श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६५
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६५
परमेश्वरके सर्वात्मभाव या विराट्-स्वरूपका वर्णन
पुरुषोऽन्तरात्मेत्युक्तं पुनरपि | वह परमेश्वर पुरुष एवं अन्तरात्मा
है—यह कहा गया, अब सबकी
सर्वात्मानं दर्शयति—सर्वस्य | तद्रूपता प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति
तावन्मात्रत्वप्रदर्शनार्थम् । उक्तं | फिर भी उसका सर्वात्मभाव दिखलाती
है । कहा भी है—"अध्यारोप और
च--"अध्यारोपापवादाभ्यां नि- | अपवादके द्वारा निष्प्रपञ्चको प्रपञ्चित
ष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते" इति । | किया जाता है" इत्यादि ।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१४॥
वह सहस्र शिर, सहस्र नेत्र और सहस्र चरणोंवाला है तथा पूर्ण है ।
वह भूमिको सब ओरसे व्याप्त कर अनन्तरूपसे उसका अतिक्रमण करके
स्थित है । [ अथवा ऐसा अर्थ करना चाहिये कि नाभिसे ऊपर दश
अङ्गुल परिमाणवाले हृदयमें स्थित है ] ॥ १४ ॥
सहस्राण्यनन्तानि शीर्षाण्य- | इसके सहस्र अर्थात् अनन्त शिर
हैं इसलिये यह सहस्रशिरवाला है ।
स्येति सहस्रशीर्षा । पुरुषः पूर्णः । | पुरुष अर्थात् पूर्ण है । इसी प्रकार
एवमुत्तरत्र योजनीयम् । स भूमिं | आगेके विशेषणोंका भी अर्थ कर लेना
१. अध्यारोप और अपवाद ये वेदान्तके पारिभाषिक शब्द हैं । किसी सत्य
वस्तुमें असत्य पदार्थका भ्रम होना अध्यारोप है, जैसे रज्जुमें सर्पकी भ्रान्ति; तथा
उस असत्य पदार्थके बाधपूर्वक परमार्थ-सत्यको प्रदर्शित कराना अपवाद है, जैसे
कल्पित सर्पके निराकरणद्वारा उसकी अधिष्ठानभूता रज्जुका भान । इसी प्रकार
निष्प्रपञ्च ब्रह्ममें मायाका आरोप करके प्रपञ्चप्रतीतिका व्यवस्था की जाती है और
प्रपञ्चके अपवादद्वारा शुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार कराया जाता है । परन्तु वस्तुतः ये
दोनों प्रपञ्चके ही अन्तर्गत हैं, अखण्ड चिन्मात्र शुद्ध ब्रह्ममें तो किसी भी प्रकारके
अध्यारोप या अपवादका अवकाश ही नहीं है । इस प्रकार अध्यारोप और अपवाद-
के द्वारा उस निर्विशेषका सविशेषरूपसे वर्णन किया जाता है ।
१६६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
भुवनं सर्वतोऽन्तर्बहिश्च वृत्वा | चाहिये । * वह भूमि अर्थात् संसार-
| को सर्वतः—बाहर और भीतरसे
व्याप्यात्यतिष्ठदतीत्य भुवनं सम- | व्याप्त करके संसारका भी अतिक्रमण
| करके स्थित है। दशाङ्गुल अर्थात्
धितिष्ठति। दशाङ्गुलमनन्तमपार- | अनन्त--अपार रूपसे । अथवा
मित्यर्थः। अथवा नाभेरुपार दशा- | नाभिसे ऊपर जो दश अङ्गुल
| परिमाणवाला हृदय है उसमें स्थित
ङ्गुलं हृदयं तत्राधितिष्ठति ॥१४॥ | है॥ १४ ॥
ननु सर्वात्मत्वे सप्रपञ्चं ब्रह्म | किन्तु सर्वात्मक होनेपर तो ब्रह्म
| सप्रपञ्च ( सविशेष ) सिद्ध होगा,
स्यात्तद्व्यतिरेकेणाभावादित्याह-- | क्योंकि उससे अतिरिक्त प्रपञ्चकी सत्ता
| ही नहीं है, इसपर श्रुति कहती है—
पुरुष एवेदग्ँ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥१५॥
जो कुछ भूत और भविष्यत् है एवं जो अन्नके द्वारा वृद्धिको प्राप्त
होता है वह सब पुरुष ही है; तथा वही अमृतत्व ( मुक्ति ) का भी
प्रभु है ॥ १५ ॥
पुरुष एवेदमिति । पुरुष एवेदं | 'पुरुष एवेदम्' इत्यादि । यह
| जो अन्नसे बढ़ता है तथा यह जो
सर्वं यदन्नेनातिरोहति यदिदं | वर्तमान दिखायी देता है तथा जो
दृश्यते वर्तमानं यद्भूतं यच्च भव्यं | कुछ भूत और भविष्यत् है वह सब
| पुरुष ही है। इसके सिवा, वह
भविष्यत् । किञ्च—उतामृतत्व- | अमृतत्वका ईशान है अर्थात् अमरण-
- अर्थात् सहस्र यानी अनन्त अक्षि ( नेत्र ) और पाद ( चरण ) होनेके
कारण वह सहस्राक्ष और सहस्रपाद है।
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६७
स्येशानोऽमरणधर्मत्वस्य कैवल्य- | धर्मत्व यानी कैवल्यपदका भी प्रभु
| है । तथा जो अन्नसे बढ़ता है, जो
स्येशानः । यच्चान्नेनातिरोहति | विद्यमान है उसका यह स्वामी
यद्वर्तते तस्येशानः ॥ १५ ॥ | है ॥ १५ ॥
पुनरपि निर्विशेषं प्रतिपाद- | फिर भी उसको निर्विशेष प्रति-
यितुं दर्शयति— | पादन करनेके लिये श्रुति दिखलाती
| है—
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १६ ॥
उसके सब ओर हाथ-पाँव हैं, सब ओर आँख, शिर और मुख हैं
तथा वह सर्वत्र कर्णोंवाला है एवं लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ १६ ॥
सर्वत इति । सर्वतः | 'सर्वतः' इत्यादि । उसके सब
पाणयः पादाश्चेति सर्वतः- | ओर हाथ-पाँव हैं इसलिये वह सर्वतः-
पाणिपादं तत् । सर्वतोऽक्षीणि | पाणिपाद है, तथा सब ओर आँख,
शिरांसि मुखानि च यस्य तत्सर्व- | शिर और मुख हैं इसलिये सर्वतो-
तोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिः | ऽक्षिशिरोमुख है । उसके सब ओर
श्रवणमस्येति श्रुतिमत् । लोके | श्रुति-कर्ण हैं इसलिये वह सर्वतः
प्राणिनिकाये सर्वमावृत्य संव्या- | श्रुतिमान् है । तथा यह लोकमें
| अर्थात् प्राणिसमूहमें सबको आवृत
प्य तिष्ठति ॥ १६ ॥ | —व्याप्त करके स्थित है ॥ १६ ॥
आत्माके देहावस्थान और इन्द्रिय-सम्बन्धराहित्यका निरूपण
उपाधिभूतपाणिपादादीन्द्रि- | उपाधिभूत पाणिपादादिके अध्या-
याध्यारोपणाज्ज्ञेयस्य तद्वत्ताशङ्का | रोपसे ऐसी आशङ्का न हो जाय कि
| ज्ञेय ( ब्रह्म ) उनसे युक्त है इसी
मा भूदित्येवमर्थमुत्तरतो मन्त्रः— | प्रयोजनसे आगेका मन्त्र है—