विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री स्तम्भन पार्श्वनाथ-कल्प २५
नाथ के आदेश से सखपुर नामक अभिनव नगर निर्माण कराके
श्री पार्श्वप्रभु का बिम्ब स्थापित किया । इस प्रतिमा को लेकर
कृष्ण के अपने नगर मे आने पर राजाओ ने वासुदेवत्वाभिषेक
उत्सव किया । कृष्ण नरेश्वर ने मणि-कंचन रत्नो से रचित
प्रासाद मे सस्थापित प्रतिमा की सात सौ वर्ष तक पूजा की ।
द्वारिका के दाह और यादव जाति के प्रलय होने पर भी
स्वामी के प्रभाव से देवालय मे अग्नि नही लगी । समुद्र ने अपनी
लोल लहरो के द्वारा नगरी के साथ रुचिर मनोहर मन्दिर सहित
स्वामी (की प्रतिमा) को जल के अन्दर ले लिया ।
नागकुमारियो के साथ क्रीडा के हेतु आये हुए तक्षक नागेन्द्र
ने प्रभु की पापनाशक प्रतिमा को देखा और उसने प्रमुदित चित्त
से बहुत प्रकार की नृत्य-कला से महामहोत्सवपूर्वक अस्सी हजार
वर्ष पर्यन्त पूजा की । दिग्पालश्रेष्ठ वरुण ने समुद्र की सफाई
करते हुए तक्षक द्वारा पूजी जाती हुई त्रिभुवनपति पार्श्वनाथ
की प्रतिमा को देखा और सोचा—अरे ये तो वही स्वामी
हैं जो देवेन्द्र द्वारा पहले पूजित थे, अब मुझे भी स्वामी के चरणो
की सेवा करना योग्य है । ऐसा विचार कर वह जिनेश्वर की
अनवरत पूजा, प्रार्थना, सेवा करने लगा । उस समय प्रभु वहाँ
चार हजार वर्ष पर्यन्त वही स्थित रहे ।
जब श्री वर्द्धमानस्वामी भरत क्षेत्र मे जलद तिलक-पुष्करा-
वर्त्त मेघ की भाँति अविरल धारा से भव्य शस्यो को सिंचन कर
रहे थे तब अपनी कान्ति से देवलोक की कान्ति को कलुषित करने
वाली कान्तिनगरी मे धनेश्वर नामक सार्थवाह सुखपूर्वक निवास
करता था । एक बार वह महाडभ्य (सेठ) यान मे समुद्र-यात्रा के
लिए निकला और सायात्रिक आदि के साथ सिंहल द्वीप पहुँचा ।
और माला बेचकर वहाँ से शीघ्रतापूर्वक लौटते हुए सहसा जल-
राशि के अन्दर प्रवहण स्तम्भित हो गया । जब वह दुखी होकर