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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३

मोहयेद्द्वैतरूपया । | अपनेको मोहग्रस्त करता है और
गुहागतं स्वमात्मानं | स्वयं ही अपने अन्तःकरणमें स्थित
लभते च स्वयं हरिम् ॥ | अपने आत्मभूत श्रीहरिको प्राप्त
व्योम्नि वज्रानलज्वाला- | करता है । जिस प्रकार आकाशमें
कलापो विविधाकृतिः । | वज्राग्नि(बिजली)की अनेक प्रकारकी
आभाति विष्णोः सृष्टिश्च | लपटें दिखायी देती हैं उसी प्रकार
स्वभावो द्वैतविस्तरः ॥ | भगवान् विष्णुका स्वभाव ही
शान्ते मनसि शान्तश्च | द्वैतविस्ताररूप सृष्टि होकर भास
घोरे मूढे च तादृशः । | रहा है । सर्वत्र सर्वदा एकमात्र
ईश्वरो दृश्यते नित्यं | भगवान् ही शान्त ( सात्त्विक )
सर्वत्र न तु तत्त्वतः ॥ | चित्तमें शान्तरूपसे और घोर (राजस)
| तथा मूढ ( तामस ) चित्तमें घोर
लोहमृत्पिण्डहेम्नां च | और मूढरूपसे दिखायी दे रहे हैं ।
विकारो न च विद्यते । | किन्तु तत्त्वतः वे वैसे नहीं हैं ।
चराचराणां भूतानां |
द्वैतता न च सत्यतः ॥ | “लोहा, मृत्पिण्ड और सुवर्ण
सर्वगे तु निराधारे | इनका भी विकार नहीं होता ।
चैतन्यात्मनि संस्थिता । | जितने चराचर भूत हैं उनका भेद
अविद्या द्विगुणां सृष्टिं | वस्तुतः नहीं है । सर्वगत निराधार
करोत्यात्मावलम्बनात् ॥ | चैतन्यात्मामें स्थित अविद्या ही
सर्पस्य रज्जुता नास्ति | आत्माके आश्रयसे स्थूल-सूक्ष्म दोनों
नास्ति रज्जौ भुजङ्गता । | प्रकारकी सृष्टि रचती है। जिस प्रकार
उत्पत्तिनाशयोर्नास्ति | सर्पमें रज्जुत्व और रज्जुमें सर्पत्व
कारणं जगतोऽपि च ॥ | नहीं है उसी प्रकार जगत्के उत्पत्ति
लोकानां व्यवहारार्थ- | और नाशका भी कोई कारण नहीं
मविद्येयं विनिर्मिता । | है। इस अविद्याकी रचना (कल्पना)
| लोकव्यवहारके लिये ही हुई है।