विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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उत्तम मुकुट, कुण्डल, केयूरादि करवाता है वह त्रिभुवनमुकुट
होकर शीघ्र ही शिव-सुख प्राप्त करता है।
जिसने त्रिभुवन चूडामणि, लोगो के नयनो के लिए अञ्जन-
शलाका जैसी इस प्रतिमा को नही देखा उसका मनुष्य जन्म ही
निरर्थक है। श्री सघदास मुनि द्वारा प्रतिमा का लघु कल्प निर्मित
है। मैंने तो बडे कल्प से सम्बन्ध मात्र समुद्धृत किया है।
जो इस कल्प को पढता, सुनता व चिन्तन करता है वह
कल्पवासियो का नाथ (इन्द्र) होकर सातवे भव मे सिद्धि प्राप्त
करता है। और जो पुस्तक लिख कर इस कल्प की गृह चैत्य मे
पूजा करता है वह चिरबोधि नरक और तिर्यञ्चगति मे नियमा
से नही जाता।
दैनिक पढने से सिंह, समुद्र, अग्नि, हाथी, चोर, साँप, ग्रह,
वैरी का निवारण होकर प्रेत, वैताल, शाकिनी आदिका भय नष्ट
होता है।
कल्प वृक्ष की भाँति यह कल्प हृदय स्थान मे धारण करने
वाले भव्यो की पुण्य-शोभा विलसित और वाञ्छित प्रदान करे।
जहाँ तक नरक्षेत्र मे मेरु रूपी प्रदीप पृथ्वी तल पर समुद्र जल
रूपी तेल से उद्योतित विद्यमान है यह कल्प वहाँ तक जयवन्त
रहे।
यह पार्श्वनाथ का सक्षिप्त कल्प समाप्त हुआ।