श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
वति। भूतोपघातभोगाच्चाधर्मः। | सम्भव नहीं है और जीवहिंसापूर्वक
अधर्मान्नरकादिप्राप्तिरिति हिंसा- | भोग भोगनेसे अधर्म होगा तथा
| अधर्मसे नरकादिकी प्राप्ति होगी।
दोषदर्शनात्कश्चिदुपरम्य तुष्यति। | इस प्रकार हिंसारूप दोष देखकर
| कोई उनसे उपरत होकर सन्तोष
प्रकृत्युपादानकालभाग्याश्चतस्रः। | कर लेता है। इस प्रकार प्रकृति,
| उपादान, काल और भाग्यनामक
विषयाणामार्जनरक्षणविषयदोष- | चार एवं विषयोंके उपार्जन, रक्षण,
| विषयतारतम्यरूप दोष, संग और
सङ्गहिंसादोषात्पञ्च तुष्टय इति | हिंसा इन दोषोंके कारण होनेवाली
| पाँच—ऐसी इन नौ तुष्टियोंकी
नव तुष्टयो व्याख्याताः। | व्याख्या कर दी गयी।
सिद्धयोऽभिधीयन्ते—ऊहः श- | अब सिद्धियाँ बतलायी जाती
ब्दोऽध्ययनमिति तिस्रः सिद्धयः। | हैं—तीन सिद्धियाँ तो ऊह,
| शब्द और अध्ययन नामकी हैं,
दुःखविघातास्तिस्रः। सुहृत्प्राप्ति- | तीन दुःखविघात नामवाली हैं
र्दानमिति सिद्धिद्वयम्। ऊहस्त- | और दो सुहृत्प्राप्ति एवं दान हैं।
त्त्वं जिज्ञासमानस्योपदेशमन्तरेण | ऊह—तत्त्वजिज्ञासुको उपदेशके
जन्मान्तरसंस्कारवशात्प्रकृत्यादि- | बिना ही जन्मान्तरके संस्कारसे जो
विषयं ज्ञानमुत्पद्यते सेयमूहो | प्रकृति आदिके विषयमें ज्ञान उत्पन्न
| हो जाता है वह ऊह नामकी पहली
नाम प्रथमा सिद्धिः। शब्दो नामा- | सिद्धि है। बिना अभ्यासके केवल
भ्यासमन्तरेण श्रवणमात्राद्यज्ज्ञा- | श्रवणमात्रसे ही जो ज्ञान उत्पन्न हो
नमुत्पद्यते सा द्वितीया सिद्धिः। | जाता है वह शब्द नामकी दूसरी
| सिद्धि है। शास्त्रके अभ्याससे जो ज्ञान
अध्ययनं नाम शास्त्राभ्यासाद्य- | उत्पन्न हो जाता है उसे अध्ययन
ज्ज्ञानमुत्पद्यते सा तृतीया सिद्धिः। | कहते हैं, यह तीसरी सिद्धि है।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
आध्यात्मिकस्याधिभौतिकस्याधि- आध्यात्मिक, आधिभौतिक और
दैविकस्य त्रिविधदुःखस्य व्युदा- आधिदैविक इन त्रिविध दुःखोंकी
साच्छीतोष्णादिजन्यदुःखसहिष्णोः उपेक्षा करनेसे शीतोष्णादिजनित
तितिक्षोर्यज्ज्ञानमुत्पद्यते तस्य दुःख सहन करनेवाले तितिक्षु पुरुष-
आध्यात्मिकादिभेदात्सिद्धेस्त्रैवि- को जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह
ध्यम् । सुहृदं प्राप्य या सिद्धि- दुःखविघात नामकी सिद्धि है;
र्ज्ञानस्य सा सुहृत्प्राप्तिर्नाम आध्यात्मिकादि भेदके कारण इस
सिद्धिः। आचार्यहितवस्तुप्रदानेन सिद्धिके भी तीन प्रकार हैं । किसी
या सिद्धिर्विद्यायाः सा दानं नाम सुहृद्के प्राप्त होनेपर जो ज्ञानकी
सिद्धिः। एवमष्टविधा सिद्धिर्व्या- सिद्धि होती है वह सुहृत्प्राप्ति नामकी
ख्याता । सिद्धि है । आचार्यको उनकी प्रिय
वस्तु दान करनेसे जो ज्ञानकी प्राप्ति
होती है वह दान नामकी सिद्धि है।
इस प्रकार आठ प्रकारकी सिद्धियों-
की भी व्याख्या की गयी ।
एवं विपर्ययाशक्तितुष्टि- इस तरह यह विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि
सिद्धाख्याः पञ्चाशत्प्रत्यय- और सिद्धि नामक पचास प्रत्ययभेदोंकी
भेदा व्याख्याताः । एवं ब्राह्म- व्याख्या हुई । ब्राह्मपुराणमें कल्पो-
पुराणे कल्पोपनिषद् व्याख्यान- पनिषद्की व्याख्याके प्रसङ्गमें साठवें
प्रदेशे षष्टितमाध्याये पञ्चाशत् अध्यायमें पचास प्रत्ययभेदोंकी इसी
प्रत्ययभेदाः प्रतिपादिताः । अथवा प्रकार व्याख्या की गयी है । अथवा
“पञ्चाशच्छक्तिरूपिणः”इति परस्य “पञ्चाशच्छक्तिरूपिणः” इस पुराण-
याः शक्तयः पुराणे स्वरूपत्वेना- वाक्यमें परमात्माकी जिन शक्तियोंका
भिमताः पञ्चाशच्छक्तय अरा इव उनके स्वरूपरूपसे वर्णन किया है
यस्य तं शतारारम् । वे ही जिसके अरोंके समान हैं उस
शतारार ( पचास अरोंवाले ) को
[ कारणरूपसे देखा ] ।
८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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विंशतिप्रत्यराभिः । विंशति- | बीस प्रत्यरोंसे युक्त । दश इन्द्रियाँ
प्रत्यरा दशेन्द्रियाणि तेषां च | और उनके विषय शब्द, स्पर्श,
विषयाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध- | रूप, रस, गन्ध, वचन, आदान
वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाः । | (ग्रहण ), गति, त्याग और आनन्द
पूर्वोक्तानामराणां प्रत्यरा ये प्रति- | —ये बीस प्रत्यर हैं । जो पूर्वोक्त
विधीयन्ते कीलका अराणां दा- | अरोंके प्रति अरे—अरोंकी दृढ़ताके
र्ढ्याय ते प्रत्यरा इत्युच्यन्ते । | लिये जो शलाकाएँ लगायी जाती हैं
तैः प्रत्यरैर्युक्तम् । अष्टकैः षड्भि- | वे प्रत्यर कहलाते हैं । उन प्रत्यरोंसे
र्युक्तमिति योजनीयम् । | युक्त, तथा छः अष्टकोंसे युक्तको
"भूमिरापोऽनलो वायुः | [ कारणरूपसे देखा ]—ऐसी योजना
खं मनो बुद्धिरेव च । | करनी चाहिये । "पृथिवी, जल,
अहंकार इतीयं मे | अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि
भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥" | और अहंकार—यह मेरी आठ भेदों-
(गीता ७ । ४ ) | वाली प्रकृति है" यह गीतोक्त
इति प्रकृत्यष्टकम् । त्वक्चर्म- | प्रकृत्यष्टक है; त्वचा, चर्म, मांस,
मांसरुधिरमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि | रुधिर, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र
धात्वष्टकम् । अणिमाद्यैश्वर्या- | यह धात्वष्टक है; अणिमादि ऐश्वर्याष्टक
ष्टकम् । धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्याधर्मा- | है; धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म,
ज्ञानावैराग्यानैश्वर्याख्यभावाष्ट- | अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य—यह
कम् । ब्रह्मप्रजापतिदेवगन्धर्वयक्ष- | भावाष्टक है; ब्रह्मा, प्रजापति, देव,
राक्षसपितृपिशाचा देवाष्टकम् । | गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितृगण और
अष्टावात्मगुणा ज्ञेयाः, दया | पिशाच—यह देवाष्टक है; और आठ
सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शौच- | जिन्हें आत्माके गुण समझना चाहिये,
| वे समस्त प्राणियोंके प्रति दया,
| क्षमा, अनसूया (निन्दा न करना ),
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१. अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और
वशित्व—ये आठ ऐश्वर्य हैं ।
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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
मनायासो मङ्गलमकार्पण्यमस्पृहेति | शौच, अनायास, मङ्गल, अकृपणता
गुणाष्टकं षष्ठम् । एतैः षड्भि- | और अस्पृहा ये छठा गुणाष्टक हैं;
र्युक्तम् । | इन छः अष्टकोंसे युक्तको [ कारण-
| रूपसे देखा ] ।
विश्वरूपैकपाशं स्वर्गपुत्रान्नाद्या- | विश्वरूप एक पाशवालेको—
दिविषयभेदाद्विश्वरूपं विश्वरूपो | स्वर्ग,पुत्र एवं अन्नाद्य आदि विषयभेदसे
नानारूप एकः कामाख्यः पाशो- | कामनामक एक ही विश्वरूप—अनेक
ऽस्येति विश्वरूपैकपाशम् । धर्मा- | प्रकारका पाश है जिसका उस
धर्मज्ञानमार्गभेदा अस्येति त्रि- | विश्वरूप एक पाशवालेको; धर्म,
मार्गभेदम् । द्वयोः पुण्यपापयो- | अधर्म और ज्ञानरूप जिसके मार्गभेद
र्निमित्तैकमोहो देहेन्द्रियमनोबुद्धि- | हैं उस तीन मार्गभेदोंवालेको; तथा
जात्यादिष्वनात्मस्वात्माभिमानो- | पाप-पुण्य इन दोनोंका एक ही
ऽस्येति द्विनिमित्तैकमोहम् । अप- | निमित्त मोह यानी देह, इन्द्रिय, मन,
श्यन्निति क्रियापदमनुवर्तते । | बुद्धि एवं जाति आदि अनात्माओंमें
अधीम इत्युत्तरमन्त्रसिद्धं वा | जिसका आत्माभिमान है ऐसे उस
क्रियापदम् ॥ ४ ॥ | दोके [ मोहरूप ] एक ही निमित्त-
| वालेको [ उन्होंने कारणरूपसे देखा ]
| इस प्रकार यहाँ पूर्वमन्त्रकी
| क्रिया 'अपश्यन्' की अनुवृत्ति होती
| है, अथवा अगले मन्त्रके क्रियापद
| 'अधीमः' ( जानते हैं ) का
| अध्याहार करना चाहिये ॥४॥
कार्यब्रह्मका नदीरूपसे वर्णन
पूर्वं चक्ररूपेण दर्शितमिदानीं | पहले जिसे चक्ररूपसे प्रदर्शित
| किया है उसीको अब श्रुति नदी-
नदीरूपेण दर्शयति— | रूपसे दिखलाती है—
८४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
८४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
पञ्चस्रोतोऽम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्रां
पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् ।
पञ्चावर्तां पञ्चदुःखौघवेगां
पञ्चाशद्भेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥
पाँच स्रोत जिसमें जलकी धाराएँ हैं, पाँच उद्गमस्थानोंके कारण जो
बड़ी उग्र और वक्र (टेढ़ी) है, जिसमें पञ्चप्राणरूप तरंगें हैं, पाँच
प्रकारके ज्ञानोंका मूल जिसका कारण है, जिसमें पाँच आवर्त (भँवर)
हैं, जो पाँच प्रकारके दुःखरूप ओघवेगवाली है और जो पाँच पर्वोंवाली
है उस पचास भेदोंवाली [नदी] को हम जानते हैं ॥ ५ ॥
पञ्चस्रोतोऽम्बुमिति । पञ्च | 'पञ्चस्रोतोऽम्बुम्' इत्यादि । पाँच
स्रोतांसि चक्षुरादीनि ज्ञानेन्द्रि- | स्रोतरूप चक्षु आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ
याण्यम्बुस्थानानि यस्यास्तां नदीं | ही जिसके जलस्थान हैं उस पाँच
पञ्चस्रोतोऽम्बुम् । अधीम इति | स्रोतरूप जलवाली नदीको [हम जानते
सर्वत्र संबध्यते । पञ्चयोनिभिः | हैं] । यहाँ 'अधीमः' (जानते हैं)
कारणभूतैः पञ्चभूतैरुग्रां वक्रां | क्रियापदका सबके साथ सम्बन्ध है ।
च पञ्चयोन्युग्रवक्राम् । पञ्च | पाँच योनियों अर्थात् कारणभूत पाँच
प्राणाः कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाण्या- | भूतोंसे जो उग्र और वक्र है उस
दयो वोर्मयो यस्यास्तां पञ्चप्राणो- | पञ्चयोन्युग्रवक्राको, पाँच प्राण अथवा
र्मिम् । पञ्चबुद्धीनां चक्षुरादि- | वाक्, पाणि, पादादि पाँच कर्मेन्द्रियाँ
जन्यानां ज्ञानानामादिः कारणं | जिसकी तरंगें हैं उस पञ्चप्राणोर्मि-
मनः । मनोवृत्तिरूपत्वात्सर्व- | को, पाँच बुद्धियों अर्थात् चक्षु आदिसे
ज्ञानानां मनो मूलं कारणं यस्याः | होनेवाले पाँच ज्ञानोंका आदि यानी
संसारसरितस्ताम् । तथा च | कारण मन है, क्योंकि समस्त ज्ञान
मनोवृत्तिरूप हैं; वह मन जिस
संसाररूप नदीका मूल—कारण है
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
मनसः सर्वहेतुत्वं दर्शयति— | उसको। तथा मन ही सबका हेतु है—
“मनोविजृम्भितं सर्वं | यह इस वाक्यसे दिखाते हैं—
यत्किंचित्सचराचरम् । | जितना कुछ स्थावर-जंगम है वह
मनसो ह्यमनीभावे | सब मनका ही विलास है। मनके
द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥” | मननशून्य होनेपर द्वैतकी उपलब्धि
इति । पञ्च शब्दादयो विषया | ही नहीं होती ।” शब्दादि पाँच
आवर्तस्थानीयास्तेषु विषयेषु प्रा- | विषय आवर्तरूप हैं, उन विषयोंमें
णिनो निमज्जन्तीति यस्यास्तां | प्राणी डूब जाते हैं, इसलिये वे
पञ्चावर्ताम् । पञ्च गर्भदुःखजन्म- | जिसके आवर्त हैं उस पाँच आवर्त-
दुःखजरादुःखव्याधिदुःखमरण- | वालीको, गर्भदुःख, जन्मदुःख, जरा-
दुःखान्येवौघवेगो यस्यास्तां पञ्च- | दुःख व्याधिदुःख और मरणदुःख ये
दुःखौघवेगाम् । अविद्यास्मिता- | पाँच जिसके ओघवेग ( जलराशिके
रागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेश- | प्रवाह ) हैं उस पाँच दुःखरूप
भेदाः पञ्च पर्वाण्यस्यास्तां पञ्च- | ओघवेगवालीको; तथा अविद्या,
पर्वामिति ॥ ५ ॥ | अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश
| ये पाँच क्लेश ही जिसके पाँच पर्व हैं
| उस पाँच पर्वोंवाली संसारनदीको
| [ हम जानते हैं ] ॥ ५ ॥
जीवके संसार-बन्धन और मोक्षके कारणका निर्देश
एवं तावन्नदीरूपेण ब्रह्म- | इस प्रकार यहाँतक तो नदी-
चक्ररूपेण च कार्यकारणात्मकं | रूपसे और ब्रह्मचक्ररूपसे प्रपञ्च-
ब्रह्म सप्रपञ्चमिहाभिहितम् । | सहित कार्य-कारणरूप ब्रह्मका वर्णन
इदानीमस्मिन्कार्यकारणात्मक- | किया गया । अब, इस कार्य-
ब्रह्मचक्रे केन वा संसरति केन | कारणात्मक ब्रह्मचक्रमें किस हेतुसे
| जीवको संसारकी प्राप्ति होती है और
श्वेता० ४—
८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
वा मुच्यत इति संसारमोक्ष- | किस साधनसे वह मुक्त होता है इस
| प्रकार संसार और मोक्षका हेतु
हेतुप्रदर्शनायाह— | दिखलानेके लिये श्रुति कहती है—
सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते
अस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे ।
पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा
जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥ ६ ॥
जीव अपनेको और सर्वनियन्ता परमात्माको अलग-अलग मानकर
इस समस्त भूतोंके जीवननिर्वाहक ( भोगभूमि ) और सबके आश्रयभूत
( प्रलयस्थान ) महान् ब्रह्मचक्रमें भ्रमता रहता है; और जब उससे
अभिन्नरूपसे सेवित होता है तब अमृतत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥
सर्वाजीव इति । सर्वेषामाजी- | 'सर्वाजीवे' इत्यादि । जिसमें समस्त
वनमस्मिन्निति सर्वाजीवे । सर्वेषां | भूतोंका जीवन है उस सर्वाजीव
| तथा जिसमें सबकी संस्था—समाप्ति
संस्था समाप्तिः प्रलयो यस्मि- | यानी प्रलय होती है उस सर्वसंस्थ
न्निति सर्वसंस्थे । बृहन्तेऽस्मि- | बृहन्त ( महान् ) ब्रह्मचक्रमें हंस-
| जीव, संसारमार्गमें हनन—गमन
न्हंसो जीवः । हन्ति गच्छत्यध्वा- | करता है इसलिये जीव हंस कहा
नमिति हंसः । भ्राम्यतेऽनात्म- | जाता है, भ्रमता रहता है, अर्थात्
| अनात्मभूत देहादिको आत्मा मानता
भूतदेहादिमात्मानं मन्यमानः | हुआ देवता, मनुष्य एवं तिर्यगादि
सुरनरतिर्यगादिभेदभिन्नानायो- | भेदोंवाली अनेकों योनियोंमें भ्रमण
| करता है । इसी प्रकार भ्रमण करता
निषु । एवं भ्राम्यमाणः परिवर्तत | हुआ सब ओर भटकता रहता है—
इत्यर्थः । | ऐसा इसका तात्पर्य है ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
वाम स्तम्भ (मूल संस्कृत - शाङ्करभाष्य):
केन हेतुना नानायोनिषु
परिवर्तते ? इति तत्राह—पृथगा-
त्मानं प्रेरितारं च मत्वेति । आ-
त्मानं जीवात्मानं प्रेरितारं चेश्वरं
पृथग्भेदेन मत्वा ज्ञात्वा'अन्योऽसा-
वन्योऽहमस्मि' इति जीवेश्वरभेद-
दर्शनेन संसारे परिवर्तत इत्यर्थः ।
केन मुच्यते ? इत्याह—जुष्टः
सेवितस्तेनेश्वरेण चित्सदानन्दा-
द्वितीयब्रह्मात्मनाहं ब्रह्मास्मीति
समाधानं कृत्वेत्यर्थः । तेनेश्वर-
सेवनादमृतत्वमेति । यस्तु पूर्णा-
नन्दब्रह्मरूपेणात्मानमवगच्छति स
मुच्यते । यस्तु परमात्मनोऽन्य-
मात्मानं जानाति स बध्यत इति ।
तथा च बृहदारण्यके भेददर्श-
नस्य संसारहेतुत्वं प्रदर्शितम्—
“य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स
इदं सर्वं भवतीति तस्य ह न
देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा
दक्षिण स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद/भाष्यार्थ):
किस कारणसे अनेकों योनियोंमें
घूमता है ? इसके उत्तरमें कहते हैं—
'पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा' इति ।
आत्मा अर्थात् जीवात्मा और प्रेरक—
ईश्वरको पृथक्—विभिन्नरूपसे मान-
कर; तात्पर्य यह है कि 'यह अन्य
है और मैं अन्य हूँ' इस प्रकार जीव
और ईश्वरका भेद देखनेसे वह
संसारमें घूमता है ।
किस उपायसे वह मुक्त होता है,
सो बतलाते हैं—उस ईश्वरसे जुष्ट—
सेवित होनेपर अर्थात् सच्चिदानन्द-
मय ब्रह्मसे अभिन्न ब्रह्मस्वरूपसे 'मैं
ब्रह्म ही हूँ'—ऐसा समाधान (समाधि)
करनेपर । इस समाधिद्वारा ईश्वरका
सेवन करनेसे वह मुक्त हो जाता
है। जो कोई भी अपनेको पूर्णानन्द
ब्रह्मस्वरूपसे अनुभव करता है वही
मुक्त होता है और जो अपनेको
परमात्मासे भिन्न जानता है वह
बँधता है । इसी प्रकार बृहदारण्यक-
में भी भेददृष्टिको संसारका हेतु
दिखलाया है—"जो ऐसा जानता
है कि मैं ब्रह्म हूँ वह सर्वरूप हो
जाता है; देवगण भी उसके सर्वात्मक
ब्रह्मभावकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचानेको
समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका
८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
ह्येषां स भवत्यथ योऽन्यां | आत्मा ही हो जाता है । किन्तु जो
देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहम- | किसी अन्य देवताकी 'यह अन्य है
स्मीति न स वेद यथा पशुरेवं | और मैं अन्य हूँ' ऐसे भावसे
उपासना करता है वह नहीं जानता
स देवानाम्” (बृह० उ० १। | [ अर्थात् वह अज्ञानी है ] वह पशु-
४। १०) इति । | ओंके समान देवताओंका पशु है ।”
तथा च श्रीविष्णुधर्मे— | ऐसा ही विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें
“पश्यत्यात्मानमन्यं तु | भी कहा है— “जीव जबतक अपने-
यावद्वै परमात्मनः । | को परमात्मासे भिन्न देखता है
तावत्संभ्राम्यते जन्तु- | तबतक वह अपने कर्मोंद्वारा मोहित
र्मोहितो निजकर्मणा ॥ | करके भटकाया जाता है । किन्तु
संक्षीणाशेषकर्मा तु | जब उसके समस्त कर्म क्षीण हो
जाते हैं तो उसे शुद्ध परब्रह्मका
परं ब्रह्म प्रपश्यति । | अपनेसे अभेदरूपसे साक्षात्कार
अभेदेनात्मनः शुद्धं | होता है, और शुद्धस्वरूप हो जानेके
शुद्धत्वादक्षयो भवेत्”॥६॥ | कारण वह अमर हो जाता है”॥६॥
परब्रह्मकी प्राप्तिसे मुक्तिका वर्णन
ननु तमेकनेमिमित्यादिना | ‘तमेकनेमिम्’ इत्यादि वाक्यसे
सप्रपञ्चं ब्रह्म प्रतिपादितम् । तथा | प्रपञ्चयुक्त ब्रह्मका प्रतिपादन किया
गया है; ऐसी स्थितिमें ‘मैं ब्रह्म हूँ’
च सत्यहं ब्रह्मास्मीति ब्रह्मात्म- | इस प्रकार ब्रह्मात्मभावकी प्राप्ति
प्रतिपत्तावपि सप्रपञ्चस्यैव ब्रह्मण | होनेपर भी प्रपञ्चयुक्त ब्रह्मको ही
आत्मस्वरूपसे जाना जायगा;
आत्मत्वेनावगमात् “तं यथा | इससे “उसकी जो जिस प्रकार
यथोपासते तदेव भवति” इति | उपासना करता है वैसा ही हो जाता
है” इस सिद्धान्तके अनुसार सप्रपञ्च
सप्रपञ्चब्रह्मप्राप्तिरेव स्यात् । ततश्च | ब्रह्मकी ही प्राप्ति होगी । और तब
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
प्रपञ्चस्यापरित्यागान्न मोक्षसिद्धिः। प्रपञ्चका त्याग न होनेसे मोक्षकी भी
प्राप्ति नहीं होगी । इसलिये 'उससे
ततश्च जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेती- अभिन्नरूपसे सेवित होनेपर अमरत्व
प्राप्त करता है' इस प्रकार जो
तिमोक्षोपदेशोऽनुपपन्न एवेत्या- मोक्षका उपदेश किया है वह
अनुपयुक्त ही है—ऐसी आशङ्का
शङ्कयाह— करके श्रुति कहती है—
उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म
तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च ।
अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा
लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः ॥ ७ ॥
प्रपञ्चसे पृथक्रूपसे वर्णन किया गया यह ब्रह्म सर्वोत्कृष्ट ही है।
उसमें [ भोक्ता, भोग्य और नियन्ता—ये ] तीनों स्थित हैं। वह इनकी
सुप्रतिष्ठा और अविनाशी है। इसमें प्रवेशद्वार पाकर ब्रह्मवेत्तालोग ब्रह्ममें
लीन हो समाधिनिष्ठामें स्थित हुए जन्म-मरणसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥
उद्गीतमिति । सप्रपञ्चं ब्रह्म 'उद्गीतम्' इत्यादि । यदि ब्रह्म
यदि स्यात्ततो भवत्येव मोक्षा- प्रपञ्चयुक्त होता तब तो [ उसकी
प्राप्तिमें ] मोक्षका अभाव हो सकता
भावः । न त्वेतदस्ति । कस्मात् ? था । किन्तु ऐसी बात है नहीं ।
यत उद्गीतमुद्धृत्य गीतमुपदिष्टं कैसे नहीं है ? क्योंकि वेदान्तोंने
कार्यकारणलक्षणात्प्रपञ्चाद्वेदान्तैः। इसका कार्य-कारणरूप प्रपञ्चसे
अलग करके गान यानी उपदेश
"अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- किया है । तात्पर्य यह है कि "वह
दितादधि" (के० उ० १। ३)। विदितसे भिन्न है और अविदितसे
९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
"तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदि- | भी परे है", "तू उसीको ब्रह्म जान,
दमुपासते” (के० उ० १।४)। | जिसकी लोक इदंभावसे उपासना
"अस्थूलम्” (बृ० उ० ३ । | करता है वह ब्रह्म नहीं है", "वह
८।८) अशब्दमस्पर्श" (क० | स्थूल नहीं है", "शब्दरहित है
उ० १ । ३ । १५) । "स एष | और स्पर्शरहित है", "वह ब्रह्म यह
नेति नेतीति ।” “ततो यदुत्तर- | (कारण) नहीं है, यह (कार्य)
तरम्" (श्वेता० उ० ३ । १०)। | नहीं है", "जो उससे भी आगे
"अन्यत्र धर्मात्” (क० उ० १।२। | है", "वह धर्मसे परे है" "न
१४)। “न सन्न चासच्छिव एव | सत् है न असत्, वह शुद्ध-
केवलः” (श्वेता० उ० ४ । १८)। | स्वभाव एवं अविद्याजनित विकल्पसे
"तमसः परः ।” “यतो वाचो | शून्य है", "वह अज्ञानसे परे है",
निवर्तन्ते ।” (तै० उ० २।४।१) | "जहाँसे वाणी लौट आती है",
"यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति | “जहाँ न अन्य कुछ देखता है, न
नान्यद्विजानाति स भूमा” (छा० | अन्य कुछ जानता है वह भूमा है",
उ० ७। २४। १)। "योऽश- | "जो भूख-प्यास तथा शोक, मोह,
नायापिपासे शोकं मोहं भयं जरा- | भय और वृद्धावस्थासे परे है", "जो
मत्येति” (बृ० उ० ३।५। | प्राण और मनसे रहित, शुद्धस्वरूप
१)। "अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो | और पर अव्याकृतसे भी परे है",
ह्यक्षरात्परतः परः” (मु० उ० २। | “ब्रह्म एकमात्र अद्वितीय है",
१।२)। "एकमेवाद्वितीयम् ।” | "विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला
(छा० उ० ६ । २ । १) “वाचा- | नाममात्र है", "यहाँ नाना कुछ
रम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० | नहीं है" तथा "उसे एकरूप ही
उ० ६।१।४)। “नेह नानास्ति | देखना चाहिये" इत्यादि मन्त्रोंमें
किञ्चन" (बृ० उ० ४।४।१९)। | ब्रह्म प्रपञ्चसे असङ्ग ही जाना
"एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० | जाता है-ऐसा इसका तात्पर्य है ।
४।४।२०)। इत्येवमादिषु प्रपञ्चा-
स्पृष्टमेव ब्रह्मावगम्यत इत्यर्थः ।
यत एवं प्रपञ्चधर्मरहितं | क्योंकि इस प्रकार ब्रह्म प्रपञ्चके
ब्रह्मात एव परंमं तु ब्रह्म । | धर्मोंसे रहित है, इसलिये वह
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
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| [Sanskrit Text] | [Hindi Translation] |
|---|---|
| तुशब्दोऽवधारणे । परममेवोत्कृ- | सर्वोत्कृष्ट ही है । मूलमें ‘तु’ शब्द |
| ष्टमेव । संसारधर्मानास्कन्दित- | निश्चयार्थक है । परमेव अर्थात् |
| त्वात् । उद्गीतत्वेन ब्रह्मण | सर्वोत्कृष्ट ही है, क्योंकि वह समस्त सांसारिक धर्मोंसे अनाक्रान्त है । |
| उत्कृष्टत्वात् । “तं यथा यथो- | उद्गीतरूप होनेसे ब्रह्म उत्कृष्ट है । |
| पासते” इति न्यायेनोत्कृष्टब्रह्मो- | “उसे जो जिस प्रकार उपासना करता है” इस न्यायसे उत्कृष्ट ब्रह्मकी |
| पासनादुत्कृष्टमेव फलं मोक्षाख्यं | उपासना करनेसे मोक्षरूप उत्कृष्ट |
| भवत्येवेत्यभिप्रायः । | फल ही होता है ऐसा अभिप्राय है । |
| नन्वेवं तर्हि ब्रह्मणः प्रपञ्चा- | ऐसा होनेपर तो यदि ब्रह्म |
| (हाशिया: प्रपञ्चस्य स्वातन्त्र्यम् आशङ्क्य तन्निरसनम्*)* संस्पृष्टत्वे प्रपञ्च- | प्रपञ्चसे असङ्ग है और ब्रह्मका भी |
| स्यापि ब्रह्मासंसर्गा- | प्रपञ्चसे कोई संसर्ग नहीं है तो |
| त्सांख्यवाद इव | सांख्यवादके समान प्रपञ्च भी पृथक् सिद्ध होनेके कारण स्वतन्त्र होनेसे |
| प्रपञ्चस्यापि पृथक्सिद्धत्वेन स्व- | “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला |
| तन्त्रत्वाद् “वाचारम्भणं विकारो | नाममात्र है” इस वाक्यके अनुसार |
| नामधेयम्” (छा०उ०६।१।४) इति | प्रपञ्चकी परतन्त्रता स्वीकार कर |
| पारतन्त्र्याभ्युपगमेन मिथ्यात्वोप- | उसका मिथ्यात्व बतलाते हुए |
| देशपूर्वकमद्वितीयब्रह्मात्मत्वेनोप- | अद्वितीय ब्रह्मरूपसे उपदेश करना |
| देशोऽनुपपन्नश्चेत्याशङ्क्याह- | अनुचित ही होगा—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है— |
| तस्मिंस्त्रयमिति । यद्यपि ब्रह्म | ‘तस्मिंस्त्रयम्’ इत्यादि । यद्यपि ब्रह्म- |
| प्रपञ्चासंस्पृष्टं स्वतन्त्रं च तथापि | का प्रपञ्चसे संसर्ग नहीं है और वह |
| प्रपञ्चो न स्वतन्त्रः । अपि तु | स्वतन्त्र है तथापि प्रपञ्च स्वतन्त्र नहीं |
| तस्मिन्नेव ब्रह्मणि त्रयं प्रतिष्ठितं | है; अपि तु भोक्ता, भोग्य और प्रेरिता— |
| भोक्ता भोग्यं प्रेरितारमिति | ऐसा कहकर जिनका आगे वर्णन |
९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[बायाँ स्तम्भ]
वक्ष्यमाणं भोग्यभोक्तृनियन्तृ-
लक्षणम् । “अजा ह्येका भोक्तृ-
भोग्यार्थयुक्ता” इति वक्ष्यमाणं भोक्तृ-
भोग्यार्थरूपं चान्यद्वेदं श्रुतिसिद्धं
विराट् सूत्राभ्यां कृतं नामरूपकर्म-
विश्वतैजसप्राज्ञजाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति-
रूपस्वरूपं प्रतिष्ठितं रज्ज्वामिव
सर्पः । यत एतस्मिन्सर्वं भो-
क्त्रादिलक्षणं प्रपञ्चरूपं प्रति-
ष्ठितम् , अत एवास्य भोक्त्रादि-
त्रयात्मकस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्म सुप्र-
तिष्ठा शोभनप्रतिष्ठा । ब्रह्मणो-
ऽन्यस्य चलनात्मकत्वाच्चलप्रति-
ष्ठान्यत्र । ब्रह्मणोऽचलत्वादत्रा-
चलप्रतिष्ठा ।
नन्वेवं तर्हि विकारभूत-
[पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मणः प्रपञ्चाश्रयत्वेऽपि नित्यत्वसमर्थनम्] प्रपञ्चाश्रयत्वेन परि-
णामित्वादद्ध्यादिव-
दनित्यं स्यादि-
त्याशङ्कयाह—अक्षरं चेति ।
यद्यपि विकारः प्रपञ्चाश्रय-
स्तथाप्यक्षरं न क्षरतीत्यक्षरम् ।
[दायाँ स्तम्भ]
किया है वे भोक्ता, भोग्य और नियन्ता
तीनों उस ब्रह्ममें ही स्थित हैं।
अथवा “अजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थ-
युक्ता” इस वाक्यसे कहे जानेवाले
भोक्ता, भोग्य और भोग, किंवा
श्रुति-प्रतिपादित विराट् और हिरण्य-
गर्भद्वारा रचे हुए नाम, रूप और
कर्म अथवा विश्व, तैजस, प्राज्ञ या
जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति ये तीनों
उसमें रज्जुमें सर्पके समान प्रतिष्ठित
हैं । क्योंकि इसमें भोक्तादिरूप
सारा प्रपञ्च प्रतिष्ठित है,
इसीसे ब्रह्म इस भोक्तादि त्रयरूप
प्रपञ्चकी सुप्रतिष्ठा अर्थात् उत्तम
आश्रयस्थान है । ब्रह्मसे भिन्न और
सब चलायमान (अस्थायी) हैं,
इसलिये अन्य सब चलप्रतिष्ठा हैं;
ब्रह्म अचल है, इसलिये इसमें उनकी
अचल प्रतिष्ठा है।
यदि ऐसा है तब तो विकारभूत
प्रपञ्चका आश्रय होनेसे परिणामी
होनेके कारण दधि आदिके समान
ब्रह्म भी अनित्य सिद्ध होगा—ऐसी
आशङ्का करके श्रुति कहती है—
‘अक्षरं च ।’ यद्यपि प्रपञ्चका
आश्रय होना विकार है तथापि वह
अक्षर है। जो स्वरूपसे च्युत नहीं
होता उसे अक्षर कहते हैं।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३
| चशब्दोऽवधारणे, अविनाश्येव | यहाँ 'च' शब्द निश्चयार्थक है अर्थात् |
| ब्रह्म, मायात्मकत्वाद्विकारस्य । | ब्रह्म अविनाशी ही है, क्योंकि विकार |
| विकाराश्रयत्वेऽप्यविनाश्येव कूट- | मायिक है। अभिप्राय यह है कि |
| स्थं ब्रह्मावतिष्ठत इत्यभिप्रायः । | विकारका आश्रय होनेपर भी कूटस्थ |
| मायात्मकत्वं च प्रपञ्चस्य पूर्वमेव | ब्रह्म अविनाशी ही रहता है । |
| प्रपञ्चितम् । तस्मात्सर्वात्मक- | प्रपञ्चका मायामय होना तो पहले |
| त्वेऽपि ब्रह्मणः प्रपञ्चस्य मिथ्या- | ही विस्तारसे बतला दिया गया है । |
| त्मकत्वेन ब्रह्मणः प्रपञ्चासंसर्गा- | अतः तात्पर्य यह है कि ब्रह्म यद्यपि |
| त्पूर्णानन्दब्रह्मात्मानं पश्यतो | सर्वरूप है तथापि प्रपञ्च मिथ्या |
| मोक्षाख्यः परमपुरुषार्थो भवती- | होनेसे ब्रह्मसे प्रपञ्चका कोई सम्बन्ध |
| त्यर्थः । | नहीं है । अतः पूर्णानन्दस्वरूप |
| | ब्रह्मात्मभावका दर्शन करनेवाले |
| | पुरुषको मोक्षरूप परम पुरुषार्थकी |
| | प्राप्ति होती है । |
| कथं तस्यात्मानं पश्यतो | अब श्रुति यह बतलाती है कि |
| (पूर्णानन्द-ब्रह्मात्मानं पश्यतो मोक्षसिद्धिप्रकारः) मोक्षसिद्धिरित्यत | उस आत्मदर्शीको किस प्रकार मोक्ष- |
| आह—अत्रास्मिन्न- | की प्राप्ति होती है ? यहाँ—अन्नमय |
| न्नमयाद्यानन्दमया- | कोशसे लेकर आनन्दमय कोशपर्यन्त |
| न्ते देहे विराडाद्यव्याकृतान्ते वा | इस देहमें अथवा विराट्से लेकर |
| प्रपञ्चे पूर्वपूर्वोपाधिप्रविलयेनोत्त- | अव्याकृतपर्यन्त प्रपञ्चमें पूर्व-पूर्व |
| रोत्तरमप्यशनायाद्यसंसृष्टं वाचा- | उपाधिका लय करते हुए उत्तरोत्तर |
| मगोचरं ब्रह्मविदो विदित्वा | क्षुधादिके संसर्गसे शून्य वाणी- |
| लीना ब्रह्मणि विश्वाद्युप- | के अविषयभूत ब्रह्मको जानकर |
| संहारमुखेन लयं गता अहं | ब्रह्मवेत्तालोग ब्रह्ममें लीन हो— |
| ब्रह्मास्मीति ब्रह्मरूपेणैव स्थिता | विश्वादिका उपसंहार करते हुए ब्रह्ममें |
| | ही लयको प्राप्त हो 'मैं ब्रह्म हूँ' |
| | इस प्रकार ब्रह्मरूपसे ही स्थित हो |
९४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
९४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
इत्यर्थः । तत्पराः समाधिपराः किं | जाते हैं । और तत्पर अर्थात्
कुर्वन्ति योनिमुक्ता भवन्ति गर्भ- | समाधिपरायण होकर क्या करते
जन्मजरामरणसंसारभयान्मुक्ता | हैं?—योनिमुक्त हो जाते हैं; अर्थात्
भवन्तीत्यर्थः । | गर्भवास, जन्म, जरा और मरणरूप
| संसारके भयसे मुक्त हो जाते हैं ।
तथा च योगियाज्ञवल्क्यो | इसी प्रकार योगियाज्ञवल्क्य भी
उक्तार्थे स्मृति- ब्रह्मात्मनैवावस्थितं | ब्रह्मात्मभावसे स्थित होनेको ही
प्रमाणदर्शनम् समाधिं दर्शयति— | समाधिरूपसे प्रदर्शित करते हैं—
“यदर्थमिदमद्वैतं | “यह जो सबका कारणरूप अद्वैत-
भारूपं सर्वकारणम् । | तत्त्व है प्रकाशस्वरूप, आनन्दमय,
आनन्दममृतं नित्यं | अमृत, नित्य और समस्त भूतोंमें
सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ | ओतप्रोत है। अनन्यचित्त पुरुष उस
तदेवानन्यधीः प्राप्य | परमात्माको ही आत्मस्वरूपसे प्राप्त-
परमात्मानमात्मना । | कर उसीमें लीन हो जाता है। वही
तस्मिन्प्रलीयते त्वात्मा | समाधि कहलाती है। इन्द्रियोंको
समाधिः स उदाहृतः॥ | अपने वशमें कर यमादि गुणोंसे
इन्द्रियाणि वशीकृत्य | सम्पन्न हो मनको आत्मामें लगावे
यमादिगुणसंयुतः । | और आत्माको परमात्मामें । फिर
आत्ममध्ये मनः कुर्या- | स्वयं परमात्मभावसे स्थित हो कुछ
दात्मानं परमात्मनि ॥ | भी चिन्तन न करे। तब यह चित्त
परमात्मा स्वयं भूत्वा | अखण्ड प्रत्यगात्मामें लीन हो जाता
न किञ्चिच्चिन्तयेत्ततः । | है। वही प्रत्यगात्मा है—ऐसा
तदा तु लीयते त्वात्मा | ब्रह्मवादियोंने कहा है” ॥ ७ ॥
प्रत्यगात्मन्यखण्डिते॥ |
प्रत्यगात्मा स एव स्या- |
दित्युक्तं ब्रह्मवादिभिः॥” |
इति ॥७॥ |
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५
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व्यावहारिक भेद और ज्ञानद्वारा मोक्षका प्रदर्शन
नन्वद्वितीये परमात्मन्यभ्यु- | किन्तु परमात्माको अद्वितीय
पगम्पमाने जीवेश्वरयोरपि | माननेपर तो जीव और ईश्वरका भी
विभागाभावाल्लीना ब्रह्मणीति | विभाग न रहनेसे 'लीना ब्रह्मणि
जीवानां ब्रह्मैकत्वपरा लयश्रुति- | तत्परा योनिमुक्ताः' यह जीवोंका ब्रह्ममें
रनुपपन्नैवेत्याशङ्क्य व्यवहारा- | लय बतलानेवाली श्रुति असंगत ही
वस्थायां जीवेश्वरयोरुपाधितो | होगी—ऐसी आशंका करके व्यव-
विभागं दर्शयित्वा तद्विज्ञानाद- | हारावस्थामें उपाधिवश जीव और
मृतत्वं दर्शयति— | ईश्वरका विभाग दिखलाकर श्रुति
परमात्माके विज्ञानसे अमृतत्वकी
प्राप्ति प्रदर्शित करती है—
संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च
व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः ।
अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावा-
ज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ८ ॥
परस्पर मिले हुए इस क्षर-अक्षर अथवा व्यक्ताव्यक्तरूप विश्वका
परमात्मा पोषण करता है । मायाधीन जीव भोक्तृभावके कारण उसमें बँधता
है और परमात्माका ज्ञान होनेपर समस्त पाशोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥
संयुक्तमेतदिति । व्यक्तं वि- | 'संयुक्तमेतत्' इत्यादि । व्यक्त-
कारजातमव्यक्तं कारणं तदुभयं | विकारसमूह और अव्यक्त कारण
क्षरमक्षरं च व्यक्तं क्षरं विनाश्य- | ये ही दोनों क्षर और अक्षर हैं ।
व्यक्त्तमक्षरमविनाशि तदुभयं | व्यक्त-क्षर यानी विनाशी है और
परस्परसंयुक्तं कार्यकारणात्मकं | अव्यक्त-अक्षर यानी अविनाशी
विश्वं भरते बिभर्तीश ईश्वरः । | है । परस्पर मिले हुए कार्य-
कारणात्मक विश्वरूप इन दोनोंका
परमात्मा पोषण करता है
९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
तथा चाह भगवान्— ऐसा ही . भगवान्ने भी कहा
“क्षरः सर्वाणि भूतानि है—“सम्पूर्ण भूत (प्राकृत विकार)
कूटस्थोऽक्षर उच्यते । क्षर हैं और कूटस्थ प्रकृति
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः (भगवान्की मायाशक्ति) अक्षर
परमात्मेत्युदाहृतः ॥ कही जाती है । इन दोनोंसे अत्यन्त
यो लोकत्रयमाविश्य उत्कृष्ट पुरुष [ अर्थात् पुरुषोत्तम ]
बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।” तो अन्य ही है, जो परमात्मा कहा गया
(गीता १५। १६, १७) है; तथा जो अविनाशी ईश्वर तीन
इति । लोकोंमें व्याप्त होकर उनको धारण
करता है ।” इत्यादि ।
न केवलमीश्वरो व्यक्ताव्यक्तं परमात्मा केवल व्यक्ताव्यक्तरूप
भरतेऽनीशश्चानीश्वरश्च स आत्मा- विश्वका भरण ही नहीं करता, अपितु
विद्यातत्कार्यभूतदेहेन्द्रियादिभि- जीव अनीश—अस्वतन्त्र भी है और
र्बध्यते भोक्तृभावात् । एतदुक्तं वह भोक्तृत्वके कारण अविद्या और
भवति—परस्परसंयुक्त व्यष्टि- उसके कार्यभूत देह एवं इन्द्रियादिसे
समष्टिरूप ईश्वरः । तद्व्यष्टिभूत- बँध जाता है । यहाँ कहना यह है
देहेन्द्रियात्मकोऽनीशो जीवः । एवं कि ईश्वर परस्पर मिले हुए समष्टि-
समष्टिव्यष्ट्यात्मकत्वेन जीव- व्यष्टिरूप है । उनमें व्यष्टि देह एवं
परयोरौपाधिकस्य भेदस्य विद्य- इन्द्रियोंवाला मायाधीन जीव है । इस
मानत्वात्तदुपाध्युपासनद्वारेण नि- प्रकार समष्टि-व्यष्टिरूपसे जीव और
रुपाधिकमीश्वरं ज्ञात्वा मुच्यत परमात्माका औपाधिक भेद विद्यमान
इति भोक्त्रात्मैक्यवादे नानुषपन्नं रहनेसे उस उपाधिजनित उपासनाके
किञ्चिद्विद्यत इति । द्वारा निरुपाधिक ईश्वरका ज्ञान होने-
पर जीव मुक्त हो जाता है । अतः
भोक्ता जीव और परमात्माका एकत्व
माननेवाले सिद्धान्तमें असंगत कुछ
भी नहीं है ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
तथा चौपाधिकमेव भेदं | इसी प्रकार भगवान् याज्ञवल्क्य
भेदस्यौ- दर्शयति भगवान् | भी इनका औपाधिक भेद ही
पाधिकत्वम् याज्ञवल्क्यः— | दिखलाते हैं—“जिस प्रकार घटादि-
“आकाशमेकं हि यथा | में एक ही आकाश भिन्न-भिन्न हो
घटादिषु पृथग्भवेत् । | जाता है उसी प्रकार एक ही आत्मा
तथात्मैको ह्यनेकश्च | जलाशयोंमें सूर्यके समान भिन्न-भिन्न
जलाधारेष्विवांशुमान् ॥” | प्रतीत हो रहा है ।”
( याज्ञ० ३ । १४४) |
तथा च श्रीविष्णुधर्मे— | श्रीविष्णुधर्मोत्तरेमें भी ऐसा ही
“परात्मनोर्मनुष्येन्द्र | कहा है—“राजन् ! परमात्मा और
विभागोऽज्ञानकल्पितः । | जीवात्माका भेद अज्ञानकल्पित है;
क्षये तस्यात्मपरयो- | अज्ञानका नाश हो जानेपर आत्मा
र्विभागाभाव एव हि ॥ | और परमात्माके भेदका अभाव ही
आत्मा क्षेत्रज्ञसंज्ञोऽयं | सिद्ध होता है । यह क्षेत्रज्ञसंज्ञक
संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । | जीवात्मा प्रकृतिके गुणोंसे युक्त है
तैरेव विगतः शुद्धः | और उन्हींसे रहित होनेपर यह शुद्ध-
परमात्मा निगद्यते ॥ | स्वरूप परमात्मा कहा जाता है ।
अनादिसंबन्धवत्या | यह क्षेत्रज्ञ अपनेसे अनादिकालसे
क्षेत्रज्ञोऽयमविद्यया । | सम्बन्ध रखनेवाली अविद्यासे युक्त
युक्तः पश्यति भेदेन | होनेसे ही अपनेमें स्थित ब्रह्मको
ब्रह्म त्वात्मनि संस्थितम्॥” | भेदभावसे देखता है ।”
तथा च श्रीविष्णुपुराणे— | तथा श्रीविष्णुपुराणमें भी कहा
“विभेदजनकेऽज्ञाने | है—“जीव और ब्रह्मका भेद उत्पन्न
नाशमात्यन्तिकं गते । | करनेवाले अज्ञानका आत्यन्तिक नाश
आत्मनो ब्रह्मणो भेद- | हो जानेपर आत्मा और ब्रह्मका
मसन्तं कः करिष्यति ॥” | मिथ्या भेद कौन करेगा ?”
( ६ । ७ । ९६) |
९८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
९८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
तथा च वासिष्ठे योगशास्त्रे | वासिष्ठ योगशास्त्रमें भी [ राम-
प्रश्नपूर्वकं दर्शितम्— | चन्द्रजीके ] प्रश्नपूर्वक यही बात
“यद्यात्मा निर्गुणः शुद्धः | दिखायी है। [राम—] “यदि आत्मा
सदानन्दोऽजरोऽमरः । | निर्गुण, शुद्ध, नित्यानन्दस्वरूप,
संसृतिः कस्य तात स्या- | जराशून्य और अमर है तो हे विभो !
न्मोक्षो वा विद्यया विभो ॥ | यह संसार किसे प्राप्त होता है ?
क्षेत्रनाशः कथं तस्य | अथवा ज्ञानसे किसका मोक्ष होगा ?
ज्ञायते भगवन्द्यतः । | और हे भगवन् ! [ ज्ञानीके महा-
यथावत्सर्वमेतन्मे | प्रयाणके समय ] उसका लिङ्गभङ्ग
वक्तुमर्हसि साम्प्रतम् ॥” | होता कैसे जाना जाता है ? इस
| समय ये सब बातें आप मुझे यथार्थ
वसिष्ठः— | रीतिसे बतला दीजिये ।”
“तस्यैव नित्यशुद्धस्य | वसिष्ठ— “मनीषिगण उस नित्य-
सदानन्दमयात्मनः । | शुद्ध, नित्यानन्दमय आत्माको ही
अवच्छिन्नस्य जीवस्य | देहावच्छिन्न जीवभावकी प्राप्ति होनेपर
संसृतिः कीर्त्यते बुधैः ॥ | संसारकी प्राप्ति बतलाते हैं । प्रत्येक
एक एव हि भूतात्मा | जीवमें एक ही भूतात्मा ( सत्य
भूते भूते व्यवस्थितः । | आत्मा—परब्रह्म ) स्थित है । वही
एकधा बहुधा चैव | जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाके समान
दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ | एक और अनेक रूपसे देखा जाता
भ्रान्त्यारूढः स एवात्मा | है । अविद्याधीन होनेपर वही
जीवसंज्ञः सदा भवेत् ॥” | परमात्मा सर्वदा जीवसंज्ञावाला हो
| जाता है ।”
तथा च ब्राह्मे पुराणे परस्यै- | इसी प्रकार ब्रह्मपुराणमें भी
[हाशिया: परस्यैवोपाधिक-] वोपाधिकं जीवादि- | परमात्माके ही औपाधिक जीवादि
[हाशिया: जीवादिभेदो] भेदं दर्शयति— | भेद दिखलाते हैं । वहाँ यह
[हाशिया: बन्धमुक्तादि-] | शंका करके कि ऐसी अवस्थामें
[हाशिया: व्यवस्था च] कथं तर्ह्यौपाधिक- | औपाधिक भेदसे ही बन्ध-मोक्षादिकी
भेदेन बन्धमुक्त्यादिव्यवस्था ? | व्यवस्था कैसे हो सकती है ? उनकी
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
इत्याशङ्क्य दृष्टान्तपूर्वकं व्यवस्थां | दृष्टान्तपूर्वक व्यवस्था दिखलाते हैं—
दर्शयति— | “जिस प्रकार एक ही सूर्य विभिन्न
“एकस्तु सूर्यो बहुधा | जलाधारोंमें अनेकरूप दिखायी देता
जलाधारेषु दृश्यते । | है उसी प्रकार समस्त उपाधियोंमें
आभाति परमात्मा च | स्थित परमात्मा भी अनेकवत् भासता
सर्वोपाधिषु संस्थितः ॥ | है । वह परब्रह्म समस्त शरीरोंके
ब्रह्म सर्वशरीरेषु | बाहर और भीतर भी स्थित है ।
बाह्ये चाभ्यन्तरे स्थितम् । | जिस प्रकार आकाश पञ्चभूतोंमें
आकाशमिव भूतेषु | ओतप्रोत है उसी प्रकार समस्त
बुद्धावात्मान चान्यथा॥ | बुद्धियोंमें एक ही आत्मा अनुस्यूत
एवं सति यथा बुद्ध्या | है, और किसी प्रकार नहीं । ऐसी
देहोऽहमिति मन्यते । | स्थितिमें अनात्मामें आत्मत्वकी भ्रान्ति
अनात्मन्यात्मताभ्रान्त्या | हो जानेसे वैसी बुद्धिके द्वारा वह जीव
सा स्यात्संसारबन्धिनी ॥ | जो ऐसा मानने लगता है कि 'मैं देह
सर्वैर्विकल्पैर्हीनस्तु | हूँ' यह मति ही उसे संसारमें बाँधने-
शुद्धो बुद्धोऽजरोऽमरः । | वाली है । किन्तु इन समस्त
प्रशान्तो व्योमवद्व्यापी | विकल्पोंसे रहित वह शुद्ध, बुद्ध,
चैतन्यात्मासकृत्प्रभः ॥ | अजर, अमर, अत्यन्त शान्त,
धूमाभ्रधूलिभिर्व्योम | आकाशके समान व्यापक, चैतन्य-
यथा न मलिनायते । | स्वरूप और नित्यज्योतिःस्वरूप है ।
प्राकृतैरपरामृष्टो | जिस प्रकार धूम, मेघ और धूलि
विकारैः पुरुषस्तथा ॥ | आदिसे आकाश मलिन नहीं होता
यथैकस्मिन्घटाकाशे | उसी प्रकार पुरुष प्रकृतिके विकारोंसे
जलैर्धूमादिभिर्युते । | असंग है । जिस प्रकार एक घटा-
नान्ये मलिनतां यान्ति | काशके जल या धूमादिसे युक्त
दूरस्थाः कुत्रचित्क्वचित् ॥ | होनेपर उससे दूर रहनेवाले अन्य
| सब घटाकाश कभी किसी भी