विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
वाराणसी, अयोध्या, मथुरा, हस्तिनापुर एवं दिल्ली कल्प
९८ विविध तीर्थ-कल्प
स्तम्भित कर दिया। प्रात काल विस्मित राजा ने क्षमा-याचना
करवा के उसे छुडा दिया। वह लज्जित हो कर हस्तिनापुर चला
गया। वहाँ पद्मोत्तर राजा राज्य करते थे, ज्वाला देवी उनकी
पटरानी थी। उनके दो पुत्र विष्णुकुमार और महापद्म थे। ज्येष्ठ
पुत्र की अनिच्छा होने से पिता ने महापद्म को युवराज पद दिया।
नमुचि उसका मन्त्री बना। मन्त्री ने युद्ध में सिहरथ राजा को
जीत लिया। महापद्म सन्तुष्ट हुए, वर देने लगे तो उसे अस्वीकृत
कर दिया। एक बार ज्वालादेवी ने अर्हन्त भगवान की रथयात्रा
करवायी। उसकी सपत्नी लक्ष्मीदेवी ने जो मिथ्यादृष्टि थी,
ब्रह्मरथ यात्रा करवायी। प्रथम रथ निकालने के विषय मे दोनो
हो राणियो के विवाद हो गया। राजा ने दोनो ही रथो को वापस
लौटा दिया। माता का अपमान देख कर महापद्म देशान्तर चला
गया। क्रमश मदनावली के साथ विवाह कर भारत के छ खण्ड
साधकर गजपुर आया। पिता ने राज्य दे दिया और पद्मोत्तर
राजा ने विष्णुकुमार के साथ सुव्रताचार्य के पास दीक्षा ले ली।
पद्मोत्तर मुक्त हो गए, विष्णुकुमार को छ हजार वर्ष तप करते
हुए अनेक लब्धियाँ उत्पन्न हुई। महापद्म चक्रवर्त्ती ने पृथ्वी को
जिन-भवनो से मण्डित कर रथयात्राएं कराके माता का मनोरथ
पूर्ण किया।
चक्री प्रदत्त वर को अस्वीकृत करने वाले नमुचि ने यज्ञ करने
के लिए राज्य मांगा। उस सत्यप्रदत्त राजा ने उसे राज्य दे दिया
और स्वय अन्त पुर मे रहने लगे। उस समय विचरण करते हुए
मुव्रताचार्य हस्तिनापुर मे वर्षावास स्थित थे। सभी पाखण्डी लोग
अभिनव राजा को देखने आये किन्तु सुव्रताचार्य नही पधारे। तब
क्रुद्ध हो नमुचि ने कहा—"मेरी भूमि पर तुम्हे सात दिन से
अधिक नही रहना चाहिये, अन्यथा मै मार दूंगा, क्योकि तुम मुझे
देखने नही आये।"
पावापुरी-दीपावली-वृहतकल्प ९१
आचार्य महाराज ने संघ की सम्मति लेकर एक आकाश-
गामी विद्यासंपन्न मुनि को आदेश दिया कि—मेरु चूला पर रहे
हुए विष्णुकुमार मुनि को बुला लाओ। उसने विज्ञप्ति की—
भगवन् ! मेरी जाने की शक्ति है किन्तु वापस लौटने की नही।
गुरु महाराज ने कहा—“वेही तुम्हे ले आवेगे ! तब वह मुनि
मेरु चूला पर गए। महर्षि को वन्दन कर सारा स्वरूप निवेदन
किया। वे तत्क्षण उस साधु को लेकर आकाश मे उडे। गजपुर
आकर राजकुल मे पहुँचे। नमुचि को छोड़ कर सभी ने उन्हे
वन्दना की। नमुचि ने पहचान लिया और बोला—“साधुओ को
ठहरने नही दूंगा !”
विष्णुकुमार ने तीन पग प्रमाण भूमि माँगी, उसने दे दी और
बोला—तीन पग से बाहर देखूगा तो मार दूंगा । तब विष्णु ऋषि
एक लाख योजन शरीर वाले बन गए। वे किरीट-कुण्डल-गदा-
चक्र और धनुष धारी थे, उनके पाँव-प्रहार से पृथ्वी काँपने लगी।
समुद्र क्षुब्ध हो गए। फुंकार से विद्याधर भग गए। नदियाँ उत्पथ
प्रवृत्त हो गई। तारे घूमने लगे, कुलगिरि डोलने लगे। मुनि
पूर्वापर समुद्र पर दोनो पाँव रख कर तीसरा पाँव नमुचि के शिर
पर देने को खड़े थे, तब इन्द्र ने अवधिज्ञान से जान कर सुराङ्ग-
नाओ को भेजा। वे कानो के पास रही हुई मधुर स्वर से शान्ति-
गर्भित उपदेश-गीत गाने लगी। और चक्रवर्त्ती आदि भी यह
व्यतिकर ज्ञात कर उन्हे प्रसन्न करने के लिए पाँवो मे गिर पड़े।
तब महर्षि प्रकृतिस्थ हो शान्त हो गए। चक्रवर्त्ती और संघ ने
क्षमा मागी। चक्रवर्त्ती ने दयापूर्वक नमुचि को विष्णुकुमार से
छुडवाया।
उस समय वर्षाकाल के चौथे मास का पक्ष-सन्धि दिन था, उस
उत्पात के शान्त होने पर लोक अपना पुनर्जन्म मानते हुए परस्पर
‘जुहार’ करने लगे। विशिष्टतर मण्डन, भोजन-छादन-ताम्बूल-
१०० विविध तीर्थ-कल्प
दि परिभोग मे प्रवृत्त हुए तब से इस दिन प्रति वर्ष वे ही व्यव-
हार प्रवर्त्तते हैं। विष्णुकुमार तथा महापद्म चक्रवर्त्ती समय पर
केवली होकर सिद्ध हुए।
इस प्रकार दश पूर्वधर आर्य सुहस्तिसूरि के मुख से सुन कर
महाराजा सम्प्रति पर्व-दिवसो मे विशेष प्रकार से जिन-पूजारत
रहता था।
पूर्व काल मे मध्यमा पापा का नाम अपापापुरी था। शक्रेन्द्र
ने 'पावापुरी' यह नाम किया, क्योकि यहाँ महावीर स्वामी का
निर्वाण हुआ।
इसी पावापुरी मे वैशाख सुदि ११ के दिन जृम्भिक गाँव से
बारह योजन आकर पूर्वाह्न समय महासेन वन मे भगवान ने
ने पण्डितगणो से परिवृत और प्रमुदित गौतमादि गणधरो को
दीक्षा दी। उन्हे गणानुज्ञा दी। उन्होने तीन निषद्या मे उत्पाद,
विगम, ध्रौव्य लक्षण त्रिपदी स्वामी से पाकर तत्क्षण द्वादशाङ्गी
रचना की। इसी नगरी मे भगवान के कानो से सिद्धार्थ वणिक के
उपक्रम से खरक वैद्य ने काष्ठ-शलाका निकाली। उसके निकालने
पर अत्यन्त वेदनावश भगवान ने चीत्कार किया, उससे प्रत्यासन्न
पर्वत मे दरार पड गई। आज भी वहाँ बीच मे सन्धि-मार्ग
दिखायो पडता है। तथा इसी पुरी मे कार्त्तिक अमावस्या की रात्रि
मे भगवान के निर्वाण के स्थान पर मिथ्यादृष्टि लोग श्री वीर-
स्तूप स्थान पर स्थापित नागमण्डप मे आज भी चातुर्वर्णिक लोग
यात्रा महोत्सव करते हैं। उसी एक रात्रि मे देवानुभाव से कुएँ से
लाये हुए जल से पूर्ण सराव मे तेल बिना दीपक प्रज्वलित
होता है।
इन पूर्वोक्त अर्थो की भगवान ने इसी नगर मे व्याख्या की थी।
यही भगवान सिद्धि सम्प्राप्त हुए थे, इत्यादि अत्यद्भुत भूत सविधान
स्थान पावापुरी महातीर्थ है।
कन्नानयनीय महावीर प्रतिमा-कल्प १०१
दीपोत्सव की उत्पत्ति कथन से रमणीय यह पावापुरीकल्प श्री
देवगिरि नगर मे स्थित श्रीजिनप्रभसूरि ने बनाया । विक्रम संवत्
१३८७ के भाद्रपद कृष्ण पुष्यार्क युक्त द्वादशी को यह स्वस्तिकार
कल्याणकारी कल्प समर्थित हुआ ।
यह अपापा या दीपोत्सव कल्प समाप्त हुआ ।
इसकी ग्रंथ-श्लोकसंख्या ४१६ और अक्षर ७ ऊपर है।
२२. कन्नानयनीय महावीर प्रतिमा-कल्प
मेरु पर्वत के सदृश धीर, अमित गुण समूह वाले श्री महावीर
जिनेश्वर को नमस्कार करके कण्णानय नगर स्थित उनकी प्रतिमा
का कल्प कुछ कहूँगा ।
चोल देशावतंस कन्नाणय नगर मे विक्रमपुर वास्तव्य, प्रभु
श्री जिनपति सूरिजी के चाचा साहु मानदेव द्वारा कारापित और
स० १२३३ आषाढ शुक्ल १० गुरुवार के दिन हमारे पूर्वाचार्य
श्री जिनपति सूरिजी द्वारा प्रतिष्ठित, मम्माण शैल समुद्गत,
ज्योतिर्मय, सुघटित, तेईस पर्वाङ्गुल प्रमाण श्री महावीर-प्रतिमा
थी जो नख सूक्ति लगने पर भी घण्ट की भाँति टकार-शब्द करती
थी । वह स्वप्नादेश से अनकवाला नामक पृथ्वी धातु विशेष
सस्पर्श सन्निहित प्रातिहार्ययुक्त श्रावकसंघ से चिर पूजित थी ।
यावत् विक्रमादित्य स० १२४८ मे चौहान-कुलप्रदीप श्री पृथ्वीराज
नरेन्द्र का सुलतान सहावुद्दीन द्वारा निधन होने पर राज्यप्रधान
परमश्रावक सेठ रामदेव ने श्रावकसंघ को लेख भेजा कि—तुर्कों
का राज्य हो गया, अत श्री महावीर स्वामी की प्रतिमा को
प्रच्छन्न रखा देना । तब श्रावको ने दाहिन कुल मडन मण्डलीक
कयवास (कैमास) नामाङ्कित “कयवास स्थल” मे विपुल वालु के
टीवो मे रख दी, जो वहाँ रही ।
विक्रम स० १३११ मे अत्यन्त दारुण दुर्भिक्ष मे निर्वाह न होने
होने से आजीविका के लिए 'जोजओ' नामक सुथार कन्नाणय से
सुभिक्ष देश के प्रति सपरिवार चला । प्रथम प्रयाण थोडा करना,
ऐसा सोचकर उसने कयंवास स्थल मे रात्रिवास किया । आधीरात
के समय देवता ने उसे स्वप्न दिया कि—तुम् जहाँ सोये हुए हो
उसके इतने हाथ नीचे भगवान महावीर की प्रतिमा है, तुम देशा-
तर मत जाओ, तुम्हारा यही निर्वाह हो जायगा । उसने सभ्रम
पूर्वक जग कर अपने पुत्रादि से उस स्थान को खुदवाया और
महावीर स्वामी की प्रतिमा देखी तो प्रसन्नतापूर्वक नगर मे जाकर
श्रावकसघ को निवेदन किया । श्रावको ने महोत्सवपूर्वक पर-
मात्मा महावीर को चैत्यगृह मे प्रवेश कराके स्थापित किया ।
त्रिकाल पूजा होने लगी । अनेक वार तुर्कों के उपद्रव से मुक्त
रहे । उस सुधार के लिए श्रावको ने वृत्ति-निर्वाह कर दिया ।
प्रतिमा का परिकर खोजने पर भी प्राप्त नही हुआ, वह कही स्थल-
धोरो के बीच रहा हुआ है । उस पर प्रशस्ति-सवत्सरादि भी लिखे
हुए होने की संभावना है ।
एक दिन न्हवण कराने के पश्चात् भगवान के शरीर पर
पसीना छूटते देखा । बार-बार पोछने पर भी जव न रुका तो
विदग्ध श्रावको ने जाना कि—यहाँ कोई अवश्य उपद्रव होगा ।
दूसरे दिन प्रभात मे जट्ठुभ राजपूतो की धाड आई, सारा नगर
विध्वस्त हुआ । इस प्रकार प्रकट-प्रभावी स्वामी यावत् सवत्
कन्यानयनीय महावीर प्रतिमा-कल्प १०३
१३८५ पर्यन्त वहाँ पूजे गए। उस वर्ष (स० १३८५ मे) अल्लविय
वंशोत्पन्न आसी नगर (हासी) के सिकन्दर ने घोर परिणाम पूर्वक
श्रावक और साधुओ को बदी बनाकर विडंवित किया। भगवान
पार्श्वनाथ की पाषाण-प्रतिमा का भग हुआ। भगवान महावीर
स्वामी की प्रतिमा को वह अखण्ड रूप से गाड़ी पर चढ़ा
कर दिल्ली लाया और तुगलकाबाद स्थित सुलतान के भण्डार मे
यह सोच कर रखा कि सुलतान के आने पर जैसी आज्ञा देगे, वैसा
किया जायगा। कालक्रम से जब सुलतान मुहम्मद देवगिरिनगर
(दौलताबाद) से दिल्ली-योगिनीपुर आया तब पन्द्रह मास पर्यन्त
भगवान तुर्को के यहाँ बदी रहे।
अन्यदा बाह्य जनपद विहार मे विचरते हुए खरतर गच्छा-
लङ्कार श्रीजिनसिंहसूरिजी के पट्ट प्रतिष्ठित श्री जिनप्रभसूरिजी
दिल्ली के शाखानगर मे पधारे। क्रमशः शाही राजसभा मे पडित-
गोष्ठी प्रस्तुत होने पर राजाधिराज के द्वारा—कौन विशिष्ट पण्डित
है ? ऐसा पूछने पर ज्योतिषी धाराधर ने उन (श्रीजिनप्रभसूरि)
की गुण-स्तुति आरम्भ की। महाराजा (सुलतान) ने उसे ही भेज
कर बहुमानपूर्वक मिति पोष शुक्ल २ के सन्ध्या समय सूरि-
महाराज को बुलाया। महाराजाधिराज से भेट हुई। अत्यन्त
निकट बैठाकर कुशल वार्त्तादि पृच्छा की और अभिनव काव्य
द्वारा सुलतान ने सूरिजी से आशीर्वाद प्राप्त किया। आधी रात
पर्यन्त एकान्त गोष्ठी कर रात्रि मे वही पर सुलाये। प्रात काल
फिर सूरि महाराज को बुलाया। महानरेन्द्र सुलतान ने सन्तुष्ट
होकर एक हजार गायो का मूल्य, प्रधान उद्यान, सौ वस्त्र, सौ
कम्बल और अगुरु चन्दन, कर्पूरादिगन्ध द्रव्य देने लगा। गुरु महा-
राज ने—साधुओ को ये नही कल्पता—ऐसा समझाकर महाराजा
को सर्व वस्तु का प्रतिषेध किया। फिर महाराजाधिराज के अप्र-
१०४ विविध तीर्थ-कल्प
त्तीति न हो, इसलिए कुछ कम्बल-वस्त्र-अगुरु आदि राजाभियोग
से स्वीकार किये। वहाँ नाना देगो से आये हुए पण्डितो के साथ
वाद-गोष्ठी करा के दो हाथी मँगवाये। एक पर गुरु महाराज को
और दूसरे पर श्रीजिनदेवसूरि को वंठाकर आठ गाही मदनभेरी
बजाते, गखध्वनि, मद्दल, कमाल, ढोल आदि वादित्र-गब्दो के
साथ भट्टविरुदावली पढते हुए, चारो वर्ण एव चतुर्विध सघ सहित
सूरि-महाराज को पौषधगाला भेजा। श्रावको ने प्रवेगमहोत्सव
किया, महादान दिया।
वादगाह ने समस्त श्वेताम्बर सघ को उपद्रव से रक्षण करने
की क्षमता वाला फरमान पत्र समर्पित किया और गुरु महाराज
के प्रतिच्छद मे उसे चारो दिशाओ मे प्रेषित किया। गासनोन्नति
हुई। अन्यदा सूरिमहाराज ने श्री शत्रुञ्जय-गिरनार-फलवर्द्धि आदि
तीर्थो की रक्षा के हेतु फरमाना मागा। बादगाह ने तत्काल सार्व-
भौम फरमान दिया और उन्हे सर्व तीर्थो मे भेजा गया। राजा-
धिराज ने प्रसन्नतापूर्वक गुरु महाराज के वचनो से अनेक वन्दियो
को मुक्त किया। फिर सोमवार के दिन वर्पान्त के समय जाकर
सुलतान से भेंट की। कीचड से भरे हुए गुरु-महाराज के पाँवो को
महाराजाधिराज ने मल्लिक काफूर के पास उत्तम वस्त्र खण्ड से
पोंछाये। गुरु महाराज के आगीर्वाद देने और वर्णन काव्य की
व्याख्या करने पर महानरेन्द्र सुलतान के चित्त में अत्यन्त चमत्कार
उत्पन्न हुआ। अवसर ज्ञात कर समस्त स्वरूप कथन पूर्वक भग-
वान महावीर स्वामी की प्रतिमा माँगी। एक छत्र पृथिवीपति ने
मुकमार गोष्ठी करके वह प्रतिमा उन्हे प्रदान की। तुगलकाबाद
शाही कोप गे मंगाकर असुअग मल्लिको के कन्धे दिलाकर सकल
सभा के समक्ष अपने सामने मँगाकर दर्गन करके गुरु महाराज को
समर्पित की। फिर महोत्सव-प्रभावना पूर्वक सुखासन मे विराज-
मान कर समस्त सघ ने मलिक ताजदीन सराय के चैत्य मे प्रवेग
कन्नानयनीय महावीर प्रतिमा-कल्प १०५
कराके स्थापित किया। गुरु महाराज ने वासक्षेप किया, प्रमु
महापूजाओ से पूजे जाते है।
फिर सुलतान-महाराजाधिराज के आदेग से श्रीजिनदेवसूरि
को अपने स्थान पर दिल्ली-मण्डल मे स्थापित कर गुरु महाराज
क्रमश महाराष्ट्र मण्डल पधारे। राजाधिराज ने श्रावकसघ सहित
उन्हे वृषभ, ऊँट, घोडे, हथिनी, मुखासनादि सामग्री दी। मार्ग के
नगरो में प्रभावना करते हुए पद पद पर सघ के द्वारा सम्मान
पाते हुए, अपूर्व तीर्थादि की वन्दना करते हुए, क्रमश सूरिजी
देवगिरि नगर पहुँचे । सघ ने प्रवेशमहोत्सव किया, सघपूजा
हुई।
सघपति जगसीह, साहण, मल्लदेव प्रमुख सघ के साथ प्रतिष्ठान-
पुर मे जीवत स्वामी श्री मुनिसुव्रत-प्रतिमा की यात्रा की।
पीछे विजय करके दिल्ली जाने पर महाराजा से श्री जिनदेव-
सूरि मिले. बहुमान दिया और एक सराय दी जिसका नाम सुलतान
सराय स्थापित किया। वहाँ चार सौ श्रावको के कुल को निवास
करने के लिए आदेश दिया। कलिकाल चक्रवर्त्ती-सुलतान ने वहाँ
पौषधशाला व चैत्य वनवाया। उन्ही भगवान महावीर स्वामी
(प्रतिमा) को वहाँ स्थापित किया। वहाँ श्वेताम्बर भक्त, दिगम्बर
भक्त श्रावक और परतीर्थिक लोग भी त्रिकाल पूजा करते हैं।
श्री महम्मदगाह द्वारा की हुई शासनोन्नति देखकर इस पञ्चम-
काल को भी लोग चतुर्थ काल की कल्पना करते हैं। क्लेश नष्ट
करने वाले श्री वीर जिनेश्वर की उपद्रव नाराक जनमननयना-
नन्दन प्रतिमा जहाँ तक चन्द्र-सूर्य हैं, जयवन्त हो।
कन्नाणयपुर के श्री महावीरप्रतिमा का यह कल्प आचार्य
श्री जिनसिंहसूरि के शिष्य मुनीश्वर ने लिखा है।
१०६ विविध तीर्थ-कल्प
श्री कन्यायननीय महावीर प्रतिमा का यह कल्प संपूर्ण हुआ ।
इस की ग्रन्थ संख्या ७७ और १५ अक्षर हैं ।
■
२३. प्रतिष्ठान पत्तन-कल्प
महाराष्ट्र रूपी लक्ष्मी के रत्नापीड, रम्य हवेलियो और नेत्रो
को गीतल करने वाले चैत्यो से युक्त गोदावरी से पवित्रित श्री-
प्रतिष्ठान नामक पत्तन जयवत रहे ।
यहाँ अड़सठ लौकिक तीर्थ और वावन वीर हैं। वीर
क्षेत्र होने के कारण यहाँ सूर्य के समान प्रौढप्रणाली राजामो का
भी प्रवेश नही होता ।
रात्रि बीतने पर उषाकाल मे यहाँ से साठ योजन चल कर
अश्व को प्रतिवोध करने के लिए श्री मुनिसुव्रत जिनेश्वर भरोच
पधारे थे ।
भगवान महावीर के निर्वाण से ९९३ वर्ष बीतने पर यहाँ
श्री कालिकाचार्य ने सावत्सरिक पर्व भाद्रपद शुक्ल ४ को किया ।
यहाँ के आयतनो की पंक्ति को देखकर विचक्षण पुरुष देव-
विमान मे अग्रणी श्री विलोकविमान को देखने का कौतुहल त्याग
देते हैं ।
यहाँ शातवाहन आदि विचित्र चरित्र वाले नरेश्वर हुए हैं एवं
यहाँ के अनेको सदन बहुत प्रकार के देवताओ से अधिष्ठित हैं।
प्रतिष्ठान पत्तन-कल्प १०७
यहाँ राजा के अनुरोध से कपिल, आत्रेय, बृहस्पति और
पाचाल ने अपने बनाये हुए चार लाख श्लोक परिमित ग्रन्थो को
एक श्लोक मे प्रस्तुत किया था। वह श्लोक यह है—
“जीर्णे भोजनमात्रेय कपिल प्राणिना दया।
वृहस्पतिरविश्वास पञ्चाल स्त्रीषु मार्दवम् ॥”
जीर्ण होने पर भोजन करना आत्रेय का, कपिल का प्राणियो
पर दया करना, विश्वास न करना बृहस्पति का एवं स्त्रियो से
कोमल व्यवहार करना पाचाल का सिद्धान्त है।
यहाँ दृष्टि से अमृत वर्षाने वाली सम्यग्दृष्टि मयूरो के लिए
पयोद घटा के सदृश श्री मुनिसुव्रत स्वामी की लेप्यमयी जीवित
स्वामी प्रतिमा जयवन्त है। उसको उस समय ग्यारह लाख अठावन
हजार आठ सौ छप्पन वर्ष हो गये।
यहाँ मुनिसुव्रत-जिनालयँ की यात्रार्थ आकर विविध पूजा
करते भव्य जन ऐहिक और पारलौकिक सुख सपत्ति प्राप्त करते हैं।
इस प्रासाद मे अन्य जिनेश्वरो के साक्षात् कान्ति वाले लेप्यमय
विम्व सुशोभित हैं जो मनुष्यो की प्रीति मे वृद्धि करते हैं।
अम्बादेवी, क्षेत्रपाल, यक्षाधिपति कर्पर्दि इस चैत्य मे वसते
हुए श्रीसंघ के उपसर्गों को नष्ट करते है।
यहाँ देवताओ के समूह से हर्षपूर्वक वद्यमान प्राणि-समूह का
उपकार करने के व्रतवाले चैत्य लक्ष्मी के भूषण श्री मुनिसुव्रत
भगवान आपका सदा कल्याण करने वाले हो।
सत्पुरुषो की सम्पत्ति के लिए श्री जिनप्रभसूरि ने श्री प्रतिष्ठान
तीर्थ का यह कल्प बनाया।
श्री प्रतिष्ठान पत्तन कल्प के ग्रन्थाग्र १९ और अक्षर १५
परिमित है।
१०८ विविध तीर्थ-कल्प
२४. नन्दीश्वरद्वीप-कल्प
इन्द्रादि द्वारा पूजित चरणो वाले श्री जिनेश्वरों की आराधना
करके विश्वपावन श्री नन्दीश्वर द्वीप का कल्प कहता हूँ (१) ।
नन्दीश्वर स्वर्ग के समान आठवाँ द्वीप है जो नन्दीश्वर नामक
समुद्र से घिरा हुआ है (२) । यह गोलाई विष्कंभ से तेसठ कोटा-
कोटि और चौरासी लाख योजन है (३) । ये विविध विन्यास युक्त
उद्यानो वाली देव-भोगभूमि है और जिनेश्वर भगवान की पूजा
के हेतु देवो के आवागमन से सुन्दर है (४) । इसके मध्यप्रदेश मे
क्रमश पूर्वादि दिशाओ मे अंजन वर्ण वाले चार अंजन गिरि हैं
(५) । वे दश हजार योजन विस्तार भूमि और हजार योजन ऊँचे
छोटे मेरुओ सहित है (६)। वहाँ पूर्व मे देवरमण, दक्षिण में नित्यो-
द्योत, पश्चिम मे स्वयंप्रभ और उत्तर मे रमणीय (नामक) हैं
(७) । उन पर नौ योजन लम्बे और उससे आधे चौडे व वहत्तर
योजन ऊँचे अर्हत् चैत्य हैं (८) । चारो के पृथक् पृथक् द्वार सोलह
योजन ऊँचे हैं उनका प्रवेश आठ योजन है (९) । वे देव, असुर,
नाग आदि देवताओ के आश्रय से उन्ही के नामो से प्रसिद्ध हैं
(१०) । उनमे सोलह योजन लंबी उतनी ही चौडी और आठ योजन
ऊँची मणिपीठिकाएँ हैं (११) । पीठिकाओं पर सर्वरत्नमय देव-
छंदक हैं जो पीठिकाओ अधिक लंबे और ऊँचे हैं (१२) । उनमे
ऋषभ, वर्द्धमान, चन्द्रानन और वारिषेण नामक पद्मासन संस्थित
स्व स्वपरिवार युक्त प्रत्येक की १०८ रत्नमय शाश्वत अर्हन्त
प्रतिमाएँ हैं (१३-१४) । दो-दो नागयक्ष भूतो की कुण्डलधारिणी
प्रतिमाएँ पथक् पृथक् हैं, प्रतिमाओं के पीछे एक एक छत्रधारिणी
प्रतिमाएँ हैं (१५) । उनमे धूप घटी पुष्पमाला, घण्टा, अष्टमङ्गल,
ध्वजा, छत्र, तोरण, चंगेरी, पटल आसन है (१६) । पूर्ण कलशादि
सोलह अलङ्करण हैं, वहाँ की भूमियाँ सोने चाँदी की वालुकामय
हैं (१७) । आयतन के प्रमाण से रुचिर मुख्य मण्डप, प्रक्षामण्डप,
अक्षवाटक और मणि पीठिकाएँ हैं (१८) । रम्य स्तूप प्रतिमाएँ और
सुन्दर चैत्य वृक्ष हैं, इन्द्रध्वज और दिव्य पुष्करिणियाँ यथा क्रम
हैं (१९) । चतुर्द्वार स्तूपो मे सब मे सोलह सोलह प्रतिमाएँ है, इस
प्रकार वे एक सौ आठ युक्त चौबीस सौ हो जाती हैं (२०) । प्रत्येक
अञ्जनगिरि के चारो दिशाओ मे लक्ष योजन जाने पर बिना मत्स्य
वाले स्वच्छ जल युक्त हजार योजन ऊँची, लाख योजन विस्तीर्ण
सोलह पुष्करिणी है जिनके नाम क्रमश इस प्रकार है (२१-२२) ।
१ नन्दिषेणा, २ अमोघा, ३ गोस्तूपा, ४ सुदर्शना, ५ नन्दोत्तरा,
६ नन्दा, ७ सुनन्दा, ८ नन्दिवर्द्धना, ९ भद्रा, १० विशाला,
११ कुमुदा, १२ पुण्डरीकिणी, १३ विजया, १४ वैजयन्ती,
१५ जयन्ती, १६ अपराजिता । (२३-२४)
इनकी प्रत्येक की लम्बाई और चौडाई पाँच सौ-पाँच योजन
है (२५) । लाख-लाख योजन लम्बे महा उद्यान हैं जिनके अगोक,
सप्तपर्ण, चम्पक, आम्र आदि नाम हैं । (२६)
पुष्करिणीयो के मध्य मे स्फटिक के पल्यमूर्त्ति वाले ललाम
वेदी उद्यानादि चित्र युक्त दधिमुख पर्वत हैं (२७) । वे चौसठ
हजार योजन ऊँचे और एक हजार योजन ऊपर की अवगाहना
वाले और नीचे से दश हजार योजन विस्तृत हैं (२८) । पुष्करिणियो
मे दो-दो रतिकर पवंत है, वे सब मिलाकर सोलह पुष्करिणियो के
वत्तीस रतिकर पर्वत हो जाते हैं (२९) । उन दधिमुख और रतिकर
पर्वतो पर अञ्जनगिरि के समान ही शाश्वत अर्हत् चैत्य हैं (३०) ।
द्वीप की चारो विदिशाओ मे तथा रतिकर पर्वत जो दश हजार
योजन विस्तारवाले और एक हजार योजन ऊँचे हैं । वे सब
रत्नमय, दिव्य और झल्लरी के आकार वाले हैं (३१-३२) । दक्षिण
के दो रतिकर पर्वतो पर शक्र और ईशानेन्द्र के एवं उत्तर दिशाओ
मे पृथक्-पृथक् भुवन आठ दिशाओ मे आठ महादेवियों की राज-
धानियाँ है। वे लाख योजन लम्बी-चौडी और जिनायतनोसे भूपित
हैं। (३३-३४)
उनके नाम क्रमश १ सुजाता, २ सौमनसा, ३ अर्चिमाली,
४ प्रभाकरा, ५ पद्मा, ६ शिवा, ७ शुचि, ८ अजना, ९ चूता,
१० चूतावतंशिका, ११ गोस्तूपा, १२ मुदर्शना, १३ अमला,
१४ अप्सरा, १५ रोहिणी, १६ रत्ना, १७ रत्नोच्चया, १८ सर्व-
रत्नसञ्चया, १९ वसु, २० वसुमित्रिका, २१ वसुभागा, २२ वसु-
न्धरा, २३ नन्दोत्तरा, २४ नन्दोतर कुरु, २५ देवकुरु, २६ कृष्णा,
२७ कृष्णरात्रि, २८ रामा रामरक्षिता (३५-३६-३७-३८) हैं।
सर्व ऋद्धिवाले सपरिच्छद देवगण श्री तीर्थंकर-अर्हन्तो की
पुण्यतिथियो मे उन चैत्यो मे अष्टाह्निका महोत्सव करते हैं (३९)।
पूर्व के अञ्जनगिरि पर चार द्वार वाले जिनालय मे शास्वती
प्रतिमाओ का श
[Page Header]
काम्पिल्यपुर तीर्थ-कल्प १११
लक्ष्मी प्राप्त करते हैं (४६)। भक्ति से चैत्यो की वंदना करने वाले,
उसका स्तुति-स्तोत्र पाठ करने वाले, नन्दीश्वर सम्बन्धी अनुपर्व
का जो आराधन करते हैं वे शीघ्र संसार से तर जाते हैं (४७)।
प्राय. पूर्वाचार्यों के बनाये हुए इस नन्दीश्वर द्वीप कल्प को
श्री जिनप्रभाचार्य ने श्लोकबद्ध किया है (४८)।
श्री नन्दीश्वर द्वीप का कल्प समाप्त हुआ। इसके ग्रन्था ग्र०
श्लो० ४९ अक्षर १० परिमित है।
२५. काम्पिल्यपुर तीर्थ-कल्प
गंगामूल स्थित श्री विमलनाथ भगवान के जिनालय की मनो-
हर श्री वाले, काम्पिल्यपुर का कल्प मै सक्षेप से कहता हूँ।
इसी जम्बूद्वीप के दक्षिण भारत खण्ड मे पूर्व दिशा मे पाचाल
नामक जनपद है। वहाँ गंगा नामक महानदी की तरंगो से प्रक्षा-
लित प्राकार भित्ति वाला कंपिलपुर नामक नगर है। वहा तेरहवें
तीर्थंकर श्री विमलनाथ इक्ष्वाकु कुलदीपक महाराजा कृतवर्म के
नन्दन और सोमादेवी की कुक्षी रूपी सीप में मुक्ताफल के सदृश
उत्पन्न हुए। उनका लछन वाराह था और असली कंचनवर्णी देह
थी। उन्ही भगवान का यहाँ च्यवन-जन्म-राज्याभिषेक-दीक्षा और
केवलज्ञान लक्षणो से पाँच कल्याणक हुए हैं। इसीलिए उस प्रदेश
मे नगर का नाम पंचकल्याणक रूढ हो गया। वहाँ उन्ही भगवान
का शूकर लांछन होने के कारण देवो ने महिमा की और वह स्थान
शूकर क्षेत्र नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुआ।
इसी नगर मे हरिषेण नामक दशवाँ चक्रवर्त्ती हुआ तथा वार-
हवाँ सार्वभौम ब्रह्मदत्त चक्रवर्त्ती भी यही उत्पन्न हुआ।
श्री वीर प्रभु के निर्वाण से दो सौ बीस वर्ष बीतने पर
मिथिला नगरी के लक्ष्मीगृह चैत्य मे आचार्य महागिरि के कौडिन्य
नामक शिष्य के शिष्य अश्वमित्र ने अणुप्रवाद पूर्व के नेउण्णिय वस्तु
के छिन्न छेदनक वक्तव्यता के आलापक पढते हुए शंकाशील होकर
चतुर्थ निह्नव हुआ। वह समुच्छेदक दृष्टि प्ररूपणा करता हुआ
कपिलपुर आया। यहाँ खड नामक श्रमणोपासक रहता था और
वह गुल्कपाल था उसके भय से ....
यहाँ सजय नामक राजा था, वह शिकार के लिए केसर उद्यान
गया। वहाँ मृग को मारने पर निकट स्थित गर्दभालि अणगार से
बोध पाकर संविग्नतया प्रव्रजित होकर सद्गति प्राप्त हुआ।
इस नगर मे पृष्ठ चम्पाधिप साल महासाल का भाणेज और
पिठर-जसवती का पुत्र गागलिकुमार हुआ, जिसे मामा ने यहाँ से
बुला कर पृष्ठ चम्पा मे राज्याभिषिक्त किया और उन्होने गौतम-
स्वामी के पास दीक्षा ग्रहण की। काल-क्रम से गागलिकुमार भी
अपने माता-पिता के साथ गणधर श्री गौतम स्वामी के पास जिन-
दीक्षा लेकर सिद्ध हुआ।
इसी नगर मे दिव्य मुकुट रत्न प्रतिविम्बित मुखरूप से प्रसिद्ध
दुर्मुह नामक राजा ने कौमुदी-महोत्सव में इन्द्रकेतु-ध्वजको अलंकृत
विभूषित और महाजनो द्वारा ऋद्धि-सत्कार करते देखा और थोडे
दिन बाद उसे भूमि पर पडे हुए, पैरो से रौंदे जाते नष्ट होते देख
कर ऋद्धि का अनृद्धिस्वरूप विचार कर वह प्रत्येकबुद्ध हुआ।
अणहिलपुर स्थित अरिष्टनेमि-कल्प ११३
इसी नगरी मे द्रुपद राजा की पुत्री महासती द्रौपदी पाँच
पाण्डवो को स्वयंवरा हुई ।
इसी नगर के राजा धर्मरुचि के अगुठो मे रहे रतनमय जिन-
विम्ब को नमस्कार करने के कारण पिशुन लोगो की प्रेरणा से
कुपित काशी नरेश ने विग्रह किया । धर्म के प्रभाव से वैश्रमण ने
सवलवाहन परचक्र को गगनमार्ग से काशी ले जाकर उद्धार
किया, वह उसी का सम्मानभाजन हुआ ।
इत्यादि अनेक सविधान रूपी रत्नो का निधान यह नगर
महातीर्थ है । भव्य लोग यहाँ तीर्थयात्रा कर जैनशासन की प्रभा-
वना करते हुए इहलोक-परलोक सुख और तीर्थङ्कर नाम कर्म
उपार्जन करते हैं ।
श्री जिनप्रभसूरि कहते हैं कि कम्पिलपुर प्रवर तीर्थ के इस
कल्प को पढते हुए श्रावक जन दुष्ट कर्म-शत्रुओ को नष्ट करे ।
श्री काम्पिल्यपुर-कल्प की श्लोक सख्या ३३ और ७ अक्षर है ।
२६. अणहिलपुर स्थित अरिष्टनेमि-कल्प
अरिष्टनेमि भगवान को नमस्कार करके अणहिलपुरपत्तनाव-
तस ब्राह्मणगच्छनिश्रित श्री अरिष्टनेमि का कल्प कहता हू ।
पूर्वकाल मे कन्नौज नगर मे यक्ष नामक महर्द्धिसपन्न व्यापारी
था । वह एक वार व्यापार के निमित्त बहुत से वैलो का सार्थ, किराना
८
लेकर, कन्नौज के राजा की पुत्री महनिका को कञ्चुलि के सम्वन्ध मे दिए
गए कन्नौज से प्रतिवद्ध गुजरात देश के प्रति प्रस्थान कर क्रमशः
सरस्वती नदी तट पर लखाराम मे आकर ठहरा । पहले अणहिल-
वाड पाटण की वह मण्डी थी । व्यापारी को वहाँ सार्थसहित रहते
हुए वर्षाकाल आ गया, मेघ बरसने लगा । एक बार भाद्रपद
महीने मे बैलो का सारा सार्थ कही चला गया, किसी को पता
नही । जब सर्वत्र खोजने पर भी न मिला तो सर्वनाश की भाँति
अत्यन्त चिन्तातुर अवस्था मे उसे रात्रि के समय स्वप्न मे अम्बा-
देवी ने कहा—बेटा, जागते हो या सोते हो ? यक्ष सेठ ने कहा—
माँ, मुझे नीद कहाँ ? जिसका सर्वस्वभूत बैलो का सार्थ चला
गया । देवी ने कहा—भद्र ! इसी लखाराम मे इमली वृक्ष के नीचे
तीन प्रतिमाए हैं, तीन पुरुष खुदवा कर उन्हे ग्रहण करो । एक
प्रतिमा श्री अरिष्टनेमि प्रभु की, दूसरी पार्श्वनाथ भगवान की और
एक अम्बिका देवी की है। यक्ष ने कहा—भगवती ! इमली के वृक्ष तो
बहुत से हैं, अतः उस प्रदेश को कैसे जाना जाय ? देवी ने कहा—
धातुमय मण्डल और पुष्पो का ढेर जहाँ देखो उसी स्थान मे तीन
प्रतिमाओ को जान लेना । उन प्रतिमाओ को प्रकट करके पूजा
करने से तुम्हारे बैल स्वयमेव आ जावेंगे । उसके प्रात काल उठकर
पूजा, विधानपूर्वक वैसा करने से तीनो प्रतिमाए प्रकट हुई । विधि-
पूर्वक पूजा करते ही क्षण मात्र मे बैल आ गए । सेठ सन्तुष्ट हुआ,
क्रमशः वहा प्रासाद बनवा कर प्रतिमाए स्थापित की ।
अन्यदा वर्षाकाल बीतने पर अग्गहार गाँव से अठारह सौ पट-
गालिक गृहालंकृत ब्राह्मण गच्छ मण्डन श्री यशोभद्रसूरि खभात
नगर के विचरते हुए वहाँ आये । लोगो ने विनति की—भगवन् !
तीर्थ का उल्लघन कर के जाना नही कल्पता । तब उन सूरि महा-
राज ने वहाँ जिन-बिम्बो को वन्दन किया । मार्गशीर्ष पूर्णिमा के
दिन ध्वजारोपण महोत्सव किया । यह ध्वजारोपण महोत्सव विक्रम
अरिष्टनेमि-कल्प ११५
संवत् ५०२ बीतने पर हुआ था। आज भी प्रतिवर्ष उसी दिन ध्वजा-
रोपण किया जाता है।
विक्रम संवत् ८०२ मे अणहिल गोपालक के परीक्षित प्रदेश
लक्षाराम स्थान मे चाउक्कड़ (चापोट्कट)-चावडा वंश मुक्ताफल
राजा वनराज ने पाटण बसाया। वहाँ १ वनराज, २ जोगराज,
३ क्षेमराज, ४ भूअड, ५ वयरसीह, ६ रत्नादित्य, ७ सामन्तसिंह
नामके चावड़ा वंशीय सात राजा हुए। फिर उसी नगर मे चालुक्य
वंशी १ मूलराज, २ चामुण्डराज, ३ वल्लभराज, ४ दुर्लभराज, ५ भीम-
देव, ६ कर्ण, ७ जयसिंह देव, ८ कुमारपालदेव, ९ अजयदेव १०
मूलराज, ११ भीमदेव नामक ग्यारह राजा हुए। फिर वाघेला १
लवण प्रसाद, २ वीरधवल, ३ वीमलदेव, ४ अर्जुनदेव, ५ सारंगदेव,
६ कर्णदेव राजा हुए। इसके बाद गुजरात मे सुलतान अलाउद्दीन
आदि का शासन प्रवृत्त हो गया।
वे अरिष्टनेमि भगवान कोहडी-अम्बिका कृत प्रातिहार्य से
आज भी उसी प्रकार पूजे जाते हैं।
पुरातत्त्वविदो के मुख से श्रवण कर श्री जिनप्रभसूरि ने यह
अरिष्टनेमि-कल्प लिखा है, जो कल्याणकारी हो।
श्री अरिष्टनेमि-कल्प पूर्ण हुआ। यह ग्रन्थाग्रन्थ ३३
परिमित है।
११६ विविध तीर्थ-कल्प
२७. शंखपुर पार्श्वनाथ-कल्प
पूर्वकाल मे नौवाँ प्रतिवासुदेव जरासंध राजगृह नगर से समस्त
सेना के साथ नौवे वासुदेव कृष्ण से युद्ध करने के लिए पश्चिम
दिशा की ओर चला। कृष्ण भी समस्त सैन्य सामग्री सहित
द्वारिका से निकल कर उसके सन्मुख देश-सीमा पर आये। जहाँ
भगवान अरिष्टनेमि ने पाञ्चजन्य-शंख बजाया, वहाँ शंखेश्वर
नगर बसा। शंख के निनाद से क्षुब्ध जरासन्ध ने जरा नामक कुल-
देवी का आराधन कर कृष्ण की सेना मे जरा की विकुर्वणा की,
जिससे श्वास-कास रोग से अपनी सेना को पीड़ित देखकर व्याकुल
होकर श्रीकृष्ण ने भगवान अरिष्टनेमि से कहा—भगवन् ! मेरी
सेना कैसे निरुपद्रव होगी ? और मुझे कब जयश्री हस्तगत होगी ?
तब भगवान ने अवधिज्ञान का उपयोग देकर कहा—"पाताल मे
नागराज से पूज्यमान भावी तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ स्वामी की
प्रतिमा है, उसे यदि तुम अपनी देव-पूजा के समय पूजो तो सेना
निरुपद्रव होगी और तुम्हारी जीत भी होगी। यह सुन कर
विष्णु ने सात महीना तीन दिन मे और मतान्तर मे तीन दिन
निराहार रहकर पन्नगाधिराज की आराधना की, क्रमशः नागराज
वासुकि प्रत्यक्ष हुआ। तब कृष्ण ने भक्ति-बहुमानपूर्वक पार्श्वनाथ-
प्रतिमा की याचना की। नागराज ने उसे अर्पण की। फिर महो-
त्सवपूर्वक लाकर अपनी देव-पूजा मे स्थापित कर त्रिकाल पूजा
प्रारम्भ की। उसके न्हवण जल को समस्त सेना पर छींटने से
जरा-रोग-शोक-विघ्न निवृत्त होकर विष्णु की सेना मे समर्थता
आ गई। क्रमशः जरासन्ध की पराजय हुई। लोहासुर, गजासुर,
बाणासुर आदि सभी जीत लिए गए।
धरणेन्द्र-पद्मावती के सान्निध्य से वह प्रतिमा सकल विघ्ना-
पहारिणी, सकल ऋद्धि-जननी हुई। वह वही शंखपुर मे स्थापित
नाशिकपुर-कल्प ११७
की गई। कालान्तर में प्रच्छन्न होकर क्रमशः शखकूप मे प्रगट
हुई। आज पर्यन्त चैत्यग्रह मे सकल संघ द्वारा वह पूजी जाती है।
अनेक प्रकार के परचे-चमत्कार पूरे जाते हैं। तुर्क राजा लोक भी
वहाँ महिमा करते हैं।
कामित तीर्थ शखेश्वर स्थित पार्श्वनाथ जिनेश्वर की प्रतिमा
का यह कल्प मैने गीत के अनुसार लिखा है। ये शखेश्वराधीश्वर
पार्श्वनाथदेव कल्याणकल्पद्रुम हैं। भव्यात्माओ के देह मे और
घर में सदा (आरोग्य एव) लक्ष्मी करे।
श्री शंखपुर-कल्प के ग्रन्थाग्र० २२ और २४ अक्षर ऊपर है।
◼
२८. नाशिकपुर-कल्प
भव भय को दूर करने वाले श्री चन्द्रप्रभ जिनचन्द्र को वन्दन
करके मैं पापमलसमूह के नाशक नाशिकपुर का कल्प कहता हूँ।
नाशिकपुर तीर्थ की उत्पत्ति ब्राह्मणादि परतीर्थिक इस प्रकार
वर्णन करते हैं—पूर्वकाल मे एक बार नारद ऋषि ने भगवान
कमलासन से पूछा कि पुण्यभूमि कहाँ है ? कमलासन ने कहा—
जहाँ मेरा यह पद्म गिरे, वही पवित्र भूमिस्थान है ! एकदिन विरंचि
ने वह पद्म छोडा जो महाराष्ट्र जनपद भूमि के अरुणा-वरुणा-
गंगा महानदी विभूषित, नाना प्रकार की वनस्पति से मनोहर देव-
भूमि पर जा कर गिरा। वहाँ पद्मासन ने पद्मपुर नामक नगर