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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

मधुरापुरी-कल्प ४३
व्यतीत होने पर सकल सघ को एकत्र कर स्कदिलाचार्य ने
आगमानुयोग-वाचना प्रवृत्त की ।
यहाँ देव-निर्मित स्तूप के समक्ष पक्षक्षमणपूर्वक देवता को
आराधना कर जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण ने दीमक भक्षित त्रुटित
पाठ भग्न महानिशीथ सूत्र ग्रंथ को परिपूर्ण किया ।
यहाँ साधुओ के तपश्चरण से सन्तुष्ट शासन देवी ने तद्दर्शनिक
परिगृहीत तीर्थ को सघ के वचनानुसार जैनो को दिलाया । पीछे
देवी ने लोगो की लोभवृत्ति ज्ञातकर स्वर्णमय स्तूप को प्रच्छन्न
करके ईंटो का बना दिया । श्री वप्पभट्टिसूरि के वचनो से आम
राजा ने उसे प्रस्तर शिल्प से मण्डित कराया ।
यहाँ शख राजा और कलावती ने पाँचवे जन्म देवसिंह-कनक-
सुन्दरी नाम के श्रमणोपासको ने राज्यलक्ष्मी का उपभोग किया ।
इस प्रकार अनेक प्रकार के सविधान वाला इस नगरी का
उत्पत्ति-इतिहास है । यहाँ नरवाहना कुबेरा, सिंहवाहिनी
अम्बिका व श्वानवाहन क्षेत्रपाल तीर्थ की रक्षा करते है ।
इस प्रकार श्री जिनप्रभ सूरि ने इस मथुरा-कल्प का कुछ
वर्णन किया । इह लोक-परलोक के सुखार्थी भव्यजन इसे पढे ।
मथुरा तीर्थ की यात्रा से जो पुण्य-ऋद्धि फल प्राप्त होता है
वही इस कल्प को तल्लीनतापूर्वक सुनने से होता है ।
श्री मथुरा-कल्प समाप्त हुआ । इसकी श्लोक सख्या ११३
और २९ अक्षर हैं ।