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ननु "विद्यां चाविद्यां च | पूर्व०-किन्तु "जो विद्या (ज्ञान)
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९
पृष्ठ 33स्थायी लिंक
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९
ननु "विद्यां चाविद्यां च | पूर्व०-किन्तु "जो विद्या (ज्ञान)
कर्मणामप्य- यस्तद्वेदोभय सह" | और अविद्या (कर्म) इन दोनोंको
मृतत्वहेतुत्वम् (ईशा० उ० ११)। | साथ-साथ जानता है", "तप और
"तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेय- | ज्ञान ये ब्राह्मणके निःश्रेयसके उत्कृष्ट
सकरं परम्।" इत्यादिना कर्मणाम- | साधन हैं" इत्यादि वाक्योंसे तो
प्यमृतत्वप्राप्तिहेतुत्वमवगम्यते । | कर्मोंका भी अमृतत्वकी प्राप्तिमें हेतु
होना जान पड़ता है ?
सत्यम्, अवगम्यत एव तद- | सिद्धान्ती-ठीक है, जान तो
तच्च तदपे-पेक्षितशुद्धिद्वारेण न | पड़ता ही है; परन्तु ज्ञानके लिये
क्षितशुद्धिद्वारेण च साक्षात् । तथा | अपेक्षित चित्तशुद्धिके द्वारा ही कर्मका
न साक्षात् हि-"विद्यां चाविद्यां | अमृतत्वमें हेतुत्व है, साक्षात् नहीं।
च" (ईशा० उ० ११) । "तपो | इसीसे "विद्यां चाविद्यां च" तथा
विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं | "तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं
परम्।" इत्यादिना ज्ञानकर्मणोर्निः- | परम्" इत्यादि वाक्योंसे ज्ञान और
श्रेयसहेतुत्वमभिधाय कथमनयो- | कर्मका निःश्रेयसमें हेतुत्व बतलाकर
स्तद्धेतुत्वमित्याकाङ्क्षायां "तपसा | ऐसी जिज्ञासा होनेपर कि ये किस
कल्मषं हन्ति विद्ययामृतमश्नुते।" | प्रकार उसके हेतु हैं- "तपसा कल्मषं
"अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यया- | हन्ति विद्ययामृतमश्नुते"* और
मृतमश्नुते" (ईशा० उ० ११) | "अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृत-
इतिवाक्यशेषेण कर्मणः कल्मष- | मश्नुते"† इन वाक्यशेषोंसे कर्मका
क्षयहेतुत्वं विद्याया अमृतप्राप्ति- | पापक्षयमें कारणत्व और ज्ञानका
हेतुत्वं प्रदर्शितम् । यत्र तु | अमृतत्वप्राप्तिमें हेतुत्व प्रदर्शित किया
शुद्ध्याद्यवान्तरकार्यानुपदेशस्त- | है । और भी जहाँ कहीं शुद्धि आदि
त्रापि शाखान्तरोपसंहारन्यायेनो- | अन्य कर्मोंका उपदेश दिखायी न
दे वहाँ भी शाखान्तरोपसंहारन्यायसे‡
- तपसे पाप नष्ट करता है और ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता है ।
† कर्मसे [ संसाररूप ] मृत्युको पार करके ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता है ।
‡ जहाँ एक ही जातिके कर्म या उपासनाका वेदकी विभिन्न शाखाओंमें वर्णन