विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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से मेरु देखा है, यदि संघ को ले जाने की तुम्हारी गक्ति न हो तो
केवल हम दोनो तो वहाँ जाने से रहे।
देवी ने उदास होकर कहा—यदि ऐसा है तो मैं यही प्रतिमाओ
से शोभित मेरु पर्वत का आकार बना दूंगी। जहाँ आप संघ सहित
देववन्दन करें। साधुओ ने स्वीकार किया। देवी ने कंचन घटित,
रत्न मण्डित, अनेक सुर परिवृत, तोरण-ध्वज-मालालंकृत शिखर
व छत्रत्रय शाली स्तूप रात्रि में निर्माण किया। वह स्तूप मेखला-
त्रय मण्डित था, एक-एक मेखला में चारो दिशाओ मे पंच वर्ण
रत्नमय बिम्ब थे। उस स्तूप पर मूल प्रतिमा श्री सुपार्श्वनाथ
स्वामी की प्रतिष्ठापित थी।
प्रातः काल लोगो को मालूम हुआ तो उस स्तूप को देखकर
वे परस्पर कलह करने लगे। कोई कहता ये वासुकि लक्षण युक्त
स्वयम्भूदेव हैं, कोई उसे शेष शय्या स्थित नारायण एवं ब्रह्मा,
धरणेन्द्र, सूर्य चन्द्रादि बतलाया, बौद्ध कहते ये स्तूप नही पर
“बुद्धडउ” है। तब मध्यस्थ पुरुपो ने कहा—कलह मत करो, ये
जिस देव ने निर्मित किया है, वही सगय दूर करेंगे। अपने-अपने
देवो को पट पर चित्र-आलेखित कर अपनी गोष्ठी सहित रहे।
जिनका देव होगा उसी का एक पट रहेगा, दूसरे देवो के पट नष्ट
हो जायेंगे। संघ ने भी सुपार्श्वनाथ भगवान का पट लिखा।
सभी लोग अपने-अपने देवो के पट गोष्ठी सहित पूजा करके नवमी
की रात्रि मे सर्व दर्शनी लोग गाते हुए स्थित रहे। आधी रात के
समय तृण-धूलि और पत्थर युक्त उद्दण्ड तूफान चलने लगा जिससे
सभी पट टूट कर उड़ गए। प्रलय गर्जारव से लोग दगो-दिग
पलायन कर गए। एक सुपार्श्वनाथ भगवान का पट स्थित रहा।
लोक विस्मित हुए और “ये अरिहन्त देव हैं”—कहने लगे। उस
पट को सारे नगर में घुमाया, पट-यात्रा प्रवर्तित हुई।