सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 276 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 102

८८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
ह्येषां स भवत्यथ योऽन्यां | आत्मा ही हो जाता है । किन्तु जो
देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहम- | किसी अन्य देवताकी 'यह अन्य है
स्मीति न स वेद यथा पशुरेवं | और मैं अन्य हूँ' ऐसे भावसे
उपासना करता है वह नहीं जानता
स देवानाम्” (बृह० उ० १। | [ अर्थात् वह अज्ञानी है ] वह पशु-
४। १०) इति । | ओंके समान देवताओंका पशु है ।”
तथा च श्रीविष्णुधर्मे— | ऐसा ही विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें
“पश्यत्यात्मानमन्यं तु | भी कहा है— “जीव जबतक अपने-
यावद्वै परमात्मनः । | को परमात्मासे भिन्न देखता है
तावत्संभ्राम्यते जन्तु- | तबतक वह अपने कर्मोंद्वारा मोहित
र्मोहितो निजकर्मणा ॥ | करके भटकाया जाता है । किन्तु
संक्षीणाशेषकर्मा तु | जब उसके समस्त कर्म क्षीण हो
जाते हैं तो उसे शुद्ध परब्रह्मका
परं ब्रह्म प्रपश्यति । | अपनेसे अभेदरूपसे साक्षात्कार
अभेदेनात्मनः शुद्धं | होता है, और शुद्धस्वरूप हो जानेके
शुद्धत्वादक्षयो भवेत्”॥६॥ | कारण वह अमर हो जाता है”॥६॥
परब्रह्मकी प्राप्तिसे मुक्तिका वर्णन
ननु तमेकनेमिमित्यादिना | ‘तमेकनेमिम्’ इत्यादि वाक्यसे
सप्रपञ्चं ब्रह्म प्रतिपादितम् । तथा | प्रपञ्चयुक्त ब्रह्मका प्रतिपादन किया
गया है; ऐसी स्थितिमें ‘मैं ब्रह्म हूँ’
च सत्यहं ब्रह्मास्मीति ब्रह्मात्म- | इस प्रकार ब्रह्मात्मभावकी प्राप्ति
प्रतिपत्तावपि सप्रपञ्चस्यैव ब्रह्मण | होनेपर भी प्रपञ्चयुक्त ब्रह्मको ही
आत्मस्वरूपसे जाना जायगा;
आत्मत्वेनावगमात् “तं यथा | इससे “उसकी जो जिस प्रकार
यथोपासते तदेव भवति” इति | उपासना करता है वैसा ही हो जाता
है” इस सिद्धान्तके अनुसार सप्रपञ्च
सप्रपञ्चब्रह्मप्राप्तिरेव स्यात् । ततश्च | ब्रह्मकी ही प्राप्ति होगी । और तब