श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७
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पुनरपि तस्य स्वरूपं दर्शयन्न- | फिर भी [ आगेके ] दो मन्त्रोंसे
भिप्रेतमर्थं प्रार्थयते मन्त्रद्वयेन— | उसके स्वरूपको प्रदर्शित करती हुई
श्रुति अभिप्रेत अर्थके लिये प्रार्थना करती है—
या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी ।
तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥५॥
हे रुद्र ! तुम्हारी जो मङ्गलमयी, शान्त और पुण्यप्रकाशिनी मूर्ति है,
हे गिरिशन्त ! उस पूर्णानन्दमयी मूर्तिके द्वारा तुम [ हमारी ओर ]
देखो ॥ ५ ॥
या ते रुद्रेति । हे रुद्र तव या | 'या ते रुद्र' इत्यादि । हे रुद्र !
शिवा तनूरघोरा । उक्तं च “तस्यैते | तुम्हारी जो मङ्गलमयी अघोरा (शान्त) मूर्ति है । अन्यत्र ऐसा ही कहा भी
तनुवौ घोरान्या शिवान्या” इति । | है— “उसकी ये दो आकृतियाँ हैं,
अथवा शिवा शुद्धाविद्यातत्कार्य- | एक घोरा है और दूसरी मङ्गलमयी” ।
विनिर्मुक्ता सच्चिदानन्दाद्वयब्रह्म- | अथवा [ तुम्हारी जो मूर्ति ] शिवा— शुद्धा यानी अविद्या और उसके
रूपा न तु घोरा शशिविम्बमि- | कार्योंसे रहित सच्चिदानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूपा है, घोरा नहीं है, अपि तु
वाह्लादिनी । अपापकाशिनी स्मृ- | चन्द्रमण्डलके समान आह्लादकारिणी
तिमात्राघनाशिनी पुण्याभिव्यक्ति- | है; तथा अपापकाशिनी—स्मरणमात्र- से ही पापोंका नाश करनेवाली
करी । तयात्मना नोऽस्माञ्छन्त- | अर्थात् पुण्यकी अभिव्यक्ति करनेवाली
मया सुखतमया पूर्णानन्दरूपया | है, अपनी उस शन्तम–सुखतम–पूर्णानन्दरूप मूर्ति (देह) से हे गिरिशन्त!
हे गिरिशन्त गिरौ स्थित्वा शं | —गिरिमें रहकर शं–सुखका विस्तार
सुखं तनोतीति । अभिचाकशीहि | करनेवाले ! हमें देखो—हमारी ओर