विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमथुरापुरी-कल्प ३७
विचरे। उस समय मथुरा नगरी बारह योजन लम्बी और नौ
योजन विस्तीर्ण एव पार्श्व स्थित यमुना नदी के जल से प्रक्षालित
प्रकार विभूषित धवलगृह, देवकुल, वापी, कूप, पुष्करिणी,
जिनभवन और हाटो से सुशोभित थी। वहाँ विविध चारो विद्याओ
को पढने वाले ब्राह्मणो का समूह था।
वहाँ वे मुनिराज अनेक फल फूलो से लदे हुए भूतरमण नामक
उपवन मे अवग्रह लेकर उपवास करके वर्षकाल—चातुर्मास स्थित
रहे। उनके स्वाध्याय, तपश्चरण और प्रशमादि गुणो से आवर्जित-
आकृष्ट उपवन स्वामिनी कुबेरा देवी ने रात्रि मे प्रकट होकर
कहा—भगवन्! आपके गुणो से मै अत्यन्त प्रसन्न हूँ, कुछ वर
माँगिए। मुनिराजो ने उसे—हम निस्सग हैं, हमें कुछ नही चाहिए।
कहते हुए—धर्म सुनाकर अविरति श्राविका बनायो।
अन्यदा कार्त्तिक शुक्ल अष्टमी की रात्रि मे मुनिराजो ने कुवेरा
देवी से कहा—तुम शय्यातर हो, हे श्राविके! तुम दृढ सम्यक्त्व
वाली हो, अत जिन वन्दन, पूजन मे प्रवृत्त रहना। वर्त्तमान योग
से चातुर्मास करके पारणे के लिए हम अन्य गाँवो मे विचरण
करेंगे। देवी ने शोकपूर्वक कहा—भगवन्! आप सर्वदा इसी
उपवन मे क्यो नही रहते। साधुओ ने कहा—
"श्रमणो, पक्षियो, भ्रमरो, गोकुल, चतुष्पदो, पासा सारी और
मेघ का निवास अनियत होता है।"
उसने प्रार्थना की—यदि ऐसा है तो धर्म कार्य कहिए, जिसे
मैं सम्पादन करूँ, क्योकि देवदर्शन अमोघ होता है। साधुओ ने
कहा—यदि ऐसा ही आग्रह है तो हमे सघ के साथ मेरुपर्वत ले
जाकर चैत्यो की वन्दना कराओ। देवी ने कहा—मैं आप दोनो
को देव-वन्दन करा दूगी। मथुरा सघ चलने से अन्तराल मे कोई
मिथ्यादृष्टि देव विघ्न करेगे। साधुओ ने कहा—हमने आगम वल