श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
मन्येषामप्युपलक्षणार्थम् । परि- कारणोंको भी उपलक्षित करनेके
लिये किया गया है । ये स्वभाव और
मुह्यमाना अविवेकिनो विषया- कालवादी परिमुह्यमान—अविवेकी
यानी विषयी होनेके कारण यथार्थ नहीं
त्मानो न सम्यग्जानन्ति । तु- जानते । 'तु' शब्द निश्चयार्थक है ।
शब्दोऽवधारणे । देवस्यैष महिमा यह तो देव ( परमेश्वर ) की महिमा
है, जिससे यह ब्रह्मचक्र भ्रमित—
माहात्म्यम् । येनेदं भ्राम्यते परिवर्तित होता है [ अर्थात् सब
परिवर्तते ब्रह्मचक्रम् ॥ १ ॥ ओर घूम रहा है ] ॥१॥
चिन्तनीय परमेश्वरका स्वरूप तथा उसकी महिमा
महिमानं प्रपञ्चयति— उस महिमाका निरूपण करते
हैं—
येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं
ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः ।
तेनेशितं कर्म विवर्तते ह
पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् ॥ २ ॥
जिसके द्वारा सर्वदा यह सब व्याप्त है तथा जो ज्ञानस्वरूप, काल-
का भी कर्ता, निष्पापत्वादि गुणवान् और सर्वज्ञ है उसीसे प्रेरित होकर
यह पृथिवी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाशरूप कर्म [ जगद्रूपसे ] विवर्तित
होता है; [ अतः उसका चिन्तन करना चाहिये ] ॥२॥
येनेति । येनेश्वरेणावृतं व्याप्त- 'येन' इत्यादि । जिस ईश्वरके
मिदं जगन्नित्यं नियमेन । ज्ञः द्वारा यह जगत् नित्य—नियमसे
व्याप्त है, जो ज्ञानस्वरूप, कालकार
कालकारः कालस्यापि कर्ता । —कालका भी कर्ता, गुणी—