विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
उज्जयिनी, धारा, प्रतिष्ठान (पैठण), कांची एवं दाक्षिणात्य तीर्थ कल्प
१८८ विविध तीर्थ कल्प
'चेल्लण' नाम से इसे कहते हैं। बड़े भारी माहात्म्य वाले श्री
चेल्लण पार्श्वनाथ के समक्ष उन महर्षियों ने सुवर्ण मुकुट मन्त्रा-
म्नाय भव्यों के लिए आद्यन्त व प्रकाशित की। और वह सिंह-
गुफा पल्ली कालान्तर में ढिपुरी नाम से प्रसिद्ध नगरी हुई। आज
भी वे भगवान् महावीर और वे चेल्लण पार्श्वनाथ उसी नगरी में
यात्रोत्सवादि से आराधन किये जाते हैं।
एक बार वकचूल खात डाल कर चोरी करने के लिए उज्जैन
मे किसी सेठ के घर गया। कोलाहल सुन कर वहाँ से लौट आया
और देवदत्ता नामक प्रधान गणिका के घर में प्रविष्ट हुआ।
उसने उसे कोढ़ी के साथ सोये हुए देखा। वहाँ से निकल कर नगर
सेठ के घर गया। वहाँ एक विंशोपक हिसाब मे कम हो रहा था
जिसके लिए सेठ ने अपने पुत्र को दुर्वाक्यों से फटकार कर घर से
निकाल दिया। यह देखते हुए रात बीत गई। फिर—राजकुल में
जाऊँगा—यह सोचते हुए सूर्योदय होने से पल्लीपति वकचूल ने
नगर से निकल कर गोह लेकर वृक्ष के नीचे दिन बिताया। रात्रि
मे फिर राजकीय भण्डार के बाहर से गोह के पूँछ द्वारा चढ़ कर
अन्दर प्रविष्ट हो गया। उसे राजा की रूठी हुई पटरानी ने देख
कर पूछा—तुम कौन हो ? उसने कहा—मै चोर हूँ। रानी ने
कहा—डरो मत, मेरे साथ सङ्गम करो। चोर ने कहा—तुम कौन
हो ? उसने कहा—मैं पटरानी हूँ। चोर ने कहा—तब तो तुम
मेरी माँ होती हो। कहते हुए जाने का निश्चय किया तो रानी ने
नखो से अंग विदीर्ण कर पहरेदारो को पुकार के बुलाया। उन्होने
पकड़ लिया। रानी को मनाने के लिए आये हुए राजा ने यह
दृश्य स्वयं देख लिया था। अत उसने अपने पुरुषो को कहा—
इसे ज्यादा कष्ट मत दो। उन्होने उसे रखा। प्रातःकाल राजा के
पूछने पर उसने कहा—देव ! मै चोरी करने के लिए प्रविष्ट हुआ,
पीछे आपके भण्डार मे देवी ने मुझे देख लिया। इसके आगे कुछ
[Header] टिपूरीतीर्थ-कल्प १८९
न कहने पर जानकार राजा ने प्रसन्न होकर उसे पुत्र रूप में
स्वीकार कर लिया और सामन्त पद पर आरूढ किया । वकचूल
ने राजा के द्वारा विडम्बना की जाती हुई रानी की रक्षा की ।
अब वकचूल सोचने लगा—अहो ! नियम धारण करने का भी
कैसा शुभ फल है !
एक बार राजा ने उसे कामरूप के राजा को जीतने के लिए
भेजा । वह युद्ध मे गया और उसे जीत कर घावो से जर्जरित
होकर स्वदेश लौटा ! राजा ने वैद्यो को नियुक्त कर इलाज कराया
पर घाव बढते ही गए । उन्होंने कहा—देव ! कौए के मास से यह
अच्छा होगा ।
जिनदास श्रावक के साथ वकचूल की मित्रता थी अत राजा
ने उसे बुलाने के लिए पुरुषो को भेजा ताकि मित्र के समझाने से
ये काक-मास भक्षण कर ले । राजा द्वारा बुलाए हुए जिनदास ने
अवन्ती आते हुए किन्ही दो देवियो को रोते हुए देखा । उसने
पूछा—क्यो रोती हो ! देवियो ने कहा—हमारा पति सौधर्म देव-
लोक से च्युत हो गया अत हम राजकुमार वकचूल की प्रार्थना
करती हैं, पर तुम्हारे जाने पर वह काक-मास भक्षण कर दुर्गति-
भाजन हो जायगा, इसलिए रोती है । सेठ ने कहा—मै ऐसा ही
करूँगा कि यह उसे भक्षण न करे । सेठ उज्जैन गया, राजा के
अनुरोध से उसने वकचूल से कहा—काक-मास ग्रहण करो । अच्छे
होकर प्रायश्चित कर लेना । वकचूल ने कहा—तुम जानते हो,
जिस कार्य को करके फिर प्रायश्चित लेना पडे, इससे तो उसका
आचरण पहले से ही न करना श्रेयस्कर है । कीचड को प्रक्षालन
करने से तो अच्छा है कि उसका स्पर्श न कर दूर ही रहा जाय ।
इस प्रकार राजा को निषेधकर अपने नियमपालन मे दृढ रह कर
वह मर कर अच्युत कल्प मे उत्पन्न हुआ ।
४५. चौरासी तीर्थ-नामसंग्रह-कल्प
जिन्होने पाप का निग्रह कर दिया है ऐसे पंच परमेष्ठी की
उपासना करके तत्र जानने वालो को विदित 'चौरासी तीर्थ जिन'
नाम का संग्रह करता हूँ ।
जैसे कि शत्रुञ्जय परभुवन मे दीपक के तुल्य श्री वज्रस्वामी
प्रतिष्ठित श्री आदिनाथ एवं पांडवो द्वारा स्थापित श्री मूलनायक
नन्दिवर्द्धन युगादिनाथ, श्री शांतिनाथ, पुण्डरीक, श्री कलश
प्रतिष्ठित और दूसरे श्री वज्रस्वामी प्रतिष्ठित पूर्ण कलश ।
सुधाकुण्ड जीवित स्वामी श्री शांतिनाथ और अवसर्पिणी मे भरत
क्षेत्र से प्रथम सिद्ध होने वाली माता मरुदेवी स्वामिनी ।
श्री उज्जवन्त गिरनार पर पुण्य कलश-मदन मूर्त्ति श्री नेमि-
नाथ, कच्चन वालानक मे अमृतनिधि श्री अरिष्टनेमि, पापा मठ मे
अतीत चौवीसी मे से श्री नेमीश्वरादि आठो पुण्य के निधान है ।
१ कायद्रा मे त्रिभुवन मंगल कलश श्री आदिनाथ । पारकर
देश मे आदिनाथ, अयोध्या मे श्री ऋषभदेव, कोलापुर मे वज्र-
मिट्टमय श्री भरतेश्वरपूजित भुवनतिलक श्री आदिनाथ, सोपारक
मे जीवंत स्वामी श्री ऋषभदेव प्रतिमा । नगरमहास्थान मे
श्री भरतेश्वर द्वारा कारित युगादि देव, दक्षिणापथ मे गोमटदेव श्री
बाहुबली, उत्तरापथ मे कलिंग देश मे गोमट श्री ऋषभदेव,
खंगारगढ मे श्री उग्रसेन द्वारा पूजित पृथ्बी के मुकुट श्री आदिनाथ,
महानगरी के उद्दण्डविहार मे श्री आदिनाथ, पुरिमताल मे श्री
आदिनाथ, तक्षशिला मे बाहुबलि का बनवाया हुआ धर्मचक्र ।
मोक्षतीर्थ मे आदिनाथपादुका, कुल्पाक में मन्दोदरी के देहरासर
चौरासी तीर्थनामसंग्रह-कल्प १९३
के श्री माणिक्यस्वामी ऋषभदेव । गगा यमुना के वेणी सगम पर
श्री आदिकर मण्डल तीर्थ है ।
२ अयोध्या मे श्री अजितनाथ, चन्देरी मे श्री अजितनाथ,
तारण तीर्थ की विश्वकोटिशिला पर श्री अजितनाथ, अगदिका मे
श्री अजित-शांति दो तीर्थंकर ब्रह्मेन्द्र के देहरासर के हैं ।
३ श्रावस्ती मे जागुली विद्यापति श्री संभवनाथ है ।
४ सेगमती गाँव मे श्री अभिनन्दन देव हैं । नर्मदा नदी उन्ही
के चरणो मे से निकली है ।
५ क्रौंच द्वीप, सिंहल द्वीप, हंस द्वीप मे श्री सुमतिनाथ देव
की पादुका हैं । आवुरिणि गाँव मे श्री सुमतिनाथ देव हैं ।
६ माहेन्द्र पर्वत और कौशाम्बी मे श्री पद्मप्रभ है ।
७ मथुग मे महालक्ष्मीनिर्मित श्री सुपार्श्व-स्तूप है । दशपुर
नगर मे सीता देवी के देहरासर के श्री सुपार्श्वनाथ हैं ।
८ प्रभास मे शशिभूषण श्रीचन्द्रप्रभ स्वामी की चन्द्रकान्त
मणिमय प्रतिमा श्री ज्वालामालिनी देवी के देहरासर की है ।
वल्लभी में आई हुई, श्री चन्द्रप्रभ स्वामी की प्रतिमा नन्दिवर्द्धन
राजा की बनवायी हुई और श्री गौतमस्वामी द्वारा प्रतिष्ठित है ।
नाशिक मे जीवितस्वामी त्रिभुवनतिलक श्री चन्द्रप्रभ हैं ।
चन्द्रावती के मन्दिर में मुकुटसदृश श्री चन्द्रप्रभ है । वाराणसी
के विघ्नेश्वर मे भी श्री चन्द्रप्रभ भगवान है ।
९ कायाद्वार मे श्री सुविधिनाथ भगवान है ।
१० प्रयाग तीर्थ मे श्री शीतलनाथ है ।
११ विन्ध्याचल और मलयगिरि पर श्री श्रेयासनाथ
भगवान है ।
१२ चम्पानगर में विश्वतिलक श्री वासुपूज्य है ।
१३ कम्पिला जी तीर्थ में गगातट पर एव श्रीसिंहपुर मे श्री
विमलनाथ हैं ।
१३
१९० विविध तीर्थ-कल्प
लौटते हुए जिनदास श्रावक ने उन देवियो को उसी प्रकार
रोते देखकर कहा—अब क्यो रोती हो ? उसने मास ग्रहण नही
किया है । देवियो ने कहा—वह तो अधिक धर्माराधन करके
अच्युत-कल्प मे चला गया, हमारा पति नही बना ।
इस प्रकार जैन धर्म के प्रभाव को बहुत काल तक विचारता,
मनन करता हुआ जिनदास श्रावक अपने घर लौटा ।
इस प्रकार इस तीर्थ के निर्माता वंकचूल भी जगत को आनंद
देने वाले हुए । ढिंपुरीतीर्थरत्न का यह कल्प जैसा सुना, उसकी
किंचित् रूप से श्री जिनप्रभसूरि ने रचना की ।
यह चेल्लण पार्श्वनाथ का कल्प समाप्त हुआ । इसकी ग्रन्थ-
संख्या ११६ अक्षर २६ ऊपर हैं ।
◼
४४. ढिंपुरीस्तव
विविध उत्तुंग पर्वतों के बीच शुभ्र छाया सुशोभित श्री महावीर
प्रभु, पार्श्वनाथ, मुनि सुव्रत और आदिनाथ की प्रतिमाओ से युक्त,
नियमधारण करने वाले श्री वंकचूल की विश्वविश्रुत पल्ली
ढिंपुरी चिरकाल तक अद्भुत लक्ष्मी को करे ।
यहाँ हस्तिदेव नदी के तट पर स्थित मनोहर गगनचुम्बी
शिखर वाले चैत्यों को देखकर यात्री-गण अपने नेत्रो को शीतलता
देते हैं ।
यहाँ मूलनायक चरम जिनेश्वर महावीर स्वामी की लेप्यमय
ढिंपुरीस्तव १९१
विगाल प्रतिमा है। दाहिनी ओर चेल्लण पार्श्वनाथ जयवन्त है
जिनके रूपर सर्पफण अलकृत हैं।
एक ओर आदिनाथ जिनेश्वर और दूसरे ओर श्री मुनि सुव्रत
भगवान् हैं। इस प्रकार अनेक जिनेश्वर मूर्त्तियो वाला मन्दिर
चमकीले वादलो के सहश है। द्वार के समीपवर्त्तिनी अविका देवी
और छ० भुजाओ वाला क्षेत्रपाल हैं। सर्वज्ञ भगवान के चरण
कमलो मे वे दोनो सेवा करते हुए भ्रमर के समान सघ के विघ्न-
समूह क्षण मात्र मे नष्ट करते हैं।
यहाँ पौष दशमी को लोक समूह द्वारा किये जाने वाले उत्सव
को देखकर भव्यजन कलिकाल के घर निश्चय ही कृतयुग को
पाहुने के रुप मे आने की संभावना करते हैं।
देवताओ द्वारा पूजित इस तीर्थ की भक्ति से आराधना करके
समस्त मनोवाञ्छित प्राप्त होते हैं और सर्व प्रकार के भयो को
जीत लेते हैं। अत्यन्त सुगन्धित चन्दन को पा कर ताप से व्याप्त
आलिङ्गित अग को कौन सहन कर सकता है ?
पापो को दूर करने मे दृढ वद्यजन ढिंपुरी तीर्थ रत्न की
वन्दना करते हैं। जिसमे कल्प वृक्ष के सहश प्रार्थित अर्थ को देने
वाले पद्मावती और धरणेन्द्र द्वार चरण गृहीत भगवान चेल्लण
पार्श्वनाथ की यह कायोत्सर्ग स्थित देह है।
शक सवत् १२५१ दीपावली के दिन सघसहित इस नगरी मे
आकर प्रभावमहोदधि इस तीर्थ का मुदित मन वाले श्री जिनप्रभ-
सूरि ने यह स्तोत्र बनाया है।
१९४ विविध तीर्थ-कल्प
१४ मथुरा मे यमुना-ह्रद मे, द्वारिका मे समुद्र मे, और नाक-
पाणि मे श्री अनन्तनाथ भगवान हैं ।
१५ अयोध्या के समीप रत्नवाहपुर मे नागराजपूजित श्री
धर्मनाथ भगवान हैं ।
१६ किष्किन्धा, लका, पाताललका और त्रिकूटगिरि पर श्री
शान्तिनाथ भगवान हैं ।
१७ १८ गगा यमुना के वेणी सगम पर श्री कुन्थुनाथ—श्री
अरनाथ भगवान है ।
१९ श्रीपर्वत पर श्री मल्लिनाथ हैं ।
२० भृगुपत्तन—भरोच मे अनर्घ्य रत्नचूड श्री मुनिसुव्रत हैं ।
प्रतिष्ठानपुर—अयोध्या, विन्ध्याचल मे माणिक्य दडक मे श्री
मुनि सुव्रत भगवान हैं ।
२१ अयोध्या मे मोक्ष तीर्थ मे श्री नमिनाथ हैं ।
२२ सौरीपुर के शख-जिनालय मे, पाटला नगर मे, मथुरा,
द्वारिका, सिंहपुर, स्तम्भ तीर्थ मे पाताललिंग नामक श्री नेमि-
नाथ भगवान हैं ।
२३ अजाहरा मे नवविधि पार्श्वनाथ, स्तम्भन मे भवभयहर
पार्श्वनाथ, फलौदी मे विश्वकल्पलता श्री पार्श्वनाथ, करहेडा में
उपसर्गहर पार्श्वनाथ, अहिछत्रा में त्रिभुवनभानु पार्श्वनाथ, कलि-
कुण्ड और नागह्रद में श्री पार्श्वनाथ, कुवकुटेश्वर मे विश्वगज
पार्श्वनाथ । माहेन्द्र पर्वत पर छाया पार्श्वनाथ, ओकार पर्वत पर
-सहस्रफणा पार्श्वनाथ, वाराणसी मे दण्डखात मे भव्य पुष्कग-
वर्त्तक पार्श्व, महाकाल के अन्तर मे पातालचक्रवर्ती पार्श्व,
मथुरा मे कल्पद्रुम पार्श्व, चम्पा मे अशोकपार्श्व, मलयगिरि पर
श्री पार्श्वनाथ भगवान हैं ।
समवसरण रचना-कल्प १९५
२४ श्रीपर्वत पर घण्टाकर्ण महावीर, विन्ध्याचल पर श्री-
गुप्त, हिमाचल मे छायापार्श्व मन्त्राधिराज श्रीस्फुलिंग है। श्री-
पुर मे अन्तरिक्ष श्री पार्श्वनाथ, डाकुली भीमेश्वर मे श्री पार्श्व-
नाथ, भाइल स्वामिगढ मे देवाधिदेव हैं।
श्री रामसेन मे प्रद्योतकारी श्रीवर्द्धमान, मोढेरा, वायड,
खेडनाणा, पाली, मतुण्डक, मूगथला, श्री मालपत्तन, ओसियाँ,
कुण्डग्राम, सत्यपुर, टका मे, गंगाह्रद मे, सर स्थान मे, वीतभय मे,
चम्पा मे, अपापा मे, पुण्ड्र मे पर्वत पर नन्दिवर्द्धन कोटि भूमि मे
श्री वीर प्रभु हैं। राजगृह वैभारगिरि पर, कैलाग और श्री
रोहणाचल मे भी श्री महावीर भगवान हैं।
अष्टापद पर चौवीस तीर्थङ्कर हैं, समेतशिखर पर वीस जिनेश्वर
हैं, हेम सरोवर मे बहत्तर जिनालय है, कोटिशिला सिद्धक्षेत्र है।
इस प्रकार जैन धर्म मे प्रसिद्ध तीर्थों की नामावली को श्री
जिनप्रभसूरि ने स्फुटित किया। इनमे कुछ मैने देखे हैं, कुछ सुने है
वैसे ही अपने तीर्थों कै नामो की पद्धति मे मैंने लिखे हैं।
समस्त तीर्थों का नामसग्रह-कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थ
सख्या ४९ और २१ अक्षर हैं।
४६. समवशरण रचना-कल्प
श्री महावीर जिनेश्वर को नमस्कार करके पूर्वाचार्य कृत
समवशरण-रचना का गाथाओ से कल्प कहता हूँ।
वायुकुमार और मेघकुमार क्रमश एक योजन भूमि शुद्ध कर
सुगन्धित जल की वर्षा करते हैं। वाणमंतर मणिरत्नमय भूमि
गत करते हैं और कुसुमवृष्टि करते हैं।
श्रेष्ठ रजत कनक और रत्न के तीन प्राकार क्रमश भुवनपति,
ज्योतिष और वाणमंतर देव बनाते हैं। प्राकारो पर कचन, रत्न
और मणियो के कपिशीर्षक होते हैं।
उन प्राकारो का एक-एक गाऊ और छः सौ धनुष का अन्तर
होता है। तेतीस धनुष एक हाथ और आठ अगुल का विस्तार
होता हैं।
उन वप्रो के पाँच सौ धनुष ऊँचे द्वार होते हैं। ये सर्व माप
जिनेश्वरो के स्वहस्त प्रमाण से जानना चाहिए।
भूमि से दश हजार सोपान चढ़ने पर प्रथम प्राकार आता है।
वहाँ से पचास धनुष जाने पर पाँच हजार सोपान चढकर दूसरा
वप्र आता है।
उसका अन्तर भी पूर्वोक्त विधि से जान लेना चाहिए। तद-
नन्तर पूरे बीस हजार सोपान चढ़ने पर तीसरा कोट है।
वे सब क्रमश दश, पाँच और पाँच हजार सोपान एक हाथ
ऊँचे व एक हाथ विस्तीर्ण है। बाह्य, मध्य और अभ्यन्तर वप्रो के
ये सोपान समझना चाहिए।
उनके बीच मे भूमि से ढाई कोश ऊँचा, दो सौ धनुष लम्बा-
समवशरण रचना-कल्प १९७
चौडा मणिपीठ है और जिनेश्वरो की धनुष-ऊंचाई के समान ही
उसके चार द्वार हैं।
उस चार मणि-रत्न जटित सिंहासन हैं, जिन पर तीन छत्रो
से भूषित भगवान पूर्वाभिमुख विराजमान होते है।
समधिक योजन विस्तार वाला दो सौ सोलह धनुष ऊँचा
अशोक वृक्ष है। व्यन्तरदेव भगवान के तीन प्रतिबिम्ब शेष तीन
सिंहासनो पर विराजमान करते हैं।
परिषद के आगे प्रारम्भ मे मुनिराज, वैमानिक देवियाँ और
साध्वियाँ रहती हैं। भुवनपति व्यन्तर ज्योतिषी देव-देवी, वैमानिक
देव और पुरुष-स्त्री बैठते है।
कुडहिकेतु सकीर्ण एक हजार योजन ऊँचे दण्ड वाला धर्मध्वज
होता है, दो यक्ष चामरधारी होते हैं और जिनेश्वर के आगे धर्म-
चक्र होता है।
ऊँची ध्वजाएँ मणितोरण अष्ट मङ्गल, पूर्णकलश, मालाओ,
पचालिकाओ और छत्रादि से प्रत्येक द्वार सुशोभित होते हैं, धूप-
घटिकाएँ होती हैं।
क्रमश. हेम-श्वेत-रक्त और श्यामल वर्ण वाले वैमानिक,
व्यन्तर, ज्योतिषी और भुवनपति प्रतिद्वार पर रत्न के वप्र वाले
पूर्वादि वप्रो पर प्रतिहार होते हैं।
जय, विजय, जयन्त और अपराजित क्रमश गौर, रक्त,
कनक व नील आभा वाली देवियाँ पूर्व क्रम से कनकमय स्थापित
करती है।
प्रत्येक बाह्य वप्र के द्वार पर दोनो ओर जटित मुकुटो से
मण्डित तुम्बुरु, पट्वाङ्ग पुरुष श्रीमालाओ से युक्त स्थापित
करते हैं।
वाह्यवप्र मे यानादि रहते हैं, दूसरे वप्र मे तिर्यंच परस्पर
१९८ विविध तीर्थ-कल्प
शत्रु भी मित्र भाव वाले होकर बैठते हैं। ये सब रत्न वप्र के बाहर
मणिमय छद मे बैठते हैं।
बाह्य वप्र के द्वारा मध्य मे दो दो गोल वापियाँ होती हैं।
कोनो मे एक-एक चौकोर वापी होती है।
तीर्थंकर पादमूल मे नमस्कार करते हुए देव चारो ओर कल-
कल शब्द से उकडु बैठे हुए सिंहनाद करते हैं।
चैत्य वृक्ष, पीठ छदक, आसन, छत्र, और चामर जो भी
करणीय हैं, वे वाणमतर देव करते हैं।
पूर्व से पश्चिम का अवगाहन करती हुई दो-दो पद्मपंक्तियाँ
मार्ग मे भगवान के पाँवो के नीचे आती है। अन्य सात घूमती
हुई क्रमश पाँवो के नीचे आती रहती हैं।
दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाभिमुख देव कृत प्रतिबिम्ब
होते हैं। ज्येष्ठ गणधर अथवा अन्य दक्षिण पूर्व मे निकट बैठते हैं।
जिनेश्वर देव के प्रतिबिम्ब जो देवकृत हैं वे तीनो दिशाओ
के अभिमुख हैं। उनका भी वैसा ही प्रभाव हैं और तदनुरूप
होते हैं।
समवशरण रचना-कल्प १९९
हुए जो जिनेश्वरदेव कहते हैं उसे यदि सारी आयु तक (आजीवन)
सुनना पडे तो वे सुनने की इच्छा रखते हैं।
साढे बारह लाख और उतने करोड सोनइयो का प्रीतिदान
भगवान का आगमन कहने वाले को चक्रवर्ती देते हैं।
वासुदेव इतने ही प्रमाण के रजत का दान देते हैं। लाख और
हजार का दान मण्डलीक राजा (प्रान्तपति) देते हैं।
इभ्य—श्रेष्ठी आदि भी जिनेश्वर भगवान का आगमन सुनकर
नियुक्त पुरुषो को अपनी-अपनी भक्ति और वैभव के अनुसार दान
देते हैं।
राजा, युवराज, अमात्य द्वारा शासित प्रवर जनपद मे कोई
दुर्वलाखण्डित पूजायोग्य आढक कलमा शालि विना तुले अखण्ड
फलक जैसे वलि किए जाते हैं, जिनसे देवता भी स्तब्ध हो जाते हैं।
पूर्व द्वार से एक साथ ही पूजा की जाती है। तिगुनी पूर्व द्वार
पर उसकी आधी अन्य द्वार स्थित देवो को दी जाती है।
आधी-आधी अधिपतियो की और अवशेष याचक जनो की
होती है। यह सर्व रोगो का प्रशमन करने वाली होती है, छः
मास तक कोई व्याधि नही आती।
पादपीठ पर राजोपनीत सिंहासन पर बैठे हुए ज्येष्ठ गणधर
अथवा दूसरे गणधर दूसरे प्रहर मे देशना देते हैं।
श्री जिनप्रभसूरि ने यह समवशरण रचना-कल्प सक्षेप से
सूत्रानुसार लिखा है। इसे पढना चाहिए।
श्री समवशरण रचना-कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थ सख्या
४३ हैं।
४७. कुडुँङ्गेश्वर नाभेय (ऋषभ) देव-कल्प
श्वेताम्बराचार्य चारणमुनि वज्रसेन द्वारा चक्रावतार तीर्थ
मे प्रतिष्ठित श्री ऋषभदेव जयवन्त हो ।
विशेष तेजस्वी भगवान कुडुङ्गेश्वर ऋषभदेव का सङ्क्षिप्त कल्प
देखकर कहता हूँ ।
पूर्व काल मे लाट देश मण्डन भरोच नगर के अलङ्कार
शकुनिकाविहार स्थित श्री वृद्धवादीसूरि ने "जो जिससे हारेगा
वह उसका शिष्य होगा" इस प्रतिज्ञा को लेकर दक्षिणापथ से
आये हुए कर्णाट भट्ट दिवाकर को जीत कर उसे व्रत ग्रहण
कराया, सिद्धसेन दिवाकर नाम रखा गया । फिर कितने ही दिनो
मे उसने समस्त आगमो का अध्ययन कर लिया । एक दिन
उन्होने—सभी आगमो को मैं संस्कृत मे कर दूंगा—कहा तो
पूज्यश्री ने कहा—क्या तीर्थङ्कर-गणधर संस्कृत नही जानते थे जो
अर्द्धमागधी मे आगमो को कहा । ऐसा बोलने से तुम्हे प्रायश्चित्त
लगा है । तुम्हे क्या कहा जाय, तुम स्वय जानते हो ।
उन्होने विचार कर कहा—भगवन् ! मौन धारण करके बारह
वर्षीय पाराञ्चित नामक प्रायश्चित्त लेकर रजोहरण मुखवस्त्रिकादि
साधु लिंग को गुप्त रखकर अवधूत के वेश मे विचरण करना
आवश्यक है । गुरु महाराज के मुख से—"यह उपयुक्त है" ऐसा
सुन कर ग्राम नगरादि देशान्तर मे पर्यटन करते हुए बारहवे वर्ष
उज्जैन मे कुडुङ्गेश्वर देवालय मे शेफालिका के कुसुम से रञ्जित वस्त्र
धारण किए हुए आकर बैठ गए । लोगो द्वारा "देव को क्यो नही
नमस्कार करते हो ?" ऐसा कहने पर भी कुछ नही बोले । इस
प्रकार जन-परम्परा से सुनकर सबको ऋण मुक्त करके अपना
कुडुंगेश्वर नाभेयदेव-कल्प २०१
सवत्सर प्रवर्त्तन करने वाले महाराजा श्री विक्रमादित्यदेव ने
आकर कहा—क्षीर चाटने वाले भिक्षु ! क्या तुम देव को नमस्कार
नही करते ? तब उन्होने कहा—मेरे नमस्कार करने से देव का
लिंग भग्न हो जायगा ! जो आपके अप्रीति का कारण हो जायगा ।
राजा ने कहा—होने दो । आप नमस्कार तो कीजिये । उन्होने
कहा—तब सुनिये । फिर उन्होने पद्मासनस्थ होकर द्वात्रिंशद्
द्वात्रिंशिकाओ से देव की स्तुति करना प्रारम्भ किया । यथा—
“अव्यक्त, प्रव्याहत, विश्वलोक स्वरूप अनादि-मध्य-अन्त
रहित पुण्य-पापविहीन स्वयभू और सहस्रनेत्रभूत अनेक रूप वाले
एकाक्षर भावलिंग को · ।
इत्यादि प्रथम श्लोक से ही प्रासाद स्थित शिखि के शिखाग्र
से धुआँ निकलने लगा । तब लोगो ने कहा—'आठ विद्याओ के
अधीश्वर ये कालाग्नि रुद्र हैं । भगवान अपने तीसरे नेत्र की अग्नि
से इस साधु को भस्म कर डालेगे !” इतने मे ही बिजली के तेज
समान तडतडाहट करते हुए प्रथम ज्योति निकलकर अप्रतिचक्रा—
चक्रेश्वरी देवी द्वारा मिथ्यादृष्टि देवता को ताड्यमान करते लिंग-
मूल से दो टुकडे होकर पद्मासनस्थ स्वयभू भगवान ऋषभदेव
प्रादुर्भूत हुए ।
इस धर्मप्रभावना द्वारा पाराञ्चित समुद्र से उत्तीर्ण होकर
उन्होने रक्ताम्बर त्याग कर रजोहरण मुखवस्त्रादि युक्त साधुलिंग
मे प्रकट होकर महाराजा को धर्मलाभ आशीर्वाद दिया । “दूर से
ही हाथ उठाए हुए आशीर्वादरूप 'धर्मलाभ' बोलने पर आचार्य
सिद्धसेन को राजा ने करोड दिए ।” फिर प्रभु से क्षमा-याचना
कर राजा ने स्तुति की ।
पाराञ्चित प्रायश्चित वहन करने वाले सिद्धसेन दिवाकराचार्य
प्रतिष्ठित श्रीमान् कुडुङ्गेश्वर नाभिराजाङ्गज ऋषभदेव जिनेश्वर
आपका कल्याण करे ।
श्व or श् + व?
Look at line 11: "श्वेताम्बरोपासक" - it is 'श्वेताम्बरोपासक'.
Wait, if you read Hindi, would someone transcribe it as "वनाकर" or "बनाकर"?
Wait, why would a Hindi text write "वनाकर" and "वनाया"?
Wait, look at line 4:
"स्वीकार" -> 'स्व' has a distinct 'व'.
Look at "वसाड" in line 6: 'व' has a loop.
Is "वनाकर" a typo by the typesetter who used 'व' for 'ब'?
Yes! In many Hindi presses of the early 20th century (especially in Gujarat/Rajasthan, like Ahmedabad or Bombay presses printing Hindi), typesetters often confused 'व' and 'ब', or the font didn't distinguish them well, OR they literally set 'व' instead of 'ब' because Gujarati/Marwari speakers often pronounce/write 'व' and 'ब' interchangeably!
Wait, look at:
"दार्शनिक लोगो को श्वेताम्बर वनाकर मिथ्यादृष्टि देव-गुरु से"
"परिमूक्त कर सारी पृथ्वी को जैन मुद्राङ्कित वनाया।"
Yes, it literally has 'वनाकर' and 'वनाया'!
Wait, let's provide the exact characters printed, or if it's 'व', write 'व' (or 'ब'? Wait, the
४८ व्याघ्री-कल्प
जो जीव-जन्तु आराधक होते हैं, उनका कीर्त्तन करने से
निश्चय ही कल्याण होता है, यह हृदय मे आलोचना-विचार करके
मै किञ्चित् रूप मे व्याघ्री-कल्प कहता हू ।
श्री शत्रुञ्जय पर आदिनाथ चैत्य दुर्ग के प्रतोली द्वार को रोक
कर कभी कोई व्याघ्री आ बैठी । उसे निश्चलाङ्गी देखकर उससे
आतङ्कित चिन्तित मन वाले श्रावक लोग जिनेश्वर को नमन
बाहर से ही कर लेते, पर आगे नही जाते ।
कोई साहसी ठाकुर उसके पास गया, पर वह न तो उसके प्रति
आकृष्ट हुई और न उसको किञ्चित् भी मारने की चेष्टा की ।
तब उस क्षत्रिय ने कही से मास लाकर उसके आगे रखा, पर
उसने उस ओर आँख उठाकर भी नही देखा ।
अब निर्भय होकर श्रावको ने भी उसके आगे आकर क्रमश˙
उत्तम भक्ष्य और पानी रखा । तो भी उसे अनिच्छुक देखकर
जनता ने हृदय मे सोचा—अवश्य ही इसने जातिस्मृति पाकर
तीर्थ पर अनशन स्वीकार किया है ।
इसका तिर्यंच भव भी प्रससनीय है, जिसने चारो प्रकार का
आहार छोड दिया । यह एकाग्र नेत्रो से देव को ही निरीक्षण
करती है ।
साधर्मी की बुद्धि से श्रावको ने उसकी चन्दन-पुष्पादि से पूजा
की और संगीत उत्सवादि मे भावना-भक्ति मे लग गए ।
निरागार प्रत्याख्यान करवाया और हर्षपूर्वक मन से ही
उसने श्रद्धा करके उसे स्वीकार किया ।
२०४ विविध तीर्थ-कल्प
इस प्रकार वह तीर्थ के माहात्म्य से ही गुद्ध वासना-भावना
समृद्ध हुई । सात आठ दिन अनगन पालन कर पापो को नष्ट कर
वह स्वर्ग गई ।
अगर-चन्दन मे उसके गरीर का अग्नि-सस्कार करके प्रतोली
के दक्षिण तरफ उसकी पाषाणमूर्त्ति स्थापित की ।
तीर्थचूडामणि श्री विमलाचल की चिरकाल जय हो, जहाँ
तिर्यंच भी आराधकाग्रणी हुए ।
श्री जिनप्रभसूरि ने यह व्याघ्री-कल्प रच कर जो पुण्य उपार्जन
किया वह श्रीसघ को सुखकारी हो ।
यह व्याघ्री-कल्प समाप्त हुआ, इसकी ग्रन्थ सख्या १४ है ।
४९. अष्टापदगिरि-कल्प
अष्टापद-स्वर्ण के समान देह की कान्ति वाले भवरूपी हस्ती
के लिए अष्टापद के समान श्री ऋषभदेव को नमस्कार करके
अष्टापद गिरि का कल्प सक्षेप से कहता हूँ ।
इसी जम्बूद्वीप नामक द्वीप मे दक्षिण भरतार्द्ध मे भारतवर्ष में
नौ योजन चौडी और बारह योजन लवी अयोध्या नामक नगरी
है । यही श्री ऋषभ-अजित-अभिनदन-सुमति-अनन्तादि जिनेश्वरो
की जन्मभूमि है । इस के उत्तर दिगा मे बारह योजन पर अष्टा-
पद नामक कैलाग अपर नाम वाला रम्य गिरिश्रेष्ठ आठ योजन
ऊँचा, स्वच्छ स्फटिक गिलामय है । इसी से लोगो मे धवल गिरि
अष्टापदगिरि-कल्प [२०५]
नाम भी प्रसिद्ध है। आज भी अयोध्या के निकटवर्ती उड्डयकूट पर
स्थित होने पर आकाश निर्मल हो तो उसकी धवल शिखर
पंक्तियाँ दीखती हैं। फिर वह महासरोवर, घने सरस वृक्ष, पानी
के पूर वाले झरनो से युक्त, परिपार्श्व मे सचरण करते जलधर,
मत्त मोर आदि पक्षियो के कोलाहल युक्त, किन्नर-विद्याधररमणियो
से रमणीक, चैत्यो को वदन करने के लिए आने वाले चारण-
श्रमणादि लोगो के दर्शनमात्र से भूख प्यास हरण करने वाला,
निकटवर्त्ती मानसरोवर विराजित है। इसकी उपत्यका मे साकेत-
वासी लोग नाना प्रकार की क्रीडाएँ कराते हैं।
इसी के शिखर पर ऋषभदेव स्वामी चतुर्दश भक्त से पर्यंकासन
स्थित, दस हजार अणगारो के साथ माघी कृष्ण त्रयोदशी के दिन
अभिजित नक्षत्र मे पूर्वाह्लि मे निर्वाण प्राप्त हुए। शक्रादि ने वहाँ
स्वामी का देह-सस्कार किया। पूर्व दिशा मे स्वामी की चिता,
दक्षिण दिशा मे इक्ष्वाकुवंशियो की और पश्चिम दिशा मे शेष
साधुओ की थी। उन तीन चितास्थानो पर देवो ने तीन स्तूप
किये। भरत चक्रवर्ती ने स्वामी के सस्कार के निकटवर्ती भूतल
पर एक योजन लंबा, आधा योजन चौडा, तीन कोश ऊँचा सिंह-
निषद्या नामक प्रासाद रत्नोपल-वार्द्धकि रत्न के द्वारा बनवाया।
उसके स्फटिक रत्नमय चार द्वार हैं। उभय पक्ष मे सोलह रत्न
चदन कलश हैं। प्रत्येक द्वार पर सोलह रत्नमय तोरण हैं। द्वार-
द्वार पर सोलह अष्टमंगल हैं। उन द्वारो मे चार विशाल मुख्य
मण्डप हैं। उन मुख्य मण्डपो के आगे चार प्रेक्षामण्डप हैं। उन
प्रेक्षामण्डपो के मध्य भाग मे वज्रमय अक्षवाटक हैं। प्रत्येक
अखाडे के बीच मे रत्नसिंहासन हैं। प्रत्येक प्रेक्षा-मण्डप के आगे
मणिपीठिकाएँ हैं। उनके ऊपर रत्नमय चैत्य-स्तूप हैं। उन चैत्य-
स्तूपो के आगे प्रत्येक के प्रतिदिशा मे वडी विशाल पूजा-मणि-
२०६ विविध तीर्थ-कल्प
पीठिका हैं। उन प्रत्येक के ऊपर चैत्य वृक्ष है। चैत्य स्तूप के
सम्मुख पाँच सौ धनुष प्रमाण वाली सर्वांग रत्न निर्मित ऋषभ-
वर्द्धमान-चन्द्रानन-वारिषेण नामक पर्यंकासन विराजित मनोहर
गास्वत जिनप्रतिमाएँ नन्दीश्वर द्वीप चैत्य मध्य स्थित की
भाँति है। उन चैत्य-स्तूपो के आगे प्रत्येक चैत्य-पादप है। उन
चैत्य-वृक्षो के आगे मणिपीठिकाएँ है। उन प्रत्येक के ऊपर इन्द्र-
ध्वजाओ के आगे तोरण और सोपान युक्त, स्वच्छ शीतल जल से
पूर्ण, विचित्र कमल शालिनी, मनोहर दधि मुखाधार पुष्करिणी
के सदृश नन्दा पुष्करिणी है।
सिंह-निषद्या महाचैत्य के मध्य भाग मे विशाल मणिपीठिका
है। उनके ऊपर चित्र रत्नमय देवच्छदक है। उसके ऊपर नाना
वर्ण के सुगम उल्लोच हैं। उल्लोचो के अन्तर पार्श्व मे वज्रमय
अंकुश हैं। उन अंकुशो से अवलम्बित घडे मे आने योग्य आँवले
जैसे प्रमाण के मुक्ताओ के हार हैं। हार-पक्तियो मे विमल मणि-
मालिकाएँ है। मणिमालिकाओ के नीचे वज्रमालिकाएँ है।
चैत्य भित्ती में विचित्र मणिमय गवाक्ष हैं, जिनमें जलते हुए अगर-
धूप समूह की मालिकाएँ हैं।
उस देवच्छदक मे रत्नमय ऋषभादि चौवीस जिनप्रतिमाएँ
अपने-अपने सस्थान, प्रमाण और वर्ण वाली भरत चक्रवर्तीकारित
हैं। उनमे सोलह प्रतिमाएँ ऋषभ, अजित, संभव, अभिनन्दन,
सुमति, सुपार्श्व, शीतल, श्रेयास, विमल, अनन्त, शान्ति, कुन्थु,
अर, नमि और महावीर भगवान की स्वर्णमय हैं। मुनिसुव्रत और
नेमिनाथ की लाजवर्तमय है। चन्द्रप्रभ और सुविधिनाथ की
स्फटिक रत्नमय हैं। मल्लि और पार्श्वनाथ की वैडूर्यमय हैं। पद्म-
प्रभ और वासुपूज्य भगवान की पद्मरागमय हैं। उन सब प्रतिमाओ
के लोहिताक्ष प्रतिपेक पूर्ण अंक रत्नमय नख हैं। नखपर्यन्त
जावयर के जैसे लोहिताक्ष मणि रस का जो सिंचन किया जाता
अष्टापदगिरि-कल्प [पृष्ठ २०७]
है उसे प्रतिषेक कहते हैं । नाभि, केशान्तभूमि, जिह्वा, तालु,
श्रीवत्स, चुचुक, हाथ और पाँवो के तले तपनीय स्वर्णमय हैं।
नयनपद्म, कनीनिकाएँ, मगु, भौंहे, रोम और गिरके केश अरिष्ट-
रत्नमय हैं। ओष्ठ विद्रुममय हैं, दन्त स्फटिकमय हैं, गीर्षघटिका
वज्रमय हैं। अन्दर लोहिताक्ष प्रतिषेक वाली स्वर्णमय नासिकाएँ
हैं। लोहिताक्ष प्रतिषेक प्रान्त वाले अंकमय लोचन हैं। उन
प्रतिमाओ के पृष्ठ भाग मे प्रत्येक के एक-एक मुक्ताप्रवाल जाल
कस कोरट मल्ल दाम वाली, स्फटिक मणि-रत्न के दण्ड वाली,
श्वेत छत्र के धारण करने वाली छत्रधर प्रतिमाएँ हैं। उनके
दोनो ओर प्रत्येक उठाए हुए मणिचामरो वाली रत्नमयी चामर-
धारिणी प्रतिमाएँ हैं। प्रतिमाओ के आगे दो-दो नागप्रतिमाएँ,
दो-दो यक्षप्रतिमाएँ, दो-दो भूतप्रतिमाएँ, दो-दो कुण्डधारिणी
प्रतिमाएँ सर्वाङ्गोज्ज्वल रत्नमयी कृताञ्जलि हो पर्युपासना करती
हैं। तथा देवछंदा मे चौवीस रत्न घण्टे, चौवीस माणिक्य दर्पण और
वैसे ही स्वर्णमयी स्थान स्थित दीपिकाएँ है। तथा रत्नकरण्डक
पुष्प चगेरियाँ, लोमहस्त, पटलिकाएँ, आभरणकरण्डक कनकमय
हैं। धूपदहनक, आरतियाँ, रत्नमय मगलदीप, रत्नमय भृगार,
रत्नमय स्थाल, सोने के प्रतिग्रह, रत्नचन्दन के कलश, रत्नमय
सिहासन, रत्नमय अष्टमङ्गल, स्वर्णमय तेल के डब्बे, कनकमय
धूपभाण्ड और स्वर्णमय कमलहस्तक हैं। ये सब प्रत्येक प्रतिमा के
आगे होते हैं। वह चैत्य चन्द्रकान्त गाल से शोभित है। ईहामृग,
वृषभ, मकर, तुरगम, नर-किन्नर, विहग, वालग, रुरु, गरभ,
चमरी, गज, वनलताओ से विचित्रित रत्नस्तम्भो से समाकुल है।
स्वर्ण के ध्वज-दण्डमण्डित पताका है। उपरिस्थित किकिणी शब्द
से मुखर ऊपर पद्मराग कलश से विराजित और गोशीर्ष चन्दनरस
के हस्तको से लांछित है। विचित्र चेष्टाओ वाली, अधिष्ठित
नितम्ब वाली माणिक्य की गालभजिकाएँ, चन्दनरस से लिप्त