विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 110, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रभु के आकण्ठ क्षिति निमग्न रहने से लोगो ने उनका नाम
यक्ष प्रसिद्ध कर दिया। उस अवस्था मे पाँच सौ वर्ष तक
जिनेश्वर भगवान् की पूजा होगी। फिर धरणेन्द्र के सानिध्य से
श्रुतसागर के पारगामी श्री अभयदेवसूरि जी सघ सहित हस्थित
रोग को दूर करके देदीप्यमान माहात्म्य वाला तीर्थ प्रकट करेंगे।
कान्तीपुरी से भगवान् पुन समुद्र मे जावेंगे। बहुत प्रकार
से नगर मे भारी महिमा से देदीप्यमान होगे।
यदि कोई सहस्र मुख वाला होकर लाल जिह्वा धारण कर ले
तो भी त्रिकाल मे कौन प्रतिमा स्थानो को साधन करने में
समर्थ है ?
पावापुरी, चम्पापुरी, अष्टापद, गिरनार, समेतगिखर, विमला-
चल, कागी, नागिक, मिथिला, राजगृह प्रमुख तीर्थों में यात्रा,
पूजन, दान से जीवो को जो फल होता है वह यहाँ पार्श्वनाथ प्रभु
की प्रतिमा के दर्शनमात्र से प्राप्त करता है।
पार्श्वनाथ भगवान को वन्दन करने की विचार-वृद्धि से मास-
खमण का फल और प्रतिमा को दृष्टिगोचर करने से छम्मा