विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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प्रेत, शाकिनी प्रमुख क्षुद्रोपद्रव विशेष कर भव्य जीवो को पराभव
नही करते । सकल अतिशयो की निधान रूप यह नगरी है ।
यह अहिच्छत्रा नगरी का कल्प पद्मावती धरणेन्द्र और कमठ
के प्रिय श्री जिन प्रभुसूरि ने सक्षेप से वर्णन किया है ।
॥ अहिच्छत्रा-कल्प समाप्त हुआ ग्रथाग्र० ३६ ॥
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८. अर्बुदगिरि-कल्प
श्री आदिनाथ और नेमिनाथ अर्हन्तो को नमस्कार करके
अर्बुद महागिरि का कल्प लेशमात्र कहता हूँ । पहले श्रीमाता
देवी की उत्पत्ति यथाश्रुत कहूँगा, जिसके अधिष्ठान से यह पर्वत
पृथ्वी मे प्रख्यात हुआ है ।
श्री रत्नमाल नगर मे रत्नशेखर राजा हुआ, नि सन्तान होने
से दुखी हो उसने शाकुनिक लोगो को बाहर भेजा । उन्होने शिर
पर काष्ठ-भार लिए कष्टपूर्वक चलने में दुर्गत स्त्री को देख
कर राजा को बतलाया कि इसका पुत्र आपके पद पर राजा
होगा । राजा के आदेश से उन लोगो ने उस सगर्भा को मारने
के लिए गर्त मे डाल दिया । वह कार्यचिन्ता के बहाने उससे
बाहर निकली और उस भयार्त्ता ने पुत्र प्रसव कर झाडी मे रख
दिया । इस घटना से अज्ञात उन लोगो ने गर्त मे लाकर उसे
मार डाला ।