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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

२१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५

२१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः
सङ्कल्पाहङ्कारसमन्वितो यः।
बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव
आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः॥ ८ ॥
जो अँगूठेके बराबर परिमाणवाला, सूर्यके समान ज्योतिःस्वरूप,
संकल्प और अहंकारसे युक्त तथा बुद्धि और शरीरके गुणोंसे भी युक्त है
वह अन्य (जीव) भी आरकी नोंकके बराबर आकारवाला देखा गया है॥८॥
अङ्गुष्ठमात्र इति। अङ्गुष्ठ- | ‘अङ्गुष्ठमात्रः’ इत्यादि। अङ्गुष्ठ-
मात्रोऽङ्गुष्ठपरिमितहृदयसुषिरापे- | मात्र अर्थात् हृदयगुहाकी अपेक्षासे
क्षया। रवितुल्यरूपो ज्योतिःस्वरूप | अँगूठेके बराबर परिमाणवाला, रवि-
इत्यर्थः। सङ्कल्पाहङ्कारादिना | तुल्यरूप अर्थात् ज्योतिःस्वरूप,
समन्वितो बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन च | बुद्धिके गुण सङ्कल्प और अहंकारादि-
जरादिना। उक्तं च “जरामृत्यू | से युक्त तथा शरीरके गुण जरादिसे
शरीरस्य” इति। आराग्रमात्रः | भी सम्पन्न; “जरा और मृत्यु शरीरके
प्रतोदाग्रप्रोतलोहकण्टकाग्रमात्रो- | धर्म हैं” ऐसा कहा भी है। आराग्र-
ऽपरोऽपि ज्ञानात्मनात्मा दृष्टो- | मात्र—कोड़ेके अग्रभागमें लगा हुआ
ऽवगतः। अपिशब्दः सम्भावना- | जो लोहेका काँटा होता है उसकी
याम्। अपरोऽप्यौपाधिको जलसूर्य | नोंकके बराबर अन्य भी यानी आत्मा
इव जीवात्मा संभावित इत्यर्थः॥८॥ | भी ज्ञानस्वरूपसे देखा—जाना गया
| है। यहाँ ‘अपि’ शब्द सम्भावनामें
| है; तात्पर्य यह है कि जलमें प्रति-
| बिम्बित सूर्यके समान उपाधिसे अन्य
| जीवात्मा भी होना सम्भव है॥८॥
पुनरपि दृष्टान्तान्तरेण दर्श- | एक दूसरे दृष्टान्तसे श्रुति फिर
यति— | भी दिखाती है—