विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 117, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ विविध तीर्थ-कल्प
योगी ने अपनी विद्या से दो प्रहर मे वैसा कर दिया।
श्रीमाता ने अपनी शक्ति से बनावटी कुर्कुट शब्द किया और
उसके निषेध करने पर भी वह उसका छल जानता हुआ
विवाह के लिए ठहर गया। योगी ने नदी के किनारे विवाह
सामग्री सहित उसे बैठाया। श्रीमाता ने कहा—त्रिशूल छोड़ कर
विवाह करने के लिए मेरे पास बैठो ! वह वैसा ही करके बैठा तो
श्रीमाता ने कुत्ते लगा कर उसकी आंखो को विकृत कर दिया और
उसी की शूल से उसका हृदय वेध कर वध कर डाला। इस प्रकार
आजन्म अखण्ड शील पालन करके श्रीमाता स्वर्ग को प्राप्त हुई।
राजा श्री पुञ्ज ने उस शिखर पर उसका प्रासाद बनवाया।
छह महीनो के बाद अर्बुद नामक सांप पहाड़ के नीचे चलता
है जिसके पहाड कम्पन होता है इसी से सभी प्रासाद विना शिखर
के हैं। लौकिक मे भी कहते हैं कि—
पहले यह हिमाचल का पुत्र नन्दिवर्द्धनगिरि था, कालान्तर मे
अर्बुदनाग का अधिष्ठान होने से "अर्बुद" नाम हो गया। इस
पर धनवानो के बारह गाँव बसते हैं। गोग्गलिक तापस और
राष्ट्रीय लोग मे हजारो हैं। न तो ऐसा वृक्ष है न वल्ली, न पुष्प,
न कन्द और न फल है एवं न ऐसी खान है जो यहाँ न देखी
जाती हो। यहाँ प्रदीप्तिमान् महौषधियाँ हैं जो रात्रि मे ज्वाज्ज्व-
ल्यमान रहती हैं। सुगन्धित और रसाढ्य दोनो प्रकार के वन हैं।
स्वच्छद छलकती हुई स्वच्छ लहरो वाली मन्दाकिनी नदी
है जिसके तट पर फूलो के वृक्ष हैं और पिपासुओ को तृप्त—
आनन्दित करने वाली सुशोभित है। इस गिरिराज के हजारो
उत्तुंग शिखर प्रकाशित है जहाँ सूर्य का रथ-सारथी भी क्षण
मात्र स्खलित हो जाता है। चण्डाली-वज्र-तैलेभ कन्दादि कन्दो
की जातियाँ उन-उन कार्यों को सिद्ध करने वाली पद-पद पर
देखी जाती हैं। यहाँ के आश्चर्यजनक कुण्ड, धातु-खाने तथा