विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिखाने के लिए दण्डकारण्य मे देवयुगल ने आकाशगामी घोड़ो
सहित रत्नजटित रथ और प्रतिमा रामभद्र को दी।
वहाँ रघुपुरुङ्गव श्री रामचन्द्र ने सात मास और नव दिन तक
विदेहदुहिता—सीता के उपनीत कुसुमो से भक्तिपूर्वक पूजा की।
राम के प्रबल कर्मों को अलङ्घनीय और दुख से छूटने वाले
ज्ञातकर उस पूज्य प्रतिमा को देवता उसी स्थान पर वापम ले
गये। अब फिर शकेन्द्र प्रकृष्ट भक्तिपूर्वक दिव्य भोगो से पूजा
करने लगा, इस प्रकार ग्यारह लाख वर्ष पूरे हो गए।
उस समय जब यदुवंश मे बलदेव-कृष्ण और नेमिनाथ तरुणा-
वस्था को प्राप्त हुए और केशव को राज्य मिला और जरासंध से
युद्ध मे अपनी सेना को उपसर्ग होने पर कृष्ण ने भगवान नेमिनाथ
से उस उपसर्ग के शीघ्र विनाश होने का उपाय पूछा।
प्रभु ने आदेश दिया—“पुरुषोत्तम ! मेरे सिद्ध होने के तेयासी
हजार सात सौ पचास वर्ष बाद विविध अधिष्ठायको द्वारा नत-
चरण श्री पार्श्व अर्हन्त होगे, जिनकी पूजा—स्नात्र जल सींचने
पर लोक मे अशिव की शांति होगी।” “स्वामी ! वर्त्तमान मे उन
जिनेश्वर की प्रतिमा कही भी विद्यमान है ?” इस प्रकार चक्रधर
श्रीकृष्ण के पूछने पर स्वामी ने कहा—“वह इन्द्रपूजित है”। तब
नेमि जिन और जनार्दन के मनोगत भाव को ज्ञात कर मातलि
सारथी सहित एक रथ मे वह प्रतिमा शकेन्द्र ने दी।
मुरारि ने प्रमुदित हो प्रतिमा को न्हवण कराके बहुत से
घनसार रस, चन्दन रस और उत्तम सुगन्धित पुष्पो से पूजा की।
पीछे सेना पर स्वामी के न्हवण जल को सिंचित किया जिससे
योगी के चित्त-विलय की भाँति सारे उपसर्गो का विलय हो गया।
बहुत दुखदायी प्रतिवासुदेव के निधन प्राप्त होने पर यादव सेना मे
जयजयकार हो गया। उसी विजय के स्थान पर जिनेश्वर नेमि-