विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमथुरापुरी-कल्प ३९
उसके बाद न्हवण प्रारम्भ हुआ। प्रथम न्हवण के लिए
श्रावक लोग कलह करने लगे। प्रतिष्ठित लोगो ने यह व्यवस्था
की—जिसके नाम का गोलक (चिट्ठी) कुमारी कन्या के हाथ में
प्रथम आवेगा वह चाहे दरिद्र हो धनाढ्य प्रथम न्हवण करावेगा।
दशमी की रात्रि मे यह व्यवस्था हुई। ग्यारस के दिन दूध, दही,
घृत, कुंकुम, चन्दनादि से हजार कलशो से श्रावकों ने न्हवण
कराया। देवताओ ने प्रच्छन्न स्थित रहकर न्हवण कराया,
आज भी वे उसी प्रकार यात्रार्थ आते हैं।
क्रमश सभी के द्वारा न्हवण कराने पर पुष्प, धूप, वस्त्र,
महाध्वज, आभरणादि चढ़ाए गए। साधुओ को वस्त्र, घृत,
गुडादि दिया। बारहवी रात्रि मे माला चढाई गयी। इस प्रकार
वे मुनिराज देववन्दन कर सकल सघ को आनन्दित कर पारणा
करके अन्यत्र चातुर्मास के लिए तीर्थ प्रकट कर क्रमशः कर्मों का
नाश कर सिद्धि प्राप्त हुए, वहाँ सिद्ध क्षेत्रतीर्थ हुआ।
मुनिराजो के वियोग से दुखित देवी ने नित्य देव-पूजा-रत अर्द्ध-
पल्योपम का आयु पूर्ण कर च्यवकर मनुष्यत्व पाया और उत्तम
पद प्राप्त किया। उसके स्थान पर जो-जो उत्पन्न होती है वह
'कुवेरा' नाम से प्रसिद्ध होती हैं। उसके द्वारा परिरक्षित स्तूप
चिरकाल—पार्श्वनाथ स्वामी के उत्पन्न होने तक खुला रहा।
इसके बीच मथुरा के राजा ने लोभ के वशीभूत होकर आदमी को
बुला कर कहा कि इस स्तूप का स्वर्ण और रत्न निकाल कर मेरे
भण्डार मे रखो। लोग लोहे के कुदालो से स्तूप पर आघात करने
लगे पर उनके घाव उस पर न लग कर स्वय घातको पर लगने
लगे। तब प्रतीतिहीन राजा ने स्वयं कुहाड़े की चोट दी, कुहाडा
ने उछलकर राजा के मस्तक को छिन्न कर डाला। तब कोपाय-
मान देवी ने प्रकट होकर लोगो के कहा—अरे पापियो ! यह
क्या काम प्रारंभ किया है, राजा की तरह तुम लोगो को भी मरना