विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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दैवात् म्लेच्छो द्वारा दोनो तीर्थो के भग्न कर देने पर भी
इसका उद्धार शक सवत् १२४३ (वि० स० १३७८) मे करवाया ।
प्रथम तीर्थ का उद्धार महण सिंह के पुत्र लल्ल ने और दूसरे का
चण्ड सिंह के पुत्र पीथड ने करवाया । चालुक्य कुल चन्द्रमा
कुमारपाल भूपाल ने इसके ऊँचे शिखर पर श्री वीर चैत्य का
निर्माण कराया ।
उन-उन औषधियो से पूर्ण और उन-उन कौतुहलो से भरे हुए
अनेक तीर्थो से पवित्रित इस अर्बुदगिरि के दर्शन धन्य जन ही
करते हैं ।
श्री जिन प्रभसूरि ने श्रोत्रसुधाकल्प यह श्रीमद् अर्बुद कल्प
बनाया है, चतुर जन इसका परिचय प्राप्त करे ।
श्री अर्बुद कल्प समाप्त हुआ । ग्रथा ग्र० ५२ अक्षर १२ हैं ।
९. मथुरापुरी-कल्प
जगत मे शरण्यभूत सातवे और तेईसवे जिनेश्वर को नमस्कार
करके भव्य जनो को मगल कारी मथुरा-कल्प कहूँगा ।
सुपार्श्वनाथ भगवान के तीर्थ मे वर्त्तमान धर्मरुचि और धर्म
घोष नामक दो मुनिवर्य सिंह के सदृश निस्सग थे ।
वे मुनिराज छट्ठ, अट्ठम, दशम, द्वादशम, पक्षोपवास और
मास, दो मास और चार मासक्षमण की तपश्चर्या करते हुए,
भव्यजीवो को प्रतिबोध करते हुए किसी समय मथुरा नगरी मे