श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
पञ्चस्रोतोऽम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्रां
पञ्चप्राणोर्मिं पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् ।
पञ्चावर्तां पञ्चदुःखौघवेगां
पञ्चाशद्भेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥
पाँच स्रोत जिसमें जलकी धाराएँ हैं, पाँच उद्गमस्थानोंके कारण जो
बड़ी उग्र और वक्र (टेढ़ी) है, जिसमें पञ्चप्राणरूप तरंगें हैं, पाँच
प्रकारके ज्ञानोंका मूल जिसका कारण है, जिसमें पाँच आवर्त (भँवर)
हैं, जो पाँच प्रकारके दुःखरूप ओघवेगवाली है और जो पाँच पर्वोंवाली
है उस पचास भेदोंवाली [नदी] को हम जानते हैं ॥ ५ ॥
पञ्चस्रोतोऽम्बुमिति । पञ्च | 'पञ्चस्रोतोऽम्बुम्' इत्यादि । पाँच
स्रोतांसि चक्षुरादीनि ज्ञानेन्द्रि- | स्रोतरूप चक्षु आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ
याण्यम्बुस्थानानि यस्यास्तां नदीं | ही जिसके जलस्थान हैं उस पाँच
पञ्चस्रोतोऽम्बुम् । अधीम इति | स्रोतरूप जलवाली नदीको [हम जानते
सर्वत्र संबध्यते । पञ्चयोनिभिः | हैं] । यहाँ 'अधीमः' (जानते हैं)
कारणभूतैः पञ्चभूतैरुग्रां वक्रां | क्रियापदका सबके साथ सम्बन्ध है ।
च पञ्चयोन्युग्रवक्राम् । पञ्च | पाँच योनियों अर्थात् कारणभूत पाँच
प्राणाः कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाण्या- | भूतोंसे जो उग्र और वक्र है उस
दयो वोर्मयो यस्यास्तां पञ्चप्राणो- | पञ्चयोन्युग्रवक्राको, पाँच प्राण अथवा
र्मिम् । पञ्चबुद्धीनां चक्षुरादि- | वाक्, पाणि, पादादि पाँच कर्मेन्द्रियाँ
जन्यानां ज्ञानानामादिः कारणं | जिसकी तरंगें हैं उस पञ्चप्राणोर्मि-
मनः । मनोवृत्तिरूपत्वात्सर्व- | को, पाँच बुद्धियों अर्थात् चक्षु आदिसे
ज्ञानानां मनो मूलं कारणं यस्याः | होनेवाले पाँच ज्ञानोंका आदि यानी
संसारसरितस्ताम् । तथा च | कारण मन है, क्योंकि समस्त ज्ञान
मनोवृत्तिरूप हैं; वह मन जिस
संसाररूप नदीका मूल—कारण है