श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
आध्यात्मिकस्याधिभौतिकस्याधि- आध्यात्मिक, आधिभौतिक और
दैविकस्य त्रिविधदुःखस्य व्युदा- आधिदैविक इन त्रिविध दुःखोंकी
साच्छीतोष्णादिजन्यदुःखसहिष्णोः उपेक्षा करनेसे शीतोष्णादिजनित
तितिक्षोर्यज्ज्ञानमुत्पद्यते तस्य दुःख सहन करनेवाले तितिक्षु पुरुष-
आध्यात्मिकादिभेदात्सिद्धेस्त्रैवि- को जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह
ध्यम् । सुहृदं प्राप्य या सिद्धि- दुःखविघात नामकी सिद्धि है;
र्ज्ञानस्य सा सुहृत्प्राप्तिर्नाम आध्यात्मिकादि भेदके कारण इस
सिद्धिः। आचार्यहितवस्तुप्रदानेन सिद्धिके भी तीन प्रकार हैं । किसी
या सिद्धिर्विद्यायाः सा दानं नाम सुहृद्के प्राप्त होनेपर जो ज्ञानकी
सिद्धिः। एवमष्टविधा सिद्धिर्व्या- सिद्धि होती है वह सुहृत्प्राप्ति नामकी
ख्याता । सिद्धि है । आचार्यको उनकी प्रिय
वस्तु दान करनेसे जो ज्ञानकी प्राप्ति
होती है वह दान नामकी सिद्धि है।
इस प्रकार आठ प्रकारकी सिद्धियों-
की भी व्याख्या की गयी ।
एवं विपर्ययाशक्तितुष्टि- इस तरह यह विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि
सिद्धाख्याः पञ्चाशत्प्रत्यय- और सिद्धि नामक पचास प्रत्ययभेदोंकी
भेदा व्याख्याताः । एवं ब्राह्म- व्याख्या हुई । ब्राह्मपुराणमें कल्पो-
पुराणे कल्पोपनिषद् व्याख्यान- पनिषद्की व्याख्याके प्रसङ्गमें साठवें
प्रदेशे षष्टितमाध्याये पञ्चाशत् अध्यायमें पचास प्रत्ययभेदोंकी इसी
प्रत्ययभेदाः प्रतिपादिताः । अथवा प्रकार व्याख्या की गयी है । अथवा
“पञ्चाशच्छक्तिरूपिणः”इति परस्य “पञ्चाशच्छक्तिरूपिणः” इस पुराण-
याः शक्तयः पुराणे स्वरूपत्वेना- वाक्यमें परमात्माकी जिन शक्तियोंका
भिमताः पञ्चाशच्छक्तय अरा इव उनके स्वरूपरूपसे वर्णन किया है
यस्य तं शतारारम् । वे ही जिसके अरोंके समान हैं उस
शतारार ( पचास अरोंवाले ) को
[ कारणरूपसे देखा ] ।