सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११

अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११
गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता
कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता ।
स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्त्मा
प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः ॥ ७ ॥
जो गुणोंसे सम्बद्ध, फलप्रद कर्मका कर्ता और उस किये हुए कर्मका
उपभोग करनेवाला है, वह विभिन्न रूपोंवाला, त्रिगुणमय, तीन मार्गोंसे
गमन करनेवाला प्राणोंका अधिष्ठाता अपने कर्मोंके अनुसार गमन
करता है ॥ ७ ॥
गुणान्वय इति । गुणैः कर्म- | ‘गुणान्वयः’ इत्यादि । जिसका
ज्ञानकृतवासनामयैरन्वयो यस्य | कर्म एवं ज्ञानजनित वासनामय
सोऽयं गुणान्वयः । फलार्थस्य | गुणोंके साथ सम्बन्ध है वह यह
कर्मणः कर्ता कृतस्य कर्मफलस्य | जीव गुणान्वय है । वह फलके लिये
स एवोपभोक्ता । स विश्वरूपो | कर्म करनेवाला है और वही किये
नानारूपः कार्यकारणोपचितत्वात् | हुए कर्मका फल भोगनेवाला भी है ।
त्रयः सत्त्वादयो गुणा अस्येति | कार्यकारणभावसे [ नाना देह धारण
त्रिगुणः । त्रयो देवयानादयो | करके]वृद्धिको प्राप्त होनेसे वह विश्वरूप
मार्गभेदा अस्येति त्रिवर्त्मा धर्मा- | —नाना रूप है । सत्त्वादि तीनों गुण
धर्मज्ञानमार्गभेदा अस्येति वा । | इसीके हैं इसलिये यह त्रिगुण है। इसके
प्राणस्य पञ्चवृत्तेरधिपः संचरति । | देवयानादि तीन मार्गभेद हैं अथवा
कैः ? स्वकर्मभिः ॥ ७ ॥ | धर्म, अधर्म और ज्ञानरूप इसके
| तीन मार्ग हैं इसलिये यह त्रिवर्त्मा
| है । यह पाँच वृत्तियोंवाले प्राणका
| अधिपति सञ्चार करता है। किनके
| द्वारा ?—अपने कर्मोंके द्वारा ॥ ७ ॥