विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
१०. अश्वावबोध तीर्थ-कल्प
मात्र परोपकार रसिक, श्याम कान्ति वाले श्री मुनिसुव्रत
जिनेश्वर को नमस्कार करके मैं श्री अश्वावबोध तीर्थ का कल्प
सक्षेप से कहता हूँ ।
श्री मुनिसुव्रत स्वामी केवल ज्ञान उत्पन्न होने के पश्चात्
विचरते हुए एकवार पैठानपुर (पैठण) (प्रतिष्ठानपुर) से एक
रात्रि मे साठ योजन उल्लघन करके जितशत्रु राजा के अश्वको
प्रतिबोध देने के लिए लाट देग मडन नर्मदा नदी अलकृत भरुअच्छ
(भरोच) नगर के कोरिंट वन में पहुँचे । जितशत्रु ने अपने प्रारभ
किए हुए अश्वमेध यज्ञ में अपने सर्वलक्षणसम्पन्न अश्व को होम-
ने की इच्छा की थी । अत आर्त्तध्यान के द्वारा दुर्गति मे न जाय
इसीलिए भगवान उसे प्रतिबोध देने के लिए पधारे थे । उन्हे वन्दन
करने के लिए लोग समवशरण मे आये, राजा भी गजारूढ होकर
आया और भगवान को वदन किया । इसके बाद अश्व भी अपने
साथ चलने के लिए नियुक्त पुरुषो के साथ स्वेच्छा से विचरता
हुआ समवशरण मे आया और स्वामी का अनुपम रूप देखकर
निश्चल खडा हो गया । उसने धर्म-देशना सुनी, प्रभु ने उसे पूर्व
भव इस प्रकार कहा—
पूर्व भव मे मैं इसी जम्बूद्वीप के पश्चिम विदेह क्षे त्र के पुष्कल
विजय की चम्पा नगरी मे सुरसिद्ध नामक राजा था । तुम मेरे
परम मित्र मतिसार नामक मत्री थे । मैं नन्दन गुरु के चरणो मे
प्रव्रजित होकर प्राणत कल्प-देवलोक मे गया । वहाँ बीस सागरो-
पम की आयु पूर्ण की, वहाँ से च्यव कर तीर्थंकर हुआ हूँ । तुम
नरायु बाँधकर भारत वर्ष के पद्मिनीखंड नगर मे सागरदत्त नामक
सार्थवाह हुए। तुम विनीत परन्तु मिथ्यादृष्टि थे। एक वार तुमने
शिवायतन बनवाया, उसमे पूजा के लिए वगीचा भी लगाया और
एक तापस को उसकी सार संभाल के लिए नियुक्त कर दिया।
गुरु के आदेश से तुम सभी क्रिया कलाप करते हुए काल निर्गमन
करते थे। जिनधर्म नामक श्रावक के साथ तुम्हारी गाढ मित्रता
हो गई। एक वार तुम उसके साथ साधुओ के पास गए। उन्होने
देशना के पश्चात् कहा—“जिसने अगूठे के पैरवे जितनी भी
जिनेश्वर भगवान की प्रतिमा बनवायी है उसने निश्चित ही नरक-
तिर्यंच गति के द्वार के अर्गला लगा दी है।”
तुम ऐसा सुनकर घर आये और सोने की जिनप्रतिमा
बनवायी। उसकी प्रतिष्ठा करवा के तुमने त्रिकाल पूजा करना
प्रारंभ कर दिया। एक वार माघ-मास मे लिंगपूरण पर्वाराधन के
के लिए तुम शिवायतन गये तब जटाधारी ने चिरसचित घृत के
घडे लिंग-पूरणार्थ निकाले। उनमे लगी घृतेलिकाओ को तापस के
द्वारा निर्दयता पूर्वक पाँवो से मसले जाते देख कर तुम शिर धुनते
हुए कहने लगे—ये दर्शनी लोग भी इतने निर्दयी हैं तो हमारे जैसे
गृहस्थ विचारे क्या जीवदया पालेगे ? फिर तुमने अपने वस्त्राञ्चल
से प्रमार्जन करना प्रारंभ किया। जटी ने तुम्हे फटकारते हुए
कहा—'अरे धर्म संकर ! कायर ! तुम अरहन्त-पाखण्डियो द्वारा
विडम्बित हो !' तब ऐ तुम सव धर्मो से विमुख हो गए। निर्दयता
पूर्वक धर्म रसिक लोगो को हँसते हुए मायारंभ से तुम तिर्यंचायु
बाँधकर भव भ्रमण करते हुए राजा के वाहन अश्व हुए। तुम्हे
प्रतिबोध देने के लिए ही हमारा यहाँ आगमन हुआ है।
स्वामी के ऐसे वचनो को सुनकर उस घोडे को जाति स्मरण
हो गया। उसने सम्यक्त्व मूल श्रावक धर्म स्वीकार कर सचित्त
का त्याग कर दिया और प्रासुक जल व सूखा घास ग्रहण करने
लगा। छह मास पर्यन्त इन नियमो का पालन करते हुए मरके
सौधर्म कल्प मे महर्द्धिक देव हुआ। उसने अवधि ज्ञान से अपना
पूर्व भव ज्ञात कर भगवान के समवगरण स्थान रत्नमय चैत्य
कराया। उसमे भगवान मुनिमुव्रत स्वामी की प्रतिमा और अपना
भी अश्वरूप स्थापित कर वह देवलोक में लौट गया। तब से
अश्वाववोध तीर्थ प्रसिद्ध हुआ। वह देव यात्री सघ के विघ्न दूर
कर तीर्थ को प्रभावना करता हुआ मानव भव प्राप्त कर यथा-
समय मोक्ष जावेगा।
कालान्तर मे वह तीर्थ गमलिका विहार नाम से प्रसिद्ध
हुआ। कैसे ? यह बतलाते है। इसी जम्बू द्वीप के सिंहल द्वीप
मे रत्नासय देश के श्रीपुर नगर मे चन्द्रगुप्त नाम का राजा
था, उसके चन्द्रलेखा भार्या थी। रानी के सात पुत्रो के वाद नर-
दत्ता देवी की आराधना से सुदर्शना नामक पुत्री हुई। उसने
समस्त कला और विद्याओ का अध्ययन कर तरुणावस्था प्राप्त
की। एक दिन वह राज-सभा मे पिता के गोद मे बैठी थी तब
धनेश्वर नामक एक व्यापारी भरौच से आया। वैद्य से पास रही
हुई कटुक गन्ध के प्रभाव से छीकते हुए उसने “णमो अरहंताण”
उच्चारण किया जिसे सुनकर राजकुमारी मूर्च्छित हो गई, वणिक
पीटा गया। सचेत होकर जाति-स्मरण प्राप्त राजकुमारी अपने
धर्म-बन्धु को देख कर प्रमुदित हुई। राजा द्वारा मूर्च्छा का कारण
पूछने पर उसने कहा—
मैं पूर्वजन्म मे भरुअच्छ मे नर्मदा तट पर कोरिट वन स्थित
-वट वृक्ष पर शमली-पक्षी थी। प्रावृप काल मे सात रात्रि तक महा-
वृष्टि हुई, आठवें दिन नगर मे क्षुधातुर भ्रमण करते हुए मैं व्याध
के गृहाङ्गण से मास-पिण्ड ले उडी। पीछा करते हुए व्याध ने
अश्वाववोध तीर्थ-कल्प ४७
मुझ वट-शाखा पर बैठी हुई को तीर से वींध डाला और मुह से
गिरे हुए मास-पिंड व तीर को लेकर व्याध अपने स्थान चला
गया। मुझे करुण चीत्कारपूर्वक बिलबिलाते-छटपटाते हुए देखकर
एक आचार्य महाराज ने जलपात्र से पानी छींट कर नवकार मन्त्र
सुनाया। मैंने श्रद्धा की और मरकर आपकी पुत्री हुई हूँ।
तब से वह राजकुमारी विषयला विरक्त हो गई और माता-
पिता को पूछ कर उसी श्रावक के साथ सात सौ जहाजो को
लेकर भरौंच के लिए रवाना हो गई। उनमे १०० जहाज वस्त्र,
१०० जहाज द्रव्य निचय, अगर-चन्दन, धान्य, जल, ईंधन, नाना
पक्वान्न, फल, प्रहरणादि के कुल छ सौ जहाज थे, पचास जहाजो
मे शस्त्र घर व पचास मे भेंट प्राभृत थी। इस प्रकार सात सौ
वाहन युक्त वह भरौंच के समुद्र तट पर पहुँची। राजा ने वाहन
समूह को देख कर सिंहल नरेश की चढाई की आशंका से नगर
क्षोभ को दूर करने के लिए सेना को सुसज्जित किया और भेट-
४८ विविध तीर्थ-कल्प
उत्तर श्रेणी मे सुरम्या नामकी नगरी मे विद्याधरेन्द्र सख नामका
राजा था जिसकी तुम विजया नामक पुत्री थी एक वार दक्षिण
श्रेणी के महिस ग्राम मे जाते हुए तुमने नदी तट पर कुक्कुट सर्प
देखा और उसे रोष वश मार डाला । वहाँ नदी तट पर स्थित
जिनायतन देखकर तुमने अत्यन्त भक्ति पूर्वक भगवान के दर्शन
किये जिससे परम आनन्द हुआ । मन्दिर से बाहर निकलते तुमने
मार्गश्रम से खिन्न एक साध्वी को देखा । उनकी चरण-वन्दना
कर धर्म श्रवण किया । तुम भी उसकी विश्रामणादि द्वारा सुश्रुषा
करके देर से घर आई । क्रमशः तुम आर्त्त ध्यान से मर के
कोरिष्टक वन मे शमली हुई । वह कुक्कुट सर्प मर के व्याध हुआ
और पूर्व भव के वैर से उसने तुम्हे शमली के भव मे बाण से
मारा । पूर्व भव मे जिन भक्ति और ग्लान साध्वी की सुश्रुषा के
कारण तुम अन्त मे वोध प्राप्त हुई और जिनप्रणीत दानादि धर्मा-
चरण कर रही हो । “इस प्रकार गुरु-महाराज के वचनो को
श्रवण कर सुदर्शना अपने समस्त द्रव्य को सात क्षेत्रो मे व्यय
करने लगी । चैत्योद्धार कराया, चौवीस देव कुलिकाए, पौषध-
शाला, दानशाला, अध्ययनशालाएं कराईं । अत. वह तीर्थ पूर्व
भव के नाम से “शमलिका विहार” कहलाया । अन्त मे उसने
द्रव्य भाव से संलेखना पूर्वक अनशन किया और मिती वैशाख
शुक्ल ५ को ईशान देव लोक प्राप्त हुई ।
श्री मुनिसुव्रत भगवान के मोक्ष जाने के पश्चात् ग्यारह लाख
चौरासी हजार चार सौ सत्तर वर्ष बीतने पर विक्रमादित्य संवत्सर
प्रवृत्त हुआ । पुन मुनिसुव्रत स्वामी के जीवितकाल (की तत्कालीन
गणना) से ग्यारह लाख पचानवें हजार मे अट्ठाईस वर्ष न्यून
समय के वर्ष मे विक्रमादित्य होगा । यह शमली विहार की उत्पत्ति
हुई ।
भरु अच्छ (भृगुकच्छ-भरोच) मे अनेक लौकिक तीर्थ भी है ।
वैभारगिरि-कल्प ४९
क्रमश उदयन के पुत्र वाहडदेव ने शत्रुञ्जय-प्रासाद का उद्धार
कराया । उसके अनुज अम्बड़ ने अपने पिता के पुण्यार्थ 'शमली
विहार' का उद्धार कराया । मिथ्यादृष्टि सिन्धवा देवी ने प्रासाद
शिखर पर नाचते हुए अम्बड को उपसर्ग किया जिसे आचार्य
श्री हेमचन्द्र सूरि ने अपने विद्याबल से निवारण किया ।
अश्वावबोध तीर्थ का यह कल्प सक्षेप से श्री जिनप्रभसूरि ने
रचा है, भव्य जन इसे त्रिकाल पढें ।
॥ अश्वावबोध तीर्थ कल्प समाप्त हुआ । यह ८२ श्लोक और
अक्षर २० का है ॥
११. वैभारगिरि-कल्प
श्री जिनप्रभसूरि द्वारा वैभारगिरि का यह कल्प सक्षिप्त रुचि
वालो की सतुष्टि के लिए स्तवन के रूप मे बनाया जाता है ।
वैभारगिरि के गुण-प्राग्भार वर्णन करने मे बुद्धि से परिपूर्ण
भारती भी समर्थ नही है वहाँ हम कौन चीज है ?
जड-(बुद्धि) होते हुए भी हम तीर्थ की भक्ति रस-सिक्त गुणो से
युक्त उस सुशोभित तीर्थराज की किञ्चित् स्तवना करते हैं ।
यहाँ दारिद्रयविद्राविका रसकूपिका, गरम और ठण्डे पानी के
कुण्ड किसे कौतूहलपूर्ण नही करते ? यहाँ त्रिकूट खण्डिकादि
शिखर एव करण ग्राम के अवशेष घर और वन प्रकाशित हैं ।
४
५० विविध तीर्थ-कल्प
विविध व्याधियो को नष्ट करने के गुणयुक्त औषधियाँ,
मनोहर जल वाले ह्रद एव सरस्वती आदि पुण्यसलिला नदियाँ
यहाँ हैं।
यहाँ बहुधा मगधालोचनादि लौकिक तीर्थ हैं। यहाँ के चैत्यो
मे अर्हन्त भगवान की प्रतिमाएँ और खण्डित-भग्न मूर्त्तियाँ भी हैं।
जो मेरु पर्वत के चारो उद्यानो की पुष्प सख्या जानते हैं वे ही
यहाँ के सर्व तीर्थों की जानकारी बता सकते हैं।
श्रो गालिभद्र-धन्ना ऋषि ने यहाँ तप्त शिलाओ पर कायोत्सर्ग
किया, उन्हे देखने से पुरुषो के पाप नष्ट हो जाते हैं।
यहाँ सिंह, गार्दूल, भालू भेड़िये आदि तीर्थ के माहात्म्य से
कभी भी उपद्रव नही करते ।
यहाँ बौद्ध विहार भी प्रति प्रदेश मे देखे जाते हैं। यहाँ उन
महर्षियो ने आरोहण कर निर्वाण प्राप्त किया था।
यहाँ जो दुर्गम अन्धेरी गुफा है, सुना जाता है कि यहाँ पूर्व
काल मे रोहिणेय चोर आदि वीरो का निवास रूप था।
राजगृह के प्राचीन नामादि
इसकी उपत्यका मे राजगृह नगर सुशोभित है, जिसके क्षिति-
प्रतिष्ठादि नाम जब तब हुए हैं। क्षितिप्रतिष्ठ, चणकपुर,
ऋषभपुर, कुशाग्रपुर नामो के पश्चात् क्रमश राजगृह नाम हुआ।
यहाँ नयनो को शीतल करने वाला गुणशिल चैत्य था जहाँ
भगवान महावीर स्वामी का समवशरण होता था।
जहाँ पर मेतार्य ने सोने का किल्ला वनवाया और पूर्व भव
के मित्र देवता ने वहाँ मणियाँ लगवाईं।
जगत् मे चमत्कार उत्पन्न करने वाली लक्ष्मी का भोग करने
वाले यहाँ शालिभद्रादि अनेक महा धनिक सेठ हुए हैं।
यहाँ छत्तीस हजार वणिको के घर थे, जिनमे आधे बौद्ध और
आधे जैन थे।
वैभारगिरि-कल्प ५१
यहाँ के प्रासादों की श्रेणी अत्यन्त प्रेक्षणीय, कल्याणकारी थी
जिनके आगे स्वर्ग के विमानो ने भी अभिमान छोड़ दिया था।
जहाँ जगत के मित्र सुमित्रवंशरूपी कमल को प्रकाशित
करने मे सूर्यवत् मुनिसुव्रत जिनेश्वर हुए, जिनके द्वारा अश्व को
अवबोध हुआ और वह व्रती बना।
जहाँ श्रीमान् जरासन्ध, श्रेणिक, कोणिक, अभयकुमार,
मेघकुमार, हल्ल विहल्ल नन्दिषेण हुए। जम्बू स्वामी, प्रभव,
शय्यभवसूरि आदि मुनि और नन्दादि पतिव्रता स्त्रिया हुई।
यहाँ श्रीमहावीर प्रभु के ग्यारह गणधर पादपोपगमनपूर्वक
मोक्ष प्राप्त हुए। भगवान के ग्यारह गणधरो मे प्रभास नामक
गणधर ने यही जन्म लेकर इसे पवित्र किया था।
जहाँ श्री वीर प्रभु ने चौदह चातुर्मास किए, ऐसे नालदालकृत
स्थान वाली नगरी कैसे पावन नही है ? जहाँ के अनेक तीर्थ अशेष
नयनाभिराम और भव्यो को आनन्ददायक है वह नालंदा हमे
पावन करे।
रणाङ्गण मे शत्रुओ को अपने नाद से भगा देने वाला क्षेत्रपाल
मुख्य मेघनाद किन पुरुषो की इच्छा पूर्ण नही करता ?
कल्याणक स्तूप के पास जो गौतम स्वामी का मन्दिर है,
दर्शन मात्र से नमस्कार करने वाले प्राणियो की प्रीति को पुष्ट
करता है।
विक्रम संवत् १३६४ मे देवताओ द्वारा सेवित वैभारगिरि तीर्थ
का शिखर रूपी कल्पवृक्ष सेवा करने वालों को लक्ष्मी प्रदान करे।
वैभारगिरि के स्वामी का गुणसमूह कहने मे संलग्न श्री जिनप्रभ
सूरि की यह सूक्ति भक्तियुक्त धीरबुद्धिवाले मनुष्य इसके कोमल
और विशद पदो को पढे।
श्री वैभारगिरि महातीर्थ का कल्प ग्र० ३१ अक्षर २ मे है।
१२ कौशाम्बीनगरी-कल्प
वत्स जनपद मे कौशाम्बी नामक नगर थी, जहाँ चन्द्र और
सूर्य श्री वर्द्धमान स्वामी को वन्दनार्थ अपने विमान सहित आये।
उनके प्रकाश के कारण समय न जानने से मृगावती समवसरण
मे बैंठी रही। चन्द्र-सूर्य के स्वस्थान जाने पर वह आर्या चन्दन-
वालादि साध्वियो के प्रतिक्रमण करने के पश्चात् उपाश्रय पहुची।
आर्या चन्दना से उपालम्भ पाकर चरणो मे गिर के स्व अपराध
को खमाते हुए केवलज्ञान प्राप्त किया।
जहाँ उज्जयिनी से पुरुषपरम्परा द्वारा लायी हुई ईंटो चण्ड-
प्रद्योतन राजा द्वारा मृगावती के कहने से बनवाया हुआ दुर्ग आज
भी खडा है।
जहाँ मृगावती की कुक्षी से उत्पन्न गन्धर्ववेदनिपुण शतानीक
पुत्र उदयन वत्स देशाधिप हुआ।
वहाँ के मन्दिरो से प्रेक्षक जनो के नयनाभिराम अमृताञ्जन
सदृश जिन प्रतिमाएँ है। वहाँ कालिन्दी-यमुना नदी की जल
लहरियो से आलिंगित होते हुए वन है।
यहाँ पौष कृष्ण प्रतिपदा के दिन अभिग्रह धारण करने वाले
भगवान महावीर का पाँच दिवस न्यून छ मासी तप का पारणा
चन्दनवाला ने सूप के कोने मे रहे हुए उडद के वाकुलो से
कराया। देवो ने साढे बारह कोटि वसुधारा-वर्षा की, जिससे आज
भी वसुहार नाम से प्रसिद्ध गाँव नगरी के पास वसता है। पच
दिव्य प्रकट हुए। उस दिन से ज्येष्ठ शुक्ल १० को स्वामी के पारणा
के दिन तीर्थ स्नान-दानादि आचार वहाँ आज भी लोगो मे
प्रवृत्त है।
अयोध्यानगरी-कल्प ५३
यहाँ पद्मप्रभ स्वामी के च्यवन-जन्म-दीक्षा और केवलज्ञान-
कल्याणक हुए हैं।
यहाँ स्निग्ध छाया वाले को सव वक्ष अधिक परिमाण मे देखे
जाते है।
यहाँ पद्मप्रभ भगवान के मन्दिर मे प्रभु को पारणा कराती
हुई चन्दनवाला की मूर्त्ति दिखायी देती है।
आज भी वहाँ उस मन्दिर मे प्रगान्तमूर्त्ति सिंह प्रतिदिन
आकर भगवान की भक्ति करता है।
जिनेश्वर के जन्म से पवित्रित कोगाम्बी नगरी महातीर्थ
श्री जिनप्रभ सूरि द्वारा स्तुत्य हमे गिव-मोक्ष दे।
कौशाम्बी नगरी का यह कल्प समाप्त हुआ, इसके श्लोक १८
और अक्षर २१ हैं।
१३. अयोध्यानगरी-कल्प
अयोध्या नगरी के अउज्झा, अवज्झा, कोसिला, विनीता,
साकेत, इक्ष्वाकुभूमि, रामपुरी, कोसल आदि सब एक ही पर्याय
हैं। यह श्री ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनन्दन, सुमतिनाथ और
अनन्तनाथ जिनेश्वर तथा महावीर स्वामी के नौवें गणधर अचल
भ्राता की जन्मभूमि है और रघुवंशोद्भव दशरथ, राम, भरत
आदि का राजस्थान है। विमलवाहन आदि सात कुलकर यही
उत्पन्न हुए थे।
५४ विविध तीर्थ-कल्प
भगवान् ऋषभदेव स्वामी का राज्याभिषेक युग्लियो ने पत्र-
सम्पुट मे जल लेकर चरणो मे छोड कर किया तो शक्रेन्द्र ने उन्हे
विनीत पुरुष कहा, जिससे विनीता नगरी नाम रूढ हुआ।
यहाँ महासती सीता ने आत्म-शुद्धि करते हुए अपने शील के
वल से अग्नि को जलपूर्ण किया। वह जल का पूर जब नगरी
को डुबाने लगा तो उस सती ने ही अपने शील के माहात्म्य से
उसकी रक्षा की।
यह अर्द्ध भरत-गोलार्द्ध पृथ्वी के मध्य मे नवयोजन विस्तीर्ण
और बारह योजन दीर्घ है। यहाँ आयतनस्थित रतनमय चक्रेश्वरी
प्रतिमा और गोमुख यक्ष विघ्नो को शीघ्र हरण करते हैं। यहाँ
घग्घर दह सरयू नदी के साथ मिल कर स्वर्गद्वार नाम से प्रसिद्धि
प्राप्त है।
यहाँ से उत्तर दिशा मे बारह योजन पर अष्टापद पर्वत है जहाँ
आदीश्वर भगवान सिद्धि को प्राप्त हुए। वहाँ भरतेश्वर ने सिंह-
निष्ध्या नामक आयतन तीन कोरा ऊँचा कराया। अपने-अपने
वर्ण और सस्थान युक्त चौबीस जिन-तीर्थंकरो के विम्ब स्थापित
किए। वहाँ पूर्व द्वार मे ऋषभ अजित दो, दक्षिण द्वार मे सभव-
नाथादि चार, पश्चिम द्वार मे सुपार्श्वनाथादि आठ, उत्तर द्वार मे
धर्मनाथादि दस तीर्थङ्कर एव अपने सौ भ्राताओ के स्तूप भी उसी
ने बनवाये।
इस नगरी के वास्तव्य लोग अष्टापद की उपत्यका मे क्रीडा
करते थे।
जहाँ से नवाङ्गी वृत्तिकारक (श्री अभयदेवसूरि) की शाखा मे
समुद्भूत श्री देवेन्द्रसूरि दिव्य शक्ति से आकाश मार्ग द्वारा चार
महाविम्ब सेरीसयपुर मे लाये।
जहाँ आज भी नाभिराजा का मन्दिर-महल है। वहाँ पार्श्व-
नाथ वाटिका, सीताकुण्ड व सहस्रधारा है। प्राकार स्थित मत्त-
[Header]
अयोध्यानगरी-कल्प ५५
गयंद यक्ष है जिसके आगे से आज भी हाथी नही निकलते, यदि
जाते है तो मर जाते है ।
गोपदराई आदि अनेको लौकिक तीर्थ वहाँ वर्त्तमान है ।
इस अयोध्यानगरी के गढ की दीवाले सरयू नदी के जल से
सिंचित है । जैनशास्त्र विहित सप्ततीर्थी यात्रा से पवित्रित जन
जयवन्त है ।
श्री देवेन्द्रसूरिजी महाराज अयोध्यापुरी से चार बिम्ब कैसे
लाए ? यह बतलाते हैं । सेरीषक नगर मे विचरने वाले, धरणेन्द्र-
पद्मावती आराधित छत्तावल्लीय श्री देवेन्द्रसूरि ने उक्कुरुडि स्थान
पर कायोत्सर्ग किया था । उनके कई वार ऐसा करने पर श्रावको
ने पूछा—भगवन् ! यहाँ कायोत्सर्ग करने मे क्या विशेषता है ?
सूरि महाराज ने कहा—यहाँ पाषाणफलक है, जिसकी पार्श्वनाथ
प्रतिमा बनवाने पर सन्निहित प्रातिहार्य होगी । श्रावको की प्रार्थना
से सूरिजी ने अष्टम तप करके पद्मावती का आराधन किया ।
भगवती ने प्रत्यक्ष होकर कहा—सोपारक मे अन्धा सुथार है, वह
यदि यहाँ आकर अष्टम तपपूर्वक सूर्यास्त के समय फलक गढ़ना
प्रारम्भ करे और दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व पूर्ण करे तो वह
प्रतिमा निष्पन्न हो जायगी । श्रावकों ने उसे बुलाने के लिए
सोपारक नगर पुरुष भेजे । वह सुथार आ गया और उसी प्रकार
घडना प्रारम्भ किया । धरणेन्द्र को धारण की हुई पार्श्वनाथ
प्रतिमा निष्पन्न हुई । सूत्रधार द्वारा घडते हुए प्रतिमा के हृदय
पर मस्सा प्रादुर्भूत हुआ । उसने उसकी उपेक्षा करके बाकी
प्रतिमा घटित की । फिर प्रतिमा को समारते हुए मस्सा देखा ।
उसने टंकी चलाई, रुधिर निकलने लगा । सूरि महाराज ने कहा—
तुमने यह क्या किया ? इस मस्से के रहते यह प्रतिमा अतीव
अद्भुतहेतुक सप्रभाव होती । उन्होने अँगूठे से दबा कर रुधिर
बन्द कर दिया ।
५६ विविध तीर्थ-कल्प
उस प्रतिमा के वनने पर अन्य भी चौवीस जिन-विम्व खान
से लाकर स्थापित किए । फिर दिव्य शक्ति से अयोध्या से तीन
महाविम्व रात्रि मे आकाश मार्ग से लाये । चौथी प्रतिमा को
लाते हुए रात्रि वीत गई और धारासेणक ग्राम के खेत मे वह रह
गई । चालुक्यचक्रवर्त्ती महाराजा कुमारपाल ने चतुर्थ विम्व की
स्थापना की । आज भी सेरीसा मे महाप्रभावक पार्श्वनाथ भगवान
सघ द्वारा पूजे जाते हैं । वहाँ म्लेच्छ लोग भी उपद्रव नही कर
सकते । शीघ्रतावश घड़ने के कारण वैसे सलावण्य अवयव नही
देखे जाते । उस गाँव मे वह विम्व आज भी मन्दिर मे पूजा
जाता है ।
श्री अयोध्यापुरी का कल्प समाप्त हुआ, यह ४४ श्लोक व
९ अक्षर परिमित है ।
१४. अपापा (पावा) पुरी संक्षिप्त-कल्प
जिसके समीप सिद्धार्थ वणिक के कहने से खरक वैद्य ने स्नान
द्रोणी मे बैठाकर दोनो कानो मे गल्य खींचे जाने पर तीव्र पीडा
से अन्तिम जिनेश्वर के चीत्कार गब्द से प्रस्फुटित गिरि दरी मे
निकलने वाला पूर आज भी दिखाई पडता है ।
जृम्भिका से रात्रि मे ही महसेन नामक वन मे आकर चरम
जिनेश्वर-महावीर स्वामी ने वैशाख शुक्ल ११ को तीर्थ प्रवर्त्तन
किया और वहाँ पर गौतम स्वामी आदि ग्यारह गणधरो को
कालिकुण्ड कुक्कुटेश्वर-कल्प ५७
उनके छात्रो सहित दीक्षित किया था। उन्होने त्रिपदी से भव-
सागरनिस्तारिणी द्वादशाङ्गी ग्रथित की थी।
जहाँ हस्तिपाल राजा की गुल्मशाला मे अधिष्ठित श्री वर्द्ध-
मान प्रभु ने दो दिन का अनशन करके अन्तिम देशना-वृष्टि की।
स्वाति नक्षत्र के दिन अमावस्या की रात्रि के अन्त मे अतुलनीय
सुखश्री का स्थान शिव-मोक्ष प्राप्त किया, वह नगरियो मे श्रेष्ठ
पावा सर्वजनो को पापरहित बनावे।
जहाँ आज भी नागकुमार साँप के रूप मे प्रभाव दिखाते हैं।
जहाँ अमावस्या की रात्रि मे तैलरहित जल से भरे हुए दीपक
जलते हैं। अनेक आश्चर्यों की भूमि चरम जिनेश्वर—महावीर
स्वामी—के स्तूप से मनोहर स्वरूप वाली श्रेष्ठपुरी वह मध्यमा
पावा यात्रियो की समृद्धि के लिए हो।
श्री अपापा (पावापुरी) कल्प संपूर्ण हुआ, इसके ग्रंथाग्र० १०
अक्षर २१ है।
१५. कलिकुण्ड कुक्कुटेश्वर-कल्प
अग जनपद मे करकण्डु राजा के राज्यकाल मे चम्पा नगरी
से अनतिदूर कादम्बरी नामक अटवी थी। वहाँ कली नामक
पर्वत था जिसकी अधोभूमि मे कुण्ड नाम का एक सरोवर था।
वहाँ यूथाधिपति महीधर नाम का एक हाथी (रहता) था। एक
वार छद्मस्थ अवस्था मे विचरते हुए भगवान श्री पार्श्वनाथ स्वामी
५८ विविध तीर्थ-कल्प
कलिकुण्ड के समीप देग मे कायोत्सर्ग पूर्वक रहे। प्रभु को देखकर
उस यूथाधिपति हाथी को जातिस्मरण उत्पन्न हुआ। उसने
सोचा—मैं विदेह क्षेत्र मे हेमंधर नामक वामन था। युवक लोग
और विट पुरुष मेरा उपहास करते थे। वैर के वशीभूत होकर
नये हुए वृक्ष की शाखा पर फासी खाकर मरने की तैयारी मे मुझे
सुप्रतिष्ठ सेठ ने देखा। उन्होने मुझे कारण पूछा, मैंने यथास्थित
कहा तो वे मुझे सद्गुरु के पास ले गए। सम्यक्त्व ग्रहण कराया,
अन्त मे अनशन करके मैने निदान किया कि मैं भवान्तर मे ऊँचा
होऊँ। फिर मर के इस वन मे हाथी हुआ। अब इन भगवन्त की
पर्युपासना करूँ। ऐसा सोचकर वही सरोवर से सरस कमलो को
लाकर उनसे जिनेश्वर भगवान को पूजा की। पूर्वगृहीत सम्यक्त्व
परिपालित होने से अनशन करके वह व्यन्तर जाति मे महर्द्धिक
देव हुआ। चरो के मुँह से यह अत्यन्त विचित्र बात सुनकर
करकण्डू राजा वहाँ आया। भगवान को न देखकर राजा अत्यन्त
आत्मनिन्दा करने लगा कि—वह हाथो ही धन्य हो गया जिसने
भगवान की पूजा की, मैं तो अधन्य हूँ। इस प्रकार चिन्तन करते
उसके आगे धरणेन्द्र के प्रभाव से वहाँ नौ हाथ प्रमाण वाली प्रतिमा
प्रादुर्भूत हुई। राजा ने प्रसन्नतापूर्वक जय जयकार करते हुए
वन्दन-पूजन किया। और वहाँ चैत्य भी बनवाया। वहाँ पुष्पादि
से त्रिकालदर्शन-पूजन-स्तुति करते हुए राजा ने कलिकुण्ड तीर्थ
प्रकाशित किया। वहाँ वह हाथी व्यन्तर सान्निध्य करता है,
परचे पूरता है। नव यत्री आदि यन्त्र और कलिकुण्ड मन्त्र, षट्
कर्म कार्य प्रकाशित किए। जैसे ग्रामवासी जन गाँव के नाम से
पुकारे जाते है वैसे ही कलिकुण्ड निवासी जिनेश्वर भी कलिकुण्ड-
पार्श्वनाथ कहलाते हैं। यह कलिकुण्ड की उत्पत्ति हुई।
पहले छद्मस्थावस्था मे श्री पार्श्वनाथ स्वामी राजपुरी मे
कायोत्सर्ग ध्यान मे रहे। वहाँ घुडसवारी के लिए जाते हुए उस
नगर के स्वामी ईश्वर राजा के वन्दी वाणार्जुन ने भगवान को
देखकर गुणकीर्त्तन किया। "ये अश्वसेन राजा के पुत्र जिनेश्वर
देव हैं" यह ज्ञात कर राजा हाथी से उतर कर प्रभु के पास आकर
मूर्छित हो गया। चेतना प्राप्त होने पर मत्री के पूछने पर वह
अपना पूर्व भाव कहने लगा—जब मैं चारुदत्त होकर पूर्व भव मे
वसतलपुर नगर मे पुरोहितपुत्र दत्त था और कुष्ठादि रोगो से
पीडित हो गंगानदी मे पडते हुए चारण मुनि से बोध पाकर
अर्हिंसादि पचव्रत पालन करते इन्द्रिय-शोषण व कषायविजय
करने लगा।
अन्यदा चैत्यगृह मे आकर जिन-प्रतिमा को प्रणाम करते हुए
पुष्कलि श्रावक ने देखा, उसने मुनि गुणसागर से पृछा—भगवन् !
इसे मन्दिर मे आने मे दोष है या नही ? मुनिराज ने कहा—"दूर
से देव को प्रणाम करने मे क्या दोष है ?" आज भी यह कुर्कट
होगा" यह सुनकर खेद करते हुए फिर मुझे गुरु महाराज ने
सम्बोधित किया कि—तुम जातिस्मरण-अनशन से मर के
राजपुरी मे ईश्वर नामक राजा होओगे। तब मैं सन्तुष्ट हुआ
और वह सब अनुभव करके क्रमश
१६. हस्तिनापुर-कल्प
गजपुर (हस्तिनापुर) स्थित श्री शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ,
अरनाथ और मल्लिनाथ स्वामी को नमस्कार कर के हस्तिनापुर
तीर्थ का कल्प सक्षेप से कहता हूँ ।
श्री आदीश्वर भगवान तीर्थंकर के भरत और बाहुबली नाम
के दो पुत्र थे । भरत के सहोदर अठाणवे कुमार थे । भगवान ने
दीक्षा लेते समय भरत को अपने पद पर अभिषिक्त किया और
बाहुबली को तक्षशिला दी, बाकी पुत्रो को भी उन देशो मे
राज्यादि दिए । अग कुमार कें नाम से अग देश हुआ, कुरु के
नाम से कुरुक्षेत्र प्रसिद्ध हुआ । इसी प्रकार वग, कलिङ्ग, सूरसेन,
अवन्ती आदि हुए । कुरु राजा का पुत्र हस्ति नामक राजा हुआ
उसने हस्तिनापुर बसाया । वहाँ भागीरथी महानदी पवित्र जल
से पूर्ण प्रवाहित है ।
वहाँ सोलहवे शान्तिनाथ, सतरहवे कुन्थुनाथ, अठारहवे
अरनाथ तीर्थङ्कर हुए । इन्होने क्रमशः पाँचवे, छठे और सातवें
चक्रवर्ती हो कर छ खण्ड भर
हस्तिनापुर-कल्प ६१
शरीर विकुर्वित कर के तीन पाँव से त्रैलोक्याक्रान्त करके नमुचि
को शासित किया ।
इस नगर मे सनत्कुमार, महापद्म, सुभूम और परशुराम आदि
महापुरुष उत्पन्न हुए ।
इसी नगर मे पाँच पाण्डव चरम शरीरी उत्तम पुरुष हुए ।
दुर्योधनादि अनेक महाबलवान राजा यहाँ उत्पन्न हुए ।
यहाँ सात करोड स्वर्ण का अधिपति गङ्गदत्त सेठ हुआ । तथा
सौधर्मेन्द्र का जीव कार्त्तिक सेठ हुआ जिसने राजाभियोग से
परिव्राजक को परोसने से वैराग्यपूर्वक हजार व्यापारियो के साथ
श्री मुनि सुव्रत भगवान के पास दीक्षा ली ।
इस महानगरी मे श्रीशान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ और
मल्लिनाथ जिनेश्वर के मनोहर चैत्य हैं, एव अम्बा देवी का भी
देवकुल है ।
इस प्रकार अनेक आश्चर्यो के निधान इस महातीर्थ मे जो
विधिपूर्वक यात्रा महोत्सव आदि से जिन-शासन की प्रभावना
करते हैं वे कुछ भवो मे ही कर्म क्लेश नष्ट कर सिद्धि प्राप्त
करते हैं ।
श्री हस्तिनापुर तीर्थ का यह सक्षिप्त कल्प भी सत्पुरुषो की
सङ्कल्प-पूर्त्ति मे कल्प-वृक्ष की भाँति बने ।
श्री हस्तिनापुर का कल्प समाप्त हुआ इसकी ग्रन्थ संख्या
चौबीस और ११ अक्षर है ।
१७. सत्यपुर-साचौर-तीर्थकल्प
श्री ब्रह्मशान्ति यक्ष सेवित श्री वीर जिनेश्वर को नमस्कार
करके श्री सत्यपुर तीर्थ का कल्प किञ्चित् यथाश्रुत कहूँगा।
(वीर स०) १३०० मे श्रीकन्नौज नरपति द्वारा कारित देवदारुमय
जिनभवन मे श्री वीर जिनेश्वर सच्चपुर मे जयवन्त वर्त्ते।
इसी जम्बूद्वीप नामक द्वीप मे भारतवर्ष मे मरुमण्डल मे
सत्यपुर (सच्चउर) नामक नगर है। वहाँ चैत्यगृह मे नाहड राय
कारित और गणधर-आचार्य श्री जज्जिग सूरि प्रतिष्ठित पित्तल-
मय श्री वीरप्रभु की प्रतिमा है। नाहडराय ने उसे कब और कैसे
बनाया, उसकी उत्पत्ति बतलाते हैं—
पूर्वकाल में नड्डूल-मण्डल मण्डन मण्डोवर नगर के स्वामी
राजा को बलवान भाइयो ने मार कर उस नगर को अधिष्ठित
कर लिया। उस राजा की गर्भवती महादेवी भगकर ब्रह्माणपुर
पहुँची। वहाँ उसने सकल लक्षण युक्त पुत्र प्रसव किया। फिर
नगर के बाहर एक वृक्ष पर झोली मे उस बालक को रखकर
तत्पार्श्ववर्त्ती स्थान मे कुछ काम करने लगी। दैवयोग से वहाँ
श्री जज्जिगसूरि जी महाराज पधारे। वृक्ष की छाया को अपरि-
वर्त्तित देखकर “यह पुण्यवन्त होगा”—ऐसा विचार कर चिर-
काल तक वे उसे देखते रहे। उस राजपत्नी ने सूरि महाराज के
निकट आकर पूछा—भगवन् ! क्या यह लडका कुलक्षयकारी,
अपलक्षणो वाला दिखाई देता है ? सूरिजी ने कहा—भद्रे ! यह
महापुरुष होगा। अत इसे सर्व प्रयत्नो से पालन करना योग्य है।
तब गुरु महाराज ने उसे अनुकम्पापूर्वक चैत्यगृह के कार्य पर
नियुक्त कर दिया। उस लडके का नाम 'नाहड' रखा। गुरु
सत्यपुर-साचौर-तीर्थ-कल्प ६३
महाराज के मुख से उसने पच परमेष्ठी नवकार मंत्र सीखा । वह
चपलतावश धनुष-तीर लेकर अक्षय पट्ट (चावल चढाने का पाटा)
पर आते हुए चूहो को अचूक लक्ष से मारने लगा । तब श्रावको
ने उसे मन्दिर से निकाल दिया । अव वह लोगो की गायो की
रक्षा करने लगा ।
एक दिन नगर के बाहर भ्रमण करते हुए उसे किसी योगी ने
देखा और उसे बत्तीस लक्षण धारी ज्ञात कर स्वर्णपुरुष सिद्ध
करने के लिए उसके पीछे-पीछे जाकर उसकी माँ की अनुज्ञा लेकर
वहाँ निवास कर लिया । अवसर पाकर एक दिन उस योगी ने
नाहड़ से कहा—"गायो की रखवाली करते हुए तुम्हे रक्त दुग्ध
वाला कुलिस वृक्ष (थोहर ?) मिले, यहाँ चिन्ह करके मुझे कहना ।"
बालक ने कहा—ठीक है । दैवयोग से एक दिन उसने वैसा देख
कर योगी को बतलाया । दोनो वहाँ गए, यथाविधि अग्नि जला-
कर उसमे रक्तक्षीर प्रक्षिप्त कर योगी के प्रदक्षिणा देने पर नाहड़
ने भी अग्नि की प्रदक्षिणा दी । किसी प्रकार योगी की दुष्ट चित्त-
वृत्ति ज्ञात कर राजपुत्र नाहड़ ने नवकार मन्त्र का स्मरण किया ।
उसके प्रभाव से योगी निष्प्रभ हो गया, नाहड़ ने उसे ही अग्नि
मे डाल दिया, वह स्वर्णपुरुष बन गया ।
नाहड़ ने विचार किया — अहो ! मन्त्र का कैसा माहात्म्य है ।
इसके दाता गुरु महाराज का मैं कैसे प्रत्युपकार करूँगा ? फिर
उसने गुरुचरणो मे आकर नमस्कार किया और सारा स्वरूप
बताते हुए कहा—कुछ आज्ञा दीजिए !
गुरु महाराज के वचनो से नाहड ने चौवीस उत्तुङ्ग शिखर
वाले चैत्य बनवाये । क्रमश वह प्रवर राज्यश्री को प्राप्त हुआ ।
बडी भारी सेना के साथ जाकर उसने अपना पैतृक स्थान ग्रहण
किया ।