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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 276 में से

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पृष्ठ 109

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५
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व्यावहारिक भेद और ज्ञानद्वारा मोक्षका प्रदर्शन

नन्वद्वितीये परमात्मन्यभ्यु- | किन्तु परमात्माको अद्वितीय
पगम्पमाने जीवेश्वरयोरपि | माननेपर तो जीव और ईश्वरका भी
विभागाभावाल्लीना ब्रह्मणीति | विभाग न रहनेसे 'लीना ब्रह्मणि
जीवानां ब्रह्मैकत्वपरा लयश्रुति- | तत्परा योनिमुक्ताः' यह जीवोंका ब्रह्ममें
रनुपपन्नैवेत्याशङ्क्य व्यवहारा- | लय बतलानेवाली श्रुति असंगत ही
वस्थायां जीवेश्वरयोरुपाधितो | होगी—ऐसी आशंका करके व्यव-
विभागं दर्शयित्वा तद्विज्ञानाद- | हारावस्थामें उपाधिवश जीव और
मृतत्वं दर्शयति— | ईश्वरका विभाग दिखलाकर श्रुति
परमात्माके विज्ञानसे अमृतत्वकी
प्राप्ति प्रदर्शित करती है—

संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च
व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः ।
अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावा-
ज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ८ ॥

परस्पर मिले हुए इस क्षर-अक्षर अथवा व्यक्ताव्यक्तरूप विश्वका
परमात्मा पोषण करता है । मायाधीन जीव भोक्तृभावके कारण उसमें बँधता
है और परमात्माका ज्ञान होनेपर समस्त पाशोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥

संयुक्तमेतदिति । व्यक्तं वि- | 'संयुक्तमेतत्' इत्यादि । व्यक्त-
कारजातमव्यक्तं कारणं तदुभयं | विकारसमूह और अव्यक्त कारण
क्षरमक्षरं च व्यक्तं क्षरं विनाश्य- | ये ही दोनों क्षर और अक्षर हैं ।
व्यक्त्तमक्षरमविनाशि तदुभयं | व्यक्त-क्षर यानी विनाशी है और
परस्परसंयुक्तं कार्यकारणात्मकं | अव्यक्त-अक्षर यानी अविनाशी
विश्वं भरते बिभर्तीश ईश्वरः । | है । परस्पर मिले हुए कार्य-
कारणात्मक विश्वरूप इन दोनोंका
परमात्मा पोषण करता है