विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७. अहिच्छत्त्रानगरी-कल्प
तीन भुवन मे भानु के नाम से प्रकट श्री पार्श्वनाथ जिनेश्वर
को नमस्कार करके अहिच्छत्त्रा नगरी का कल्प किंचित् यथाश्रुत
कहूँगा ।
इसी जवूद्वीप के भारतवर्ष मे मध्य खण्ड स्थित कुरुजांगल
जनपद मे सखावती नामक ऋद्धि-समृद्धि नगरी थी । वहाँ भगवान
पार्श्वनाथ स्वामी छद्मस्थ विहार मे विचरते हुए कायोत्सर्ग स्थित
रहे । पूर्व निबद्ध वैर के कारण कमठासुर ने अविच्छिन्न धारा-
प्रवाह से वर्षता हुआ मेघ विकुर्वण किया, जिससे सारे भूमण्डल मे
जल-जलाकार होकर भगवन्त के आकण्ठ जल आ गया ।
पञ्चाग्निसाधक कमठ तापस द्वारा जलाए काठ मे दग्ध
साँप को निकाले गए प्रभु के उपकार को स्मरण कर नागराज
धरणेन्द्र ने अवधि-ज्ञान से देखा और अपनी अग्रमहिषियो के साथ
आकर मणिरत्नमय सहस्रफणालंकृत छत्र प्रभु के ऊपर करके
कुण्डलीकृत नागराज ने उन्हे ग्रहण कर उस उपसर्ग को निवारण
किया । तभी से उस नगरी