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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

१३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

१३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

रुध्यते प्रवर्यादौ। सवित्रा प्रेरितः | आदि) में वायुका अधिरोध होता है
| अर्थात् जहाँ सवितासे प्रेरित होकर
शब्दमभिव्यक्तं करोति। सोमो | वायु शब्दको अभिव्यक्त करता है
| और जहाँ दशापवित्र (छाननेके
यत्र दशापवित्रात्पूयमानोऽति- | वस्त्र) से पवित्र किये (छाने हुए)
| सोमरसकी अधिकता होती है उस
रिच्यते तत्र क्रतौ संजायते मनः। | यज्ञकार्यमें उसका मन लग जाता है।
अग्निर्यत्राभिमथ्यत इत्यत्रापरा | 'अग्निर्यत्राभिमथ्यते' इस मन्त्रकी
| यह दूसरी व्याख्या की जाती है—
व्याख्या—अग्निः परमात्मा, | अग्नि परमात्माको कहते हैं, क्योंकि
अविद्यातत्कार्यस्य दाहकत्वात् । | वह अविद्या और उसके कार्यको
उक्तं च—"......अहमज्ञानजं | दग्ध करनेवाला है। [श्रीमद्भगवद्गीता-
| में] कहा भी है "मैं अपने भक्तोंके
तमः । नाशयाम्यआत्मभावस्थो | अन्तःकरणमें स्थित होकर प्रकाशमय
ज्ञानदीपेन भास्वता" (गीता | ज्ञानदीपकसे उनके अज्ञानजनित
१०।११) इति । यत्र | अन्धकारको नष्ट कर देता हूँ।"
यस्मिन्पुरुषे मथ्यते स्वदेह- | उस परमात्मारूपिका 'स्वदेहमरणिं
| कृत्वा' इत्यादि पूर्वमन्त्रसे कहे हुए
मरणिं कृत्वेत्यादिना पूर्वो- | ध्यानरूप निर्मन्थनके द्वारा जिस
क्तध्याननिर्मथनेन वायुर्यत्राधि- | पुरुषमें मन्थन होता है, तथा जहाँ
| वायुका अधिरोध होता है अर्थात्
रुध्यते शब्दमव्यक्तं करोति | रेचकादि क्रियाओके कारण जहाँ
रेचकादिकरणात् । सोमो यत्रा- | वायु अव्यक्त शब्द करता है और
| जहाँ अनेक जन्मोंतक [अग्निकी]
तिरिच्यतेऽनेकजन्मसेवया तत्र | सेवा करनेसे सोमकी बहुलता होती
तस्मिन्यज्ञदानतपःप्राणायामसमा- | है, उस यज्ञ, दान, तप, प्राणायाम
धिविशुद्धान्तःकरणे संजायते | एवं समाधि आदिसे विशुद्ध हुए