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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 112

श्री स्तम्भनक-कल्प २९
श्री स्तंभनक-कल्प
दृढ व्याधि से शरीर अशक्त हो जाने पर अनशन ग्रहण करने
के लिए ( श्री अभयदेव सूरि जी महाराज ने ) सघ को बुलाया,
रात्रि मे देवी ने सूत की नौ कोकडी सुलझाने के लिए कहा।
हाथो से अशक्ति प्रकाशित करने पर ( देवी ने ) नवाङ्ग विवरण
कथा से चमत्कृत कर स्तभन पार्श्वनाथ वन्दन करने की आरोग्य-
विधि उपदिष्ट की । सभाणा से चलकर धवलकपुर आने के वाद
पादविहारी होकर स्तम्भनपुर के सेढी नदी के तट पर स्थित
खोखरे पलाश वन मे पहुंचे। गो-दुग्ध झरने से स्थान को पहिचान
कर जयतिहुअण स्तोत्रार्द्ध से पार्श्वनाथ स्वामी को प्रत्यक्ष किया
और स्तवन पूर्ण कर प्रभावशाली वृत्त द्वय को गुप्त कर दिया।
सघ द्वारा निर्मापित जिनालय मे श्री पार्श्वनाथ भगवान की
प्रतिमा को स्थापित किया वे गतरोग हुए नवाङ्गो वृत्तिकारक
श्री अभयदेव सूरि जी महाराज विजयवन्त हो ।
जन्म से भी चार हजार वर्ष पूर्व देवालय में पूजित हुए और
भगवान की वासव, वासुदेव और वरुण ने समुद्र मे पूजा की।
कान्तिनगरी के सेठ धनेश्वर ने पूजा की, और नागार्जुन ने भी
अर्चन किया वे स्तंभनपुर के श्री पार्श्वनाथ जिनेश्वर आपकी
रक्षा करे।
श्री स्तभनक कल्प समाप्त हुआ ग्र० १०० (पाठान्तर १११) हैं।