श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
त्प्रकाशात्तमसो यथा । | अन्धकारकी । अतः अज्ञानका
तस्माज्ज्ञानेन मुक्तिः स्या- | पूर्णतया क्षय होनेपर ज्ञानसे ही
दज्ञानस्य परिक्षयात् ॥” | मुक्ति होती है,” “व्रत, दान, तप,
“व्रतानि दानानि तपांसि यज्ञाः | यज्ञ, सत्य, तीर्थ, आश्रम और
सत्यं च तीर्थाश्रमकर्मयोगाः। | कर्मयोग—ये सब स्वर्गके ही हेतु हैं,
स्वर्गार्थमेवाशुभमश्रुवं च | अतः अशुभ ( अकल्याणकर )
ज्ञानं ध्रुवं शान्तिकरं महार्थम् ॥” | और अनित्य हैं । किन्तु ज्ञान नित्य,
“यज्ञैर्देवत्वमाप्नोति | शान्तिकारक और परमार्थस्वरूप है”,
तपोभिर्ब्रह्मणः पदम् । | “मनुष्य यज्ञोंके द्वारा देवत्व प्राप्त
दानेन विविधान्भोगा- | करता है, तपस्यासे ब्रह्मलोक पाता
ज्ञानान्मोक्षमवाप्नुयात् ॥” | है, दानसे तरह-तरहके भोग प्राप्त
“धर्मरज्ज्वा व्रजेदूर्ध्वं | करता है और ज्ञानसे मोक्षपद पाता
पापरज्ज्वा व्रजेदधः। | है”, “धर्मकी रस्सीसे पुरुष ऊपरकी
द्वयं ज्ञानासिना छित्त्वा | ओर जाता है और पापरज्जुसे अधो-
विदेहः शान्तिमृच्छति ॥” | गतिको प्राप्त होता है, परन्तु जो इन
“त्यज धर्ममधर्मं च | दोनोंको ज्ञानरूप खड्गसे काट देता
उभे सत्यानृते त्यज। | है वह देहाभिमानसे रहित होकर
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा | शान्ति प्राप्त करता है”, “धर्म-अधर्म
येन त्यजसि तच्च्यज ॥” | दोनोंका त्याग करो तथा सत्-असत्
| दोनोंहीसे मुख मोड़ लो, इस प्रकार
| सत्-असत् दोनोंकी आस्था छोड़कर
| जिस ( त्यागाभिमान ) के द्वारा उनका
| त्याग करते हो उसे भी त्याग दो ।”
एवं श्रुतिस्मृतिविरोधान्न कर्म- | इस प्रकार श्रुति और स्मृतियोंसे
| विरोध होनेके कारण तथा युक्तिसे
साधनममृतत्वं न्यायविरोधाच्च । | भी विरुद्ध होनेसे अमृतत्व कर्मसाध्य
| नहीं है । यदि उसे कर्मसाध्य माना
कर्मसाधनत्वे मोक्षस्य चतुर्विध- | जायगा तो मोक्ष भी चार प्रकारकी
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३
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क्रियान्तर्भावादनित्यत्वं स्यात् । | क्रियाओंके अन्तर्गत होनेसे अनित्य
| हो जायगा; क्योंकि 'जो क्रियासाध्य
यत्कृतकं तदनित्यमिति कर्म- | होता है वह अनित्य होता है' इस
| नियमके अनुसार क्रियासाध्य वस्तुकी
साध्यस्य नित्यत्वादर्शनात् । | नित्यता नहीं देखी जाती । किन्तु
| मोक्षको तो सभी सिद्धान्तवालोंने
नित्यश्च मोक्षः सर्ववादिभिरभ्युप- | नित्य माना है । चातुर्मास्ययागके
गम्यते । तथा च श्रुतिश्चातुर्मा- | प्रकरणमें ऐसी श्रुति भी है कि "हे
| मर्त्य ! तू पुनः पुत्ररूपसे उत्पन्न
स्यप्रकरणे—प्रजामनु प्रजायसे | होता है, यही तेरा अमरत्व है ।"
तदु ते मर्त्यामृतमिति । किंच, | तथा "सुकृतम्" ( अक्षय्यं ह वै
| चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति ) इस
सुकृतमिति सुकृतस्याक्षयत्व- | श्रुतिमें सुकृतका अक्षयत्व बतलाया
| गया है और 'सुकृत' शब्द कर्मके
मुच्यते । सुकृतशब्दश्च कर्मणि । | अर्थमें प्रयुक्त होता है ।
नन्वेवं तर्हि कर्मणां देवादि- | शंका—तब इस प्रकार तो
| देवत्वादिकी प्राप्तिके हेतु होनेसे कर्म
प्राप्तिहेतुत्वेन बन्धहेतुत्वमेव । | बन्धनके ही कारण सिद्ध होते हैं ?
सत्यम्, स्वतो बन्धहेतुत्व- | समाधान—सचमुच, स्वयं तो वे
| बन्धनके ही कारण हैं । ऐसा ही
मेव । तथा च श्रुतिः—"कर्मणा | श्रुति भी कहती है—"कर्मसे
१. उत्पाद्य, विकार्य, संस्कार्य और प्राप्य-ये चार प्रकारके क्रियाफल हैं ।
जब कोई अविद्यमान वस्तु क्रियाद्वारा उत्पन्न की जाती है तो उसे उत्पाद्य कहते हैं,
जैसे घट, पट आदि । एक वस्तुको दूसरे रूपमें परिणत करनेपर जो फल प्राप्त होता
है उसे विकार्य कहते हैं जैसे हारको गलाकर उसका कङ्कण बना दिया जाय । दोषको
हटाना और गुणको प्रकट कर देना संस्कार्य है जैसे किसी दर्पणको घिसकर
उसका मैल हटा दिया जाय और उसमें चमक पैदा कर दी जाय । किसी अप्राप्य
वस्तुको क्रियाद्वारा प्राप्त करना यह प्राप्य क्रियाफल है; जैसे गमनक्रियाके द्वारा किसी
ग्रामविशेषमें पहुँचना ।