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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

१५४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३

१५४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
तत्स्रष्टृत्वं प्रतिपादयति ॥ २ ॥ और उसके जगत्कर्तृत्वका प्रतिपादन
करता है ॥ २ ॥
परमेश्वरसे जगत्की सृष्टिका प्रतिपादन
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो
विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् ।
सं बाहुभ्यां धमति संपतत्रै-
र्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः ॥ ३ ॥
वह सब ओर नेत्रोंवाला, सब ओर मुखोंवाला, सब ओर भुजाओंवाला
और सब ओर पैरोंवाला है। वह एकमात्र देव ( प्रकाशमय परमात्मा )
द्युलोक और पृथिवीकी रचना करता हुआ [ वहाँके मनुष्य-पक्षी आदि
प्राणियोंको ] दो भुजाओं और पतत्रों ( पैरों एवं पंखों ) से युक्त
करता है* ॥ ३ ॥

  • इस मन्त्रके उत्तरार्द्धका अर्थ अन्यान्य टीकाकारोंने अनेक प्रकारसे किया
    है । प्रस्तुत अर्थ शांकरभाष्यके अनुसार है । शंकरानन्दजी इसकी व्याख्या इस
    प्रकार करते हैं—“हस्ताभ्यां विश्वमुत्पादयन्नुत्पत्तिकोले विविधान्शब्दानुत्पाद्योत्पाद-
    कादिरूपेण करोति । बाहुभ्यामिति द्विवचनसामर्थ्यात्सर्वकर्महेतुत्वाच्च धर्माधर्माभ्या-
    मिति विवक्षितम् ।......यद्यपि धमतिरग्निसंयोगार्थस्तदापि सन्तापकारित्वेन सुख-
    दुःखयोरुत्पत्तौ स्थितौ संहारे च सुखदुःखकारित्वं व्याख्येयम् । संपतत्रैः पतनशीलैः
    पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतैर्न परमाणुभिः......धमतीत्यनुषङ्गः ।” अर्थात् वह हाथोंसे
    विश्वको उत्पन्न कर उसकी उत्पत्तिके समय उत्पाद्य-उत्पादकादिरूपसे अनेक प्रकारके
    शब्द करता है । ‘बाहुभ्याम्’ इस पदमें द्विवचन है तथा हाथ समस्त कर्मोंके हेतु
    होते हैं, इसलिये इस पदसे ‘धर्माधर्मके द्वारा’ यह अर्थ बतलाना अभीष्ट है । जिस
    समय ‘धमति’ क्रियाका अर्थ अग्निसंयोग लिया जाय उस समय भी सन्तापकारक
    होनेके कारण सुख-दुःखकी उत्पत्ति-स्थिति और संहारमें उनका सुख-दुःखकारित्व
    ही बतलाना चाहिये । ‘संपतत्रैः’—पतनशील पञ्चीकृत महाभूतोंसे युक्त करता है,
    परमाणुओंसे नहीं । नारायणतीर्थ लिखते हैं—“बाहुभ्यां विद्याकर्मभ्यां संधमति
    पतत्रैः वासनारूपैः संधमति दीपयति जीवनिष्ठविद्याकर्मवासनादिभिरीश्वरो जगत्प्रव-

अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५
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विश्वतश्चक्षुरिति । सर्वप्राणि- | 'विश्वतश्चक्षुरत' इत्यादि ।
गतानि चक्षूंष्यस्येति विश्वत- | समस्त प्राणियोंके चक्षु इस परमात्मा-
| के ही हैं, इसलिये यह विश्वतश्चक्षु
श्चक्षुः । अतः स्वेच्छयैव सर्वत्र | है । अतः अपनी इच्छामात्रसे ही
| इसमें सर्वत्र चक्षु यानी रूपादिको
चक्षू रूपाद्यौ सामर्थ्यं विद्यत इति | ग्रहण करनेका सामर्थ्य है । इसी
| प्रकार आगे [ विश्वतोमुखः आदि ]
विश्वतश्चक्षुः । एवमुत्तरत्र योज- | में भी अर्थयोजना कर लेनी चाहिये ।
| वह दो भुजाओं‌द्वारा संयुक्त करता
नीयम् । सं बाहुभ्यां धमति संयो- | है; धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं
जयतीत्यर्थः; अनेकार्थत्वाद्धात्तू- | [ इसीसे अग्निसंयोगके अर्थमें प्रयुक्त
| होनेवाले 'धमति' का अर्थ संयोजन
नाम् । पक्षिणश्च धमति द्विपदो | लिया गया है ] । तथा पक्षियों और
| दो पैरोंवाले मनुष्यादिको पंतत्रों
मनुष्यादींश्च पतत्रैः । किं कुर्वन् ? | ( पंखों और पैरों ) से युक्त करता
| है । क्या करता हुआ ? द्युलोक
द्यावापृथिवी जनयन्देव एको | और पृथिवीकी सृष्टि करता हुआ ।
विराजं सृष्टवानित्यर्थः ॥ ३ ॥ | तात्पर्य यह है कि उस एकमात्र
| देवने विरा‌ट्‌की रचना की ॥३॥
र्तयतीत्यर्थः ।” अर्थात् बाहु—विद्या और कर्मद्वारा तथा पतत्र-वासनाओं‌द्वारा
संधमति—दीप्त करता है; अर्थात् जीवनिष्ठ विद्या और कर्मादिके द्वारा ईश्वर जगत्-
को प्रवृत्त करता है। विज्ञानभगवान् कहते हैं—"बाहुभ्यां मनुष्यादीन्संधमति
संयोजयति*** पतत्रैः पतनसाधनैः पादैः संधमति***अथवा पतत्रैः पक्षैः पक्षिणः
संधमति ।” अर्थात् वह मनुष्यादिको भुजाओंसे युक्त करता है और पतत्र—चलनेके
साधन यानी पैरोंसे युक्त करता है । अथवा पतत्र यानी पक्षोंसे पक्षियोंको युक्त
करता है।
१. 'पतत्र' शब्दका अर्थ है पतनसे बचानेवाला । अतः मनुष्योंके विषयमें
इसका अर्थ पैर समझना चाहिये और पक्षियोंके विषयमें पक्ष ।