास करके पर्वत गुफा में रहे और कपर्दि यक्ष का आराधन
कर तीन विम्बो को पर्वतगुफा मे छिपाकर रखा। सुनते हैं कि आज
भी शक्रेन्द्र वहाँ आते हैं और पूजा करते हैं।
पाण्डवो द्वारा स्थापित श्री ऋषभदेव के उत्तर दिशा की ओर
वह गुफा आज भी चेलना तलाई तक विद्यमान है। यक्ष के
आदेग से प्रतिमाओ के दर्गन होते हैं।
यहाँ भगवान अजितनाथ और शान्तिनाथ वर्षावास रहे थे।
वहाँ उनके दो पूर्वाभिमुख चैत्य थे, अजितनाथ चैत्य के निकट
अनुपमा सर हुआ। मरुदेवी के पास आँखो को गीतल करनेवाला
गान्तिनाथ चैत्य भव्य प्राणियो की भव-भ्रान्ति को दूर करता है।
श्री गान्तिनाथ जिनालय के आगे तीस हाथ पर सात पुरुष
नीचे सोने और रूपे की दो खाने हैं। वहाँ से सौ हाथ आगे पूर्व
द्वार वाली सिद्ध रस से भरी हुई आठ हाथ नीचे रसकूपिका है।
श्री पादलिप्ताचार्य ने तीर्थोद्धार के लिए उसके समीप स्वर्ण और
रत्न स्थापित किए थे। पूर्व दिगा मे ऋषभदेव के नीचे ऋषभकूट
से ३० धनुष जाकर अष्टम तप पूर्वक बलिविधान आदि करने पर
वरुट्टया देवी बहु धन दिखलाती है। उनकी आज्ञा से गिला
उघाड कर रात्रि मे वहाँ प्रवेग-किया जाता है। वहाँ उपवास
करने से सर्वसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ऋषभदेव भगवान् का पूजन
वदन करने से (भव्य प्राणी) एकावतारी होता है। पाँच सौ
धनुष आगे पाषाणकुण्डिका है, वहाँ सात पद जाकर बुद्धिमान को
बलिविधि करनी चाहिए। किसी-किसी पुण्यगाली को वहाँ
गिलोत्पाटन कर दो उपवास करनेपर रसकूपिका प्रत्यक्ष होती है।
कल्कि का पुत्र परमार्हत् धर्मदत्त होगा, वह प्रतिदिन जिन-
विम्ब की प्रतिष्ठा कराके भोजन करेगा। उसका पुत्र जितगत्रु
राजा गत्रुञ्जय का उद्धार करेगा और वह बत्तीस वर्ष राज्य-
लग्मी का भोग करेगा। उसका पुत्र मेघघोष यहाँ कपर्दि यक्ष के
शत्रुञ्जय तीर्थ-कल्प ९
आदेश से श्री शान्तिनाथ और मरुदेवी के चैत्य का उद्धार करेगा।
नन्दिसूरि, आर्य श्रीप्रभ, मणिभद्र, यशोमित्र, धनमित्र, विकटधर्म,
मुमङ्गल और सूरसेन इस तीर्थ के उद्धार कराने वाले होगे जो
दुष्प्रसहसूरि के समय होने वाले विमलवाहन से पहले उद्धार
करेंगे।
जो यहाँ यात्रियो को कष्ट देते हैं अथवा उनका धन अपहरण
करते हैं वे अपने पाप के भार से वंश सहित घोर नरक मे पडते
हैं। यहाँ यात्रा-पूजा-तीर्थ द्रव्य की रक्षा और यात्री सघों का
सत्कार करने वाला, गोत्रसहित स्वर्ग लोक मे पूजा जाता है।
यहाँ पर वस्तुपाल और पेथड आदि के बनवाये हुए धर्म-
स्थानो का वर्णन करते हुए वक्ता पार नही पा सकता है। दूषक-
काल के प्रभाव से म्लेच्छो द्वारा इसके भविष्य मे भग होने की
सभावना करके मन्त्री वस्तुपाल एव तेजपाल—बुद्धिमानो—ने
ऋषभदेव व पुडरीक स्वामी की प्रतिमाएँ मम्पाणी पाषाण की
बनवा कर भूमिगृह मे रख दी थी।
कलिकाल के प्रभाव से स० १३६९, वैक्रमीय मे म्लेच्छो ने
जावड् स्थापित बिम्ब को भग कर दिया। इसके बाद स० १३७१
मे समरा शाह ने मूलनायक बिम्ब का उद्धार किया।
इस तीर्थ पर जो सघपति हो गए हैं, हो रहे हैं, और भविष्य
मे होगे, वे धन्य है। वे चिरकाल तक लक्ष्मी से समृद्ध रहे।
श्री भद्रबाहु स्वामी ने पहले 'कल्प पाहुड' से श्री शत्रुजय
कल्प बनाया था और उनके बाद श्री वज्रस्वामी ने और फिर
पादलिप्ताचार्य ने भी बनाया। उन्ही कल्पो से उद्धृत कर सक्षेप से
श्री जिनप्रभ सूरि ने यह श्री शत्रुजय कल्प प्रणीत किया है।
इस कल्प को वाचने, ध्यान करने, व्याख्यान करने, पढने और
श्रवण करने पर भक्तिशाली भव्य तीसरे भव मे सिद्धि प्राप्त
करते हैं।
१० विविध तीर्थ-कल्प
हे शत्रुजय शैलेग । तुम्हारे गुण कौन विद्वान थोडा-सा भी
कहने मे समर्थ हो सकते हैं ? इस तीर्थ के प्रभाव से यात्रा करने
वाले और नमस्कार करने वाले मनुष्य के मन-परिणाम शुभ होते
हैं और वृद्धिगत होते हैं ।
हे गिरिराज ! तुम्हारी यात्रा को चलते हुए सघ के रथ, घोडे,
ऊँट और मनुष्यो के चरणो से पवित्र हुई रज भव्य-जनो के अग
मे लगने पर पाप को नष्ट करती है । अन्यत्र मासक्षमण करने पर
जितने पापो का क्षय होता है उतना आपको नमस्कार करने मात्र
से हो जाता है ।
श्री नामेय-ऋषभ के द्वारा जहाँ निवास किया गया है और
इन्द्र से प्रग्रसित वैभव वाला है, ऐसे हे गिरिराज ! हे सिद्धक्षेत्र !
मन वचन और काया से तुम्हे नमस्कार करता हूँ । मैने सरल मन
से तुम्हारा कल्प बना कर जो पुण्य अर्जन किया है, उससे सारा
विश्व वास्तविक सुख वाला बने ।
पोथी मे रहे हुए इस कल्प को जो पूजेगा उसे समस्त इच्छित
सम्पत्तियाँ और सिद्धि प्राप्त होगी ।
- इसके प्रारंभ करने पर संघ मे 'राजाधिराज' प्रसन्न हुए थे,
[L1
२. रैवतगिरि-कल्प संक्षेप
श्री नेमिनाथ जिनेश्वर को मस्तक नमाकर—नमस्कार कर,
रैवतगिरिराज—गिरनार का कल्प जैसा श्री वज्रस्वामी के शिष्य
और पादलिप्त सूरि ने कहा है, (कहूँगा)।
छत्रशिला के समीप शिलासन पर भगवान श्री नेमिनाथ ने
दीक्षा ली, सहस्राम्रवन मे उन्हे केवलज्ञान हुआ, लक्षाराम मे
मे देशना दी और 'अवलोकन' के उच्च शिखर पर निर्वाण पाये।
रैवतगिरि की मेखला मे श्रीकृष्ण ने वहाँ तीन कल्याणक के स्वर्ण-
रत्नमय प्रतिमालंकृत जीवित स्वामी के तीन चैत्य कराके अम्बिका
देवी (प्रतिमा) भी कराई। इन्द्र ने भी वज्र से पहाड को कोर के
स्वर्ण बलानक और रौप्यमय चैत्य, रत्नमय वर्ण और प्रमाणोपेत
प्रतिमा, अम्बा शिखर-पर रंगमण्डप, अवलोकन शिखर, बालानक
मण्डप मे शाम्ब ने इतने कराये। श्री नेमिनाथ के मुख से निर्वाण
स्थान ज्ञातकर निर्वाण के पश्चात् श्रीकृष्ण ने सिद्धविनायक
प्रतिहार की प्रतिमा स्थापित थी। तथा दामोदर के अनुरूप
१ कालमेघ, २ मेघनाद, ३. गिरिविदारण ४ कपाट, ५ सिंहनाद,
६ खोडिया और ७ रैवत तीव्रतप क्रीडन से क्षेत्रपाल उत्पन्न हुए।
इनमे मेघनाद सम्यग्दृष्टि और भ० नेमिनाथ का चरणभक्त है।
गिरिविदारण ने कचन बालानक मे पाँच उद्धार विकुर्वण किये।
वहाँ एक अम्बा देवी के आगे उत्तर दिशा मे एक सौ सात कदम
पर गुफा है, जहाँ अष्टम तप करके बलि-विधानपूर्वक शिला उठाने
पर बीच में गिरिविदारण प्रतिमा है। वहाँ से पचास कदम जाने
पर बलदेवकारित शाश्वत जिनप्रतिमा को नमस्कार कर उत्तर
१२ विविध तीर्थ-कल्प
दिशा मे पचास कदम जाने पर तीन वारी आती हैं । पहली वारी
तीन सौ कदम जाने पर गोदोहनासन से प्रविष्ट हो पाँच उपवास
पूर्वक भ्रमर रूप दारुण सत्त्व से उठाकर सात कदम अधोमुख
प्रवेग करके वालानक मण्डप मे इन्द्र के आदेश से धनद कारित
अम्बा देवी की पूजा करके स्वर्ण जाली मे स्थापन करना । वहाँ
स्थित होकर मूलनाथ श्री नेमिनाथ जिनेन्द्र को वन्दन करना
चाहिए । दूसरी वारी मे एक पाद पूजा करके स्वयंवर वापी से
नीचे चालीस कदम जाने पर मध्यवारी आती है । वहाँ से सात सौ
कदम पर एक कुँआ है । वहाँ वर हंस स्थित होकर यहाँ भी
मूलनायक को वन्दन करना । तीसरी वारी का मूल द्वार-प्रवेश
अम्बा देवी के आदेश से होता है, अन्यथा नही । ऐसा क्वचन
बालानक का मार्ग है और वहाँ अम्बा के आगे बीस हाथ पर
विवर है । अम्बा देवी के आदेश से यहाँ तीन उपवास पूर्वक
शिलोद्घाटन द्वारा बीस हाथ जाने पर सात सम्पुट और पाँच
पेटियो के नीचे रसकूपिका है, जो प्रत्येक अमावस्या के दिन
खुलती है । यहाँ भी तीन उपवास करके अम्बा देवी के आदेश से
बलिविधान-पूजन करके (रस) ग्रहण करना चाहिए ।
इसी प्रकार जीर्णकूट पर तीन उपवास करके बलिपूजन
द्वारा सरल मार्ग से सिद्ध विनायक उपलब्ध होता है । और वहाँ
चिन्तित कार्य की सिद्धि होती है । यदि वैसे प्रत्यक्ष हो जाय
तो एक दिन ठहरना चाहिए । वैसे हो राजिमती गुफा से एक सौ
कदम पर गो-दोहिका ( आसन ) द्वारा रसकूपिका और कृष्ण
चित्रकवल्ली हैं एव राजिमती की प्रतिमा रत्नमय है और अम्बिका
की भी वहाँ है, अनेक रूप्यमय औषधियाँ भी वहाँ रही हुई है ।-
वहाँ छत्रशिला, घटशिला और कोटिशिला—तीन शिलाएँ
बतलाई हैं । छत्रशिलाके बीचो-बीच कनकवल्ली है । सहस्राम्रवन
रैवतगिरि कल्प-संक्षेप १३
मे रजत-स्वर्णमय चौबीस एवं लखाराम में चौबीस जिनेश्वरो की
बहत्तर गुफाएँ कही हैं।
कालमेघ के आगे स्वर्णवालुका नदी से तीन सौ आठ कदम
उत्तर दिगा मे जाकर गिरि-कन्दरा मे प्रविष्ट होकर जल से
स्नान करके उपवासपूर्वक रहने से द्वार खुलता है। प्रथम द्वार मे
स्वर्ण-खान, दूसरे द्वार मे रत्न-खान है जो सघ के लिए अम्बा देवी
द्वारा विकुर्वित है। वहाँ कृष्ण के पाँच भण्डार हैं, अन्य दामोदर
के समीप हैं। अंजनशिला के अधोभाग में बीस पुरुप नीचे रजत-
स्वर्ण-धूलि बतलाई है।
उसके पश्चिम मे मगलक देवदाली है जिससे रस-सिद्धि होती
है। संघ के समुद्धार कार्य के लिए श्री वज्रस्वामी ने बतलाई है।
शस्य कड़ाह मे लेकर कोटिविन्दु का सयोग करने पर घण्ट-
गिला चूर्ण के योग से अजन-सिद्धि होती है।
विद्यापाहुड उद्देशक से रैवत कल्प समाप्त हुआ। (ग्रथाग्र ० ३८)
●
३. श्री उज्जयन्तस्तवः
श्री रैवतक, उज्जयन्त आदि नामो से प्रसिद्ध, श्री नेमिनाथ
भगवान द्वारा पवित्रित श्री गिरनार गिरीश्वर की स्तवना
करता हूँ।
भुवन मे यह स्थान सौराष्ट्र देग नाम से विख्यात है जिसकी
भूमि रूपी कामिनी के ललाट पर यह गिरिराज तिलक के
समान है।
९४ विविध तीर्थ-कल्प
इसकी उपत्यका मे ऋषभदेवादि (जिनालयो से) अलंकृत
खंगार दुर्ग है और भगवान पार्श्वनाथ भूषित तेजलपुर है।
इसके दो योजन ऊँचे श्रृंग पर जिनालयो की श्रेणी शरच्चन्द्र
की किरणो जैसी निर्मल पुण्यराशि की भाँति सुशोभित है।
यहाँ श्री नेमिनाथ का सुन्दर चैत्य है और उसपर स्वर्णमय
दण्ड-कलश और आमलसार सुशोभित है।
यहाँ शिवादेवीनन्दन श्री नेमिनाथ भगवान् की चरणपादुका
के दर्शन, स्पर्शन और पूजन से शिष्ट लोगो के पाप-व्यूह नष्ट
होते हैं।
विशाल राज्य को पुराने तृण की भाँति छोडकर व स्नेहपूर्ण
बन्धुओ को त्याग कर प्रभु ने यहाँ महाव्रत स्वीकार किये।
उन प्रभु ने यही केवलज्ञान पाया और वे जगज्जनो का हित-
साधन कर यही से मोक्ष प्राप्त हुए। अतएव यहाँ मत्रीश्वर
श्री वस्तुपाल ने भव्य जनो के चित्त मे चमत्कृति करनेवाले तीन
कल्याणक मन्दिरो का निर्माण कराया।
यहाँ जिनेश्वर की प्रतिमाओ से पूर्ण इन्द्र-मण्डप मे श्री
नेमिनाथ भगवान का स्नान कराते हुए लोग इन्द्र की तरह
लगते हैं।
इस गिरिराज पर अमृतमय जल से पूर्ण गजेन्द्रपद नामक
कुण्ड है, जहाँ के जल से अर्हन्त भगवान का स्नात्र-न्हवण कराया
जाता है।
यहाँ वस्तुपाल के बनवाये हुए शत्रुञ्जयावतार चैत्य मे ऋषभ-
देव, पुण्डरीक, अष्टापद और नन्दीश्वर (स्थापित) हैं। स्वर्ण वर्ण
वाली सिंहवाहिनी अम्बिका सिद्ध¹ बुद्ध² पुत्रो से युक्त है, वह आम्र-
लुम्बधारिणी संघ के विघ्न हरण करती है।
श्री नेमिनाथ प्रभु के चरण-कमलो से पवित्रित अवलोकन
नामक शिखर के दर्शन करते भव्यजन कृतार्थता प्राप्त करते हैं।
श्री उज्जयन्तस्तव. १५
जाम्बवती की कुक्षी से उत्पन्न कृष्ण के पुत्र गाम्ब ने और
प्रद्युम्न एवं महाद्युम्न ने ऊँचे श्रृंग पर दुष्कर तपश्चर्या की। यहाँ
नाना प्रकार की औषधियाँ रात्रि मे जाज्वल्यमान-चमचमाहट
करती हैं। घण्टाक्षरगिला व छत्रशिला ऊँचे स्थान पर शोभित है।
सहस्राम्रवन व लक्षाराम एव दूसरे भी वनसमूह मयूर, कोयल
और भँवरो के संगीत से सुभग लगते हैं।
ऐसा वृक्ष, वल्ली, पुष्प या फल कोई नही है जिसे यहाँ इह-
लौकिक विद्वान भी न चाहते हो। जहाँ रथनेमि को उन्मार्ग से
सन्मार्ग मे लाया गया था, उस राजिमती की गृफा के अन्दर कौन
वंदन नही करते ?
यहाँ पर भव्य जनो द्वारा सम्पन्न पूजा, स्नात्र, दान और तप
मोक्ष सुख प्राप्ति के हेतु होते हैं। यहाँ जो इस पहाड़ पर दिग्भ्रम
से भी किसी भी मार्ग मे चला जाय तो वह भी चैत्य स्थित
जिनेश्वर को स्थापित और पूजित-अर्चित देखता है।
काश्मीर से आये हुए रत्नश्रावक ने यहाँ कुष्माण्डी-अम्बिका
के आदेश से लेप्यमय बिम्ब के स्थान पर पाषाणमय नेमिनाथ
प्रतिमा स्थापित की।
नदी-झरने-कुण्ड-खानो और लताओ की संख्या को कौन
गिनने वाला (गिनती कर सकता) है ? चैत्यो से अलकृत शिखरो
वाले रैवतगिरि को नमस्कार हो, जिस महातीर्थ का अभिषेक
मुक्तिदायक है।
सूरीन्द्रो से वर्णित और देवताओ के समान प्रभा वाले इस
गिरिराज की मैंने स्तुति की है ऐसा गिरनार और रजत-हेम सिद्धि
वाली भूमि आप सबको हर्षित करे। कवि ने युक्ति से अपना
जिनप्रभसूरि नाम भी इस गाथा मे दे दिया है।
४. उज्जयन्त महातीर्थ-कल्प
सौराष्ट्र देश मे उज्जयन्त नामक रम्य पर्वत है जिसके शिखर
पर चढ कर भक्तिपूर्वक नेमि जिनेश्वर को नमस्कार करो ।
अम्बिका देवी को न्हवण-अर्चन-गध-धूप-दीपक से पूजन कर
प्रणाम करके धनार्थी अर्थ प्राप्त करता है ।
गिरिशिखर, कुहर, कन्दरा, झरने, कपाट, विकट कूपादि मे
खत्तवाय को देखो, जैसा कि पूर्वाचार्यों ने कहा है ।
कन्दर्प के दर्प को काटने वाले, कुगति दूर करने वाले, भगवान्
नेमिनाथ का मन्दिर निर्वाण-शिला नाम से जगत मे विख्यात है ।
उसके उत्तर की ओर दश धनुष पर अधोमुख विवर है, जिसके
द्वार पर चार धनुष नीचे अवदान लिंग है, ' वहाँ पशु मूत्र गन्ध
वाला रस है । सौ पल ताँबे के साथ मिलाने पर चन्द्रमा और कुन्द
के समान उज्ज्वल चाँदी सहसा बन जाती है ।
पूर्व दिशा से धनुष्यान्तर पर वैसा ही है जैसे आगे बताया,
वह पाषाणमय है और दक्षिण दिशा मे बारह धनुष जाने पर वहाँ
हिंगुल वर्ण वाला दिव्य प्रवर रस दिखाई पडता है जो अग्नि के
सग से सर्व प्रकार के लोहे को स्पर्श मात्र से ही वेध कर सोना
बना देता है ।
उज्जयन्त पर विहला नामक नदी है और पार्वती की प्रतिमा
है जिसे अगुली से दबाने पर पर्वतीय द्वार खुल जाता है ।
उज्जयन्त गिरिराज पर शक्रावतार है जिसके उत्तर की ओर
सोपान पक्तियाँ है और कबूतर के वर्ण वाली मिट्टी है । पच गव्य
से बाँधकर पिण्डी बनाकर धमन करने पर श्रेष्ठ चाँदी बनती है
उज्जयन्त महातीर्थ-कल्प १७
जो दारिद्रय व्याधि को नष्ट करती है और दुख-कान्तार से पार
लगा देती है।
शिखर के विशाल श्रुंग पर जहाँ पाद कुंट्टिमा दिखाई पडती
है उसके समीप गिखर पर कव्वड-हडा है उस पर पामह नामक
चाँदी है।
उज्जयन्त-रैवत वन मे जहाँ सुद्दार वानर है, उसका बाँया
कान कटा हुआ है, वह विवर के श्रेष्ठ द्वार को खोल देता है।
उस विवर मे प्रविष्ट होकर सौ हाथ जाने पर सुवर्ण वर्ण वाले
वृक्ष दिखाई पड़ते हैं, उनसे नीलां रस झरता है वह निश्चय से
सहस्रवेधी रस हैं। उसे लेकर निकलते हुए वानर-हनुमत को वाम
पाद से स्पर्श करना चाहिए, वह उस श्रेष्ठ द्वार को ढँक देता है
जिससे कोई भी मनुष्य जानने नही पाता।
उज्जयन्त शिखर पर कोहडि-अम्बिका गृह विख्यात है उसके
पोछे गिला है। उसके दोनो और औषधि है जिसे अलसी के तेल
से मिश्रित कर (प्रयोग करने पर) वह प्रतिवात वकित अंगो को
ठीक कर देती है। जिस पर अविका तुष्ट हो जाती है, उसकी
दुर्गति व सभी व्याधियाँ दूर हो जाती हैं। वहाँ पर प्रधान मन-
शिल वर्णवाली वेगवती नामक नदी है, उसकी मिट्टी को धमन
करने पर श्रेष्ठ रजत बन जाती है।
उज्जयन्त पर ज्ञानगिला है, जिसके नीचे सोने के समान वर्ण
वाली मिट्टी है, जिसका बकरे के मूत्र मे पिण्ड बनाकर खैर के
अगारो मे धमन करने पर सोना बनता है। ज्ञानशिला के नीचे
की मिट्टी पचगव्य से पिण्डी बनाकर हडे के नीचे रस हैं, उससे
सहस्र वेध करने पर सोना बनता है। गिरिराज के निकट 'तिल-
विसारण नामक औषधि है उसको लाकर गिला पर गाढी बाँधे,
उसमे दो लाख द्रम्म प्राप्त होते हैं। सुवर्ण तीर्थ पर लड्डुअ प्रधान
सेना नाम की नदी है, उसके पिण्ड से भी सोना बनता है, इसमें
कोई सन्देह नही।
२
१८ विविध तीर्थ-कल्प
विलक्ष नगर मे मधुक गृह नामक दिव्य शिखर है, उसके
बीच मे गणपति रस-कुण्ड हैं जिसके ऊपर उपवास करके पूजन
करने पर गणपति के चलाया हुआ प्रवर-रस "पामापेवी" (?)
है और बग को स्तम्भित कर देता है, इसमे सन्देह नहीं ।
सहस्राश्रव नामक तीर्थ करज वृक्ष से मनोहर और सुन्दर है ।
वहाँ पर तुरियाचार नाम के पाषाण है, उसके दो भाग हैं। एक
भाग पारदमूत्र से पीसकर अ धरूषा मे धमन करने पर चाँदी वन
जाती है, जिससे मनुष्य दु खरूपी कान्तार से पार उतर जाता है।
अवलोकन शिखर की शिला के पीछे वहाँ श्रेष्ठ रस झरता है
जो तोते के पख के समान वर्ण वाला है और 'सुव्व' को श्रेष्ठ
सोना बना देता है ।
प्रद्युम्नगिरि पर अम्बिकाश्रम पद नामक स्थान हैं, वहाँ भी
पीली मिट्टी है और हेमवाद से श्रेष्ठ सोना बनती है ।
उज्जयन्त पर जहाँ ज्ञानशिला है और उसके नीचे भी पीली
मिट्टी है, उसे 'साहामिय' लेप से छाया मे सुखाने पर सोना
बनता है।
उज्जयन्त के प्रथम शिखर पर चढकर दक्षिण की ओर उतरने
पर तीन सौ धनुष 'पूतिकर' नाम की गुफा है, उसे उघाड कर
निपुण व्यक्ति को देखकर वहाँ जाना चाहिए । वहाँ बारह दण्ड
के अन्तर पर जवू फल जैसा दिव्य रस है, जिसे भाड मे सहस्र
भाग चाँदी के साथ घोलने पर सहसा बाजारू सोना हो जाता है।
अम्बिका भुवन के पूर्व दिशा से उत्तर दिशा पर्यन्त तापस-
भूमि है, वहाँ वासुदेव की पाषाणमय प्रतिमा दीखती है, उससे
उत्तर दिशा मे दश हाथ जाने पर पार्वती की प्रतिमा दिखाई
पडती है। जिसे अवराह मुहर अगुष्टिका से दबाने पर रास्ता
देती है। नौ धनुष प्रवेश करने पर दक्षिणोत्तर दिशा मे कूप
उज्जयन्त महातीर्थ-कल्प १९
दिखाई पडता है उसमें निश्चय ही हरिताल लक्ष वर्ण वाला सहस्र-
वेधी रस है।
उज्जयन्त पर ज्ञानशिला विख्यात है, वहाँ पाषाण है, उसके
उत्तर पार्श्व मे दक्षिण अधोमुख विवर है, उसके दश धनुष दक्षिण
जाने पर हिंगुल वर्ण वाला शतवेधी रस है सो “सुव्व” को वेध
देता है इसमे कोई सन्देह नही।
वृषभ-ऋषभादि कूट पर पाषाण है, वहाँ पर सगम है। हाथी
को लीद के साथ स्पर्श करने पर वह सोना बन जाता है।
जिनालय के दक्षिण की ओर जानेपर जलुकचरी मिट्टी है, तिर्यञ्च
और मनुष्य के रक्त से विद्ध होने पर ताँबे को सोना बना देती है।
वेगवती नामक नदी है, उसमे मनशिल वर्ण वाले पाषाण हैं।
‘सुव्व’ को पत्रवेध करने पर स्रवित होता है और धमन करने पर
ताँवे को शीघ्र सोना बना देता है।
यह उज्जयन्त कल्प अविकल्प है, अम्बिका को प्रणाम कर जो
जिनभक्त करता है वह इच्छित सुख को प्राप्त करता है।
उज्जयन्त महातीर्थ का कल्प समाप्त हुआ।
५. रैवतगिरि-कल्प
पश्चिम दिशा मे सौराष्ट्र देश मे पर्वत-राज रैवत के शिखर
पर श्री नेमिनाथ भगवान का उत्तुग शिखर वाला भवन है।
पूर्वकाल मे वहाँ भगवान नेमिनाथ स्वामी की लेप्यमय प्रतिमा थी।
एक वार उत्तरदिशा-विभूषण कश्मीर देश से अजित और रतन
नाम के दो भ्राता संघपति होकर गिरनार आये । उन्होने शीघ्रता-
वश बहुत से पचामृत भरे कलशो द्वारा न्हवण-स्नात्र कराया
जिससे श्री नेमिनाथ भगवान की लेप्यमय प्रतिमा गल गई । उन्होने
अपने पर (गल्ती) अत्यन्त खेद करते हुए आहार का प्रत्याख्यान
कर दिया । इक्कीस उपवास के अनन्तर स्वयं भगवती अम्बिका
देवी आई, संघपति को उठाया । उसने देवी को देखकर जय जय
कार शब्द किया । देवी ने कहा—यह विम्ब ग्रहण करो, पर पीछे
मत देखना । अजित संघपति एक तार से खीचते हुए श्री नेमिनाथ
भगवान का रत्नमय विम्ब कचनवालानक से लाये । प्रथम भवन
की देहली मे आरोपण कर संघपति ने अत्यन्त हर्षपूर्वक पृष्ठ
भाग मे देखा । प्रतिमा वही पर निश्चल हो गई । देवी ने कुसुम-
वृष्टिपूर्वक जय जयकार किया । यह प्रतिमा वैशाखी पूर्णिमा के
दिन संघपति ने नव्यकारित प्रासाद मे पश्चिमाभिमुख स्थापित
किया । स्नात्र-महोत्सव करके अजित संघपति अपने भाई के साथ
स्वदेश लौट गया । कलिकाल मे देवी ने लोगो का कलुषित चित्त
ज्ञात कर रत्नमय प्रतिमा की झलकती हुई कान्ति को आच्छादित
कर दिया ।
पहले गुजरात मे जयसिंह देव ने राजा खेंगार को मार कर
सज्जन को दण्डाधिप स्थापित किया । उसने विक्रम संवत् ११८४
मे श्री नेमिनाथ भगवान का अभिनव जिनालय बनवाया । मालव-
देशमण्डन सेठ भावड साह ने स्वर्णमय आमलसार-कलश कराया ।
चालुक्यचक्री श्री कुमारपालदेव नरेन्द्र संस्थापित श्री श्रीमाल
कुलोद्भव सौराष्ट्र दडनायक ने विक्रम संवत् १२२० मे पाज
(पद्या-सीढियाँ) करवायी । उसी भावना से धवल ने अंतराल मे
पर्व-प्रपा भराये । पाज चढते हुए लोगो को दक्षिण दिशामे लक्षा-
राम दिखाई देता है ।
अणहिल वाड पाटण मे पोरवाडकुलमण्डन आसराज-कुमार
रैवतगिरि-कल्प २१
देवी के पुत्र और गुर्जराधिपति श्री वीरधवल की राज्यधुरा को
चलाने वाले मन्त्रीश्वर वस्तुपाल तेजपाल नामक दो भ्राता हुए ।
उनमे तेजपाल मत्री ने गिरनार की तलहट्टी मे स्वनामाङ्कित
तेजलपुर नामक प्रवर गढ, मठ, प्रपा, मन्दिर और बाग-बगीचो से
सुन्दर बनवाया । वहाँ अपने पिता के नामाङ्कित 'आसराज
विहार' नामक पार्श्वनाथ जिनालय कराया । अपनी माता कुमार-
देवी के नाम से 'कुमर सरोवर' निर्माण करवाया । तेजलपुर के
पूर्व दिशा मे उग्रसेनगढ नामक दुर्ग मे युगादिनाथ-प्रमुख जिन-
मन्दिर सुशोभित है । उसके उग्रसेनगढ, खगारगढ और जूनागढ
तीन नाम प्रसिद्ध है । गढ के बाहर दक्षिण दिशा मे चँवरी-वेदी,
लड्डुओ के ओरे, पशुवाटक आदि स्थान है । उत्तर दिगा मे
विशाल स्तभ शाला गोभित दश दगार-मण्डप, गिरिद्वार मे पचम
हरि, दामोदर आदि स्थान स्वर्ण रेखा नदी के पार मे बर्त्तमान है ।
कालमेघ के समीप तेजपाल मत्री ने बहुत दिनो से नही आए
हुए सघ को बुलाकर उज्जयन्त शिखर पर एकत्र किया । वस्तु-
पाल मन्त्री ने शत्रुञ्जयावतार मन्दिर, अष्टापद-समेत शिखर मण्डप,
कपर्दियक्ष एव मरुदेवी प्रासाद कराये । तेजपाल मन्त्री ने तीन-
कल्याणक चैत्य कराया । देपाल मन्त्री ने इन्द्रमण्डप का उद्धार
कराया ।
ऐरावण गज-पद-मुद्रा अलकृत गजेन्द्रपद कुण्ड है, वहाँ अग
प्रक्षालन कर आये हुए यात्री लोग दुखो को जलाञ्जलि देते हैं ।
छत्रशिला के नीचे सहस्राम्रवनोद्यान है जहाँ यादवकुल-प्रदीप,
समुद्रविजय शिवादेवीनन्दन भगवान नेमिनाथ के दीक्षा केवल-
ज्ञान और निर्वाण कल्याणक हुए है । गिरिशिखर पर चढते ही
अम्बिका देवी का मन्दिर दिखाई देता है । वहाँ से अवलोकन
शिखर है, जहाँ पर स्थित होकर दशो दिशा से भगवान नेमिनाथ
२२ विविध तीर्थ-कल्प
स्वामी को अवलोकन किया जाता है । फिर पहले शिखर पर
गांवकुमार और दूसरे पर प्रद्युम्न (के विम्ब) हैं ।
इस पर्वत पर स्थान-स्थान पर चैत्यो मे रत्न-स्वर्णमय जिन-
विम्ब नित्य पूजा किए हुए दिखाई देते हैं । यहाँ की भूमि स्वर्ण-
मडिनी है और अनेक प्रकार के धातु रसो का भेदन करने वाली
देदीप्यमान दिखाई पडती है । रात्रि मे दीपक की भाँति प्रज्वलित
औषधियां दिखाई देती हैं । नाना प्रकार के वृक्ष-वल्ली-पत्र-पुष्प-
फलादि पद-पद पर उपलब्ध होते हैं । अनवरत खल-खलाहट
शब्द करके झरते हुए झरणो का जल और मत्त कोयल व भ्रमरो
के झकार सुनाई देते हैं ।
उज्जयन्त महातीर्थ कल्प शेप सक्षेप से यह श्री जिनप्रभसूरि
जी ने यथाश्रुत लिखा है ।
श्री रैवतगिर का कल्प समाप्त हुआ । इसके ग्रंथाग्रं० (अनुष्टुप
छंद के अक्षरो वाला) १६१ अक्षर २७ हैं ।
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६
श्री स्तम्भन पार्श्वनाथ-कल्प २३
रुचि धार्मिक जनो के सन्तोषार्थ श्री पार्श्वनाथ का कल्प लेश-
मात्र कहूँगा।
भव दुख रूपी भार से परिपूर्ण अगो वाले भव्यो के भव-भ्रमण
नष्ट करने के लिए मैं इस कल्प को सक्षेप से कहता हूँ, सुनिए।
विजया, जया, कमठ, पद्मावती, पार्श्वयक्ष, वैकट्या, धरणेन्द्र
और सोलह विद्या देवियाँ जिनके अधिष्ठायक हैं। प्रतिमोत्पत्ति-
निदानकल्प मे कलित होने पर भी यहाँ उसे विस्तार भय से
संकलित नही किया क्योकि पीछे इसे कोई नही पढेगा।
जो व्यक्ति समुद्र को चुलु के समान कर ले व ताराओ के
विमानो की गिनती कर ले वह भी पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा
की महिमा को कहने मे समर्थ नही हो सकता।
यह पुराणप्रतिमा अनेक स्थानो मे संस्थापित होकर उपसर्ग
शान्ति के हेतु खेचरो, देवो और उत्तम पुरुषो से पूजी गई है।
जो इन्द्रादि द्वारा कीर्त्तित और महिमा कृत पार्श्वनाथ-प्रतिमा
है उसे मैं जन-मानस मे निश्चल भाव करने के लिए कहूँगा।
भारतवर्ष रूपी सरोवर मे भव्यजन-कमल को विकसित-बोधित
करते हुए सुर-असुरो द्वारा वन्दित चरणो वाले श्री मुनिसुव्रत
भगवान दिनकर की भाँति विचरते थे तब श्री पार्श्वनाथस्वामी
की यह प्रतिमा चम्पा नामक श्रेष्ठ नगरी के रत्नाकरोपकंठ मे
ज्योतीश्वरो से वर्णित थी।
कार्त्तिक सेठ के भव मे शक्र को इन्ही के ध्यान से व्रत ग्रहणा-
नन्तर सौ की संख्या मे अभिग्रह सिद्ध हुए थे। अत प्रतिमा के
माहात्म्य से मुग्ध सौधर्मेन्द्र महान् दिव्य विभूति से वही स्थित हो
पूजा-अर्चा करने लगा।
इस प्रकार कितना काल बीतने पर जब श्री रामचन्द्र जी ने
वनवास किया तो इन्द्र के वचन से लोगो को राघव का प्रभाव