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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

२०४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५

२०४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५

क्षरं त्वविद्या क्षरणहेतुः संसृति- | उनमें क्षर—क्षरणकी हेतु यानी
कारणम् । अमृतं तु विद्या मोक्ष- | संसारकी कारण तो अविद्या है और
हेतुः । यस्तु पुनर्विद्याविद्ये ईशते | अमृत यानी मोक्षकी हेतु विद्या
नियमयति स ताभ्यामन्यस्त- | है । और जो विद्या और अविद्याका
त्साक्षित्वात् ॥ १ ॥ | शासन करता है वह उनका साक्षी
| होनेसे उन दोनोंसे भिन्न है ॥१॥
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कोऽसावित्याह— | वह कौन है ? सो बतलाते हैं—
यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको
विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः ।
ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे
ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २ ॥
जो अकेला ही प्रत्येक स्थान तथा सम्पूर्ण रूप और समस्त योनियों
( उत्पत्तिस्थानों ) का अधिष्ठान है, तथा जिसने सृष्टिके आरम्भमें उत्पन्न
हुए कपिल ऋषि ( हिरण्यगर्भ ) को ज्ञानसम्पन्न किया था और जन्म लेते
हुए भी देखा था [ वही विद्या और अविद्यासे भिन्न उनका शासक है ]॥२॥
यो योनिमिति । यो योनिं | ‘यो योनिम्’ इत्यादि । जो
योनिं स्थानं स्थानं “यः | योनि-योनिको—स्थान-स्थानको अर्थात्
पृथिव्यां तिष्ठन्” (बृ०उ० ३ । | “जो पृथिवीमें स्थित होकर [पृथिवी-
७।३) इत्यादिनोक्तानि पृथिव्या- | का शासन करता है ]” इत्यादि
दीन्यधितिष्ठति नियमयति । | मन्त्रसे कहे हुए पृथिवी आदिको
एकोऽद्वितीयः परमात्मा विश्वानि | अधिष्ठित—नियमित करता है तथा
रोहितादीनि रूपाणि योनीश्च | जो एक—अद्वितीय परमात्मा
प्रभवस्थानान्यधितिष्ठति । ऋषिं | लोहितादि सम्पूर्ण रूपोंको और
| योनियों-उत्पत्तिस्थानोंको अधिष्ठित
| करता है; [ जिसने ] ऋषि यानी