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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 442 में से

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पृष्ठ 124

स्तूप को बिना खोले सुघटित पत्थर जड़ कर जीर्णोद्धार किया
गया। आज भी देवो द्वारा यह महास्तूप रक्षित है, देउल मे हजारो
प्रतिमाएँ है, आवासानिक प्रदेग मे मनोहर गन्धकुटी मे चिल्लणिका
अम्बा और अनेक क्षेत्रपालादि सयुक्त यह जिनभवन विराज-
मान है।
इस नगरी मे भावी तीर्थंकर श्री कृष्ण वासुदेव का जन्म
हुआ। यहाँ आर्य मगू तथा हुडिक यक्ष—जो चोर का जीव यक्ष
हुआ था—का देव कुल है।
यहाँ पाँच स्थल हैं, यथा—१ अर्क स्थल, २ वीर स्थल,
३. पद्म स्थल, ४ कुश स्थल, ५ महा स्थान। एव बारह वन इस
प्रकार हैं—१. लोहजघ वन, २ मधुवन, ३. विल्व वन, ४ ताल
वन, ५ कुमुदवन, ६ वृन्दावन, ७ भण्डीर वन, ८ खदिर वन,
९ कामिक वन, १० कोल वन, ११ बहुलावन, १२ महावन।
यहाँ पाँच लौकिक तीर्थ हैं, यथा—१ विश्रान्तिक तीर्थ,
२ असिकुण्ड तीर्थ, ३ वैकुण्ठ तीर्थ, ४ कालिंजर तीर्थ, ५ चक्र
तीर्थ।
शत्रुञ्जय मे ऋषभदेव, गिरनार पर नेमिनाथ, भरौंच मे
मुनि सुव्रत, मोढेरा मे महावीर और मथुरामे सुपार्श्व—पार्श्व को
दो घडी के भीतर वन्दन कर सोराष्ट्र के ढुठण मे विहार कर के
जो ग्वालियर मे आहार करते थे उन आमराय सेवित चरण-
कमल श्री वप्पभट्टि सूरि जी महाराज ने वि० स० ८२६ मे मथुरा
मे श्री महावीर भगवान का विम्ब स्थापित किया।
यहाँ श्री वीर वर्द्धमान स्वामी के जीव विश्वभूति ने अप-
रिमित वल प्राप्ति का नियाणा किया था। यहाँ यमुना वंकयमुन
राजा के द्वारा निहित दण्ड अणगार के केवल ज्ञान उत्पन्न होने
पर महिमा करने के लिए इन्द्र आया था।