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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 442 में से

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पृष्ठ 116

अर्बुदगिरि-कल्प ३३

पुण्ड से आकृष्ट होकर एक मृगी उस बालक को दोनो समय
स्तन पान करा देती। अन्यदा महालक्ष्मी ने टङ्कशाला मे मृगी
के चारो पैरो वाली नयी मुद्रा-नाणा की वृद्धि कर दी। यह सुन
कर जिगु रुप मे उत्पन्न होने की वार्त्ता फैल गई। कोई नया
राजा हुआ, सुन कर राजा ने सुभटो को भेजा, उन्होने उसका
वध करने के लिए आकर नगर के गोपुर मे उसे देखा और बाल-
हत्या से बचने के लिए गायो के झुण्ड के आने के मार्ग मे रख
दिया। उसके उसी प्रकार रहते भाग्यवश एक उक्षा—धान बटोर
ने वाली स्त्री के रूप मे शक्ति विशेष—आगे हो गई, उससे प्रेरित
हो पशुओ के बीच से उस शिशु को उठा कर रख लिया। यह
सुन कर मंत्री के समझाने से राजा ने उसे लेकर अपना औरस
पुत्र मान लिया।
क्रमशः वह श्रीपुञ्ज नामक राजा हुआ और उसकी पुत्री
श्रीमाता रूप सम्पन्न वानर जैसे मुख वाली हुई। वह जाति-
स्मृति प्राप्त वैराग्यवान्-निर्विषयी हुई। उसने अपने पिता से अपना
पूर्व भव निवेदन किया कि मै पहले वानरी थी और अर्बुदगिरि
की वृक्ष शाखा पर किसी ने मेरा शिरोच्छेद कर दिया। मेरा
रुण्ड वृक्ष के नीचे कुण्ड मे जा गिरा। उस अमित तीर्थ के प्रभाव
से मै नर देह धारिणी हुई। मेरा मस्तक आज जी उसी तरह है
अत मैं वानरमुखी हुई हूँ। श्रीपुञ्ज ने उसे अपने पुरुषो के साथ
भेज कर कुण्ड मे उसका मुख डुबाया, जिससे वह नरमुखी हो
गई और आबू पर तपश्चर्या करने लगी।
एक वार आकाशगामी योगी उसे देख कर रूपमुग्ध हो
गया। उसने आकाश से उतर कर प्रेमालाप पूर्वक कहा—शुभे!
तुम मुझे किस प्रकार वरण करोगी? उसने कहा—रात्रि का
प्रथम प्रहर जब तक कुर्कुट बोले उससे पहिले किसी विद्या से यदि
इस पर्वत-ह्रद पर मनोहर बारह सीढियाँ बना दो तो मैं तुम्हे
वरण करुँगी!

३