विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्बुदगिरि-कल्प ३५
अमृत जल वाले झरणो के कारण यह समृद्ध प्रदेश है। कोयल के
उच्च स्वर से कूकने पर शीघ्र कोकूयित कुण्ड से खल-खल गब्द
करता हुआ जल का प्रवाह प्रादुर्भूत होता है।
श्रीमाता, अचलेश्वर, वशिष्ठाश्रम आदि लौकिक तीर्थ और
मन्दाकिनो आदि भी है। इस महागिरिराज के नेता परमार
नरेश्वर हैं जिनकी राजधानी चन्द्रावती नगरी लक्ष्मी की निधान
है। विमलबुद्धिकलित विमल दण्डनायक ने यहाँ ऋषभदेव
भगवान की पित्तलमय प्रतिमावाला चैत्य बनवाया। उसने चम्पक
वृक्ष के सान्निध्य मे पुत्र सम्पदा एवं तीर्थोद्धार की वाञ्छा से
भगवती अम्बा की आराधना करके श्रीमाता के मन्दिर के पास
पुष्प-मालादि से रुचिर और गोमय गोमुख देखकर वहाँ शुल्क
देकर जमीन ग्रहण की। गुर्जरेश्वर पर क्रुद्ध राणा श्री धाधूक
को भक्ति से प्रसन्न कर चित्रकूट से लाकर उसके वचनो से विक्रम
स० १०८८ मे प्रचुर द्रव्य व्यय द्वारा उसने "विमल वसति"
नामक उत्तम प्रासाद बनवाया। यहाँ बहुत प्रकार से पूजित
अम्बिका देवी यात्रागत सघ के गहन विघ्नो का नाश करती है।
युगादिदेव के चैत्य के सामने यहाँ एक रात्रि मे शिल्पी ने पाषाण-
मय घोडा घढ कर तैयार किया।
विक्रम संवत् १२८८ मे सचिवो मे चन्द्र के समान तेजपाल ने
लूणिगवसही नामक नेमिनाथमन्दिर का निर्माण कराया। श्री
स्तम्भतीर्थ मे निष्पन्न कसौटी का नेत्रामृताञ्जन बिम्ब तेजपाल
मन्त्री ने वहाँ स्थापित किया। उसने श्री सोम दिग्पाल के निर्देग
से अपने पूर्णजो की मूर्तियाँ हस्तिगाला मे विराजमान की।
अहो ! सूत्रधार शिरोमणि शोभन देव् ने इस चैत्य गिल्प की
रचना से अपना नाम सार्थक कर दिया। इस अर्बुद के अनुज
मैनाक पर्वत की समुद्र ने वज्र से रक्षा की और इसने भवदण्ड से
मन्त्रीश्वरो की रक्षा की।